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भाग 20: भानगढ़ का नरक-कुंड, पारद-लिंगम और गुरु बालू नाथ की गुफ़ा
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 16 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 20 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3020
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
. तांत्रिक का नग्न रूप और प्रेतों का महा-चक्रवात
कर्नल विक्रम राठौड़ की वह फ़ौजी वर्दी ज़मीन पर किसी पुराने, सड़े हुए केंचुली की तरह बिखरी पड़ी थी।
और उस वर्दी के भीतर से जो आठ सौ साल पुराना कंकाल-रूपी दैत्य बाहर निकला था—तांत्रिक सिंघावत—उसका शरीर नश्वर मनुष्यों जैसा नहीं था। उसकी चमड़ी पर श्मशान की सूखी, नीली-सफ़ेद चिता-भस्म की तीन परतें चढ़ी थीं। उसकी पसलियों की हड्डियाँ बाहर निकली हुई थीं, जिनके बीच में काले ज़हरीले बिच्छू रेंग रहे थे। उसके सिर की जटाएँ ज़मीन तक लटक रही थीं, जिनमें नरमुंडों के छोटे-छोटे ताबीज़ हवा में टकराकर खड़खड़ा रहे थे—खट-खट-खट!
उसकी दोनों आँखों के कोटरों में सामान्य पुतलियाँ नहीं थीं; वहाँ रक्त के दो उबलते हुए कुंड थे, जिनसे गहरा लाल धुआँ रिसकर भानगढ़ की पथरीली ज़मीन पर फैल रहा था।
"हाहाहाहा!"
सिंघावत का वह भयानक, गगनभेदी अट्टहास अरावली की नंगी, सूखी पहाड़ियों से टकराकर दस गुना बड़ा होकर लौटा।
उसकी उस आवाज़ के निकलते ही—
भानगढ़ के उस तीन परकोटों वाले विशाल खंडहर-नगर में एक रूह-कँपा देने वाला हाहाकार मच गया।
हनुमान पोल से लेकर बाज़ार की टूटी हुई दुकानों तक, सोमेश्वर मंदिर की वीरान सीढ़ियों से लेकर गोपीनाथ मंदिर की छतरियों तक... हज़ारों की तादाद में 16वीं सदी के प्रेत अपनी-अपनी क़ब्रों और मलबों से बाहर निकल आए!
वे प्रेत सामान्य साए नहीं थे।
वे उन अभागे नागरिकों की रूहें थीं जो 1573 के उस शापित नगर में तांत्रिक सिंघावत के उस काले जादू की रात एक ही पहर में तड़प-तड़प कर मरे थे। किसी का आधा धड़ सड़ा हुआ था, किसी की खोपड़ी के भीतर से काली ज्वाला निकल रही थी। वे सब अपने घुटनों के बल रेंगते हुए, पागलों की तरह चीख़ते हुए कबीर और मीरा की तरफ़ बढ़ रहे थे!
"सिंघावत!" कबीर ने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस मुग़ल भस्म से दैदीप्यमान चांदी के खंजर को कसकर भींच लिया।
कबीर के दोनों पैर अब पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। उस खांडवप्रस्थ की पाताल-अग्नि और ज़हर ने कबीर की त्वचा को काले ग्रेनाइट जैसा कठोर बना दिया था। उसने मीरा को अपनी पीठ के पीछे कर लिया।
"तुमने एक सच्चे सिपाही की खाल पहनकर हमारे साथ छल किया, सिंघावत! लेकिन तुम भूल गए कि मैं दिल्ली के उस कोटला और इंद्रप्रस्थ के नर्क को चीरकर यहाँ तक पहुँचा हूँ!"
सिंघावत के होंठों पर एक घिनौनी, सड़ी हुई मुस्कान उभरी:
"दिल्ली? अरे अज्ञानी बालक! दिल्ली तो केवल एक सराय है जहाँ बाहर के मुग़ल और तुर्क आकर अपनी क़ब्रें खोदते रहे!
असली तंत्र, असली पाताल की धुरी तो इस अरावली के सीने में गड़ी है!
मैंने आठ सौ साल पहले इस भानगढ़ के नीचे उस धुरी को बाँधा था। मुझे केवल उस रक्त की प्रतीक्षा थी जो सूर्य और पाताल की अग्नि का साझा वारिस हो... और वह रक्त तुम्हारी बाहों में सो रहा है!"
सिंघावत ने अपनी भस्म से पुती, सूखी उंगलियों को हवा में लहराया।
सननन्र!
काले ताँबे की चार विशाल, अदृश्य ज़ंजीरें ज़मीन को फाड़कर बाहर निकलीं।
इससे पहले कि कबीर अपना खंजर चला पाता, उन ज़ंजीरों ने कबीर की दोनों कलाइयों और टखनों को हवा में ही जकड़ लिया! कबीर का शरीर खिंचकर पत्थरों से जा टकराया।
और दूसरी तरफ़, दो ज़ंजीरें मीरा के कन्धों पर जा लिपटीं।
मीरा के हाथ से वह नवजात शिशु छूटने ही वाला था कि मीरा ने अपने दोनों दाँतों से उस बच्चे के कम्बल के सिरे को पकड़ लिया और घुटनों के बल पत्थरों पर बैठ गई!
2. सात-मंज़िला महल का पाताल-कक्ष और पारे की गंध
"चलो, मेरे अतिथियों..." सिंघावत की आवाज़ में किसी अजगर की फुसफुसाहट थी।
"उस काले सूर्य का अमृत तैयार हो चुका है। अब इस नगर के असली देवता का अभिषेक होगा!"
उन ताँबे की ज़ंजीरों ने कबीर और मीरा को ज़मीन पर घसीटना शुरू कर दिया।
वे दोनों भानगढ़ के उस सात-मंज़िला खंडहर महल के विशाल, टूटे हुए 'सूरज पोल' के भीतर खींचे जा रहे थे।
महल के भीतर का दृश्य बाहर से भी अधिक भयानक था।
महल की ऊपरी चार मंज़िलें सदियों पहले गिर चुकी थीं, लेकिन ज़मीन के नीचे जो तीन मंज़िलें थीं—जिन्हें 'पाताल-दालान' कहा जाता था—वहाँ दिन के इस पहर भी घोर, दमघोंटू अंधकार छाया हुआ था।
जैसे-जैसे वे नीचे उतर रहे थे, हवा का दबाव इतना बढ़ रहा था कि कबीर के कानों के पर्दे फटने लगे।
और हवा में...
हवा में कपूर या लोबान की गंध नहीं थी; वहाँ उबलते हुए पारे (Mercury Vapor) की एक ऐसी मीठी, नशीली और फेफड़ों को गला देने वाली गंध थी जो सीधे तंत्रिका तंत्र (nervous system) पर हमला कर रही थी।
वे सातवीं मंज़िल के सबसे निचले, गुप्त तहख़ाने में जा गिरे।
धड़ाम!
ज़ंजीरें पत्थरों के खंभों में बँध गईं।
कबीर ने हांफते हुए अपनी आँखें खोलीं।
यह कमरा किसी साधारण महल का तहख़ाना नहीं था।
यह अरावली की उस प्राचीन, प्रागैतिहासिक ग्रेनाइट चट्टान को अंदर से खोखला करके बनाया गया एक विशाल, गोलाकार तांत्रिक गर्भगृह था।
कमरे की गोलाकार दीवारों पर काले पत्थर में नरबलि, यक्ष-यक्षिणियों और अघोर-साधना के सैकड़ों वीभत्स चित्र खुदे हुए थे।
और उस विशाल कक्ष के ठीक बीचों-बीच...
फर्श पर काले संगमरमर का एक विशाल अरघा (योनि-पीठ) बना था, और उस पीठ के ऊपर स्थापित था—'महा-पारद लिंगम' (The Great Mercury Lingam)!
वह लिंगम किसी पत्थर या धातु का नहीं था।
वह शुद्ध, घनीभूत, जीवित तरल पारे (Liquid Mercury) का एक चार फीट ऊँचा खंभा था!
वह पारा बिना किसी आग के भी अपनी सतह पर खौल रहा था—गुल... गुल... खदबद!—और उसके भीतर से गहरे बैंगनी रंग की चुंबकीय तरंगें निकलकर सीधे ऊपर की तरफ़ जा रही थीं, जहाँ छत में एक संकरा, सीधा छेद था जो सीधे आसमान में चमक रहे उस काले सूर्य की सीध में खुलता था!
यह वही खगोलीय और भू-गर्भीय नाभि-केंद्र था, जिसने पूरी पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव को उल्टा घुमा रखा था!
3. राजकुमारी रत्नावती का शाप और गुरु बालू नाथ की समाधि
सिंघावत उस खौलते हुए पारद-लिंगम के पास जाकर खड़ा हो गया।
उसने अपनी जटाओं से एक सूखा हुआ, नरकंकाल का पंजा निकाला और उसे उस पारे की सतह पर छुआ दिया।
लिंगम से नीली-बैंगनी लपटें फूट पड़ीं।
"कबीर मेहरा..." सिंघावत ने मुड़कर कबीर की आँखों में देखा, जो दर्द से लाल हो चुकी थीं।
"तुम इतिहास के पन्ने पलटते रहे, लेकिन तुमने कभी उस पन्ने को नहीं पढ़ा जिसे मुग़ल और कछवाहा राजाओं ने जला दिया था!
तुम सोचते हो कि मैंने इस नगर को केवल इसलिए शाप दिया था क्योंकि राजकुमारी रत्नावती ने मेरे वशीकरण के इत्र को एक चट्टान पर पटक दिया था?
कितना मूर्खतापूर्ण झूठ है यह!"
सिंघावत ने उस खौलते हुए लिंगम की तरफ़ इशारा किया:
"राजकुमारी रत्नावती कोई सामान्य स्त्री नहीं थी! वह सूर्यवंशी राजपूतों की उस 'अग्नि-शिखा' परंपरा की आख़िरी रक्षिका थी, जिसके पास इस अरावली के चुंबकीय ध्रुव को बांधने वाली 'सूर्य-मणि' थी!
और उस पहाड़ी की चोटी पर बैठा वह तपस्वी—गुरु बालू नाथ—उसने इस पूरे क्षेत्र पर एक ऐसा रूहानी ताला लगा रखा था कि जब तक महल की परछाईं उसकी कुटिया पर नहीं पड़ती, तब तक पाताल का यह पारा कभी खौल नहीं सकता था!"
सिंघावत की आँखों में 800 साल पुरानी नफ़रत की ज्वाला भड़क उठी:
"मैंने रत्नावती को वश में करने की कोशिश इसलिए की थी ताकि मैं उसकी उस सूर्य-मणि को छीन सकूँ!
लेकिन जब उसने उस मणि को उस चट्टान पर पटककर मुझे कुचलने की कोशिश की... तो मैंने अपनी अंतिम साँस में इस पूरे नगर की तीस हज़ार जीवित रूहों को एक ही पल में इस पारे के भीतर क़ैद कर दिया!
वे तीस हज़ार रूहें आठ सौ साल से इस पारद-लिंगम की बैटरी बनकर जल रही हैं!
और आज... आज जब आसमान में वह काला सूर्य अपने चरम पर है... मुझे केवल इस एक नवजात के रक्त की आहुति चाहिए ताकि यह पारा पूरी पृथ्वी के गर्भ में समा जाए और धरती का हर महाद्वीप हमेशा के लिए अंधेरे के पाताल में डूब जाए!"
सिंघावत ने अपने हाथ आगे बढ़ाए।
ताँबे की वह ज़ंजीर, जिसने मीरा को जकड़ रखा था, अपने आप खिंचने लगी।
मीरा के सीने से वह बच्चा छूटकर हवा में तैरता हुआ सीधे उस खौलते हुए पारद-लिंगम के ऊपर पहुँच गया!
बच्चे की छाती का वह चांदी का कमल का निशान उस पारे की बैंगनी लपटों को छूते ही दर्द से तड़प उठा। बच्चा नींद से जाग गया और उसकी नन्हीं, मासूम चीख़ उस पाताल-कक्ष में गूँज उठी:
ऊँआआआ... ऊँआआआ!
4. पत्थर की देह और मीरा का रूहानी मंत्र
"मेरे बच्चे को छोड़ दो, दरिंदे!"
मीरा पागलों की तरह छटपटाई।
और उस मातृत्व के चरम बिंदु पर, मीरा के भीतर की वह ज़ोहरा की वंशावली एक बार फिर बिजली की तरह भड़क उठी।
मीरा की दोनों कलाइयों पर खुदे हुए वे प्राचीन ब्राह्मी अक्षर अचानक सूर्य की तरह चमकने लगे!
ॐ नमः शिवाय... महाकाल भैरवाय नमः!
मीरा के मुँह से वह आदिम मंत्र फूटा जो गुरु बालू नाथ की परंपरा का मूल बीज-मंत्र था!
मीरा के शरीर से निकली उस पवित्र, रूहानी ऊर्जा ने उन ताँबे की ज़ंजीरों को एक ही झटके में भस्म कर दिया!
मीरा आज़ाद हो गई!
उसने ज़मीन पर गिरी वही कर्नल राठौड़ की भारी स्नाइपर राइफ़ल उठाई और बिना सोचे-समझे, प्वाइंट-ब्लैंक रेंज से सीधे तांत्रिक सिंघावत के सीने पर ट्रिगर दबा दिया!
धाँय! धाँय! धाँय!
भारी .50 कैलिबर की गोलियाँ सिंघावत की सूखी पसलियों को चीरती हुई पार निकल गईं।
सिंघावत दर्द और अविश्वास से लड़खड़ाया। उसके सीने के घावों से ख़ून नहीं, बल्कि काला, बदबूदार कीचड़ बह निकला।
"मूर्ख स्त्री!" सिंघावत दहाड़ा।
उसने अपना भस्म से पुता हाथ हवा में घुमाया और मीरा को एक प्रचंड रूहानी थप्पड़ मारा। मीरा हवा में दस फीट उछली और पत्थर के खंभे से टकराकर बेहोश हो गई। उसका सिर फूट गया और ख़ून फर्श पर बहने लगा।
लेकिन उस कुछ सेकंड के भटकाव ने कबीर को वह मौका दे दिया जिसकी उसे तलाश थी!
कबीर ने अपनी छाती और अपनी जांघों की मांसपेशियों को पूरी ताक़त से सिकोड़ा।
उसकी देह में जो खांडवप्रस्थ की पाताल-अग्नि और अरावली का पाषाण-ज़हर फैला था... कबीर ने उसे अपनी कमज़ोरी नहीं, अपना कवच बना लिया!
उसकी त्वचा अब इंसान की चमड़ी नहीं थी; वह काले ग्रेनाइट की चट्टान बन चुकी थी!
चर्र्र्र्र्र्र्क!
कबीर ने अपनी दोनों पत्थर बन चुकी बाहों को पूरी ताक़त से झटका।
ताँबे की वे प्राचीन ज़ंजीरें कबीर की चट्टानी ताक़त के आगे तिनकों की तरह टूटकर बिखर गईं!
कबीर ज़मीन पर उतरा। उसकी आँखें लाल अंगारों की तरह दहक रही थीं।
उसने ज़मीन पर पड़े उस मुग़ल भस्म से दैदीप्यमान चांदी के खंजर को अपने पत्थर जैसे हाथ में थाम लिया और एक ही छलांग में सीधे उस खौलते हुए पारद-लिंगम के चबूतरे पर जा पहुँचा!
5. पारद-लिंगम का महा-द्वंद्व और कबीर का अंतिम दाँव
"सिंघावत!"
कबीर की आवाज़ किसी पहाड़ के फटने जैसी गूँजी।
सिंघावत मुड़ा। उसकी आँखों में पहली बार एक जीवित मनुष्य की उस पाषाण-मुद्रा को देखकर सच्चा, आदिम ख़ौफ़ उभरा।
"तू... तू पत्थर बन चुका है?" सिंघावत की आवाज़ कांपी।
"हाँ!" कबीर ने दहाड़ लगाई।
"तुमने इस ज़मीन के पत्थरों को शाप दिया था, सिंघावत! आज वही पत्थर तुम्हारी मौत बनकर आया है!"
कबीर ने अपने खंजर का एक भयानक, आकाशीय वार किया।
खंजर की चांदी ने सिंघावत के दाएँ कंधे को चीर दिया। तांत्रिक की बाह कटकर उस खौलते हुए पारे के कुंड में जा गिरी!
चीखखखखख!
सिंघावत की ऐसी अमानवीय, नरक-कँपा देने वाली चीख़ निकली जिसने भानगढ़ की पहाड़ियों की चोटियों को हिला दिया।
तांत्रिक ने अपने बचे हुए बाएँ हाथ से कबीर की गर्दन को जकड़ लिया। उसकी उंगलियों के नाख़ून कबीर की पत्थर जैसी चमड़ी को खुरचने लगे, चिंगारियाँ फूटने लगीं।
"अगर मैं मरूँगा, कबीर... तो इस पूरी पृथ्वी को अपने साथ ले जाऊँगा!"
सिंघावत ने पागलों की तरह हँसते हुए उस तैरते हुए बच्चे की तरफ़ देखा।
वह अपने पूरे वज़न के साथ उस बच्चे को उस खौलते हुए पारद-लिंगम के मुंह में डुबोने के लिए झपटा!
"नहीं!"
कबीर के पास सोचने का एक मिली-सेकंड भी नहीं था।
अगर वह बच्चा उस पारे में गिर जाता, तो उसकी दैवीय अग्नि उस पारे के साथ मिलकर पूरी पृथ्वी के कोर को हमेशा के लिए फाड़ देती।
कबीर ने अपना खंजर छोड़ दिया।
उसने अपने दोनों पत्थर बन चुके हाथों को... सीधे उस खौलते हुए तरल पारद-लिंगम के भीतर घुसा दिया!
छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्छ्र्र्र्र्र्र्र्र!
एक ऐसा अवर्णनीय, ब्रह्मांडीय दर्द उठा जिसकी कोई सीमा नहीं थी।
खौलता हुआ, ज़हरीला पारा कबीर के हाथों की नसों में उतरने लगा।
लेकिन कबीर की देह पहले से ही पाषाण और पाताल-अग्नि से बनी थी! वह पारा कबीर की हड्डियों में जाकर जमने लगा।
कबीर ने अपने दोनों हाथों से उस लिंगम के केंद्र में स्थापित उस 'उल्टे चुंबकीय चक्र' को पकड़ लिया...
और उसने अपने दाँत भींचकर, अपनी आत्मा की अंतिम ऊर्जा लगाकर, उस चक्र को पूरी ताक़त से दाहिनी तरफ़ (घड़ी की दिशा में) घुमा दिया!
कड़कड़ाती बिजली! तड़ाक!
6. ध्रुवों का सीधा होना और काले सूर्य का पतन
जैसे ही कबीर ने उस पारद-लिंगम के ध्रुव को सीधा किया—
पूरे भानगढ़ के नीचे की ज़मीन में एक ऐसा रूहानी विस्फोट हुआ जिसने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को एक ही झटके में अपनी मूल धुरी पर खींच लिया!
वह खौलता हुआ पारा अचानक शांत हो गया। उसका रंग बैंगनी से बदलकर शुद्ध, दर्पण जैसा चमकीला चांदी बन गया।
और ऊपर—
आसमान में वह जो काला सूर्य पश्चिम से उग रहा था...
उस काले सूर्य की परिधि में एक भयानक, विशाल दरार पड़ी!
चर्र्र्र्र्र्र्क! बूम!
वह काला सूर्य किसी शीशे के गोले की तरह आसमान में ही चकनाचूर हो गया!
उसकी काली किरणें हवा में भाप बनकर उड़ गईं।
और उस टूटते हुए अंधकार के पीछे से...
पूरब दिशा में, अरावली की चोटियों के पीछे से... सच्चे, तेजस्वी, जीवनदाता सूर्य की सुनहरी, गर्म किरणें फूट पड़ीं!
वह असली प्रभात था!
किरणों के छूते ही भानगढ़ के वे हज़ारों प्रेत शांत होने लगे। उनकी सदियों की पीड़ा मिटने लगी, और वे सब सफ़ेद, पवित्र प्रकाश में बदलकर आकाश की ओर मोक्ष पाकर उड़ने लगे।
नीचे तहख़ाने में, तांत्रिक सिंघावत का शरीर उस सुनहरी धूप की एक किरण के पड़ते ही जलने लगा।
"नहीं! यह प्रकाश... यह मुझे जला रहा है!"
सिंघावत चीख़ता हुआ ज़मीन पर लोटने लगा। उसकी हड्डियाँ, उसकी जटाएँ, उसकी भस्म... सब कुछ उस पवित्र सूर्य-प्रकाश में गलकर राख के एक काले ढेर में तब्दील हो गई!
सिंघावत का अंत हो चुका था। 800 साल पुराना शाप टूट चुका था।
कबीर ने अपने हाथों को उस शांत पारे से बाहर खींचा।
उसके हाथ अब पत्थर नहीं थे; पारे के शुद्धिकरण ने उस ज़हर को सोख लिया था। उसके हाथ वापस एक सामान्य, हाड़-माँस के मानवीय हाथ बन चुके थे!
उसने हवा से गिरते हुए उस नन्हे बच्चे को अपनी बाहों में लपक लिया।
बच्चा पूरी तरह सुरक्षित था। वह कबीर के सीने से चिपक गया और चैन से अँगूठा चूसने लगा।
मीरा को होश आ गया था। वह लड़खड़ाती हुई उठी और कबीर के गले से लग गई। दोनों की आँखों से खुशी के, विजय के और राहत के आँसू बह रहे थे।
"कबीर... हम जीत गए..." मीरा ने बच्चे के माथे को चूमते हुए कहा। "सूर्य वापस अपनी जगह आ गया... दिल्ली बच गई... पूरी दुनिया बच गई!"
कबीर ने मुस्कुराते हुए अपने बेटे को देखा। उसने अपने जीवन में पहली बार इतनी शांति, इतना सुकून महसूस किया था।
वे दोनों उस अंधेरे तहख़ाने की सीढ़ियों से ऊपर चढ़े और भानगढ़ के उस सात-मंज़िला महल के मुख्य चबूतरे पर आकर खड़े हो गए।
सुबह की ताज़ा, ठंडी हवा उनके चेहरों को छू रही थी। चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। खंडहर अब डरावने नहीं, बल्कि एक शांत, मुक्त इतिहास जैसे लग रहे थे।
7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: राजकुमारी रत्नावती की सेना (The Twist)
कबीर ने अपनी गोद में सो रहे उस बच्चे को प्यार से निहारा।
वह उस बच्चे के नन्हे गाल पर अपना हाथ फेरने ही वाला था कि...
अचानक, उसकी उंगलियों को कुछ बहुत अजीब महसूस हुआ।
बच्चे की त्वचा...
वह कोई जीवित, गर्म इंसानी चमड़ी नहीं थी!
कबीर का हाथ ठिठक गया।
उसने कांपती नज़रों से उस कम्बल को हटाया जो बच्चे के ऊपर लिपटा हुआ था।
और जो उसने देखा...
उस दृश्य ने कबीर के मस्तिष्क के भीतर के सारे ख़ून को एक ही सेकंड में जमा दिया।
उसकी आँखों के आगे पूरा ब्रह्मांड एक बार फिर घूमने लगा।
उस कम्बल के भीतर... कोई ज़िंदा बच्चा नहीं था!
कबीर की गोद में... काली मिट्टी और पकी हुई टेराकोटा (terracotta) की बनी एक प्राचीन, खोखली गुड़िया रखी हुई थी!
उस गुड़िया की छाती पर वही चांदी का कमल का फूल खुदा हुआ था, और उसके भीतर से सड़े हुए सरसों के बीज और श्मशान की सूखी भस्म रिसकर कबीर की हथेली पर गिर रही थी!
"यह... यह क्या है?!" कबीर के मुँह से एक दबी हुई, पागलों जैसी चीख़ निकली।
मीरा ने जब उस मिट्टी की गुड़िया को देखा, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई: "मेरा बच्चा कहाँ है?! कबीर, हमारा बेटा कहाँ है?!"
तभी—
भानगढ़ के महल के ठीक सामने, अरावली की उस सबसे ऊँची पहाड़ी की चोटी पर... जहाँ गुरु बालू नाथ की प्राचीन छतरी खड़ी थी...
शंखों और रणभेरी की एक ऐसी गगनभेदी, राजसी ध्वनि गूँज उठी जिसने पूरे अलवर के पहाड़ों को हिला दिया!
पों-पों-पों! धू-धू-धू! (युद्ध के नगाड़ों की गूँज)
कबीर और मीरा ने कांपते हुए अपनी नज़रें उस पहाड़ी की चोटी पर उठाईं।
और जो उन्होंने देखा...
उस दृश्य ने उनके अस्तित्व की अंतिम ईंट को भी उखाड़ फेंका।
पहाड़ी की चोटी पर, गुरु बालू नाथ की उस पवित्र छतरी के सामने...
एक विशाल, श्वेत अरबी घोड़े पर एक महारानी सवार थी।
उसने 16वीं सदी के राजपूताना के शुद्ध सोने और फ़ौलाद का बख्तरबंद पहन रखा था। उसके सिर पर पन्नों और मोतियों से जड़ा हुआ राजसी मुकुट था। उसके एक हाथ में सूर्य-प्रतीक वाली भारी तलवार थी।
उसका रूप इतना अनुपम, इतना दिव्य और इतना राजसी था कि कोई भी मनुष्य उसके आगे सजदे में झुक जाए।
वह कोई और नहीं थी...
वह स्वयं राजकुमारी रत्नावती थी!
ज़िंदा! अमर! हाड़-मांस की देह में!
और सबसे भयानक बात—
राजकुमारी रत्नावती के बाएँ हाथ में... उसकी छाती से चिपका हुआ... कबीर और मीरा का असली, जीवित नवजात बेटा था!
वह बच्चा रत्नावती की छाती से लगा हुआ शांति से मुस्कुरा रहा था!
और रत्नावती के पीछे...
उस पहाड़ी की ढलानों पर... हज़ारों की तादाद में 16वीं सदी के राजपूत शूरवीरों की एक जीवित, अमर सेना नंगी तलवारें और भाले लिए खड़ी थी!
रत्नावती की आवाज़ उस घाटी में किसी सोने के घंटे की तरह गूँज उठी:
**"धन्यवाद, कबीर मेहरा!
तुमने उस पाखंडी तांत्रिक सिंघावत का वध करके... मेरे आठ सौ साल पुराने निर्वासन को समाप्त कर दिया!
उस तांत्रिक ने समझा था कि वह इस बच्चे से दुनिया को भस्म करेगा...
और तुमने समझा कि तुम इसे एक साधारण घर का बालक बनाकर पालोगे!
कितने नादान हो तुम दोनों!
यह बालक किसी साधारण मेहरा ख़ानदान का चिराग़ नहीं है...
यह बालक इस आर्यावर्त के प्राचीन 'सूर्यवंश' का अंतिम चक्रवर्ती सम्राट है!
आज से... यह बालक भानगढ़ और मेवाड़ की इस सेना का अधिपति है!
और तुम दोनों... इस इतिहास के वे प्यादे थे जिन्होंने अपना कार्य पूर्ण कर दिया है!"**
रत्नावती ने अपनी तलवार हवा में लहराई।
और उस सेना के हज़ारों सैनिकों ने एक साथ अपनी ढालों को तलवारों से पीटते हुए गगनभेदी जयघोष किया:
"महाराजाधिराज कबीर-पुत्र की जय!
सूर्यवंश का नया सूर्य उदय हो चुका है!"
कबीर और मीरा उस टूटे हुए महल के चबूतरे पर खड़े थे...
सिंघावत मर चुका था, काला सूर्य डूब चुका था... लेकिन उनका अपना सगा बेटा अब एक प्राचीन, अमर क्षत्रिय साम्राज्य का बंदी सम्राट बन चुका था, जिसे वापस पाने के लिए उन्हें उस इतिहास से लड़ना था जो कभी मरा ही नहीं था!