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भाग 22: चौरासी हज़ार कंकाल, दीवान की हवेली और नमक का पाताल
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 22 of 25
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2874
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. हड्डियों के पाताल में पतन
गिरने की कोई सीमा नहीं थी।
ऐसा लगा मानो कुलधरा की धरती की छाती फट गई हो और समय के उस सबसे निचले गर्त ने कबीर और मीरा को अपने जबड़े में निगल लिया हो।
चारों तरफ़ केवल चीत्कार, हवा की सांय-सांय और टूटते हुए पत्थरों की गड़गड़ाहट थी। नीचे सैकड़ों फीट की गहराई में केवल घोर, अगाध अंधकार फैला था।
धड़ाम! खड़खड़ाहट! चर्र्र!
कबीर और मीरा किसी सख्त ज़मीन या पानी पर नहीं गिरे।
वे एक ऐसे विशाल, भुरभुरे और चरमराते हुए ढेर पर जाकर गिरे, जो उनके वज़न से दबकर कई फीट नीचे धँस गया।
कबीर के मुँह और नथुनों में सूखी, तीखी, खारी धूल भर गई। उसने हांफते हुए, खांसते हुए अपने दोनों हाथों से उस सतह को टटोला जिस पर वह पड़ा था।
उसकी उंगलियाँ पत्थरों से नहीं टकराईं।
उसकी उंगलियाँ सूखी, खोखली इंसानी खोपड़ियों, टूटी हुई पसलियों और जांघों की सूखी हड्डियों के बीच धँस गई थीं!
कबीर ने अपनी जेब से वह इमरजेंसी मिलिट्री टॉर्च निकाली। टॉर्च का स्विच दबाते ही जो दृश्य सफ़ेद रोशनी में सामने आया... उस दृश्य ने कबीर की रीढ़ की हड्डी के भीतर के मज्जा को हमेशा के लिए सुन्न कर दिया।
वह कोई गुफ़ा नहीं थी।
वह कंकालों का एक अंतहीन, मील भर लंबा समंदर था!
जहाँ तक टॉर्च की रोशनी जा रही थी, वहाँ केवल इंसानी हड्डियाँ थीं। लाखों की तादाद में खोपड़ियाँ एक-दूसरे के ऊपर इस तरह ढेरों में लगी थीं जैसे किसी विशाल अनाज के गोदाम में गेहूँ के दाने भरे हों।
और उन हड्डियों के बीच में... पीतल की पुरानी चूड़ियाँ, बच्चों के पैरों के घुंघरू, चांदी की मुड़ी हुई पाजेब और सिंदूर की सूखी, काली पड़ चुकी डिब्बियाँ बिखरी पड़ी थीं।
यह था कुलधरा का वह असली, रूह-कँपा देने वाला सच!
1825 की उस सर्द रात, जब दीवान सालिम सिंह ने चौरासी गाँवों के पालीवाल ब्राह्मणों को उनके परिवारों, उनकी गर्भवती स्त्रियों और उनके नवजातों के साथ इस खाई में ज़िंदा फेंककर ऊपर से नमक और पत्थरों की सिल्लियाँ चुनवा दी थीं!
वे चौरासी हज़ार मासूम रूहें कभी इस रेगिस्तान से बाहर नहीं जा सकी थीं; वे इस पाताल में तड़प-तड़प कर सड़ गई थीं!
"कबीर..."
मीरा की एक बहुत धीमी, कांपती हुई आवाज़ हड्डियों के एक ढेर के पीछे से आई।
कबीर पागलों की तरह उस तरफ़ रेंगा। मीरा अपनी कोहनियों के बल उठी थी। उसके कपड़े फट चुके थे, उसके माथे से ख़ून रिस रहा था, लेकिन उसकी आँखें पागलों की तरह उस अँधेरे में अपने बच्चे को ढूँढ रही थीं।
"हमारा बेटा कहाँ है, कबीर?! वह शैतान उसे कहाँ ले गया?!" मीरा ने हड्डियों को अपने दोनों हाथों से हटाते हुए चीख़ मारी।
तभी—
उस पाताल के सन्नाटे को चीरती हुई एक ऐसी आवाज़ गूँजी, जिसने उस गुफ़ा की छत से सैकड़ों खोपड़ियों को हिलाकर नीचे गिरा दिया:
खड़-खड़-खड़... हाहाहाहाहा!
2. सालिम सिंह का खूनी दरबार: हड्डियों की हवेली
रोशनी की एक ख़ूनी, लाल लकीर उस गुफ़ा के दूसरे छोर पर जल उठी।
कबीर और मीरा ने उस दिशा में देखा।
उस विशाल भूमिगत गुफ़ा के केंद्र में, काले नमक की एक विशाल चट्टान के ऊपर... जैसलमेर की उस मशहूर 'सालिम सिंह की हवेली' का एक वीभत्स, डरावना और राक्षसी रूप खड़ा था!
हवेली के वे प्रसिद्ध अड़तीस झरोखे (balconies) पीले पत्थरों से नहीं बने थे; वे हज़ारों इंसानी रीढ़ की हड्डियों और पसलियों को जोड़कर तराशे गए थे! हवेली के मुख्य दरवाज़े पर शेरों की मूर्तियों की जगह दो विशाल कंकाल खड़े थे, जिनके हाथों में लोहे की जलती हुई मशालें थीं।
और उस हवेली के मुख्य चबूतरे पर...
इंसानी खोपड़ियों से बने एक विशाल सिंहासन पर दीवान सालिम सिंह बैठा था!
उसका आधा शरीर 1825 के उस पतभ्रष्ट, अय्याश दीवान का सड़ा हुआ माँस था—जिसने ज़रीदार कश्मीरी अचकन, मोतियों का नौलखा हार और सिर पर राजपूती पगड़ी पहन रखी थी। उसकी एक आँख में कीड़े रेंग रहे थे और गालों का गोश्त गलकर दाँतों से चिपक गया था।
और उसका आधा शरीर उस रेगिस्तान के प्राचीन शैतान—'ग़ूल-ए-सहरा'—का था, जिसके कन्धों से सियार और गिद्ध के भयानक मुँह निकलकर हवा में ज़हरीला थूक फेंक रहे थे!
और उस सिंहासन के ठीक सामने, काले नमक की एक वेदी पर...
कबीर और मीरा का नवजात बेटा पड़ा हुआ था!
वह बच्चा रो भी नहीं पा रहा था।
उस काले नमक की वेदी से एक ऐसी ज़हरीली, रासायनिक ठंडक निकल रही थी जो उस बच्चे की नन्ही त्वचा से उसकी जीवन-ऊष्मा और नमी को सोख रही थी। बच्चे के होंठ नीले पड़ रहे थे और उसकी छाती का वह चांदी का कमल का निशान बुझने की कगार पर था।
"स्वागत है, कबीर मेहरा! स्वागत है, ज़ोहरा की आख़िरी बेटी!"
सालिम सिंह ने अपनी सड़ी हुई उंगलियों से उस बच्चे के नन्हे गाल को छुआ। उसकी आवाज़ में सियार की गुर्राहट और दरबारी फ़ारसी का घिनौना मिश्रण था:
"दो सौ साल तक मैंने इस नमक की सेज पर अपनी भूख को पाला है। उस दिन 1825 में, जब उन अभागे पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी बेटियों को मुझे सौंपने से इनकार कर दिया था... तो मैंने उनसे कहा था कि तुम्हारी अगली सात पीढ़ियों तक कोई बच्चा इस रेगिस्तान में नहीं हँसेगा!
और आज... इस सूर्यवंशी बालक की अंतिम साँस इस काले नमक में समाएगी, और मैं इस पाताल से निकलकर पूरे राजस्थान पर अपनी लाशों की हुकूमत क़ायम करूँगा!"
3. चौरासी हज़ार आत्माओं का प्रेत-जाल
कबीर ने अपना वह मुग़ल भस्म से सना चांदी का खंजर निकाला और आगे झपटा: "सालिम सिंह! मैं तेरी इस सड़ी हुई खोपड़ी के टुकड़े कर दूँगा!"
लेकिन इससे पहले कि कबीर दो कदम भी आगे बढ़ पाता—
सालिम सिंह ने अपने सिंहासन के पास रखे एक विशाल, लोहे के कड़ाह की तरफ़ इशारा किया—'नमक की हांडी'।
उस कड़ाह में चौरासी गाँवों के मुख्य आचार्यों की जलने के बाद बची हुई काली राख और नमक का एक खौलता हुआ घोल भरा था।
सालिम सिंह ने एक लोहे के भारी त्रिशूल से उस कड़ाह के घोल को हिला दिया।
छ्छ्छ्छ्र्र्र!
एक भयानक, चीखती हुई रासायनिक गंध फैली।
और उस घोल के हिलते ही—
उस गुफ़ा की ज़मीन पर बिछे वे हज़ारों कंकाल हरकत में आ गए!
हवा में एक ऐसा सामूहिक, दिल दहला देने वाला विलाप गूँज उठा जिसने कबीर के कानों से ख़ून निकाल दिया।
हज़ारों की तादाद में सफ़ेद, पारदर्शी, फटी हुई आँखों वाले प्रेत—पुरुष, महिलाएँ और छोटे बच्चे—उस हड्डियों के ढेर से बाहर निकल आए।
दो सौ साल के असहनीय दर्द और उस नमक के अज़ाब ने उन पवित्र ब्राह्मणों की रूहों को 'विक्षिप्त पिशाचों' (Feral Wraiths) में बदल दिया था! वे अपनी सुध-बुध खो चुके थे। वे केवल दर्द में जल रहे थे।
"ख़ून... हमें ताज़ा ख़ून दो!"
"हमारी प्यास बुझाओ!"
"हमें इस नमक की जलन से आज़ाद करो!"
हज़ारों ठंडे, चिपचिपे, पारदर्शी हाथ कबीर और मीरा की तरफ़ बढ़े।
वे हाथ कबीर के कपड़ों को फाड़ने लगे, उसकी त्वचा को खुरचने लगे। कबीर ने अपने खंजर से वार किया, लेकिन रूहों को काटा नहीं जा सकता था; वे हवा की तरह थीं जो कबीर के फेफड़ों के भीतर घुसकर उसकी साँसों को जमा रही थीं।
कबीर घुटनों के बल गिर पड़ा।
मीरा को दर्जनों प्रेत-हाथों ने ज़मीन पर दबा लिया था।
सालिम सिंह अपनी अचकन को संवारते हुए हँसा: "देखा तुमने? ये वही ब्राह्मण हैं जिनकी इज़्ज़त की तुम दुहाई दे रहे थे! दो सौ साल का अंधकार किसी भी साधु को पिशाच बना देता है! अब ये तुम्हारे ही जिस्म का माँस नोचकर अपनी इस अनंत भूख को मिटाएँगे!"
4. मीरा का महा-विलाप: मरुधरा का मर्सिया
कबीर का दम घुट रहा था।
उसके गले पर दसियों ठंडी रूहानी उंगलियों का शिकंजा था। वह देख सकता था कि उस काले नमक की वेदी पर उसका बेटा अब बिल्कुल शांत हो चुका था—उसकी छाती की धड़कन रुकने वाली थी।
तभी—
उस गुफ़ा के नरक में एक ऐसी आवाज़ गूँजी जिसने हवा के उस ज़हरीले बहाव को एक ही पल में रोक दिया।
यह आवाज़ किसी हथियार की नहीं थी।
यह आवाज़ मीरा की थी।
मीरा ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। उसके माथे का घाव चमक रहा था, और उसकी छाती से... चावड़ी बाज़ार की उस गायिका ज़ोहरा और इस थार रेगिस्तान की उन चौरासी हज़ार कुल-वधुओं का संयुक्त दर्द एक प्राचीन राजस्थानी लोक-विलाप (मरुधरा का मर्सिया) बनकर बाहर फूट पड़ा!
मीरा का गला किसी वीणा के तार की तरह कांप रहा था:
"ओ म्हारो बीरो... ओ म्हारी मायड़...
थारी कोख रो जायो आज थारे ही कांकड़ में रोवे!
कांई थे भूल गया उस सांवण री तीज ने?
कांई थे भूल गया उस कुल री लाज ने?
एक माँ थारे आंगणे आपरा लाल मांगन आई है...
उठो म्हारी धरम-बहेनां... उठो!"
वह कोई साधारण गीत नहीं था।
वह एक माँ का अपनी पूर्वज माताओं से किया गया सीधा रूहानी संवाद था!
उस आवाज़ में इतना अगाध, इतना पवित्र और इतना चीर देने वाला मातृत्व-शोक था कि उस गुफ़ा में तैरती हुई उन हज़ारों प्रेत-स्त्रियों के साए अचानक ठिठक गए।
एक बूढ़ी प्रेत-स्त्री—जिसकी छाती से उसके बच्चे का कंकाल चिपका था—उसने अपने हाथ कबीर के गले से हटा लिए।
उसकी आँखों के कोटरों से दो सौ साल बाद पहली बार आंसुओं की ठंडी बूँदें टपक पड़ीं।
दूसरी स्त्री रुकी... तीसरी रुकी...
और कुछ ही पलों में, वे चौरासी हज़ार प्रेत उस खूनी उन्माद से बाहर आ गए!
उनकी यादें वापस लौट आईं। उन्हें याद आया कि वे कौन थे—वे विद्वान, त्यागी, धर्मनिष्ठ पालीवाल ब्राह्मण थे, जिन्होंने अपनी मर्यादा के लिए अपने प्राण त्यागे थे, न कि किसी के बच्चे का ख़ून पीने वाले पिशाच!
उन प्रेतों की आँखें कबीर और मीरा से हटकर... सीधे उस सिंहासन पर बैठे दीवान सालिम सिंह पर जाकर टिक गईं!
हवा में अब विलाप नहीं था; हवा में चौरासी हज़ार पूर्वजों का महा-क्रोध एक खूनी आँधी बनकर घूमने लगा!
5. हड्डियों की हवेली का विध्वंस और सालिम सिंह का अंत
सालिम सिंह के चेहरे का वह सड़ा हुआ माँस दहशत से कांप उठा।
उसके कंधे पर बैठा वह गिद्ध-मुँह पागलों की तरह चीख़ने लगा: "नहीं! इन्हें रोको! यह नमक का कड़ाह हिलाओ!"
सालिम सिंह ने त्रिशूल उठाया।
लेकिन इससे पहले कि वह उस 'नमक की हांडी' को छू पाता—
कबीर बिजली की फुर्ती से उछला!
कबीर के दोनों पत्थर बन चुके हाथ उस भारी, लोहे के कड़ाह के दोनों सिरों पर जा टिके।
"यह तुम्हारी उस पाप की हांडी का अंत है, सालिम सिंह!" कबीर दहाड़ा।
उसने अपनी पूरी ताक़त से उस कई टन वजनी लोहे के कड़ाह को उठाया और सीधे उस हड्डियों की हवेली के केंद्रीय खंभे पर दे मारा!
तड़ाक! भभक! क्रैश!
कड़ाह फट गया।
काले नमक का वह खौलता हुआ घोल फर्श पर बिखर गया, और उसके भीतर बंधी उन चौरासी मुख्य आचार्यों की पवित्र भस्म हवा में एक सफ़ेद, दिव्य प्रकाश का बवंडर बनकर उड़ गई!
उस बंधन के टूटते ही—
वे चौरासी हज़ार प्रेत एक विशाल, सफ़ेद सुनामी की तरह उस सिंहासन पर टूट पड़े!
चीखखखखख!
सालिम सिंह की ऐसी भयानक, नरक-कँपा देने वाली चीख़ निकली जिसने उस पूरी पाताल-गुफ़ा की छत को हिला दिया।
हज़ारों प्रेत-हाथों ने सालिम सिंह के उस सड़े हुए शरीर को पकड़ लिया।
किसी ने उसकी अचकन फाड़ दी, किसी ने उसके गिद्ध वाले सिर को उखाड़ दिया, तो किसी ने उसकी पसलियों की एक-एक हड्डी को तोड़ डाला। उसका वह 'ग़ूल-ए-सहरा' वाला आधा जिन्न-स्वरूप उन चौरासी हज़ार रूहों के पवित्र क्रोध की आग में तिनके की तरह जलने लगा!
सालिम सिंह का शरीर उस हड्डियों के ढेर पर घिसटता हुआ, गलकर काले कीचड़ में बदल गया और हमेशा के लिए उस ज़मीन के भीतर समा गया!
दो सौ साल पुराना वह शाप... उस पवित्र क्षमा और प्रतिशोध के साथ समाप्त हो चुका था।
वे चौरासी हज़ार रूहें हवा में हाथ जोड़कर मुस्कुराईं। उन्होंने मीरा और कबीर के सिर पर अपना रूहानी आशीर्वाद दिया, और वे सब एक साथ उस गुफ़ा की छत को चीरते हुए स्वर्ग के प्रकाश में विलीन हो गईं।
6. बच्चे की साँसें और सरस्वती का गुप्त सोता
कबीर दौड़ा।
उसने उस काले नमक की वेदी से अपने नन्हे बेटे को उठा लिया।
बच्चे की त्वचा ठंडी थी, लेकिन जैसे ही कबीर ने अपनी छाती की गर्मी से उसे लगाया, और मीरा ने अपने आंसुओं से उस बच्चे के माथे को चूमा...
उस बच्चे की छाती का वह कमल का निशान फिर से सुनहरे रंग में धधक उठा!
बच्चे ने एक लंबी, ताज़ा साँस ली। उसकी आँखें खुलीं—पूरी तरह सामान्य, मासूम, मानवीय आँखें! उसने अपनी माँ की उंगली को कसकर पकड़ लिया और किलकारी मार दी।
"हमारा बेटा... हमारा बच्चा ठीक है!" मीरा रोते हुए हँस पड़ी।
कबीर ने दोनों को अपनी बाहों में भींच लिया।
लेकिन राहत का यह पल बहुत छोटा था।
सालिम सिंह के मरते ही, वह हड्डियों की हवेली और उस पाताल-गुफ़ा की छत ताश के पत्तों की तरह ढहने लगी थी। भारी-भारी पत्थर ऊपर से गिर रहे थे।
"यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता कहाँ है?" कबीर ने चारों तरफ़ देखते हुए कहा।
तभी, उस ढहते हुए सिंहासन के ठीक नीचे, ज़मीन की एक विशाल चट्टान खिसक गई।
उस चट्टान के नीचे... पत्थरों की एक चौड़ी, प्राचीन सीढ़ी नीचे जा रही थी जहाँ से पानी के कल-कल बहने की बहुत तेज़, मीठी आवाज़ आ रही थी।
यह कोई गंदा पानी नहीं था।
यह उस पौराणिक, लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी (The Lost Vedic Saraswati) की वह गुप्त, भूमिगत धारा थी जो हिमालय से निकलकर राजस्थान के इस रेगिस्तान के हज़ारों फीट नीचे आज भी बह रही थी!
"नीचे चलो!" कबीर ने मीरा का हाथ पकड़ा।
वे दोनों उस सीढ़ी से नीचे उतरे और उस भूमिगत नदी के रेतीले किनारे पर पहुँच गए। पानी इतना साफ़ था कि तलहटी के पत्थर साफ़ दिखाई दे रहे थे।
7. वह भयानक, रोंगटे खड़े कर देने वाला महा-ट्विस्ट: माँ की वापसी (The Twist)
कबीर ने सोचा था कि वे इस नदी के किनारे-किनारे किसी निकास की तरफ़ बढ़ेंगे।
लेकिन जैसे ही टॉर्च की रोशनी उस भूमिगत नदी के पानी पर पड़ी...
सामने जो दृश्य था, उसने कबीर के मस्तिष्क के सारे न्यूरॉन्स को एक ही सेकंड में जलाकर राख कर दिया।
उस पौराणिक, प्राचीन सरस्वती नदी के किनारे... पत्थरों का कोई पुराना घाट नहीं बना था।
वहाँ एक अत्यंत आधुनिक, कंक्रीट और टाइटेनियम का बना हुआ सबमरीन डॉक (Subterranean Submarine Dock) बना हुआ था!
डॉक पर शक्तिशाली सफ़ेद एलईडी फ़्लडलाइट्स जल रही थीं। बिजली के भारी-भारी जनरेटरों की घुरघुराहट गूँज रही थी।
और पानी की सतह पर... एक काले रंग की, आधुनिक, गुप्त डीप-सी न्यूक्लियर सबमर्सिबल (Nuclear Submersible) बंधी हुई थी!
उस पनडुब्बी की धातु की बॉडी पर बड़े-बड़े अक्षरों में भारत सरकार के सबसे गुप्त वैज्ञानिक संगठन का लोगो छपा था:
‘DRDO — ADVANCED OCCULT SCIENCES & NEURO-GENETICS WING’
‘प्रोजेक्ट अग्नि-पुत्र: फेज़ 4’
कबीर के हाथ-पाँव काठ हो गए। "डीआरडीओ? यहाँ... राजस्थान के इस पाताल में?!"
तभी—
उस पनडुब्बी का भारी, गोल हैच-डोर 'हिसस्स' की आवाज़ के साथ खुला।
अंदर से प्रेशराइज़्ड केबिन की सफ़ेद भाप बाहर निकली।
और उस हैच से बाहर निकलकर, उस कंक्रीट के डॉक पर जो महिला क़दम रख रही थी...
उसने पूरे शरीर पर सफ़ेद रंग का अत्याधुनिक रेडिएशन-सूट पहन रखा था। उसने अपने चेहरे से पारदर्शी हेलमेट का शीशा ऊपर किया।
उस महिला की उम्र लगभग पचास-पचपन साल थी। उसके चेहरे पर वही तीखी नाक थी, वही गहरी आँखें थीं जो कबीर की अपनी थीं।
कबीर का दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा उसकी छाती फट जाएगी।
उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके मुँह से निकली आवाज़ किसी मरे हुए इंसान की चीख़ जैसी थी:
"माँ...?"
सुमित्रा मेहरा! कबीर की अपनी सगी माँ!
वही माँ, जिसके बारे में कबीर के पिता ने बताया था कि वह जब दस साल का था, तब उसकी माँ की एम्स अस्पताल में कैंसर से मौत हो चुकी थी! जिसकी अस्थियाँ कबीर ने ख़ुद हरिद्वार के गंगा घाट पर अपने नन्हे हाथों से विसर्जित की थीं!
सुमित्रा मेहरा के चेहरे पर किसी माँ का प्यार, कोई ममता या कोई आँसू नहीं था।
उसके चेहरे पर एक बर्फीली, निर्मम और क्रूर वैज्ञानिक मुस्कान थी। उसके हाथ में एक अत्याधुनिक, उच्च-आवृत्ति वाला ध्वनिक न्यूरो-डिस्रप्टर (Acoustic Neuro-Disruptor) हथियार था।
सुमित्रा ने उस हथियार का रुख़ सीधे कबीर के सीने की तरफ़ कर दिया।
उसकी आवाज़ में कोई मातृत्व नहीं था; वह एक ऐसी डायरेक्टर की आवाज़ थी जिसने अपनी प्रयोगशाला के चूहों को अपना काम पूरा करते देख लिया हो:
**"शाबाश, कबीर...
तुमने मेरा काम बहुत आसान कर दिया।
तुमने कोटला के उस जिन्न को भी मार दिया, भानगढ़ के उस तांत्रिक को भी भस्म कर दिया, और कुलधरा के इस शाप को भी साफ़ कर दिया।
तुमने सोचा था कि तुम्हारी माँ कैंसर से मर गई थी?
कितनी नादान हो तुम!
तुम्हारी माँ डीआरडीओ और इस देश के सबसे बड़े डीप-स्टेट सिंडिकेट की चीफ़ साइंटिफ़िक डायरेक्टर है!
तुम्हारे पिता, तुम्हारे दादा, तुम्हारी यह पत्नी मीरा... सब इस 'प्रोजेक्ट अग्नि-पुत्र' के वे जेनेटिक इनक्यूबेटर थे जिन्हें मैंने ख़ुद अपनी फ़ाइलों में डिज़ाइन किया था!
अब बिना कोई नौटंकी किए... उस बच्चे को मुझे सौंप दो, कबीर...
क्योंकि भारत के नए सुपर-सोल्जर और इस नए युग के जीवित परमाणु-अस्त्र का असली ट्रायल... अब मेरी लैब में शुरू होगा!"**
सुमित्रा के पीछे, उस पनडुब्बी के भीतर से दर्जनों अत्याधुनिक, ब्लैक-ऑप्स कमांडोज़ अपनी असॉल्ट राइफ़लों के साथ बाहर निकल आए और उन्होंने कबीर और मीरा को घेर लिया!
कबीर उस पौराणिक नदी के किनारे बुत बना खड़ा था...
उसने शैतानों से लड़ाई की थी, प्रेतों से लड़ाई की थी, राजाओं से लड़ाई की थी...
लेकिन अब उसके सामने उसकी अपनी सगी माँ खड़ी थी, जिसने उसके पूरे जीवन, उसके प्रेम और उसके बच्चे को केवल एक वैज्ञानिक हथियार बनाने का षड्यंत्र रचा था!