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भाग 21: कुलधरा का महा-श्मशान, चौरासी गाँव का शाप और रेत की प्रेत-सेना
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 21 of 25
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2949
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. भानगढ़ की वीरान प्राचीर और माता-पिता का महा-संकल्प
इंसान जब अपनी जान के लिए लड़ता है, तो वह थक सकता है, वह पीछे हट सकता है, वह हार मान सकता है।
लेकिन जब एक पिता और एक माँ अपने कलेजे के टुकड़े को किसी दैत्य, किसी सुल्तान या किसी अमर महारानी के पंजों से छुड़ाने के लिए निकलते हैं... तो वे मनुष्य नहीं रहते। वे ब्रह्मांड के उस आदिम क्रोध में बदल जाते हैं जिसके आगे काल भी अपना रास्ता बदल लेता है।
भानगढ़ के सात-मंज़िला खंडहर महल के उस टूटे हुए चबूतरे पर कबीर खड़ा था।
उसके दोनों हाथों में वह मिट्टी की खोखली गुड़िया टूटी पड़ी थी। उसकी हथेलियों पर श्मशान की सूखी भस्म और सड़े हुए सरसों के बीज हवा में उड़ रहे थे। सामने, अरावली की पहाड़ी की चोटी पर वह श्वेत अरबी घोड़ा और राजकुमारी रत्नावती की वह हज़ारों अमर राजपूत सैनिकों की सेना... हवा के एक सुनहरे बवंडर में विलीन हो चुकी थी।
हवा में केवल घोड़ों की टापों की दूर जाती हुई गूँज और रत्नावती के वे अंतिम, राजसी शब्द गूँज रहे थे:
‘यह बालक इस आर्यावर्त के प्राचीन सूर्यवंश का अंतिम चक्रवर्ती सम्राट है... आज से यह भानगढ़ और मेवाड़ की इस सेना का अधिपति है!’
"कबीर..."
मीरा की आवाज़ में अब कोई लाचारी, कोई आँसू नहीं थे।
वह खड़ी हुई। उसके सिर का घाव भर चुका था, उसकी फटी हुई नर्स की वर्दी पर जमी कालिख अब किसी योद्धा के बख्तरबंद जैसी दिख रही थी। उसकी आँखों में वह ममता की अग्नि धधक रही थी जो किसी भी साम्राज्य को एक फूँक में राख कर सकती थी।
"वे हमारे बेटे को कहाँ ले गए हैं?" मीरा ने कबीर का हाथ पकड़ा।
कबीर ने ज़मीन पर गिरे उस चांदी के खंजर को उठाया।
खंजर की नोक पर अब नीली आग नहीं थी; उस पर भानगढ़ के उस पारद-लिंगम का एक चमकदार, जीवित तरल पारा चिपका हुआ था। और वह पारा... एक जीवित कंपास की तरह, पश्चिम-दक्षिण की दिशा—राजस्थान के उस सबसे गहरे, निर्जन और अभिशप्त रेगिस्तान की तरफ़ मुड़ रहा था जहाँ रेत के सिवा कुछ नहीं था।
"जैसलमेर..." कबीर ने भारी, खुरदुरी आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में एक बर्फीला संकल्प था।
"रत्नावती उसे वहाँ ले गई है जहाँ सूर्य का तेज रेत की छाती में दफ़्न है। कुलधरा!"
"कुलधरा?" मीरा की भृकुटि तन गई। "वह चौरासी गाँवों का शापित, वीरान गाँव?"
"हाँ," कबीर ने कहा।
"इतिहास केवल इतना जानता है कि 1825 में जैसलमेर के अय्याश दीवान सालिम सिंह के अत्याचारों और उसकी हवस से अपनी बेटियों की इज़्ज़त बचाने के लिए पालीवाल ब्राह्मणों के चौरासी गाँव एक ही रात में अपना सब कुछ छोड़कर ग़ायब हो गए थे। और जाते-जाते वे उस ज़मीन को एक ऐसा शाप दे गए थे कि आज तक वहाँ कोई दूसरा इंसान अपना घर नहीं बसा सका।
लेकिन असली सच यह है, मीरा... कि पालीवाल ब्राह्मण केवल पुजारी या व्यापारी नहीं थे; वे सूर्यवंश के उस गुप्त 'सहस्र-रश्मि भूमिगत गर्भगृह' के अंतिम रक्षक थे!
रत्नावती हमारे बेटे का राज्याभिषेक किसी महल में नहीं... कुलधरा के उस शापित पाताल-कुंड में करने गई है ताकि वह अपने उस अमर राजपूत साम्राज्य को इस कलयुग के सीने पर दोबारा स्थापित कर सके!"
कबीर और मीरा ने नीचे आंगन में देखा।
कर्नल राठौड़ की वह बख्तरबंद कस्पर गाड़ी अब चालू हो चुकी थी—पारद-लिंगम के सीधे होते ही उसका विद्युत-चुंबकीय अवरोध समाप्त हो गया था। कबीर ने स्टीयरिंग संभाला, मीरा उसके बगल में बैठी, और वह भारी बख्तरबंद वाहन भानगढ़ की घाटी को चीरता हुआ सीधे थार के रेगिस्तान की तरफ़ दौड़ पड़ा!
2. थार का महा-मरुस्थल और 1825 का जीवित शाप
सात सौ किलोमीटर का वह भयानक सफ़र।
जयपुर, अजमेर, जोधपुर और पोखरण के वीराने को पार करते हुए, जब कस्पर गाड़ी जैसलमेर के पीले बलुआ पत्थरों वाले रेगिस्तान में दाख़िल हुई, तो शाम के छह बज रहे थे।
आसमान में अब वह काला सूर्य नहीं था; असली सूर्य थार के विशाल रेत के टीलों (sand dunes) के पीछे डूब रहा था। आसमान का रंग पिघले हुए सोने और गहरे नारंगी रंग में रंगा था।
लेकिन जैसलमेर शहर से अठारह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में, जैसे ही कस्पर ने उस सूखी, पथरीली कच्ची सड़क पर मोड़ लिया... तापमान अचानक तीस डिग्री से गिरकर जमा देने वाली ठंड में बदल गया।
चारों तरफ़ पीली रेत के बीच, दूर तक फैले हुए कुलधरा के खूनी खंडहर दिखाई दिए।
यह कोई सामान्य वीराना नहीं था।
यहाँ लगभग चार सौ साल पुरानी, लखौरी और पीले पत्थरों से बनी हज़ारों हवेलियों, घरों, चौपालों और मंदिरों के कंकाल खड़े थे। किसी भी घर पर छत नहीं थी; छतें सदियों पहले ढह चुकी थीं, केवल नंगी, चौकोर दीवारें खड़ी थीं जो रेत के समंदर में गड़ी हुई हज़ारों खुली क़ब्रों जैसी लग रही थीं।
हवा में कोई सामान्य सरसराहट नहीं थी।
रेत के टीलों से टकराकर बहती हुई हवा ऐसी आवाज़ निकाल रही थी जैसे हज़ारों औरतें एक साथ अपनी छाती पीट-पीट कर रो रही हों।
सड़क के किनारे खड़े हर एक टूटे हुए मकान की चौखट पर... लाल सिंदूर और गेरू से रंगे हुए सूखे, खूनी हाथों के छापे (Handprints) बने हुए थे।
वे 1825 की उस अंतिम रात उन चौरासी गाँवों की कुल-वधुओं द्वारा लगाए गए शाप के जीवित मुहर थे!
कस्पर गाड़ी कुलधरा के मुख्य प्रवेश द्वार पर जाकर रुक गई।
कबीर और मीरा गाड़ी से नीचे उतरे।
रेत इतनी ठंडी थी जैसे बर्फ़ का चूरा हो। कबीर के हाथ में पकड़े उस खंजर का पारा ज़ोर-ज़ोर से कांपने लगा।
"वे यहाँ हैं," मीरा ने अपने हाथ की चमकती हुई ब्राह्मी लिपि को देखते हुए कहा। "गाँव के केंद्र में... उस प्राचीन बावड़ी और सूर्य-मंदिर के पास!"
3. रेत का राजदरबार और मध्यकालीन छावनी
कबीर और मीरा साए की तरह कुलधरा की संकरी, खंडहर गलियों में आगे बढ़े।
दोनों तरफ़ के टूटे हुए मकानों के आलों में दीये नहीं जल रहे थे; वहाँ रेत के भीतर से निकलती हुई नीली, फॉस्फोरस जैसी रूहानी रोशनी चमक रही थी। पत्थरों से रोने और बर्तनों के खड़कने की आवाजें आ रही थीं—1825 के वे अदृश्य बाशिंदे आज भी अपनी चौखटों पर बैठकर उस भयानक रात का मातम मना रहे थे।
वे गाँव के मुख्य चौक पर पहुँचे।
सामने जो दृश्य था, उसने कबीर और मीरा के होश उड़ा दिए।
कुलधरा के उस वीरान, सूखे चौक में... जहाँ एक प्राचीन बावड़ी और भगवान विष्णु व सूर्य का पुराना मंदिर खड़ा था... वहाँ 16वीं सदी का एक विशाल, वैभवशाली शाही शिविर लगा हुआ था!
लाल मख़मल और सोने की ज़री वाले सैकड़ों तंबू गड़े थे।
तंबुओं के बाहर मशालें जल रही थीं, जिनकी लपटें हवा के बिना भी सीधी, शांत खड़ी थीं।
और उन तंबुओं के चारों तरफ़... हज़ारों की तादाद में 16वीं सदी के राजपूत योद्धा अपने लोहे के बख्तरबंद, जिरह-बख्तर और ढाल-तलवारों के साथ पहरा दे रहे थे।
वे सैनिक इंसान नहीं थे; वे अमर, पाषाण-हृदय प्रेत-योद्धा थे जिनकी आँखों में न कोई दया थी, न दर्द। उनकी तलवारों की धार पर सैकड़ों सालों का सूखा ख़ून जमा था।
और उस चौक के बीचों-बीच, मंदिर की सीढ़ियों पर...
सोने के एक विशाल, नक्काशीदार झूले में... कबीर और मीरा का नवजात बेटा लेटा हुआ था!
बच्चे के माथे पर लाल चंदन और कस्तूरी का एक विशाल 'सूर्य-तिलक' लगाया जा रहा था। उसके नन्हे शरीर पर शुद्ध सोने का एक छोटा-सा शाही कवच पहनाया गया था।
और झूले के पास... राजकुमारी रत्नावती खड़ी थी।
उसने सफ़ेद रेशम की राजपूती पोशाक पहन रखी थी, सिर पर राजमुकुट था, और उसके हाथ में एक सोने का कमंडल था जिसमें उस प्राचीन बावड़ी का अमृत-जल भरा था।
उसके चारों तरफ़ चार वृद्ध, जटाधारी पुरोहित वेद-मंत्रों का पाठ कर रहे थे:
"ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥"
वे बच्चे को इस दुनिया का राजा नहीं बना रहे थे; वे उस बच्चे की आत्मा को इस कुलधरा के पाताल में गड़े उस आदिम सूर्य-चक्र से स्थायी रूप से बाँध रहे थे!
4. पंडित गंगाधर की रूह और भूमिगत सुरंग
"हम सीधे हमला नहीं कर सकते, कबीर," मीरा ने एक टूटी हुई हवेली की ओट से देखते हुए फुसफुसाया। "वे हज़ारों में हैं। अगर उन्होंने बच्चे को उस बावड़ी के पानी में डुबो दिया, तो उसका इंसानी वजूद हमेशा के लिए मिट जाएगा।"
"कोई न कोई रास्ता ज़रूर होगा..." कबीर ने ज़मीन की मिट्टी को मुट्ठी में भींचते हुए कहा।
तभी—
जिस हवेली के तहख़ाने में वे छिपे थे, उसके फ़र्श की एक चौकोर पत्थर की सिल्ली अचानक सरक गई।
चर्र्र्र...
नीचे से एक बूढ़ा, सफ़ेद धोती और जनेऊ पहने साया बाहर निकला।
उसके माथे पर त्रिपुंड था, दाढ़ी छाती तक लटकी थी, और उसकी आँखों में दो सौ साल का गहरा, असीम वैराग्य था।
वह 1825 में कुलधरा को शाप देने वाले चौरासी गाँवों के मुख्य कुलगुरु—पंडित गंगाधर पालीवाल की रूह थी!
"आ गए तुम, कबीर मेहरा..." पंडित गंगाधर की आवाज़ किसी सूखे कुएँ में हवा के गूँजने जैसी थी।
कबीर और मीरा चौंककर पीछे हटे, लेकिन कबीर ने तुरंत हाथ जोड़ लिए: "महाराज... आप कौन हैं? क्या आप भी उस महारानी के साथ हैं?"
पंडित गंगाधर ने अपना सिर नफ़ी (ना) में हिलाया। उनकी आँखों से रेत के बारीक कण आंसुओं की तरह टपके।
"मैं उस अभागे कुल का पुरोहित हूँ, बेटा... जिसने अपनी बेटियों की आबरू बचाने के लिए इस पूरी ज़मीन को अपने ही आंसुओं के शाप में बाँध दिया था।
रत्नावती अंधी हो चुकी है। वह समझती है कि वह अपने सूर्यवंश का पुनरुद्धार कर रही है। वह नहीं जानती कि जिस बावड़ी के मुहाने पर वह बैठी है... उस बावड़ी के नीचे कोई स्वर्ग का खज़ाना नहीं है!"
कबीर का माथा ठनका: "तो उस बावड़ी के नीचे क्या है, पंडित जी?"
पंडित गंगाधर की आवाज़ में भयानक सिहरन दौड़ गई:
"1825 की उस अमावस की रात, जब हम चौरासी गाँव के लोग इस नगर को छोड़कर भागे थे... तो जैसलमेर के उस पापी दीवान सालिम सिंह ने अपने सैनिकों के साथ हमारे पीछे हमला किया था।
उसने हमारे चौरासी सबसे बड़े आचार्यों और उनकी गर्भवती पत्नियों को पकड़कर... इसी बावड़ी के भीतर ज़िंदा फेंक दिया था और ऊपर से पत्थरों की सिल्लियाँ चुनवा दी थीं!
वे चौरासी हज़ार कंकाल आज भी उस बावड़ी के पाताल में तड़प रहे हैं!
और सालिम सिंह... सालिम सिंह मरा नहीं था; उसकी रूह उस रेगिस्तान के सबसे भयानक जिन्न—'ग़ूल-ए-सहरा' (The Desert Ghoul)—के साथ मिलकर उस बावड़ी के तलछट में एक ऐसा नरभक्षी अजगर बन चुकी है जो केवल उस पल का इंतज़ार कर रही है जब कोई पवित्र रक्त उस बावड़ी में गिरे!"
पंडित गंगाधर ने ज़मीन में बने उस गुप्त सुरंग के मुहाने की तरफ़ इशारा किया:
"यह सुरंग सीधे उस सूर्य-मंदिर की मुख्य वेदी के ठीक नीचे खुलती है। जाओ! अपने बच्चे को उस झूले से उठा लो इससे पहले कि रत्नावती का वह अंतिम मंत्र पूरा हो!"
5. मंदिर का महा-संग्राम और ममता का प्रहार
कबीर और मीरा ने एक पल भी नहीं गँवाया।
वे दोनों उस संकरी, अंधेरी सुरंग में रेंगते हुए आगे बढ़े। सुरंग की दीवारों पर 1825 के उन अभागे पुरोहितों की हड्डियाँ और टूटी हुई मालाएँ बिखरी थीं।
कुछ ही मिनटों में वे सूर्य-मंदिर के गर्भगृह के ठीक नीचे पहुँचे।
ऊपर से मंत्रों की गूँज अपने चरम पर थी:
"सूर्यपुत्राय नमः! चक्रवर्ती सम्राज्याय नमः!"
रत्नावती ने अपने दोनों हाथों में उस बच्चे को उठा लिया था। वह मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतरकर उस गहरी, पत्थरीली बावड़ी के मुहाने की तरफ़ बढ़ रही थी। बावड़ी का पानी किसी काले तेल की तरह शांत और भयानक दिख रहा था।
धड़ाम!
मंदिर के गर्भगृह की संगमरमर की जाली को कबीर ने अपने पत्थर बन चुके दोनों हाथों से एक ही झटके में तोड़ दिया!
कबीर और मीरा मलबे को चीरते हुए बाहर निकले।
"रत्नावती! रुक जाओ!" कबीर की गर्जना उस पूरे रेगिस्तान में गूँज उठी।
हज़ारों राजपूत सैनिकों ने एक साथ अपनी तलवारें खींच लीं—झनन्नन्र!
वे कबीर की तरफ़ झपटे।
लेकिन कबीर अब कोई लाचार इंसान नहीं था। उसने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस चांदी के खंजर को हवा में लहराया। खंजर से निकली पवित्र मुग़ल भस्म और निज़ामुद्दीन के पानी की रूहानी तरंगों ने सामने आए पहले दस सैनिकों के बख्तरबंदों को छूते ही राख बना दिया!
सैनिक पीछे हटे। उनकी अमर देह उस पवित्र धातु के आगे जलने लगी थी।
और दूसरी तरफ़—
मीरा एक शेरनी की तरह उछली।
उसने अपने गले की वह अकीक की माला हवा में घुमाई। मीरा के मुँह से ज़ोहरा की वह सात सौ साल पुरानी रूहानी तान फूटी—एक ऐसी तीखी, पराश्रव्य स्वर-लहरी जिसने मंदिर के चारों तरफ़ खड़े उन चारों पाखंडी पुरोहितों के कानों से ख़ून निकाल दिया! पुरोहित ज़मीन पर गिर पड़े।
कबीर ने छलांग लगाई और सीधे उस बावड़ी की मुंडेर पर, रत्नावती के ठीक सामने जा खड़ा हुआ!
6. माता-पिता का दर्पण और पाषाण हृदय का पिघलना
रत्नावती ने अपनी कमर से वह सूर्य-प्रतीक वाली भारी तलवार खींच ली।
उसकी तलवार की नोक कबीर के सीने से केवल एक इंच दूर थी।
"पीछे हटो, कबीर!" रत्नावती की आवाज़ में किसी देवी का रौद्र रूप था।
"तुम इस बालक के भाग्य के बीच में नहीं आ सकते! इस बालक की नियति एक नश्वर मनुष्य की तरह जीना और मरना नहीं है! यह सम्राट है! यह उस अखंड भारत का शासक बनेगा जिसका सपना मेरे पूर्वजों ने देखा था!"
कबीर ने अपनी तलवार नहीं उठाई। उसने अपना खंजर नीचे कर लिया।
उसने अपने दोनों लहूलुहान, फटे हुए हाथ आगे बढ़ा दिए।
कबीर की आँखों में अब कोई क्रोध नहीं था; वहाँ केवल एक पिता का वह असीम, पवित्र दर्द था जो किसी भी तलवार की धार से ज़्यादा गहरा था।
"कैसा सम्राट, रत्नावती?" कबीर की आवाज़ कांप उठी।
"जिस सम्राट की माँ उसकी याद में अपनी छाती पीट-पीट कर मर जाए? जिस सम्राट का पिता अपनी ही औलाद को देखने के लिए तरस जाए?
क्या तुम्हारे पूर्वजों ने यही सिखाया था कि किसी माँ की गोद सूनी करके साम्राज्यों की नींव रखी जाती है?"
कबीर ने आगे बढ़कर उस बच्चे के कम्बल को थोड़ा-सा हटाया।
बच्चे की नन्हीं छाती पर वह चांदी का कमल का फूल... अब काले रंग में बदल रहा था!
बच्चे की आँखों से आँसू बह रहे थे, और वह अपनी नन्हीं, कांपती हुई उंगलियों से हवा में अपनी माँ—मीरा—की तरफ़ हाथ फैला रहा था!
"देखो इसे, रत्नावती!" मीरा सीढ़ियों पर घुटनों के बल बैठकर रो पड़ी।
"यह कोई सिंहासन नहीं माँग रहा है... यह अपनी माँ का दूध माँग रहा है! यह कोई मुकुट नहीं चाहता... यह अपने पिता का सीना चाहता है!
तुम भी तो एक स्त्री थीं, रत्नावती! क्या तुम्हारे सीने में दिल नहीं है? क्या आठ सौ साल के इस घमंड ने तुम्हारी आत्मा को इतना अंधा कर दिया है कि तुम्हें एक बच्चे की सिसकी भी सुनाई नहीं देती?"
रत्नावती की तलवार की नोक... कांपने लगी।
उस अमर महारानी ने उस बच्चे के चेहरे को देखा।
बच्चे के नन्हे गाल पर बहते हुए आंसुओं की बूँदें... रत्नावती के बख्तरबंद पर गिरीं।
और उस एक बूँद ने... आठ सौ साल से जमी उस बर्फ़ को, उस पत्थर बन चुके राजसी अहंकार को एक ही पल में पिघला दिया।
रत्नावती की आँखों में सदियों बाद पहली बार सच्चे, इंसानी आँसू छलक पड़े।
उसकी तलवार उसके हाथ से छूटकर पत्थरों पर गिर पड़ी—खनन्न्र!
"मैंने... मैंने क्या कर दिया..." रत्नावती के होंठ थरथराए। "मैंने अपने ही सूर्य के प्रकाश को अंधकार की वेदी पर चढ़ा दिया..."
रत्नावती ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए।
वह उस बच्चे को कबीर की खुली बाहों में सौंपने ही वाली थी—
उसके चेहरे पर एक पश्चाताप भरी, पवित्र मुस्कान उभर आई थी:
"लो कबीर... अपने बेटे को संभालो... यह तुम्हारा है..."
7. वह भयानक, रोंगटे खड़े कर देने वाला महा-ट्विस्ट: दीवान सालिम सिंह का जागरण (The Twist)
लेकिन जिस पल कबीर की उंगलियाँ उस बच्चे के कम्बल को छूने वाली थीं—
ठीक उसी माइक्रो-सेकंड में...
उस गहरी, शांत, काली बावड़ी के पानी में एक ऐसा भयानक विस्फोट हुआ जिसने पूरी पृथ्वी की छाती को चीर दिया!
बूम! छपाक!
बावड़ी का काला पानी पचास फीट ऊँचा उछला।
और उस पानी के भीतर से...
काले नमक, सड़ी हुई हड्डियों और थार के रेगिस्तान की ज़हरीली रेत से बना हुआ एक विशाल, पचास फीट लंबा कंकाल-रूपी हाथ बाहर निकला!
उस हाथ के नाख़ून लोहे के विशाल भालों जैसे थे।
खचाक!
उस दैत्याकार पंजे ने पीछे से... एक ही वार में... राजकुमारी रत्नावती के सीने को आर-पार चीर डाला!
रत्नावती के मुँह से ख़ून का एक विशाल फव्वारा छूटा। उसकी आँखें अविश्वास और असहनीय पीड़ा से फैल गईं।
उस विशाल हाथ ने रत्नावती के शरीर को तिनके की तरह मरोड़कर बावड़ी की गहराई में फेंक दिया, और अपने दूसरे पंजे से... उस नन्हे बच्चे को हवा में ही झपट लिया!
"कबीर!" मीरा की एक भयानक, दिल दहला देने वाली चीख़ गूँजी।
और फिर—
उस बावड़ी के खौलते हुए काले पानी से जो दैत्य बाहर निकला...
उसका आधा शरीर 1825 के उस क्रूर दीवान सालिम सिंह का सड़ा हुआ, कीड़ों से भरा कंकाल था, जिसने ज़रीदार अचकन और मोतियों की माला पहन रखी थी...
और उसका आधा शरीर उस रेगिस्तान के सबसे भयानक, आदिम जिन्न—'ग़ूल-ए-सहरा'—का था, जिसके सिर पर सियार और गिद्ध के मुँह जुड़े हुए थे!
उसकी आवाज़ में चौरासी हज़ार मरे हुए पालीवाल ब्राह्मणों की हड्डियों के खड़खड़ाने की आवाज़ थी:
**"हाहाहाहाहा!
दो सौ साल तक मैंने इस बावड़ी के कीचड़ में इस पल का इंतज़ार किया था, राजकुमारी!
तूने समझा कि तू सूर्यवंश को जगाएगी?
इस बावड़ी के नीचे कोई खज़ाना नहीं है...
यह वह नरक-कुंड है जहाँ 1825 की उस रात मैंने चौरासी गाँवों के ब्राह्मणों को उनकी गर्भवतियों के साथ ज़िंदा दफ़्न किया था!
और आज... इस सूर्यवंशी बालक का ख़ून उन चौरासी हज़ार भूखे प्रेतों की प्यास बुझाएगा!"**
उस दैत्य ने अपनी पूँछ को ज़मीन पर मारा।
धड़ाम!
कुलधरा का पूरा का पूरा मंदिर, वह बावड़ी और उसके आसपास की ज़मीन ताश के पत्तों की तरह ढह गई!
एक विशाल, अथाह खाई खुल गई।
और कबीर, मीरा, वह बच्चा और वह महा-दैत्य... एक साथ उस ज़मीन के नीचे दबे चौरासी हज़ार कंकालों के उस पाताल-अंधियारे में समा गए!