PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 18: शेर मंडल की वेधशाला, शून्य का सिद्धांत और हुमायूँ का गुप्त अष्टकोण

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
18 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
13 min
Words
2537
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. आदिम सूर्य-तेज और माता की ममता का संघर्ष
वह ऊष्मा किसी आग की भट्टी जैसी नहीं थी; वह ऐसी थी मानो सूर्य का गर्भ फटकर सीधे पुराने क़िले की उस पुरातात्विक खाई में उतर आया हो।

पाषाण कुंड का वह प्राचीन, कस्तूरी-सुगंधित जल कुछ ही सेकंडों में खौलकर सफ़ेद भाप में बदल चुका था। खुदाई की गहरी खाइयों की लाल-भूरी मिट्टी कांच की तरह पिघलकर चमकदार काले शीशे (slag) में तब्दील हो रही थी। हवा में ऑक्सीजन इतनी तेज़ी से जल रही थी कि कबीर, मीरा और कर्नल राठौड़ के फेफड़े भीतर से सूखते हुए महसूस हो रहे थे।

हवा में तीन फीट ऊपर तैरता हुआ वह नवजात शिशु... अब कोई साधारण नन्हा बच्चा नहीं था।

उसकी देह से निकलती हुई वह सुनहरी, प्रखर ज्वाला इतनी तीव्र थी कि उसकी तरफ़ नंगी आँखों से देखना अपनी आँखों को हमेशा के लिए अंधा करने जैसा था। उसकी दोनों आँखों में घूमते हुए वे सूर्य-मंडल ब्रह्मांड के उस आदिम सत्य को दर्शा रहे थे, जिसके आगे मनुष्य, जिन्न और देवता—सब केवल राख के बराबर थे।

"ॐ वह्निपुत्राय विद्महे..."

उस बच्चे के नन्हे, गुलाबी होंठों से निकलती हुई वह गगनभेदी वैदिक ऋचा जब पत्थरों से टकराई, तो पुराने क़िले की 500 साल पुरानी क़िला-ए-कुहना मस्जिद के विशाल मेहराबों में दरारें पड़ने लगीं।

कबीर ज़मीन पर पड़ा अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था।

उसके शरीर में वह ज़हरीला, चांदी और जिन्न की आग से सना ख़ून दौड़ रहा था जो उसने अभी-अभी अपने बेटे की नसों से अपने भीतर खींचा था। उसकी छाती की नसें काली पड़ चुकी थीं, उसकी दृष्टि धुंधली हो रही थी।

लेकिन मीरा...

मीरा उस असहनीय, चमड़ी को जला देने वाली गर्मी की परवाह किए बिना, अपने घुटनों के बल आगे बढ़ रही थी।

उसकी नर्स की वर्दी के धागे जलकर धुएँ में बदल रहे थे। उसकी हथेलियों पर बड़े-बड़े छाले पड़ चुके थे। मगर उसकी आँखों में किसी देवता का भय नहीं था; वहाँ केवल अपने बच्चे को खोने का वह पाशविक, मातृ-शोक था जो हर ब्रह्मांडीय नियम से बड़ा होता है।

"तुम चाहे अग्नि-देव हो... या पूरे संसार का अंत करने वाले महाकाल..."

मीरा रोते हुए, हांफते हुए उस तैरते हुए बच्चे के ठीक नीचे पहुँच गई। उसने अपने दोनों जलते हुए, कांपते हाथ ऊपर उठाए:

"तुमने इस मिट्टी में जन्म लेने के लिए मेरी कोख को चुना था! नौ महीने तक तुमने मेरी नसों का ख़ून पिया है! तुम मेरे बेटे हो... मेरे बच्चे!"

मीरा ने उस धधकते हुए, सूर्य-समान बच्चे के नन्हें पाँवों को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया!

छ्छ्छ्छ्र्र्र!

मीरा की हथेलियों की त्वचा जलकर सफ़ेद हो गई। माँस के जलने की गंध फैली। मीरा के मुँह से दर्द की एक चीख़ निकली, लेकिन उसने अपने बच्चे के पैर नहीं छोड़े। उसने अपना जला हुआ माथा उस बच्चे के नन्हें, गर्म तलवों पर टेक दिया।

और उस पल—

वह जो गगनभेदी, भयानक मंत्र उस बच्चे के मुँह से निकल रहा था... वह अचानक रुक गया।

उस बच्चे की सुनहरी, अंधी आँखों में एक पल के लिए एक बहुत बारीक, नीली मानवीय पुतली उभरी। उस आदिम, तीन हज़ार साल पुराने देवता की चेतना उस माँ के आंसुओं और उसकी त्वचा के स्पर्श से एक सेकंड के लिए ठिठक गई।

दैवीय क्रोध और मानवीय वात्सल्य के बीच एक भयानक खिंचाव पैदा हो गया।

2. अफ़रीत की विभीषिका और कर्नल राठौड़ की रिपोर्ट
"कबीर! मीरा! यह मौका है! बाहर निकलो!"

कर्नल विक्रम राठौड़ ने खाई के किनारे से अपनी भारी स्नाइपर राइफ़ल फेंककर नीचे छलांग लगाई।

उन्होंने अपनी एस्बेस्टस (अग्नि-अवरोधक) फ़ौजी जैकेट उतारी और कबीर के जलते हुए शरीर को उसमें लपेट लिया।

"कर्नल साहब..." कबीर ने ख़ून थूकते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "वह... वह बच्चा शांत नहीं होगा... उसकी प्रकृति ही दाह है... वह इस पूरी दिल्ली को भस्म कर देगा..."

"दिल्ली पहले ही जल रही है, कबीर!" कर्नल राठौड़ ने कबीर को अपने कंधे पर उठाते हुए कहा।

उनके हाथ में पकड़े मिलिट्री सैटेलाइट कम्युनिकेटर की स्क्रीन लाल बत्तियों से फड़क रही थी:
"पूरे देश के रडार और सेटेलाइट्स ब्लैंक हो चुके हैं! अमेरिकी और रूसी डिफेंस सेटेलाइट्स को लग रहा है कि नई दिल्ली में कोई थर्मोन्यूक्लियर चेन-रिएक्शन शुरू हो गया है।

और बाहर... वह दो सौ फीट ऊँचा अफ़रीत-ए-आज़म मथुरा रोड की तरफ़ बढ़ रहा है! उसने सुप्रीम कोर्ट और प्रगति मैदान के फ़्लाईओवरों को अपने पैरों तले कुचल दिया है। अगर हमने इस बच्चे की इस ऊर्जा को अगले पंद्रह मिनट में शांत नहीं किया, तो पूरी पृथ्वी का वायुमंडल जलकर ख़ाक हो जाएगा!"

"कहाँ ले जाएँ इसे?" मीरा ने बच्चे को अपनी जली हुई छाती से चिपकाए हुए पूछा। बच्चा अब हवा में नहीं तैर रहा था; मीरा की छुअन ने उसे कुछ पलों के लिए शांत कर दिया था, लेकिन उसकी त्वचा से अब भी सफेद लपटें निकल रही थीं।

कबीर ने अपनी कांपती उंगली से खाई के पार, पुराने क़िले के दक्षिणी कोने पर खड़े एक लाल बलुआ पत्थर के अष्टकोणीय (octagonal) बुर्ज की तरफ़ इशारा किया:

"शेर मंडल... हमें शेर मंडल की उस गुप्त वेधशाला में जाना होगा!"

3. शेर मंडल का ऐतिहासिक रहस्य और हुमायूँ का पतन
पुराने क़िले के हरे-भरे पेड़ों के बीच दो-मंज़िला, अष्टकोणीय लाल पत्थर का वह बुर्ज खड़ा था—शेर मंडल।

इतिहास की किताबों में लिखा है कि इसे शेरशाह सूरी ने बनवाया था, और बाद में मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने इसे अपनी निजी लाइब्रेरी और खगोलीय वेधशाला (Astronomical Observatory) बनाया था। और 24 जनवरी 1556 की शाम, इसी इमारत की संकरी, फिसलन भरी सीढ़ियों से उतरते वक़्त अज़ान की आवाज़ सुनकर हुमायूँ का पैर फंसा था, वह गिरा था और उसकी मौत हो गई थी।

लेकिन कबीर—एक शोधार्थी के रूप में—जानता था कि सरकारी इतिहास कितना अधूरा था।

"हुमायूँ का पैर किसी सीढ़ी से नहीं फिसला था, कर्नल साहब..." कबीर ने भागते हुए हांफते हुए कहा।

"हुमायूँ 'इल्म-ए-नुजूम' (इस्लामी ज्योतिष) और प्राचीन हिंदू नक्षत्र-विद्या का सबसे बड़ा तांत्रिक था।

उसने इस शेर मंडल को पांडवों के उसी मय दानव द्वारा बनाई गई प्राचीन 'अष्टकोणीय सूर्य-वेधशाला' की नींव पर दोबारा तामीर करवाया था!

हुमायूँ ने अपनी मौत से ठीक पहले इस बुर्ज के सबसे निचले तहख़ाने में एक ऐसा यंत्र स्थापित किया था जो ब्रह्मांड की किसी भी अति-प्राकृतिक ऊर्जा को सोख सकता था। वह उस दिन उसी यंत्र को बंद करने नीचे जा रहा था जब पाताल के सायों ने उसे सीढ़ियों से धक्का दे दिया था!"

वे तीनों शेर मंडल के छोटे, लोहे के मेहराबदार दरवाज़े पर पहुँचे।

दरवाज़े पर पुरातत्व विभाग का एक ज़ंग लगा ताला लटक रहा था।

कर्नल राठौड़ ने अपनी 9एमएम पिस्तौल निकाली और ताले पर दो गोलियाँ दाग दीं—धाँय! धाँय!

ताला टूट गया। कबीर ने भारी पल्ले को धक्का दिया और वे सब उस अंधेरे, संकरे बुर्ज के भीतर दाखिल हो गए।

4. सीढ़ियों का भूलभुलैया और पाताल का अष्टकोण
शेर मंडल की सीढ़ियाँ इतनी संकरी और इतनी खड़ी थीं कि एक बार में केवल एक ही इंसान नीचे उतर सकता था। पत्थरों पर सैकड़ों साल पुरानी काई और चिकनाहट थी।

वे ऊपर लाइब्रेरी वाले कमरे में नहीं गए; वे नीचे उतरने वाली उन सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े जो ज़मीन के बीस फीट नीचे पाताल में जाती थीं—वह हिस्सा जिसे 1947 के बाद से कभी किसी पर्यटक के लिए नहीं खोला गया था।

नीचे पहुँचते ही एक अजीब, जमा देने वाली ठंड ने उनका स्वागत किया।

यह कोई बर्फ़ की ठंड नहीं थी; यह 'शून्य' (Absolute Void) की ठंड थी—जहाँ न कोई ध्वनि थी, न हवा, और न कोई गंध।

कक्ष का आकार बिल्कुल अष्टकोणीय (eight-sided) था।

आठों दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर में नहीं, बल्कि काले उल्कापिंडीय पाषाण में आठ खगोलीय यंत्र जड़े थे—सूर्य-घड़ी, नक्षत्र-चक्र, और ग्रहों की चाल को मापने वाले पीतल के विशाल एस्ट्रोलेब्स (Astrolabes)।

और उस कमरे के ठीक बीचों-बीच...

फर्श पर अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाले कमल) के आकार का एक गहरा गड्ढा था।

उस गड्ढे के केंद्र में एक विशाल, चौकोर, मटमैला-काला पत्थर रखा था—'महाशून्य पाषाण' (The Shunya Stone)!

उस पत्थर की खासियत यह थी कि उस पर कमरे की जलती हुई इमरजेंसी टॉर्च की रोशनी भी नहीं टिक रही थी; पत्थर सारी रोशनी को अपने भीतर सोख रहा था, जैसे वह कोई सूक्ष्म ब्लैक-होल हो!

"यह क्या चीज़ है, कबीर?" कर्नल राठौड़ ने अपनी टॉर्च की रोशनी उस पत्थर पर डालते हुए पूछा, जो तुरंत ग़ायब हो गई।

"यह वही खगोलीय शून्य-शिला है, कर्नल साहब," कबीर ने दीवार पर खुदी हुई फ़ारसी और संस्कृत की संयुक्त इबारत को पढ़ते हुए कहा।

"अग्नि को जल से नहीं बुझाया जा सकता, क्योंकि यह कोई साधारण आग नहीं है; यह खांडवप्रस्थ के महा-दाह की आदिम ऊर्जा है। जल तो इसे और भड़का देगा।

अग्नि को केवल एक ही चीज़ शांत कर सकती है—'शून्य' (The Absolute Void)!

जब अग्नि को जलने के लिए कोई तत्व, कोई वायु, कोई पदार्थ नहीं मिलता, तो वह अपने मूल स्रोत में विलीन हो जाती है!"

5. पूर्णाहूति का संकल्प और पिता का अंतिम समर्पण
तभी—

मीरा की गोद में रखे उस बच्चे ने एक बार फिर अपनी आँखें खोल दीं।

उसकी देह से निकलती हुई सुनहरी आग ने शेर मंडल की दीवारों को लाल करना शुरू कर दिया।

बाहर से उस अफ़रीत-ए-आज़म की दहाड़ इतनी क़रीब आ चुकी थी कि शेर मंडल की अष्टकोणीय छत से चूना और पत्थर झड़कर नीचे गिरने लगे।

"वक़्त ख़त्म हो गया, कबीर!" मीरा रो पड़ी। उसके हाथ उस बच्चे की गर्मी से फिर से झुलसने लगे थे।

कबीर आगे बढ़ा।

उसने उस अष्टदल कमल के बीच में रखे उस ठंडे, प्रकाश-विहीन 'महाशून्य पाषाण' को दोनों हाथों से छुआ।

पत्थर के छूते ही कबीर के शरीर में दौड़ता हुआ वह ज़हरीला, खौलता हुआ ख़ून एक पल के लिए शांत हो गया। उस पत्थर ने कबीर की पीड़ा को अपने भीतर खींचना शुरू कर दिया।

"मीरा... बच्चे को इस पत्थर के केंद्र पर रख दो," कबीर ने शांत, गंभीर आवाज़ में कहा।

"नहीं! कबीर, क्या यह इसे मार देगा?" मीरा ने बच्चे को अपनी छाती से और कसकर चिपका लिया।

"यह इसे मारेगा नहीं, मीरा," कबीर की आँखों से आँसू बह निकले।

"यह इसके भीतर के उस आदिम, अनियंत्रित देवता को 'विश्राम' देगा। यह उस तीन हज़ार साल पुरानी प्रतिज्ञा को पूर्ण करेगा। और जब वह आग शांत होगी... तो केवल हमारा बच्चा बचेगा—एक सामान्य, मासूम, इंसानी बच्चा!"

कबीर ने आगे बढ़कर मीरा के माथे को चूमा। फिर उसने उस नन्हे बच्चे के माथे पर अपना सिर रख दिया।

"बेटा... तुमने अपने पिता के पापों को झेला है... अब अपने पिता की गोद में सो जाओ।"

मीरा ने रोते हुए, कांपते हाथों से उस बच्चे को उस महाशून्य पाषाण के बिल्कुल केंद्र पर रख दिया।

और कबीर ने... अपने दोनों लहूलुहान हाथों से उस बच्चे और उस पत्थर को एक साथ अपनी बाहों में समेट लिया!

6. शून्य का महा-अवशोषण और अग्नि का निर्वाण
जैसे ही कबीर का शरीर, वह बच्चा और वह शून्य-पाषाण एक-दूसरे से मिले—

एक ऐसा धमाका हुआ जिसमें कोई आवाज़ नहीं थी।

कमरे की सारी रोशनी, सारी आग, सारा धुआँ और सारी गर्मी उस काले पत्थर के केंद्र की तरफ़ एक विशाल भँवर की तरह खिंचने लगी!

हूशशशशश!

उस बच्चे के शरीर से निकलती हुई वह सुनहरी ज्वाला उस काले पाषाण के भीतर समाने लगी।

कबीर की नसों में दौड़ता हुआ वह ज़हरीला, खौलता हुआ ख़ून भी उस पत्थर में खिंचने लगा। कबीर के मुँह से निकली चीख़ हवा के बिना ही घुट गई। उसका शरीर बर्फ़ की तरह ठंडा होने लगा। उसकी आँखों के आगे का अंधकार अब कोई नर्क नहीं था; वह एक शांत, निर्मल, पवित्र समाधि जैसा सन्नाटा था।

बच्चे की सुनहरी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।

उसकी त्वचा का वह भयंकर, धधकता हुआ रूप शांत होकर वापस एक प्यारे, गुलाबी, नवजात शिशु के रूप में लौटने लगा।

और बाहर—

पुराने क़िले के प्राचीर के सामने खड़ा वह दो सौ फीट ऊँचा अफ़रीत-ए-आज़म... अचानक ठहर गया।

उसकी आँखों का लावा बुझने लगा। उसका शरीर वापस ठंडे बेसाल्ट और साधारण मिट्टी में बदलने लगा।

एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ, वह दैत्य भरभराकर नीचे गिरा और पुराने क़िले की गहरी खाइयों में केवल पत्थरों और मलबे के एक विशाल टीले के रूप में हमेशा के लिए दफ़्न हो गया!

पूरी दिल्ली की सड़कों पर जलती हुई वह नीली और लाल आग एक ही पल में बुझ गई।

कर्तव्य पथ, लाल क़िला, जामा मस्जिद और इंडिया गेट के ऊपर का वह खूनी आसमान धीरे-धीरे साफ होने लगा। दिल्ली की ठंडी, सामान्य शीतकालीन हवा वापस लौट आई।

शेर मंडल के उस तहख़ाने में सन्नाटा छा गया।

उस अष्टकोणीय पत्थर के ऊपर... वह बच्चा शांति से सो रहा था। उसकी नन्ही छाती पर वही चांदी का कमल का फूल जैसी जन्म-निशानी अब एक सुंदर, हल्के सफ़ेद निशान के रूप में चमक रही थी।

कबीर उस पत्थर के सहारे बैठा था। उसकी साँसें बहुत धीमी थीं, लेकिन वह ज़िंदा था! उसका शरीर ज़हर से मुक्त हो चुका था।

मीरा घुटनों के बल बैठकर रो पड़ी। उसने अपने बच्चे को उठाया और कबीर के सीने से लगा दिया।

"हम बच गए, कबीर..." मीरा की सिसकियाँ उस तहख़ाने में गूँज उठीं। "सब कुछ ख़त्म हो गया... हमारा बेटा बच गया..."

कर्नल राठौड़ ने अपनी पिस्तौल नीचे कर ली। उन्होंने अपनी टोपी उतारी और उस बच्चे के सिर पर हाथ रख दिया। उनकी आँखों में भी आँसू थे: "गॉड ब्लेस यू, सन... तुमने इस पूरे देश को बचा लिया।"

7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-ट्विस्ट: पश्चिम का काला सूर्य (The Twist)
कर्नल राठौड़ ने अपनी जेब से वह मिलिट्री सेटेलाइट कम्युनिकेटर निकाला ताकि वे आर्मी हेडक्वार्टर को यह खबर दे सकें कि ऑपरेशन सफल हो गया है।

स्क्रीन पर सिग्नल वापस आ चुके थे।

कम्युनिकेटर की हरी बत्ती जल रही थी।

लेकिन जैसे ही कर्नल राठौड़ ने 'पुश-टू-टॉक' का बटन दबाया...

स्पीकर से जो आवाज़ आई, उसने उस कमरे में मौजूद तीनों इंसानों के ख़ून को हमेशा के लिए जमा दिया।

स्पीकर पर भारतीय सेना के डीजीएमओ (Director General of Military Operations) या रक्षा मंत्री की आवाज़ नहीं थी।

स्पीकर पर अरावली की पहाड़ियों के नीचे बने 'नेशनल अंडरग्राउंड कमांड बंकर' के मुख्य वैज्ञानिक और सेना प्रमुख की बेहद घबराई हुई, हांफती हुई और पागलों जैसी आवाज़ गूँज रही थी:

**"कर्नल राठौड़! अगर आप सुन सकते हैं... तो उस शेर मंडल से तुरंत बाहर निकलिए!

आपने क्या कर दिया, राठौड़?!

आपने उस 'शून्य-शिला' को सक्रिय क्यों किया?!

हमारे भू-भौतिकीय (Geophysical) और अंतरिक्ष उपग्रहों का डेटा देखिए!

उस महाशून्य पाषाण ने केवल उस बच्चे की आग को नहीं सोखा... उस पत्थर ने पूरी पृथ्वी के चुंबकीय कोर (Geomagnetic Core) के घूर्णन को उल्टा घुमा दिया है!

दिल्ली की आग बुझ गई है... लेकिन पूरी दुनिया का समय और दिशा हमेशा के लिए उलट चुकी है!"**

कबीर का दिल एक बार फिर पाताल में जा गिरा। उसने कांपते हुए कर्नल के कम्युनिकेटर की तरफ़ देखा।

स्पीकर से वह आख़िरी, भयानक संदेश आया जिसने पूरी इंसानियत के वजूद पर पूर्णविराम लगा दिया:

**"राठौड़... खिड़की से बाहर देखिए!

सुबह के पाँच बज रहे हैं...

लेकिन सूर्य पूरब से नहीं...

सूर्य पश्चिम दिशा से उग रहा है!

और वह कोई जीवन देने वाला सूर्य नहीं है...

वह एक काला, रोता हुआ सूर्य (The Black Sun) है!

और उस उल्टे सूर्य के प्रकाश से... अंटार्कटिका से लेकर सहारा के रेगिस्तानों तक... पृथ्वी के हिमखंडों में हज़ारों सालों से दफ़्न वे 'आदिम असुर और मारिद जिन्नात' एक साथ जाग चुके हैं, जिन्होंने कभी नूह के तूफ़ान (The Great Deluge) से पहले इस धरती को श्मशान बनाया था!"**

कबीर लड़खड़ाता हुआ उठा।

वह पागलों की तरह शेर मंडल की उन संकरी सीढ़ियों पर चढ़ा और बुर्ज की अष्टकोणीय पत्थर की जालीदार खिड़की से बाहर देखा।

और जो उसने देखा...

उस दृश्य ने कबीर की आत्मा की अंतिम चीख़ भी छीन ली।

पश्चिम दिशा में... जहाँ धौला कुआँ और अरावली की पहाड़ियों के पीछे सूरज को डूबना चाहिए था...

वहाँ एक विशाल, विकराल, काला सूर्य आसमान में ऊपर उठ रहा था!

उस काले सूर्य से अंधकार की ऐसी काली किरणें फूट रही थीं जो दिन के उजाले को निगल रही थीं।

और उस काले सूर्य के रथ पर... हज़ारों मील दूर से उड़ती हुई... उन आदिम दैत्यों की एक ऐसी अंतहीन सेना दिल्ली की तरफ़ बढ़ रही थी जिसके सामने कोटला के जिन्नात केवल चींटियों के बराबर थे!

कबीर ने अपने हाथ में सो रहे उस नन्हे बच्चे को देखा।

उस बच्चे ने अपनी नींद में एक हल्की-सी करवट ली... और उसके नन्हें होंठों पर एक बहुत रहस्यमयी, सर्द मुस्कान तैर गई...

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · सभी भाग →