PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 17: पुत्र का लहू, पाताल का महा-अफ़रीत और इंद्रप्रस्थ की गुप्त गुफ़ा

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 13 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
17 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
13 min
Words
2556
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. पिता का विलाप और घायल नवजात
धरती पर इससे बड़ा कोई नर्क नहीं हो सकता कि एक पिता अपने ही हाथों से अपने कलेजे के टुकड़े का सीना चीर दे, और फिर उस बच्चे की नन्हीं, मासूम उंगलियाँ उसी पिता के ख़ून से सने अँगूठे को जीवन की भीख माँगते हुए पकड़ लें।

इंडिया गेट के उस बयालीस मीटर ऊँचे, हवा के थपेड़ों से कांपते हुए पत्थरीले चबूतरे पर कबीर घुटनों के बल बैठा था।

उसकी गोद में वह नवजात शिशु पड़ा था।

बच्चे की छाती के ठीक बीचों-बीच, जहाँ वह मुग़ल भस्म से सना चांदी का खंजर अभी-अभी पिघला था, वहाँ से गाढ़ा, सुर्ख़ लाल ख़ून रिस रहा था। लेकिन उस ख़ून के साथ-साथ एक चमकदार, सफ़ेद चांदी का तरल भी बह रहा था जो बच्चे की नन्हीं, दूधिया चमड़ी को जला रहा था।

बच्चे का नन्हा बदन इतनी ज़ोर से कांप रहा था जैसे किसी बर्फीले तूफ़ान में कोई नन्हा परिंदा फँस गया हो। उसकी साँसें बहुत उथली, बहुत तेज़ और घरघराहट भरी थीं—हिस्स... खट... सिसक...

"नहीं... नहीं, मेरे बच्चे... पापा को माफ़ कर दो..." कबीर पागलों की तरह रो रहा था।

उसकी आँखों से गिरते हुए गर्म आँसू उस बच्चे के लहूलुहान चेहरे पर गिर रहे थे। उसने अपनी फटी हुई कमीज़ का एक बड़ा टुकड़ा अपने दाँतों से फाड़ा और उसे उस बच्चे के सीने के ज़ख़्म पर कसकर दबा दिया।

कबीर का अपना बदन टूटने की कगार पर था। उसकी छाती का वह तावीज़ वाला ज़ख़्म खुला था, उसकी कटी हुई उंगलियों से ख़ून बह रहा था, लेकिन इस वक़्त उसे अपने किसी दर्द का अहसास नहीं था।

उसके सामने उसका अपना बेटा मर रहा था—वह बेटा, जिसे उसने कभी अपनी बाहों में नहीं खिलाया था, जिसका नामकरण नहीं हुआ था, जिसे उसने चंद सेकंड पहले एक शैतान समझकर क़त्ल करने की कोशिश की थी!

सामने, इंडिया गेट के कंगूरे पर मलिका-ए-आतिश का वह साया हवा में तैर रहा था।

उसकी वहशी, शैतानी हँसी पूरे कर्तव्य पथ के ऊपर गूँज रही थी:
"रोओ, कबीर! तुम्हारी यह चीख़ मेरे सत्तर साल के इंतक़ाम का सबसे मीठा संगीत है! तुम्हारे पुरखों ने मेरा ख़ून बहाया था... आज तुमने अपने हाथों से अपने ख़ानदान का दीपक बुझा दिया!"

2. मातृत्व का महा-विद्रोह और मीरा की मुक्ति
लेकिन उस शैतानी जश्न के बीच, एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसे कोई मध्यकालीन जिन्न अपनी तांत्रिक किताबों में नहीं लिख सका था।

वह जो बीस साल की नर्स—मीरा शर्मा—अब तक उस 'मलिका-ए-आतिश' के भयानक, बारह हाथों वाले दैत्याकार खोल के भीतर एक असहाय क़ैदी की तरह दबी हुई थी...

उसने जब उस बच्चे की उस धीमी, दर्दनाक कराह को सुना...

जब उस माँ के कानों में उसके अपने सगे बच्चे की अंतिम हिचकी पहुँची...

तो छह सौ पचास साल पुराना वह जिन्नात का तिलिस्म एक ही पल में तिनके की तरह बिखर गया!

एक माँ की आदिम, जैविक ममता के आगे ब्रह्मांड का कोई भी शैतान ज़्यादा देर तक टिक नहीं सकता।

"छोड़... इसे... छोड़ दे!"

मीरा के गले से एक ऐसी भयानक, पाशविक चीख़ निकली जिसने उस जिन्न के रूहानी आवरण को भीतर से फाड़ डाला!

चर्र्र्र्र्र्र्क!

मलिका-ए-आतिश के वे बारह काले, लपलपाते हुए हाथ हवा में ही कटकर राख बन गए। उसकी आँखों में जलती हुई वह नीली, शैतानी आग अचानक बुझ गई। वह ज़रीदार, मध्यकालीन हरी पोशाक किसी पुराने कफ़न की तरह फटकर उड़ गई।

मीरा का अपना इंसानी शरीर—नीली फटी हुई नर्स की वर्दी में—उस भयानक साए से अलग होकर उस ठंडे पत्थर के फर्श पर आ गिरा।

ज़ोहरा का वह प्रेत हवा में छटपटाता हुआ चीख़ा: "ग़द्दार लड़की! तूने अपने ही ख़ानदान के इंतक़ाम को ठुकरा दिया!"

मगर मीरा ने उस प्रेत की तरफ़ देखा तक नहीं।

वह घुटनों और कोहनियों के बल घिसटती हुई, पत्थरों पर अपना ख़ून बहाती हुई, सीधे कबीर और उस बच्चे की तरफ़ लपकी।

"मेरा बच्चा... मेरा बच्चा..." मीरा ने उस नवजात को अपनी दोनों कांपती बाहों में समेट लिया।

उसने अपना चेहरा उस बच्चे के ख़ून से सने गाल से चिपका दिया। उसके आंसुओं की धार ने बच्चे के चेहरे पर जमे उस काले धुएँ को धो डाला।

"कबीर... इसे बचाओ! भगवान के लिए इसे बचाओ!" मीरा एक पागलों की तरह कबीर का चेहरा पकड़कर रोने लगी। "यह हमारा बच्चा है! उस अस्पताल के बेसमेंट में उन डॉक्टरों ने मुझे बेहोश करके... मेरी कोख से इसे चुराया था! यह कोई शैतान नहीं है... यह सिर्फ़ एक नन्हा, बेकसूर बच्चा है!"

कबीर ने मीरा के सिर को अपनी छाती से लगा लिया।

"मैं इसे मरने नहीं दूँगा, मीरा... चाहे मुझे अपनी आत्मा की आख़िरी बूँद भी बेचनी पड़े!"

3. पाताल का जागरण: अफ़रीत-ए-आज़म का महा-विस्फोट
लेकिन उन दोनों के पास आँसू बहाने का वक़्त नहीं था।

जैसे ही उस बच्चे का वह शुद्ध, मानवीय ख़ून उस चांदी के पिघले हुए रस के साथ मिलकर इंडिया गेट के पत्थरों से रिसता हुआ नीचे कर्तव्य पथ की ज़मीन में समाया...

पूरी दिल्ली की ज़मीन में एक ऐसा भयानक, रिक्टर स्केल पर 9.0 की तीव्रता वाला जलज़ला (भूकंप) आया जिसने संसद भवन से लेकर लाल क़िले तक की ज़मीन को फाड़ दिया!

गड़गड़ाहट... चर्र्र... धड़ाम!

कर्तव्य पथ के बीचों-बीच, विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक की दो किलोमीटर लंबी सड़क दो टुकड़ों में बंट गई।

ज़मीन के भीतर से लाल, खौलते हुए मैग्मा और काली गंधक का एक विशाल फव्वारा छूटा जो तीन सौ फीट ऊँचा आसमान में गया!

और उस फटती हुई ज़मीन के गर्त से...

एक ऐसा वजूद बाहर निकल रहा था जिसकी विशालता देखकर कबीर और मीरा की साँसें हलक़ में अटक गईं।

वह कोई आम जिन्न नहीं था। वह सुल्तान का हमज़ाद भी नहीं था।

वह था—'अफ़रीत-ए-आज़म' (The Primordial Ifrit of Indraprastha)!

यह वह आदिम पाताल-दैत्य था जो तब से इस ज़मीन की गहराइयों में सो रहा था जब दिल्ली का नाम 'इंद्रप्रस्थ' था—महाभारत काल में जब पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण और अग्नि-देव की सहायता से खांडवप्रस्थ के घने जंगलों को भस्म किया था, तब उस महा-दाह की बची हुई आदिम, विध्वंसक अग्नि इस ज़मीन के गर्भ में समा गई थी!

तुग़लक, मुग़ल और ब्रिटिश तो केवल इस दैत्य की छाती पर ईंटें रखकर अपनी हुकूमतें चला रहे थे।

वह दैत्य कम से कम दो सौ फीट ऊँचा था। उसका शरीर ठोस, काले बेसाल्ट पत्थरों और धधकते हुए लावे से बना था। उसकी आँखें कनाट प्लेस के सेंट्रल पार्क जितनी बड़ी थीं, जिनमें पिघला हुआ सोना उबल रहा था। जब उसने अपनी विशाल, ज्वालामुखी जैसी साँस छोड़ी, तो रायसीना हिल के राष्ट्रपति भवन के गुंबद की दीवारें चटक गईं!

उस दैत्य ने अपना एक विशाल पंजा उठाया और इंडिया गेट के शीर्ष की तरफ़ बढ़ा दिया।

"हमें यहाँ से निकलना होगा!" कबीर चिल्लाया।

4. कर्नल राठौड़ की वापसी और आसमान में फ़रारी
फड़-फड़-फड़-फड़!

अचानक, लाल बादलों को चीरता हुआ भारतीय सेना का एक जलता हुआ, गोलियों से छलनी ध्रुव एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH Dhruv) इंडिया गेट के ठीक ऊपर मंडराने लगा।

हेलीकॉप्टर का साइड का दरवाज़ा खुला।

वहाँ कर्नल विक्रम राठौड़ खड़े थे! उनके सिर पर ख़ून से भीगी पट्टी बंधी थी, एक हाथ टूटा हुआ था, लेकिन दूसरे हाथ से उन्होंने विंच (बचाव रस्सी) का हार्नेस नीचे फेंक दिया!

"कबीर! रस्सी पकड़ो! तुरंत!" कर्नल राठौड़ रोटर ब्लेड्स के भारी शोर में चिल्लाए।

कबीर ने बिना एक पल गँवाए उस बच्चे को मीरा के सीने से बांधा, और उस मजबूत हार्नेस को मीरा और अपने शरीर के चारों तरफ़ लपेटकर लॉक कर दिया।

"खींचो!" कबीर ने हाथ का इशारा किया।

विंच की मोटर घुर्रराई!

वे तीनों हवा में खिंच गए।

और ठीक उसी पल—

उस अफ़रीत-ए-आज़म का वह विशाल, जलता हुआ पंजा इंडिया गेट के उस ऊपरी चबूतरे से टकराया जहाँ वे एक सेकंड पहले खड़े थे!

धड़ाम! क्रैश!

इंडिया गेट का ऊपरी कंगूरा किसी सूखे बिस्कुट की तरह टूटकर नीचे गिर पड़ा। पत्थरों का एक विशाल बवंडर हवा में उड़ा।

हेलीकॉप्टर के पायलट ने पूरी ताक़त से योक खींचा। हेलीकॉप्टर लड़खड़ाया, उसका पिछला रोटर एक जलते हुए साए से बाल-बाल बचा, और वह तेज़ी से पूर्व दिशा—यमुना नदी की तरफ़ भाग निकला।

5. पुराना क़िला: इंद्रप्रस्थ की प्राचीन शरणगाह
हेलीकॉप्टर के केबिन में कबीर, मीरा और कर्नल राठौड़ फर्श पर हांफ रहे थे।

मीरा ने उस बच्चे को अपनी गोद में ले रखा था। लेकिन बच्चे की हालत हर पल बिगड़ रही थी।

उसकी छाती का ज़ख़्म अब नीला पड़ रहा था। वह चांदी, जो उसके सीने में पिघल गई थी, अब उसके नन्हे दिल की नसों में ज़हर बनकर फैल रही थी। बच्चे के होंठ काले पड़ रहे थे और उसकी नब्ज़ इतनी धीमी थी कि बमुश्किल महसूस हो रही थी।

"यह नहीं बचेगा, कबीर..." मीरा रो पड़ी। "इसके जिस्म में वह चांदी ज़हर बन चुकी है... इसके फेफड़े जम रहे हैं!"

कर्नल राठौड़ ने अपने आपातकालीन रेडियो पर संदेश भेजा: "मेडे! मेडे! बेस, क्या कोई सुरक्षित मेडिकल सेंटर चालू है?"

रेडियो से सिर्फ़ स्टैटिक और किसी के रोने की भयानक आवाज़ें आ रही थीं:

"दिल्ली का कोई अस्पताल नहीं बचा है, कर्नल! एम्स, सफ़दरजंग, आरएमएल... सब खंडहर बन चुके हैं! पूरी राजधानी की सड़कों पर आग के शैतान नाच रहे हैं!"

"अस्पताल इसे नहीं बचा सकते, कर्नल साहब," कबीर ने बच्चे के माथे को चूमते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक गहरा, आध्यात्मिक निश्चय था।

"तो कहाँ ले चलूँ?" पायलट ने पीछे मुड़कर चिल्लाया। "हमारा फ्यूल टैंक लीक कर रहा है! हमारे पास सिर्फ़ पाँच मिनट की उड़ान बची है!"

कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

नीचे, मथुरा रोड के किनारे, शेरशाह सूरी और हुमायूँ का वह विशाल, प्राचीन क़िला दिखाई दे रहा था—पुराना क़िला (Purana Qila)!

"पुराना क़िला!" कबीर ने कहा। "हेलीकॉप्टर को पुराने क़िले के मैदान में उतारो!"

"पुराना क़िला क्यों?" कर्नल राठौड़ ने पूछा।

"क्योंकि पुराना क़िला मुग़लों का नहीं है, कर्नल साहब," कबीर ने ज़ोहरा की उस जली हुई डायरी के आख़िरी पन्ने को याद करते हुए कहा।

"भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई में साबित हो चुका है कि यह जगह महाभारत काल के इंद्रप्रस्थ की मूल नींव है!

इसके नीचे तीन हज़ार साल पुराना वह पाषाण कुंड है जिसे पांडवों के मय दानव ने बनाया था। उस कुंड के पानी में आज भी वह औषधीय अमृत है जो किसी भी रूहानी ज़हर को काट सकता है!"

क्रैश-लैंडिंग!

हेलीकॉप्टर का निचला हिस्सा पुराने क़िले के विशाल लॉन की ज़मीन से टकराया। स्किड्स टूट गए, रोटर ब्लेड्स मिट्टी में धँसकर मुड़ गए, और हेलीकॉप्टर पचास मीटर तक घिसटता हुआ क़िला-ए-कुहना मस्जिद के सामने जाकर रुक गया।

6. इंद्रप्रस्थ का पाषाण कुंड और ख़ून का अंतिम विनिमय
कर्नल राठौड़ ने अपनी मशीन गन संभाली और मस्जिद के दरवाज़े पर मोर्चा संभाल लिया: "तुम दोनों अंदर जाओ! मैं इन शैतानों को यहाँ रोके रखूँगा!"

कबीर और मीरा उस बच्चे को लेकर मस्जिद के पीछे चल रही एएसआई (ASI) की गहरी ट्रेंच (खुदाई के गड्ढे) में उतर गए।

तीस फीट नीचे, जहाँ मौर्य और महाभारत कालीन मिट्टी की परतें खुली हुई थीं, एक प्राचीन, काले ग्रेनाइट का बना हुआ गोल पाषाण कुंड मौजूद था।

उस कुंड के भीतर पारदर्शी, हल्का हरा, कस्तूरी जैसी महक वाला पानी भरा था—यह इंद्रप्रस्थ का वह मूल भूमिगत सोता था जो आधुनिक प्रदूषण से अछूता था।

मीरा ने बच्चे को उस ठंडे, पवित्र पानी के किनारे रखा।

बच्चे ने साँस लेना लगभग बंद कर दिया था। उसकी आँखें बंद हो चुकी थीं।

"अब क्या करें, कबीर?" मीरा के हाथ कांप रहे थे।

कबीर ने कर्नल के फर्स्ट-एड बॉक्स से एक रबर की आईवी ट्यूब और दो मोटी सुइयाँ निकालीं।

उसने एक सुई अपनी खुद की कलाई की मुख्य नस में घोंप दी।

और दूसरी सुई उसने उस नन्हे बच्चे की पैर की नस में चुभा दी।

"कबीर! यह तुम क्या कर रहे हो?" मीरा चीख़ी।

"ख़ून का विनिमय (Complete Blood Exchange), मीरा," कबीर ने शांत, गंभीर आवाज़ में कहा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

"इस बच्चे के भीतर वह चांदी और जिन्न की आग इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि इसका नन्हा जिस्म इस रूहानी दबाव को नहीं झेल पा रहा है।

मैं अपनी नसों से अपना शुद्ध इंसानी ख़ून इसके शरीर में भेजूँगा... और इसके जिस्म का वह सारा ज़हर, वह सारी पिघली हुई चांदी... मैं अपनी नसों में खींच लूँगा!"

"नहीं, कबीर! तुम मर जाओगे!" मीरा ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

"एक बाप का फ़र्ज़ अपनी ज़िंदगी बचाना नहीं होता, मीरा... अपनी औलाद को साँस देना होता है।"

कबीर ने ट्यूब का क्लैंप खोल दिया।

सर्र्र्रक!

कबीर के शरीर से उसका जीवन-रस उस बच्चे की नसों में बहने लगा, और बच्चे के शरीर से वह जलता हुआ, चांदी का ज़हरीला ख़ून कबीर के दिल की तरफ़ लौटने लगा।

कबीर की आँखें दर्द के मारे पलट गईं। उसकी नसों में ऐसा लगा जैसे कोई उबलता हुआ तेज़ाब और कांच के टुकड़े एक साथ बहा रहा हो। उसकी छाती की पसलियाँ अकड़ने लगीं। उसका दिल धीमी गति से धड़कने लगा—धक...... धक...... धक......

लेकिन चमत्कार हुआ।

उस बच्चे के चेहरे का कालापन ग़ायब होने लगा।

उसकी छाती का वह गहरा घाव अपने आप भरने लगा, और उस घाव की जगह चांदी की एक खूबसूरत, दैवीय चमक वाली कमल के फूल जैसी जन्म-निशानी (Lotus Mark) उभर आई!

बच्चे ने एक लंबी, गहरी, स्वस्थ साँस ली। उसका रोना शुरू हो गया—एक सामान्य, प्यारे, इंसानी बच्चे का मधुर रुदन!

कबीर मुस्कुराया।

उसके मुँह से ख़ून का एक बड़ा घूँट निकला। उसने ट्यूब को अपनी कलाई से उखाड़ फेंका।

वह लड़खड़ाकर उस पाषाण कुंड के पत्थरों पर गिर पड़ा। उसकी आँखें बंद होने लगी थीं। उसकी ज़िंदगी की डोर टूटने के कगार पर थी।

"कबीर! कबीर, आँखें खोलो!" मीरा रोते हुए कबीर के चेहरे को थपथपा रही थी।

7. वह भयानक, रोंगटे खड़े कर देने वाला महा-ट्विस्ट: खांडवप्रस्थ का महा-अग्निदेव (The Twist)
तभी—

खुदाई के उस गड्ढे के ऊपर से कर्नल राठौड़ की दहशत भरी चीख़ गूँजी:

"कबीर! मीरा! बाहर निकलो! वह दैत्य... वह अफ़रीत-ए-आज़म शहर को छोड़कर... सीधे पुराने क़िले की तरफ़ आ रहा है!"

ज़मीन में भयानक कंपन हुआ। पुराने क़िले के विशाल परकोटे के पत्थर टूटकर गिरने लगे।

कबीर ने अपनी अंतिम, धुंधली नज़रों से उस बच्चे की तरफ़ देखा।

वह अपने बच्चे को एक आख़िरी बार छूना चाहता था।

लेकिन जो हुआ...

उसने कबीर के मरते हुए मस्तिष्क को एक ऐसे महा-आघात से भर दिया जिसकी कल्पना इस ब्रह्मांड के किसी धर्मग्रंथ में नहीं थी।

उस बच्चे ने रोना बंद कर दिया था।

वह बच्चा... मीरा की गोद से अपने आप, बिना किसी सहारे के, हवा में तीन फीट ऊपर उठ गया!

उसकी आँखें खुलीं।

लेकिन उन आँखों में कोई इंसानी पुतली नहीं थी।

और न ही उन आँखों में उस छह उंगलियों वाले जिन्न की नीली आग थी!

उस बच्चे की दोनों आँखों में... शुद्ध, प्रखर, अंधा कर देने वाला सोने जैसा सूर्य-तेज (Solar Radiance) जल रहा था!

उसकी नन्हीं देह से एक ऐसी प्रचंड, ब्रह्मांडीय ऊष्मा फूट पड़ी जिसने उस पाषाण कुंड के पानी को एक ही सेकंड में भाप बनाकर उड़ा दिया!

और उस नन्हे, एक दिन के बच्चे के मुँह से...

कोई अरबी नहीं निकली। कोई फ़ारसी नहीं निकली।

उसके मुँह से गूँजी—हज़ारों आचार्यों और ऋषियों के शंखनाद जैसी, शुद्ध, आदिम, गगनभेदी वैदिक संस्कृत:

"ॐ वह्निपुत्राय विद्महे, महाज्वालाय धीमहि, तन्नो अग्निः प्रचोदयात्!"

कबीर और मीरा पत्थर की तरह जम गए।

उस नवजात शिशु का चेहरा किसी तीन हज़ार साल पुराने, क्रोधित देवता के मुखौटे में बदल रहा था।

उसने अपनी नन्हीं दृष्टि नीचे गिरे कबीर पर डाली। उसकी आवाज़ ने पूरे इंद्रप्रस्थ के पत्थरों को कँपा दिया:

**"हे कबीर मेहरा...

तुमने समझा कि तुम एक सामान्य पिता हो?

तुमने समझा कि तुम्हारे इस बच्चे को उन तुग़लक़ के कमज़ोर जिन्नों ने अपनी हवस के लिए गढ़ा था?

अरे अज्ञानी नश्वर!

मैं कोई जिन्न नहीं हूँ... और न मैं किसी शैतान की औलाद हूँ!

मैं साक्षात 'अग्नि-देव' हूँ!

वही अग्नि, जिसने तीन सहस्र वर्ष पूर्व इस खांडवप्रस्थ की भूमि पर भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन से यह प्रतिज्ञा की थी कि कलयुग के अंतिम पहर में... मैं इस सम्पूर्ण भ्रष्ट और पापी संसार को अपने मुख का ग्रास बनाऊँगा!

उन मूर्ख जिन्नों और तुम्हारे उस विज्ञान ने तो केवल मेरे इस स्थूल अवतार का गर्भ तैयार किया था!

और तुमने... अपने इस पितृ-रक्त की आहुति देकर... मेरे इस महा-अवतार की अंतिम मुहर लगा दी है!"**

उस बच्चे ने अपनी नन्हीं हथेली को आकाश की ओर उठाया।

और उस एक इशारे से—

वह जो दो सौ फीट ऊँचा अफ़रीत-ए-आज़म बाहर खड़ा था... वह एक पालतू कुत्ते की तरह घुटनों के बल बैठकर पुराने क़िले के सामने झुक गया!

कबीर उस सूखी खाई में पड़ा था...

उसने जिस बच्चे को बचाने के लिए अपनी जान दी थी... वह बच्चा इस पूरी पृथ्वी को भस्म करने वाला महा-प्रलय का साक्षात अग्नि-अवतार बन चुका था!

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