PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 19: पश्चिम का काला सूर्य, अरावली की खूनी खाई और भानगढ़ का निमंत्रण

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
19 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
17 min
Words
3263
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. उल्टे ब्रह्मांड की भोर और मृत किरणों का तांडव
जब प्रकृति अपने नियम तोड़ती है, तो सबसे पहले मनुष्य का मस्तिष्क आत्मसमर्पण करता है।

शेर मंडल की अष्टकोणीय पत्थर की खिड़की से बाहर का दृश्य किसी भी धार्मिक ग्रंथ में वर्णित प्रलय के दिन (कयामत / महाप्रलय) से भी अधिक वीभत्स था।

सुबह के ठीक पाँच बजकर बत्तीस मिनट हुए थे।

लेकिन दिल्ली के आसमान पर पूरब दिशा—यमुना और गाज़ियाबाद की तरफ़—अथाह, स्याह और घोर अंधकार छाया हुआ था। और पश्चिम दिशा में... जहाँ धौला कुआँ, अरावली की सूखी पहाड़ियाँ और थार का रेगिस्तान फैला था... वहाँ क्षितिज को चीरता हुआ एक विशालकाय, धधकता हुआ 'काला सूर्य' धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था!

वह कोई प्रकाश देने वाला सूर्य नहीं था।

वह सूर्य के आकार का एक ऐसा अंध-पिंड था जिसकी परिधि से नारंगी या पीली किरणें नहीं, बल्कि पराबैंगनी (ultraviolet) और गहरी बैंगनी-काली किरणें बाहर फूट रही थीं। वे किरणें जहाँ-जहाँ पड़ रही थीं, वहाँ उजाला होने के बजाय चीजें अंधी हो रही थीं।

भौतिकी के नियम उल्टे हो चुके थे।

कबीर ने खिड़की से नीचे देखा—पेड़ों और इमारतों की परछाइयाँ पश्चिम की तरफ़ नहीं, बल्कि पूर्व की तरफ़ उलटी दिशा में खिंच रही थीं! यमुना का पानी बहने के बजाय पीछे की तरफ़, अपने उद्गम की ओर उल्टी दिशा में चढ़ने लगा था।

आकाश में उड़ने वाले परिंदे—चील, कबूतर और कौवे—हवा में आगे उड़ने के बजाय अजीब, हिंसक झटकों के साथ पीछे की तरफ़ उड़ रहे थे, और कुछ ही पलों में उनके पंख जम रहे थे और वे पत्थरों की तरह ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो रहे थे।

हवा का तापमान बढ़ने के बजाय हर मिनट दो डिग्री नीचे गिर रहा था।

उस काले सूर्य की किरणों में ऐसी अप्राकृतिक, कॉस्मिक ठंडक थी जो हड्डियों के भीतर के मज्जा (bone marrow) को जमा रही थी।

"यह... यह संभव नहीं है..." कर्नल विक्रम राठौड़ शेर मंडल की खिड़की के लोहे के सरियों को पकड़े कांप रहे थे।

उनके चेहरे पर लगा सैन्य अनुशासन उस खगोलीय विनाश के आगे धूल बन चुका था। उनके हाथ में पकड़े सैटेलाइट कम्युनिकेटर की स्क्रीन पर नासा (NASA) और इसरो (ISRO) के अंतिम, विकृत और कटे-फटे ऑटोमेटेड बुलेटिन स्क्रॉल हो रहे थे:

[ISRO-HQ EMERGENCY BROADCAST]

"ग्लोबल जियोमैग्नेटिक शील्ड शून्य हो चुकी है।

पृथ्वी का नॉर्थ पोल और साउथ पोल 180 डिग्री घूम चुके हैं।

मैग्नेटिक नार्थ अब अंटार्कटिका में नहीं... थार रेगिस्तान के ठीक नीचे केंद्रित हो रहा है!

सूर्य के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम ने फोटॉन छोड़ना बंद कर दिया है...

वह प्रकाश को सोख रहा है! वी हैव लॉस्ट द सन... गॉड सेव आवर सोल्स..."

कबीर ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

उसकी नसों में जो ज़हर और पिघली हुई चांदी उसने अपने बेटे के शरीर से खींची थी, वह उस काले सूर्य की बैंगनी किरणों के संपर्क में आते ही बर्फ़ की तरह जमने लगी थी। उसकी त्वचा पर नीली नसें किसी नक्शे की तरह उभर आई थीं।

तभी, नीचे अष्टदल कमल के पत्थर पर लेटे उस नवजात शिशु ने अपनी आँखें खोलीं।

वह रो नहीं रहा था।

उसकी नन्हीं, दूधिया छाती पर वह कमल के आकार की चांदी की जन्म-निशानी... उस काले सूर्य की बैंगनी किरणों को देखकर एक लयबद्ध धड़कन के साथ चमक रही थी।

धक... धक... धक...

हर बार जब बच्चे की छाती की वह निशानी धड़कती थी, आसमान में वह काला सूर्य एक इंच ऊपर चढ़ जाता था!

2. शून्य का भार और अरावली का प्राचीन ग्रिड
"कबीर... यह बच्चा..." मीरा ने लड़खड़ाते हुए बच्चे को अपनी गोद में उठाया।

मीरा की हथेलियों के वे भयानक जलने के घाव... अब पूरी तरह भर चुके थे!

हैरानी की बात यह थी कि जब उस बच्चे ने अपनी माँ की छाती को छुआ था, तो मीरा की जली हुई त्वचा पर कोई निशान नहीं बचा था; उसकी जगह उसकी दोनों कलाइयों पर बहुत बारीक, प्राचीन ब्राह्मी लिपि के अक्षर सोने की तरह चमकने लगे थे।

मीरा की आँखें अब किसी आम डरी हुई लड़की जैसी नहीं थीं; उसके भीतर ज़ोहरा की वह सात पीढ़ियों पुरानी रूहानी वंशावली पूरी तरह जाग चुकी थी।

"मीरा, क्या तुम इसे महसूस कर सकती हो?" कबीर ने अपनी कांपती उंगलियों से उस बच्चे के माथे को छुआ।

"हाँ, कबीर," मीरा की आवाज़ में एक अजीब, अलौकिक गहराई थी।

"यह काला सूर्य कोई नया तारा नहीं है। जब तुमने उस महाशून्य पाषाण से इस बच्चे की अग्नि को सोखा, तो उस पाषाण ने पृथ्वी के उस गुप्त 'नाभि-केंद्र' को हिला दिया जिसे तीन हज़ार साल पहले बांधा गया था।

यह बच्चा उस काले सूर्य का 'एंकर' (लंगर) बन गया है। जब तक यह इस दिल्ली की ज़मीन पर रहेगा, यह काला सूर्य ऊपर चढ़ता रहेगा... और जब यह ठीक दोपहर के बारह बजे सिर पर पहुँचेगा... तो पृथ्वी का वायुमंडल अंतरिक्ष के शून्य में बह जाएगा!"

"तो इसे कैसे रोकें?" कर्नल राठौड़ ने अपनी एस्बेस्टस जैकेट को कसते हुए पूछा। "अगर यह पूरी पृथ्वी का मामला है, तो हम कहाँ जाएँ? कोई सेफ़ ज़ोन बचा है?"

"एक जगह है, कर्नल साहब," कबीर ने शेर मंडल की दीवार पर खुदे उस अष्टकोणीय नक्षत्र-चक्र की तरफ़ इशारा किया।

दीवार पर पत्थर में तराशा गया नक्शा केवल दिल्ली का नहीं था। उस नक्शे में अरावली पर्वतमाला की प्राचीन शृंखला को एक विशाल, कुंडली मारे हुए नाग के रूप में उकेरा गया था।

और उस नाग का सिर... दिल्ली के रायसीना हिल और पुराने क़िले पर था... लेकिन उसकी नाभि और उसकी पूँछ कहाँ थी?

कबीर की उंगली नक्शे के उस बिंदु पर जाकर टिक गई जहाँ राजस्थान के अलवर ज़िले की वीरान, कटीली पहाड़ियों के बीच एक नाम खुदा था:

‘भानगढ़ — तांत्रिक सिंघावत का पाताल-द्वार!’

"भानगढ़..." कर्नल राठौड़ का माथा ठनका। "राजस्थान का वह शापित क़िला? जहाँ पुरातत्व विभाग ने सूर्यास्त के बाद रुकने पर क़ानूनी पाबंदी लगा रखी है?"

"वही, कर्नल साहब," कबीर ने गंभीर स्वर में कहा।

"इतिहास केवल एक प्रेमकथा जानता है—कि तांत्रिक सिंघावत राजकुमारी रत्नावती पर मोहित हो गया था और उसके शाप से वह नगर एक ही रात में वीरान हो गया।

लेकिन वह केवल एक लोककथा थी ताकि आम इंसान उस जगह से दूर रहें!

असली सच यह है कि तांत्रिक सिंघावत गुरु गोरखनाथ की परंपरा का एक बागी 'नाथ-सिद्ध' था। उसने उस क़िले के नीचे पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव को बाँधने वाला एक विशाल 'पारद-लिंगम' (Mercury Core Anchor) स्थापित किया था!

अगर हम इस बच्चे को उस पारद-लिंगम के केंद्र पर रखकर उस चक्र को सीधा नहीं करेंगे... तो यह काला सूर्य कभी नहीं डूबेगा!"

3. DMRC के भूमिगत रास्ते और धौला कुआँ का महा-श्मशान
पुराने क़िले के बाहर निकलना अब आत्महत्या जैसा था।

सड़कों पर काले सूर्य की बैंगनी किरणें कंक्रीट और डामर को गला रही थीं। हवा का दबाव इतना कम हो चुका था कि खुले में साँस लेने पर नथुनों से ख़ून फूट रहा था।

"हम ज़मीन के ऊपर से नहीं जा सकते," कर्नल राठौड़ ने अपने सामरिक नक्शे को देखते हुए कहा।

"लेकिन हमारे पास एक रास्ता है। दिल्ली मेट्रो की 'एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन'—नई दिल्ली स्टेशन से लेकर धौला कुआँ और द्वारका तक—ज़मीन के अस्सी फीट नीचे एक गहरी टनल में चलती है। उसका ट्रैक कंक्रीट और भारी शील्डिंग से सुरक्षित है। अगर हम उस टनल के रास्ते धौला कुआँ तक पहुँच जाएँ, तो वहाँ सेना के वेस्टर्न कमांड का अंडरग्राउंड डिपो है, जहाँ बख्तरबंद 'कस्पर' और 'स्ट्राइकर' वाहन मौजूद हैं!"

वे तीनों उस बच्चे को एक मोटे, थर्मल मिलिट्री कम्बल में लपेटकर पुराने क़िले के गुप्त निकास द्वार से बाहर निकले।

कर्नल राठौड़ ने आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन के आपातकालीन एयर-शाफ्ट के लोहे के ग्रिल को अपनी भारी कटर-कुल्हाड़ी से काट दिया।

वे एक-एक करके उस अंधेरे, अस्सी फीट गहरे शाफ्ट में उतर गए।

नीचे, मेट्रो की टनल में एक दमघोंटू, भारी सन्नाटा था।

पटरियों पर इमरजेंसी की पीली लाइटें बहुत धीमी, अंतिम बैटरी-बैकअप पर झिलमिला रही थीं। हवा में जली हुई रबर और इंसुलेशन की गंध थी।

कबीर, मीरा और कर्नल राठौड़ पटरियों के बीचो-बीच दौड़ रहे थे। कबीर के हाथ में वही मुग़ल भस्म से सना चांदी का खंजर था, जिसकी चमक इस पाताल में टॉर्च का काम कर रही थी।

पटरियों पर जगह-जगह मेट्रो की खाली ट्रेनें खड़ी थीं, जिनके शीशे भीतर से टूटे हुए थे।

सीटों पर लोगों के पर्स, मोबाइल फ़ोन और जूते लावारिस पड़े थे—जैसे ट्रेन में बैठे हज़ारों यात्री एक ही पल में हवा में भाप बनकर उड़ गए हों!

दो घंटे की निरंतर, दमघोंटू दौड़ के बाद वे धौला कुआँ मेट्रो स्टेशन के भूमिगत जंक्शन पर पहुँचे।

यहाँ का दृश्य देखकर कर्नल राठौड़ के क़दम वहीं जम गए।

धौला कुआँ का वह विशाल भूमिगत स्टेशन किसी प्राचीन युद्ध के श्मशान में बदल चुका था।

स्टेशन के विशाल कॉनकोर्स (concourse) हॉल में भारतीय सेना के कम से कम चालीस कमांडोज़ की लाशें ज़मीन पर पड़ी थीं।

लेकिन उन लाशों पर गोली का कोई निशान नहीं था।

उनके पूरे शरीर बर्फ़ की तरह नीले पड़ चुके थे, और उनके चेहरों की आँखें, नाक और कान पूरी तरह पिघलकर काले मोम की तरह बह चुके थे! उनकी छाती पर उनकी उँगलियों के नाख़ूनों से एक ही शब्द खुरच कर लिखा गया था:

‘सिंघावत जाग गया है!’

4. सेना का बख्तरबंद दैत्य और एनएच-48 का खूनी सफ़र
"कमांडोज़..." कर्नल राठौड़ घुटनों के बल बैठ गए। उनकी आँखों में आँसू थे। ये उनकी अपनी 'स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स' की टुकड़ी थी।

"इन्हें किसी हथियार ने नहीं मारा, कर्नल साहब," मीरा ने एक लाश की नब्ज़ को छूते हुए कहा। उसकी उंगलियों के ब्राह्मी अक्षर चमक उठे।

"इन्हें उस काले सूर्य की पहली किरण ने मारा है। जब सूर्य उल्टा उगता है, तो इंसान के भीतर का पानी उसके ख़ून को उबाल देता है। हमें तुरंत उस बख्तरबंद गाड़ी में बैठना होगा!"

स्टेशन के पीछे बने सेना के अंडरग्राउंड व्हीकल बे (Vehicle Bay) में एक विशाल, आठ पहियों वाला दक्षिण अफ़्रीकी शैली का 'कस्पर 4x4 आर्मर्ड पर्सनल कैरियर (Casspir APC)' खड़ा था।

यह वाहन ज़मीन की बारूदी सुरंगों और परमाणु-जैविक-रासायनिक (CBRN) हमलों को झेलने के लिए सीलबंद कंक्रीट और टाइटेनियम मिश्र धातु से बना था।

कर्नल राठौड़ ने ड्राइवर की सीट संभाली। उन्होंने भारी इग्निशन स्विच ऑन किया।

गर्र्र्र्र्र्र्र्क! धड़-धड़-धड़!

गाड़ी का भारी वी-शेप डीजल इंजन एक भयानक गर्जना के साथ जाग उठा। बख्तरबंद गाड़ी के भारी बुलेटप्रूफ़ शीशों पर सीसा-युक्त (lead-lined) काली परत चढ़ी थी, जो उस काले सूर्य की पराबैंगनी किरणों को रोक सकती थी।

"सब लोग हार्नेस बाँध लो!" कर्नल राठौड़ ने चिल्लाकर गियर डाला।

धड़ाम!

कस्पर ने अंडरग्राउंड डिपो के भारी लोहे के शटर को तोड़ा और सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग 48 (NH-48 — दिल्ली-जयपुर हाईवे) की चौड़ी सड़क पर छलांग लगा दी!

बाहर का मंज़र किसी हॉरर फ़िल्म से भी परे था।

गुड़गांव (गुरुग्राम) के वे विशाल, शीशे के साइबर-सिटी वाले गगनचुंबी टॉवर उस काले सूर्य के नीचे किसी विशाल, जले हुए कंकालों की तरह खड़े थे। सड़कों पर हज़ारों गाड़ियाँ एक-दूसरे से टकराकर जल रही थीं।

और उन जलती हुई गाड़ियों के मलबे के बीच से...

अरावली की पहाड़ियों से निकलकर हज़ारों की तादाद में 'आदिम मरु-जिन्नात' और 'असुर-साए' हाईवे पर रेंग रहे थे!

वे साए दिल्ली के आम जिन्नों जैसे नहीं थे।

वे पचास-पचास फीट लंबे, कटीले, पत्थरों जैसे सख्त और हड्डियों से बने दैत्य थे, जिनके शरीरों पर लाखों बिच्छुओं और सांपों की खालें लिपटी थीं। यह अरावली पर्वतमाला—जो दुनिया की सबसे प्राचीन वलित पर्वतमाला (oldest fold mountains) मानी जाती है—के गर्भ में करोड़ों सालों से सोए हुए प्रागैतिहासिक प्रेत थे!

"वे हमारी तरफ़ आ रहे हैं!" मीरा ने पीछे के छोटे बुलेटप्रूफ़ शीशे से देखते हुए चिल्लाया।

कर्नल राठौड़ ने एक्सीलेटर को पूरा फर्श तक दबा दिया: "कसकर पकड़ो!"

धड़ाक! क्रैश!

कस्पर का भारी, नुकीला बम्पर उन पत्थरीले सायों से टकराया। हड्डियों और पत्थरों के टूटने की भयानक आवाज़ें आईं।

गाड़ी की छत पर लगे 12.7 मिमी के रिमोट वेपन स्टेशन (RWS) से कर्नल राठौड़ ने जॉयस्टिक के ज़रिये गोलियों की बौछार शुरू कर दी। हेवी-कैलिबर के इनसिंडियरी (आग लगाने वाले) राउंड्स उन दैत्यों के सीनों में छेद कर रहे थे, लेकिन वे साए रुक नहीं रहे थे; वे हाईवे पर उस गाड़ी का पीछा कर रहे थे!

5. अरावली का कंकाल और राजस्थान की खूनी सीमा
तीन घंटे के उस भयानक, खूनी सफ़र के बाद, कस्पर धारूहेड़ा, रेवाड़ी और नीमराना के वीराने को पार करता हुआ राजस्थान के अलवर ज़िले की सीमा में दाख़िल हुआ।

यहाँ हाईवे ख़त्म हो चुका था।

चारों तरफ़ अरावली की सूखी, नंगी, काली पहाड़ियाँ थीं। इन पहाड़ियों पर एक भी पत्ता या घास का तिनका नहीं था; ऐसा लग रहा था मानो किसी विशालकाय दैत्य की रीढ़ की सूखी हड्डियाँ ज़मीन से बाहर निकल आई हों।

आसमान में वह काला सूर्य अब लगभग 45 डिग्री के कोण पर चढ़ चुका था।

उसकी काली किरणों ने धरती के वायुमंडल को इतना पतला कर दिया था कि कस्पर की भारी एयर-कंडीशनिंग के बावजूद गाड़ी के भीतर का तापमान शून्य से नीचे जा रहा था। गाड़ी के शीशों पर अंदर की तरफ़ बर्फ़ की मोटी परत जम रही थी।

कबीर ने बच्चे को देखा।

बच्चे की छाती का वह कमल का निशान अब बहुत तेज़, ख़ूनी लाल रंग में धड़क रहा था।

कबीर का अपना बदन सुन्न पड़ चुका था। उसने देखा कि उसके दाएँ हाथ की कटी हुई उंगलियों के ठूंठ... अब पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। उसके नाख़ूनों की जगह काले ग्रेनाइट की नुकीली परतें उग आई थीं।

"कबीर... तुम्हारी देह बदल रही है," मीरा ने कांपते हुए कबीर के हाथ को छुआ।

"मुझे पता है, मीरा," कबीर ने भारी, पथरीली आवाज़ में कहा।

"जब मैंने अपने बेटे से वह ज़हर अपने भीतर खींचा था... तो मैंने सिर्फ़ ज़हर नहीं खींचा था। मैंने उस खांडवप्रस्थ की पाताल-अग्नि और सुल्तान के उस 650 साल पुराने शाप को अपनी आत्मा में हमेशा के लिए जकड़ लिया है।

अगर हम भानगढ़ के उस केंद्र तक नहीं पहुँचे... तो मैं ख़ुद एक ऐसा पाषाण-राक्षस बन जाऊँगा जिसकी कोई चेतना नहीं होगी!"

सामने, सरिस्का के घने, सूखे जंगलों के पार... एक संकरी, पथरीली घाटी शुरू हो रही थी।

घाटी के मुहाने पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक पुराना, जंग लगा लोहे का बोर्ड पत्थरों में गड़ा हुआ था।

उस बोर्ड पर काले अक्षरों में हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखा था:

चेतावनी: भानगढ़ की सीमा

"सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले इस क़िले के परिसर में प्रवेश करना क़ानूनन जुर्म है।

जो यहाँ रात बिताता है, वह कभी वापस नहीं लौटता।"

लेकिन आज... वहाँ न कोई सूर्यास्त था, और न सूर्योदय!

वहाँ सिर्फ़ उस काले सूर्य का वहशी, जमा देने वाला अंधकार था!

कस्पर उस घाटी के संकरे, पथरीली पत्थरों वाले रास्ते पर रेंगता हुआ आगे बढ़ा।

और फिर, घाटी का मोड़ मुड़ते ही...

भानगढ़ का वह ऐतिहासिक, शापित खंडहर-नगर उनके सामने आ खड़ा हुआ!

6. भानगढ़ का खंडहर: पत्थरों का प्रेत-नगर
भानगढ़ की वह विशाल, तीन परकोटों वाली प्राचीर अरावली की पहाड़ियों की गोद में किसी सड़े हुए कंकाल की तरह फैली हुई थी।

1573 में राजा भगवंत दास द्वारा बसाया गया यह नगर कभी बाज़ारों, हवेलियों और नर्तकियों के घुंघरुओं से आबाद था। लेकिन आज... उस काले सूर्य के नीचे, यह खंडहर किसी दूसरी ही दुनिया का पाताल-लोक लग रहा था।

मुख्य दरवाज़ा—हनुमान पोल—पार करते ही दोनों तरफ़ बाज़ार के खंडहर थे।

दुकानों की छतें सदियों पहले गिर चुकी थीं, केवल बिना छतों की चौकोर दीवारें खड़ी थीं जो क़ब्रों जैसी दिख रही थीं।

और उन खाली दुकानों की चौखटों पर... हज़ारों की तादाद में सफ़ेद, पारदर्शी प्रेत बैठे थे!

वे 16वीं सदी के उस नगर के अभागे नागरिक थे, जो तांत्रिक सिंघावत के उस भयानक शाप की रात एक ही पहर में तड़प-तड़प कर मर गए थे। उनकी रूहें सदियों से इन पत्थरों में क़ैद थीं, मोक्ष के इंतज़ार में।

जैसे ही कस्पर गाड़ी उस मुख्य सड़क पर पहुँची, गाड़ी का इंजन अचानक खांसने लगा।

खट... खट... हिसस्स!

गाड़ी का भारी डीजल इंजन एक भयानक झटके के साथ बंद हो गया।

डैशबोर्ड के सारे डिजिटल मीटर्स, बैटरियां और अल्टरनेटर एक ही सेकंड में जलकर राख हो गए!

"गाड़ी डेड हो चुकी है," कर्नल राठौड़ ने अपने हाथ से स्टीयरिंग को छोड़ते हुए कहा। "यहाँ का इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ़ील्ड इतना ताक़तवर है कि किसी भी मशीन को एक सेकंड में पिघला दे।"

"हमें पैदल चलना होगा," कबीर ने कहा।

उसने गाड़ी का भारी, बख्तरबंद दरवाज़ा खोला।

वे तीनों बाहर निकले।

हवा में इतनी भयानक, श्मशान जैसी ठंड थी कि साँस लेते ही फेफड़ों में बर्फ़ जमने लगती थी। हवा में कपूर, सड़ी हुई हड्डियों और गंधक की वही प्राचीन गंध थी।

सामने, पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर... भानगढ़ का सात-मंज़िला राजमहल खड़ा था।

महल की ऊपरी चार मंज़िलें ढह चुकी थीं, केवल नीचे की तीन मंज़िलें खड़ी थीं जो किसी विशालकाय खोपड़ी के टूटे हुए जबड़े जैसी दिख रही थीं।

और उस महल के ठीक पीछे, पहाड़ी की एक संकरी चट्टान पर... तांत्रिक सिंघावत की छतरी (Cenotaph) हवा में लटकी हुई दिख रही थी!

"वह वहाँ है," मीरा ने अपनी कलाई के चमकते हुए ब्राह्मी अक्षरों को देखते हुए कहा। "उस महल के सातवें तहख़ाने में वह पारद-लिंगम गड़ा है। हमें वहीं जाना होगा!"

7. वह भयानक, दिल दहला देने वाला महा-ट्विस्ट: चौथा मुसाफ़िर (The Twist)
वे तीनों उस पत्थरीले रास्ते पर आगे बढ़ने लगे।

कबीर के हाथ में वह चांदी का खंजर था, मीरा ने उस नवजात बच्चे को अपनी छाती से चिपका रखा था, और कर्नल राठौड़ अपनी भारी शॉटगन लिए पीछे-पीछे पहरेदारी कर रहे थे।

वे महल के मुख्य मेहराबदार दरवाज़े—सूरज पोल—के पास पहुँचे।

दरवाज़े की चौखट पर काले पत्थर की एक प्राचीन, भयानक भैरव की मूर्ति स्थापित थी।

कबीर चौखट पार करने ही वाला था कि अचानक...

उसके हाथ में पकड़े उस चांदी के खंजर ने एक बहुत तेज़, सीटी जैसी रूहानी आवाज़ निकाली!

सननन्र!

खंजर की धार पर जमी वह मुग़ल भस्म अचानक नीली आग में जल उठी!

कबीर ठिठक गया।

यह खंजर तभी जलता था जब उसके दस फीट के दायरे में कोई ऐसा शैतान या प्रेत मौजूद हो जिसने किसी जीवित इंसान का रूप धर रखा हो!

कबीर ने धीरे से अपनी गर्दन घुमाई।

सामने मीरा खड़ी थी। मीरा की छाती पर वह बच्चा सो रहा था। मीरा की कलाई के अक्षर शुद्ध, पवित्र सोने जैसे चमक रहे थे। वह कोई शैतान नहीं थी।

तो फिर यह खंजर किसके लिए जल रहा था?

कबीर की नज़र धीरे-धीरे पीछे घूमी... और कर्नल विक्रम राठौड़ पर जाकर टिक गई।

कर्नल राठौड़ चौखट के बाहर खड़े थे। उनके चेहरे पर वही सख्त, फ़ौजी भाव था। उनके हाथ में वही शॉटगन थी।

"क्या हुआ, कबीर? रुक क्यों गए? अंदर चलो!" कर्नल राठौड़ ने अपनी भारी आवाज़ में कहा।

कबीर ने कर्नल के चेहरे को देखा। फिर कबीर की नज़र धीरे-धीरे नीचे उतरी... कर्नल के पैरों की तरफ़।

और जो कबीर ने देखा...

उस दृश्य ने कबीर की रीढ़ की हड्डी के भीतर के सारे ख़ून को एक ही सेकंड में बर्फ़ बना दिया।

काले सूर्य की बैंगनी किरणें कर्नल राठौड़ के शरीर पर पड़ रही थीं।

मीरा की परछाईं ज़मीन पर पड़ रही थी। कबीर की परछाईं ज़मीन पर पड़ रही थी।

लेकिन कर्नल विक्रम राठौड़ की... ज़मीन पर कोई परछाईं नहीं थी!

और उससे भी ज़्यादा भयानक बात—

कर्नल राठौड़ के जो फ़ौजी बूट ज़मीन पर टिके थे... वे ज़मीन को छू नहीं रहे थे! वे ज़मीन से चार इंच ऊपर हवा में तैर रहे थे!

कबीर का गला सूखकर काँटा हो गया। उसने कांपते हाथों से खंजर को कर्नल की छाती की तरफ़ तान दिया:

"कर्नल... तुम कौन हो?"

कर्नल राठौड़ के चेहरे का वह फ़ौजी रोब... वह तनाव... अचानक एक सेकंड में ग़ायब हो गया।

उनके चेहरे पर एक ऐसी भयानक, प्राचीन, वीभत्स और सड़ी हुई मुस्कान उभरी जिसे देखकर मीरा के गले से एक चीख़ निकल गई।

कर्नल राठौड़ ने अपनी शॉटगन नीचे फेंक दी।

उन्होंने अपनी दोनों उंगलियों से अपनी गर्दन की त्वचा को पकड़ा... और एक ही झटके में अपनी फ़ौजी वर्दी और अपने चेहरे की चमड़ी को किसी पुराने मुखौटे की तरह खींचकर उतार दिया!

चर्र्र्र्र्र्क!

उस चमड़ी के नीचे कोई हाड़-मांस का सैनिक नहीं था!

उस वर्दी के भीतर से जो वजूद बाहर निकला...

वह एक आठ सौ साल पुराना, भस्म से पुता हुआ, जटाधारी, लाल आँखों वाला तांत्रिक था, जिसके गले में काले सांपों की मालाएँ और नरमुंड लटके हुए थे!

वही तांत्रिक... सिंघावत!

सिंघावत का वह भयानक अट्टहास पूरे भानगढ़ के खंडहरों में गूँज उठा:

**"हाहाहाहा! कबीर मेहरा!

तुमने समझा कि वह पैरा-कमांडो कर्नल राठौड़ तुम्हें दिल्ली से यहाँ बचाकर लाया था?

अरे मूर्ख बालक!

असली कर्नल राठौड़ तो उसी पल मर गया था जब उसका हेलीकॉप्टर पुराने क़िले के लॉन में क्रैश हुआ था!

उस हेलीकॉप्टर के मलबे से मैंने उसकी लाश की खाल उतारी थी... ताकि मैं तुम्हें... और इस बच्चे को... अपनी इस कर्मभूमि तक सुरक्षित ला सकूँ!

स्वागत है भानगढ़ में, कबीर!

मुझे इस पारद-लिंगम को जगाने के लिए इसी बच्चे की बलि चाहिए थी...

और तुमने ख़ुद... अपने हाथों से मेरे शिकार को मेरी ही चौखट पर पहुँचा दिया!"**

सिंघावत ने अपने दोनों काले, भस्म से पुते हाथ हवा में उठाए।

और भानगढ़ के वे हज़ारों प्रेत... एक साथ अपनी क़ब्रों से उठकर... कबीर और मीरा को चारों तरफ़ से घेरने के लिए आगे बढ़ गए!

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