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भाग 16: कर्तव्य पथ का महाप्रलय, इंडिया गेट की आग और अमर जवान की चिता
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 16 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2875
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. वक़्त की खाई से 2026 के महा-श्मशान में वापसी
अंतरिक्ष और समय जब फटते हैं, तो उनकी आवाज़ किसी बम के धमाके जैसी नहीं होती; वह एक ऐसी सुन्न कर देने वाली, ब्रह्मांडीय चीरफाड़ होती है जो आत्मा के भीतर की नसों को खींच लेती है।
कबीर उस 1354 के ढहते हुए संसद-मक़बरे की जलती हुई छत से ऊपर की ओर फिंक गया।
नीचे, खौलती हुई यमुना का लावा अपनी अंतिम हिचकी ले रहा था, और ऊपर... वक़्त की वह भयानक, काली दरार उसे अपनी तरफ़ खींच रही थी। चारों तरफ़ गुरुत्वाकर्षण ख़त्म हो चुका था। उसके बदन पर बंधी वह फटी हुई जैकेट, उसकी छाती का वह ताज़ा घाव, और उसके दाएँ हाथ में मुग़ल भस्म से जगमगाता हुआ वह चांदी का खंजर—सब कुछ उस चुंबकीय खिंचाव में थरथरा रहा था।
धड़ाम!
कबीर किसी उल्कापिंड की तरह एक सख्त, ठंडी और खुरदुरी डामर की सड़क पर आ गिरा।
वह कई मीटर तक घिसटता हुआ गया। उसके घुटने और कोहनियाँ छिल गईं, और उसके मुँह में धूल, बारूद और जले हुए टायर की वही जानी-पहचानी, आधुनिक रासायनिक कड़वाहट भर गई।
उसने हाँफते हुए अपना सिर उठाया।
वह वापस आ चुका था।
यह 2026 की नई दिल्ली थी।
वह कर्तव्य पथ (पुराना राजपथ) के उस चौड़े, भव्य विस्तार पर पड़ा था, जहाँ हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस की परेड निकलती है। सामने राष्ट्रपति भवन और रायसीना हिल की ऐतिहासिक इमारतें रात के अंधेरे में खड़ी थीं, और पीछे... इंडिया गेट का वह विशाल, 42 मीटर ऊँचा मेहराबदार स्मारक खड़ा था।
लेकिन यह कोई सामान्य दिल्ली की रात नहीं थी।
यह धरती पर उतरे साक्षात नर्क का पहला पहर था।
कर्तव्य पथ की वह खूबसूरत लाल बजरी वाली सड़कें और हरी घास के मैदान किसी प्रथम विश्व युद्ध के युद्धक्षेत्र में बदल चुके थे। दोनों तरफ़ के पुराने जामुन के विशाल पेड़ जलती हुई मशालों की तरह धधक रहे थे। हवा में सायरनों की ऐसी पागलों जैसी चीखें गूँज रही थीं जो कानों के पर्दों को फाड़े दे रही थीं।
और आसमान...
आसमान में न कोई तारे थे, न चाँद, और न दिल्ली का वह सामान्य कोहरा।
आसमान का रंग गहरा, ख़ूनी बैंगनी हो चुका था। बादलों की जगह आग के विशाल, घूमते हुए बवंडर चक्कर काट रहे थे, जिनसे काले अंगारों और जलते हुए गंधक की बारिश सीधे दिल्ली की छाती पर हो रही थी!
2. सेना बनाम जिन्नात: विज्ञान और बारूद की असहायता
"फ़ायर! ओपन फ़ायर! ऑल यूनिट्स, एंगेज!"
कबीर के बाएँ तरफ़ से एक भारी, गूँजती हुई फ़ौजी दहाड़ सुनाई दी।
कर्तव्य पथ के चौराहे पर भारतीय सेना की बख्तरबंद रेजिमेंट और एनएसजी (NSG) के ब्लैक कैट कमांडोज़ ने एक विशाल सुरक्षा घेरा बना रखा था।
चार टी-90 भीष्म (T-90 Bhishma) मुख्य युद्धक टैंक अपनी विशाल 125 मिमी की तोपों के मुँह इंडिया गेट की तरफ़ ताने खड़े थे। उनके पीछे दर्जनों बीएमपी-2 बख्तरबंद गाड़ियाँ और भारी मशीन गनों से लैस सेना के ट्रक खड़े थे।
धड़ाक! धड़ाक! धड़ाक!
टैंकों की तोपों से आग के विशाल गोले निकले।
हाई-एक्सप्लोसिव एंटी-टैंक (HEAT) गोले इंडिया गेट की तरफ़ बढ़ते हुए उन हवा में तैरते काले सायों से टकराए।
लेकिन जो हुआ, उसे देखकर उन टैंकों के भीतर बैठे जाँबाज़ कमांडरों की रूह कांप गई।
तोपों के वे आधुनिक, प्रचंड गोले जैसे ही उन उड़ते हुए जिन्नात के विशालकाय, बीस फीट ऊँचे सायों के पास पहुँचे... वे फटने के बजाय हवा में ही जम गए!
उन आग के दैत्यों ने उन गोलों को अपने काले, छह उंगलियों वाले पंजों में पकड़ लिया। गोलों का उच्च-क्षमता वाला बारूद किसी मोमबत्ती की तरह पिघलकर उन जिन्नों की नसों में समा गया! आधुनिक विस्फोटकों की वह सारी ऊर्जा उन दैत्यों के लिए कोई ख़तरा नहीं थी; वह उनकी भूख की खुराक बन रही थी!
"गोलियों का कोई असर नहीं हो रहा है, सर!" एक सिपाही अपनी इंसास राइफ़ल का ट्रिगर दबाते हुए पागलों की तरह चीख़ा।
गोलियाँ उन सायों के सीने से आर-पार निकलकर पीछे की कंक्रीट की दीवारों में धँस रही थीं।
तभी, आसमान से एक भयानक, गड़गड़ाती हुई आवाज़ आई।
हिंडन एयरबेस से भेजे गए भारतीय वायुसेना के दो सुखोई एसयू-30 एमकेआई (Sukhoi Su-30MKI) लड़ाकू विमान ध्वनि की गति से इंडिया गेट के ऊपर से गुज़रे। उन्होंने अपनी ब्रह्मोस और हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलें उस आसमान में तैरते हुए काले बवंडर पर दाग दीं।
हूशशश!
लेकिन जैसे ही मिसाइलें उस रूहानी घेरे के भीतर दाख़िल हुईं, इंडिया गेट के ऊपर मंडरा रही उस महा-शक्ति ने अपनी उंगली का एक हल्का-सा इशारा किया।
हवा में एक अदृश्य, प्रचंड विद्युत-चुंबकीय और पराभौतिक झटका (occult shockwave) दौड़ा।
दोनों सुखोई विमानों के आधुनिक रडार, फ्लाई-बाय-वायर सिस्टम और इंजन एक ही सेकंड में जलकर राख हो गए। लड़ाकू विमान हवा में ही बेकाबू होकर लट्टू की तरह घूमे और ज़मीन पर गिरकर आग के विशाल गोलों में तब्दील हो गए—बूम! बूम!
आधुनिक तकनीक, परमाणु युग की फ़ौज और इक्कीसवीं सदी का विज्ञान उस 650 साल पुरानी आदिम आग के आगे महज़ बच्चों के खिलौनों की तरह कुचले जा रहे थे!
3. इंडिया गेट की प्राचीर पर बैठा नवजात काल
कबीर मलबे और टूटे हुए पेड़ों की ओट में छिपता हुआ आगे बढ़ा।
उसने अपना सिर ऊपर उठाया और सीधे इंडिया गेट के मुख्य मेहराबदार शिखर की तरफ़ देखा।
वह मंज़र किसी भी इंसान के दिल की धड़कन को हमेशा के लिए रोक देने के लिए काफ़ी था।
इंडिया गेट के उस 42 मीटर ऊँचे शीर्ष पर—जहाँ कभी ब्रिटिश काल में 'शाही ताज' का प्रतीक बना था—वहाँ मलिका-ए-आतिश (मीरा) खड़ी थी!
उसका शरीर अब किसी सामान्य औरत का नहीं था। वह तीस फीट ऊँची, आग और नीले धुएँ की एक विशालकाय साम्राज्ञी बन चुकी थी। उसके बारह काले, भयानक हाथ हवा में लहरा रहे थे। उसकी आँखें पूरी तरह नीली आग की भट्टी जैसी जल रही थीं, और उसके सिर पर वही सल्तनत-कालीन तांत्रिक मुकुट दहक रहा था।
और उसकी गोद में...
उसकी छाती से चिपका हुआ एक नवजात शिशु था।
वह शिशु दिखने में महज़ कुछ ही घंटों का लग रहा था, लेकिन उसका वजूद किसी ब्लैक-होल जैसा भारी और विकराल था।
उसकी चमड़ी पूरी तरह कोयले जैसी काली थी, जिसके नीचे नीली नसों का एक जाल धड़क रहा था। उसकी आँखें खुली हुई थीं—पूरी तरह अंधी, पुतलियों से रहित, शून्य जैसी आँखें।
और जब उस शिशु ने अपना मुँह खोला...
तो कोई बच्चे के रोने की आवाज़ नहीं निकली।
उसके मुँह से एक ऐसी तीखी, पराश्रव्य (ultrasonic) रूहानी चीख़ निकली जिसने पूरी नई दिल्ली के वायुमंडल के साउंड-बैरियर को एक ही झटके में फाड़ दिया!
चीखखखखख्र्र्र्र!
उस आवाज़ के टकराते ही, कर्तव्य पथ के दोनों तरफ़ स्थित शास्त्री भवन, निर्माण भवन और उद्योग भवन के लाखों कांच के शीशे एक साथ फूट पड़े! कंक्रीट की मजबूत दीवारें फटने लगीं। सड़कों पर खड़े सैनिकों के कानों और नाक से ख़ून बहने लगा और वे अपने सिर पकड़कर ज़मीन पर तड़पने लगे।
उस नवजात की वह पहली चीख़ इस पूरी आधुनिक दिल्ली के चेतन मस्तिष्क को सीधे नष्ट कर रही थी!
4. कर्नल राठौड़ की टुकड़ी और अमर जवान का रहस्य
कबीर आगे बढ़ने ही वाला था कि एक मजबूत, लोहे जैसी पकड़ ने उसके कॉलर को पकड़ा और उसे सड़क के किनारे खड़े एक बख्तरबंद वाहन (Casspir APC) के पीछे खींच लिया।
"सिर नीचे करो, बेवक़ूफ़!"
एक सख्त, सैन्य आवाज़ आई।
कबीर ने पलटकर देखा।
सामने भारतीय सेना के पैरा-कमांडोज़ का एक कर्नल खड़ा था। उसकी वर्दी ख़ून और कालिख से सनी थी, चेहरे पर गहरी खरोंचें थीं, और उसकी आँखों में एक ख़तरनाक, हताश गुस्सा था। उसके नेम-प्लेट पर लिखा था: 'कर्नल विक्रम राठौड़ — स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स'।
कर्नल राठौड़ ने अपनी ग्लॉक पिस्टल कबीर के सीने पर तान दी:
"तुम कौन हो? तुम्हारे कपड़ों पर यह मध्यकालीन लिबास कैसा है? और तुम्हारे हाथ में यह खंजर..."
कर्नल की नज़र कबीर के चेहरे पर पड़ी। उसकी आँखें चौंककर फैल गईं:
"रुको... तुम... तुम कबीर मेहरा हो? एम्स के न्यूरो-लैब के उस 'प्रोजेक्ट बरज़ख़' का मिसिंग पेशेंट?!"
कबीर ने कर्नल की पिस्तौल को अपने हाथ से धीरे से नीचे किया। कबीर की आवाज़ में एक अजीब, अलौकिक गंभीरता थी जो केवल उन लोगों में होती है जो मौत के पार से लौटकर आए हों।
"कर्नल साहब... पिस्तौल नीचे रखिए," कबीर ने कहा। "आपकी ये मशीन गनें, आपके ये टी-90 टैंक और आपके वे सुखोई विमान इस बला का एक बाल भी बाँका नहीं कर सकते। आप बारूद से उस आग को मारने की कोशिश कर रहे हैं जो बारूद के ईजाद होने से हज़ारों साल पहले से इस ज़मीन पर राज कर रही है!"
कर्नल राठौड़ ने अपने दाँत भींचे: "तो फिर क्या करें? दिल्ली की सरकार ख़त्म हो चुकी है! पीएमओ और कैबिनेट सेक्रेटेरिएट से संपर्क टूट चुका है। पूरी दुनिया से हमारा संपर्क कट गया है। क्या हम इन शैतानों के आगे घुटने टेक दें?"
"नहीं," कबीर ने इंडिया गेट के उस विशाल मेहराब की तरफ़ इशारा किया।
"इंडिया गेट सिर्फ़ एक स्मारक नहीं है, कर्नल साहब। 1931 में जब एडविन लुटियंस ने इसे बनवाया था, तो उसने इसे पहले विश्व युद्ध और अफ़गान युद्ध में शहीद हुए 84,000 भारतीय सैनिकों की स्मृति में बनवाया था।
वे 84,000 सैनिक केवल इतिहास के नाम नहीं हैं; इस ज़मीन के नीचे उनकी शहादत की वह रूहानी मिट्टी दबी है जिसने कभी विदेशी हुकूमतों की चूलें हिला दी थीं!
और उसके नीचे जलने वाली वह 'अमर जवान ज्योति'... वह कोई गैस की लौ नहीं थी; वह इस मुल्क के शहीदों का वह अखंड रूहानी चराग़ था जो किसी भी शैतानी आग को अपनी पवित्रता से काट सकता है!"
कबीर ने अपना वह मुग़ल भस्म से सना चांदी का खंजर दिखाया:
"मुझे उस मेहराब के ऊपर पहुँचना होगा। मुझे उस नवजात के सीने में यह खंजर उतारना होगा इससे पहले कि वह अपने पूरे होश में आए! क्या आप मुझे उस स्मारक की सीढ़ियों तक पहुँचा सकते हैं?"
कर्नल राठौड़ ने एक पल के लिए कबीर की आँखों में देखा। उन आँखों में कोई झूठ या पागलपन नहीं था; वहाँ एक ऐसा अटूट संकल्प था जो सिर्फ़ किसी सच्चे सिपाही की आँखों में होता है।
कर्नल ने अपनी मैगज़ीन लोड की और अपने बचे हुए छह कमांडोज़ की तरफ़ देखा:
"बॉयज़! आज़ाद भारत का सबसे बड़ा ऑपरेशन शुरू हो रहा है। हम इस लड़के के लिए रास्ता साफ करेंगे। फ़ॉस्फ़ोरस और मैग्नीशियम ग्रेनेड्स निकालो! उस शैतान की आँखों को अंधा कर दो!"
5. इंडिया गेट की चढ़ाई और खूनी अग्नि-परीक्षा
"गो! गो! गो!"
कर्नल राठौड़ की दहाड़ के साथ ही, छह कमांडोज़ ने एक साथ दर्जनों मैग्नीशियम और सफ़ेद फ़ॉस्फ़ोरस के ग्रेनेड इंडिया गेट के बेस की तरफ़ दाग दिए।
तड़ाक! भभक!
अंधा कर देने वाली, दूधिया सफ़ेद रोशनी का एक महा-विस्फोट हुआ।
हवा में तैरते हुए उन जिन्नों के साए उस तीव्र, रासायनिक प्रकाश के झटके से एक पल के लिए बिलबिला उठे। उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे चीख़ते हुए पीछे हटे।
"भागो, कबीर!" कर्नल राठौड़ अपनी मशीन गन से गोलियों की बौछार करते हुए चिल्लाए।
कबीर ने अपनी पूरी ताक़त अपने पैरों में झोंक दी।
वह दौड़ता हुआ इंडिया गेट के उस काले, संगमरमर वाले अमर जवान ज्योति के चबूतरे पर पहुँचा।
चबूतरे पर उल्टी रखी वह प्रसिद्ध एसएलआर (SLR) राइफ़ल और उसके ऊपर रखा वह सैनिक का हेलमेट... नीली आग की लपटों से घिरा हुआ था।
कबीर ने उस राइफ़ल को छुआ।
उस धातु के स्पर्श से उसके भीतर 84,000 अमर शहीदों के संकल्प की एक ठंडी, पवित्र लहर दौड़ी। उसकी कटी हुई उंगलियों का दर्द एक पल के लिए ग़ायब हो गया।
उसने इंडिया गेट की विशाल, बलुआ पत्थर की दीवारों पर बने नक्काशीदार कंगूरों और मरम्मत के लिए लगी पुरानी लोहे की सीढ़ियों को पकड़ लिया।
वह ऊपर चढ़ने लगा।
हर कदम के साथ हवा की गर्मी बढ़ रही थी। मलिका-ए-आतिश के साए ने कबीर को देख लिया था।
"तू फिर आ गया, कीड़े!"
मलिका-ए-आतिश ने अपनी छह उंगलियों वाले एक हाथ से आग का एक विशाल गोला कबीर की तरफ़ फेंका।
सननन्र!
आग का गोला इंडिया गेट के पत्थर से टकराया। भारी पत्थर टूटकर नीचे गिरा। कबीर का एक पैर फिसल गया, वह हवा में लटक गया। लेकिन उसने अपने बाएँ हाथ से पत्थर की दरार को कसकर पकड़े रखा। उसने नीचे देखा—कर्नल राठौड़ और उनकी टुकड़ी को आग के दर्जनों साए अपने जबड़ों में जकड़ चुके थे। वे अपनी अंतिम साँस तक गोलियाँ चला रहे थे।
"यह कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी!" कबीर दाँत पीसते हुए चिल्लाया।
उसने अपने शरीर को ऊपर खींचा और एक छलांग लगाकर सीधे इंडिया गेट के सबसे ऊपरी, सपाट चबूतरे पर जा पहुँचा!
6. चोटी पर महा-युद्ध और मीरा की अंतिम चीख़
ऊपर का मंज़र किसी कयामत के शिखर जैसा था।
मलिका-ए-आतिश अपनी पूरी भयानक, दैत्याकार मुद्रा में कबीर के सामने खड़ी थी। उसकी छाती से वह नवजात शिशु चिपका हुआ था, जिसकी आँखें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं।
"कबीर मेहरा..." मलिका-ए-आतिश की आवाज़ में ज़ोहरा की नफ़रत और जिन्नात का घमंड एक साथ गूँज रहा था।
"तू इस बच्चे को नहीं छू सकता! यह बच्चा आग और मिट्टी का वह पहला मुकम्मल संगम है जो इस दुनिया के सारे क़ानूनों, सारी सीमाओं और सारे इंसानों को ख़ाक में मिला देगा!"
उसने अपने बारह हाथों में आग की तलवारें बना लीं और कबीर पर एक साथ वार किया!
खचाक! खचाक! झनन्नन्र!
कबीर ने अपने उस चांदी के खंजर से उन वारों को रोका।
चांदी और आग के टकराने से नीली-सफ़ेद चिंगारियों का बवंडर उठा। कबीर के कपड़े जलने लगे, उसकी चमड़ी पर फफोले पड़ गए। लेकिन कबीर पीछे नहीं हटा। उसने उस अमर जवान ज्योति के पवित्र संकल्प को अपने खंजर में उतार लिया था।
उसने अपने खंजर को एक ख़ास कोण पर घुमाया—वही दाँव जो उसने 1945 के उस आज़ाद हिंद के प्रशिक्षण में सीखा था—और मलिका-ए-आतिश के तीन हाथों को एक ही झटके में काट डाला!
चीखखखख!
नीले ख़ून की धार छूटी। मलिका-ए-आतिश दर्द से लड़खड़ाई।
और उसी पल—
उस भयानक, राक्षसी चेहरे के भीतर से... अचानक एक मासूम, कांपती हुई, इंसानी आवाज़ फूट पड़ी:
"क... कबीर! मुझे मार दो!"
कबीर ठिठक गया।
वह मीरा थी!
उस जिन्न के भयानक मुखौटे के पीछे से उस बीस साल की नर्स की असली आँखें बाहर झाँक रही थीं। उसके गालों पर इंसानी आँसू बह रहे थे।
"कबीर... मैं इस शैतान को ज़्यादा देर नहीं रोक सकती!" मीरा का मानवीय हाथ अपने ही दूसरे हाथों को पीछे खींच रहा था।
"यह बच्चा... यह बच्चा मेरी कोख को जला रहा है! यह मुझे अंदर से खा रहा है! इसे मार दो, कबीर! इससे पहले कि यह अपनी तीसरी चीख़ निकाले... इस खंजर को इसके सीने में घोंप दो!"
"मीरा!" कबीर की आँखें आंसुओं से भर गईं।
लेकिन सोचने का वक़्त नहीं था।
उस नवजात शिशु ने अपना मुँह खोल लिया था। उसकी छाती फूल रही थी—वह अपनी तीसरी और अंतिम विनाशकारी चीख़ निकालने ही वाला था, जो पूरी दिल्ली के इंसानों के मस्तिष्कों को हमेशा के लिए फाड़ देती!
कबीर ने अपनी आँखें बंद कीं।
उसने अपने मुँह से ईश्वर का, अपने पुरखों का और उस मिट्टी का नाम लिया।
और उसने पूरी ताक़त से वह मुग़ल भस्म से चमकता हुआ चांदी का खंजर... सीधा उस नवजात शिशु की छाती के बीचों-बीच घोंप दिया!
खचाक!
7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-मोड़: अस्पताल का टैग और पिता का सच (The Twist)
कबीर को लगा था कि खंजर के लगते ही वह बच्चा जलकर राख हो जाएगा।
उसे लगा था कि यह शैतानी साम्राज्य एक ही पल में ढह जाएगा।
लेकिन जो हुआ...
उसने कबीर की रूह, उसकी नसों और उसके अस्तित्व के एक-एक रेशे को हमेशा के लिए शून्य में फेंक दिया।
चांदी का वह पवित्र खंजर उस बच्चे के सीने में धँसते ही... पिघल गया!
जैसे किसी ने बर्फ़ की छुरी को खौलते हुए तेल में डाल दिया हो! चांदी उस बच्चे के शरीर में समा गई, और उस घाव से कोई काला धुआँ या आग नहीं निकली।
वहाँ से शुद्ध, लाल, ताज़ा इंसानी ख़ून बह निकला!
उस बच्चे ने रोना बंद कर दिया।
उसकी काली, राख जैसी चमड़ी अचानक छूटकर गिरने लगी। उस भयानक, दानवी खोल के नीचे से एक गोरा, नाज़ुक और सुंदर इंसानी नवजात बाहर झाँकने लगा!
कबीर की आँखें दहशत और अविश्वास से फटी की फटी रह गईं।
उसकी नज़र उस बच्चे की नन्हीं, बायीं कलाई पर पड़ी।
उस कलाई पर कोई तांत्रिक धागा नहीं बंधा था।
उस कलाई पर दिल्ली सरकार के सफ़दरजंग अस्पताल (Safdarjung Hospital) का वही पारदर्शी, प्लास्टिक का मेडिकल नवजात टैग (infant ID tag) बंधा हुआ था!
कबीर ने कांपते हाथों से उस टैग को देखा। उस पर कंप्यूटर से छपे हुए काले अक्षरों में जो लिखा था, उसे पढ़कर कबीर के पैरों तले से इंडिया गेट ही नहीं, पूरी कायनात खिसक गई:
अस्पताल: सफ़दरजंग हॉस्पिटल, नई दिल्ली
वार्ड: मैटरनिटी विंग — ICU 3
जन्म तारीख़: 13 सितंबर 2026, समय: रात 11:42
माता का नाम: मीरा शर्मा
पिता का नाम: कबीर मेहरा
कबीर के गले से कोई आवाज़ नहीं निकली। उसकी साँसें पूरी तरह बंद हो गईं।
यह कोई 650 साल पुराना जिन्न नहीं था!
यह कोई 1354 का मध्यकालीन दैत्य नहीं था!
कबीर के दिमाग़ में एम्स की उस न्यूरो-लैब के वे 22 दिन बिजली की तरह कौंधे!
जब वह और मीरा उस बेसमेंट में बेहोश पड़े थे, जब डॉ. सेन और उनकी टीम उन पर प्रयोग कर रही थी... तब उन्होंने विज्ञान और जेनेटिक्स के ज़रिये कबीर और मीरा के डीएनए को मिलाकर, उस कृत्रिम इनक्यूबेटर में इस बच्चे को जन्म दिलवाया था!
यह बच्चा कोई परलौकिक शैतान नहीं था... यह कबीर और मीरा का अपना सगा, जैविक (biological) बेटा था!
जिन्नात ने तो केवल इस मासूम इंसानी बच्चे के शरीर को अपनी आग का मुखौटा बनाया था!
और तभी—
उस बच्चे ने अपनी नन्हीं, नाज़ुक आँखें खोलीं।
वे आँखें कबीर की अपनी आँखें थीं। उसने अपनी नन्हीं, इंसानी उंगलियों से कबीर के उस ख़ून से सने अँगूठे को पकड़ लिया।
और उस बच्चे के नन्हें होंठों से... किसी जिन्न की नहीं, बल्कि एक मासूम बच्चे की आवाज़ में वह शब्द निकला जिसने कबीर के कलेजे को चीर कर रख दिया:
"पापा..."
कबीर घुटनों के बल गिर पड़ा।
उसने अपने ही बेटे की छाती में खंजर घोंप दिया था!
और उसके ठीक पीछे, मलिका-ए-आतिश का वह भयानक साया उस बच्चे के शरीर से पूरी तरह अलग होकर हवा में खिलखिला कर हँसा:
**"कैसा लगा इंसाफ़, कबीर मेहरा?
सत्तर साल पहले तुम्हारे परदादा ने मेरी मासूम कोख का क़त्ल किया था...
और आज... तुमने अपने ही हाथों... अपने ही ख़ून... अपने ही बेटे का सीना चीर दिया!
अब रोओ, कबीर... क्योंकि इस ख़ून की बलि के साथ ही... कोटला का असली महा-राक्षस अब इस धरती पर क़दम रखने जा रहा है!"**