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भाग 15: आग का संसद भवन, दादा की वसीयत और तीन युगों का विलय
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 15 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2689
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. पारिवारिक विश्वासघात की राख और पितामह का अट्टहास
इंसान की ज़िंदगी में सबसे बड़ा सदमा मौत नहीं होती; सबसे बड़ा सदमा वह पल होता है जब वह यह देखता है कि जिस शख़्स की उंगली पकड़कर उसने बचपन में चलना सीखा था, जिस दादा की गोद में बैठकर उसने परियों और वीरों की कहानियाँ सुनी थीं... वही शख़्स उसके पूरे ख़ानदान के विनाश का मुख्य सूत्रधार था।
कबीर उस खौलती हुई यमुना के किनारे पत्थरों पर घुटना टेके बैठा था।
उसके सामने जो नदी बह रही थी, उसमें पानी की एक बूँद भी नहीं थी। पूरी यमुना नदी पिघले हुए लाल-नारंगी लावे, खौलते हुए ताँबे और नीले अंगारों के एक भयानक समंदर में बदल चुकी थी। उस लावे की सतह से उठने वाली ज़हरीली भाप इतनी गर्म थी कि कबीर के चेहरे की भौंहें और पलकों के बाल झुलसकर मुड़ रहे थे।
और उस लावे के समंदर के बीचों-बीच, पानी को चीरकर जो अस्सी फीट ऊँची इमारत खड़ी थी...
वह कोई मध्यकालीन किला नहीं थी।
वह भारत के पुराने संसद भवन (Council House/Parliament House) का वही मशहूर वृत्ताकार (circular) स्तंभों वाला ढाँचा था, लेकिन उसकी बनावट को फ़िरोज़ शाह कोटला की जामी मस्जिद के काले, खुरदुरे, सल्तनत-कालीन पत्थरों के साथ इस तरह गूँथ दिया गया था जैसे किसी ने आधुनिक लोकतंत्र की हड्डियों पर मध्यकालीन वहशीपन का माँस मढ़ दिया हो!
स्तंभों के बीच खिड़कियों की जगह हज़ारों इंसानी खोपड़ियाँ जड़ी थीं, जिनके मुँह से नीली आग की लपटें बाहर निकल रही थीं।
और उस संसद-मक़बरे के सबसे ऊँचे, विशाल केंद्रीय गुंबद के कंगूरे पर... ओमकार मेहरा खड़े थे।
कबीर के सगे दादा!
वही दादा, जिनकी 1970 में पंखे से लटककर आत्महत्या करने की कहानी कबीर को बचपन से सुनाई गई थी। वही दादा, जिनकी याद में हर साल उनके घर में शांति-पाठ और गरीबों को कम्बल बांटे जाते थे!
ओमकार मेहरा ने 1970 के दशक का वही जाना-पहचाना खाकी सफ़ारी सूट पहन रखा था। उनकी आँखों पर वही मोटा, चौकोर सोने के फ्रेम वाला चश्मा था। उनके चेहरे पर वही शांत, सौम्य और आदरणीय मुस्कान थी जो घर के ड्राइंग रूम की तस्वीरों में दिखती थी। लेकिन उनके दाएँ हाथ में एक छह फीट लंबी, मुड़ी हुई ताँबे की सुलेमानी छड़ी थी, जिसके सिरे पर एक जीवित, धधकता हुआ इंसानी दिल धड़क रहा था!
"कबीर, मेरे बच्चे..." ओमकार की आवाज़ लावे की खदबदाहट को चीरती हुई इस तरह आई जैसे कोई दादा अपने पोते को ड्राइंग रूम में सोफ़े पर बैठने के लिए बुला रहा हो।
"तुमने बहुत दौड़-धूप कर ली। तुमने 1954 के अपने उस बेवक़ूफ़ परदादा हरदयाल को भी देख लिया, और 1354 के उस फ़र्ज़ी सुल्तान को भी मिटा दिया। लेकिन क्या तुमने कभी यह सोचा कि जिस ताँबे की अंगूठी को तुम अपनी उंगली में सुरक्षा-कवच समझकर पहने घूम रहे थे... वह अंगूठी किसने गढ़ी थी?"
कबीर के दाँत इतनी ज़ोर से भींचे कि उसके मसूड़ों से ख़ून रिसने लगा।
"तुमने... तुमने मुझे उस अंगूठी में बाँधा था, दादाजी?" कबीर की आवाज़ नफ़रत और आंसुओं में डूबी हुई थी।
ओमकार ने एक बहुत धीमी, आत्मीय हँसी हँसते हुए अपनी छड़ी को ज़मीन पर पटका:
"बेशक, मेरे बच्चे! तुम्हारे परदादा हरदयाल तो एक कमज़ोर, डरपोक बनिया थे। उन्होंने 1954 में उस ज़ोहरा नाम की गायिका की बलि देकर केवल पचास लाख रुपयों का कर्ज़ और चंद हवेलियाँ माँगी थीं। कितनी घटिया सोच थी उनकी!
लेकिन मैं... मैंने 1970 में जब दिल्ली के लुटियंस ज़ोन और कोटला की इन गुप्त प्राचीन फाइलों का अध्ययन किया, तो मुझे समझ आया कि असली ताक़त दौलत में नहीं है... असली ताक़त 'हुकूमत' (Governance) में है!
मैंने अपनी मौत का झूठा नाटक रचा ताकि मैं इस ज़मीन के नीचे, वक़्त के उस गुप्त जोड़ पर बैठ सकूँ जहाँ 1354 का मध्यकालीन वहशीपन और 2026 का आधुनिक संविधान एक-दूसरे से मिलते हैं!"
2. लावे का समंदर और पंडित महाशर्मा का अग्नि-सेतु
ओमकार की छड़ी से नीली बिजलियाँ निकलकर उस संसद-मक़बरे के खंभों में दौड़ने लगीं।
और उस भयानक कंपन के साथ ही, नदी के इस पार खड़े लाखों आधुनिक दिल्लीवासियों की देहों में खिंचाव होने लगा!
कबीर ने मुड़कर देखा।
वह स्कूल मास्टर, वह सुप्रीम कोर्ट का वकील, वे हज़ारों आधुनिक छात्र और औरतें—उनकी त्वचा अचानक सूखने लगी थी। उनके बाल सफ़ेद हो रहे थे, उनकी आँखों की रोशनी बुझ रही थी। जैसे कोई विशाल, अदृश्य पंप उन लाखों ज़िंदा इंसानों की आत्मा और उनकी जीवन-ऊर्जा को खींचकर उस संसद भवन के गुंबद में भर रहा हो!
"वह उनकी रूहें चूस रहा है, कबीर!"
पीछे से एक हांफती हुई, कमज़ोर आवाज़ आई।
कबीर ने देखा।
पंडित महाशर्मा मेहरा—उनके आदि-पूर्वज—लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनका पूरा शरीर पत्थरों की चोटों और ख़ून से लथपथ था। उनके हाथ में जनेऊ का वह पवित्र, सात-गांठों वाला सूती धागा था जो अब सोने की तरह चमक रहा था।
"बाबा... इसे कैसे रोकें?" कबीर ने महाशर्मा को सहारा देते हुए पूछा। "यमुना लावे की नदी बन चुकी है। हम उस पार कैसे जाएँ?"
महाशर्मा ने अपनी गहरी, आंसुओं से भरी आँखें कबीर के चेहरे पर टिका दीं।
"इस नदी को केवल वही पार कर सकता है, कबीर... जो अपने पुरखों के पापों का प्रायश्चित अपनी देह से करने को तैयार हो। 1354 में मैंने इस बाओली का पहला नक्शा खींचकर जो पाप किया था... आज उस पाप की आहुति देने का वक़्त आ गया है!"
"नहीं, बाबा! आप क्या करने जा रहे हैं?"
महाशर्मा ने कबीर की बात नहीं सुनी।
उन्होंने अपने जनेऊ को अपने सीने से तोड़ा और उसे अपनी हथेली के ख़ून से भिगो लिया। उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और वे प्राचीन वैदिक मंत्र पढ़ने लगे जो यमुना की मूल, पाताल-धारा को पुकारते थे।
और फिर—
पंडित महाशर्मा ने उस खौलते हुए लावे के समंदर में छलांग लगा दी!
छपाक! भभक!
कबीर की चीख़ गूँज उठी: "बाबा!"
लेकिन महाशर्मा का शरीर जला नहीं!
उनकी रूहानी तपस्या और उनके प्रायश्चित के ख़ून ने उस लावे की सतह को छूते ही एक चमत्कार कर दिया। लावे की सतह पर जहाँ-जहाँ उनका ख़ून पड़ा, वहाँ की आग ठंडी होकर काले, ठोस ग्रेनाइट पत्थरों के एक संकरे पुल में तब्दील हो गई!
वह ‘अग्नि-सेतु’ था—यमुना के लावे के सीने पर खिंचा हुआ एक ऐसा पत्थरीला रास्ता जो सीधा उस संसद-मक़बरे के मुख्य द्वार तक जा रहा था!
महाशर्मा की रूह उस पुल के पत्थरों से एक हल्की, सफ़ेद रोशनी के रूप में उभरी और कबीर के कान में फुसफुसाई:
"जाओ, कबीर... उस दुष्ट की छड़ी को तोड़ दो... हमारे ख़ानदान के इस कलंक को हमेशा के लिए मिटा दो!"
3. संसद-मक़बरे के गलियारे: मुर्दों की लोकसभा
कबीर ने एक क्षण भी नहीं गँवाया।
उसने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस मुग़ल भस्म से दैदीप्यमान चांदी के खंजर को कसकर भींच लिया और उस तपते हुए, काले पत्थरों के पुल पर दौड़ लगा दी। उसके जूतों के तलवे उस भयानक गर्मी से पिघलने लगे थे, लेकिन वह रुका नहीं।
उसने उस संसद-मक़बरे के विशाल, लोहे के मेहराबदार मुख्य द्वार को अपने कंधे से टक्कर मारकर खोल दिया!
धड़ाम!
अंदर का दृश्य किसी भी जीवित इंसान के मस्तिष्क को पागल कर देने के लिए काफ़ी था।
यह भारत के पुराने संसद भवन का वही वृत्ताकार सेंट्रल हॉल (Central Hall) था, जहाँ आज़ाद भारत का संविधान लिखा गया था, जहाँ पंडित नेहरू ने 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' का भाषण दिया था।
लेकिन यहाँ की हवा में आज़ादी की ख़ुशबू नहीं थी; यहाँ सड़े हुए कफ़न, सल्फर और जली हुई चमड़ी की असहनीय दुर्गंध भरी थी।
हॉल के चारों तरफ़ लगी लकड़ी की बेंचों पर... सैकड़ों मरे हुए हुक्मरानों के कंकाल बैठे थे!
मुग़ल सल्तनत के वज़ीर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर-जनरल, लुटियंस दिल्ली के पुराने नौकरशाह और आज़ादी के बाद के भ्रष्ट राजनेता—वे सब अपने-अपने दौर के सड़े हुए लिबासों में उन बेंचों पर शांत, बुत बने बैठे थे। उन सभी कंकालों की आँखों के गड्ढों में नीली आग जल रही थी, और उनके हाथों में लोहे की मोटी-मोटी फाइलें थीं जिन पर लाल मोम की मुहरें लगी थीं!
और हॉल के बीचों-बीच, जहाँ कभी संविधान सभा के अध्यक्ष की कुर्सी होती थी...
वहाँ इंसानी पसलियों और खोपड़ियों से बना एक विशाल, खूनी सिंहासन रखा था।
उस सिंहासन पर ओमकार मेहरा बैठे थे। उनके सामने एक विशाल, काली लकड़ी की मेज़ थी, जिस पर जानवरों की सुखाई गई खाल (parchment) पर लिखा हुआ एक विशाल दस्तावेज़ फैला हुआ था।
उस दस्तावेज़ के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था: ‘संविधान-ए-आतिश’ (The Constitution of Fire)।
"आओ कबीर, अंदर आ जाओ," ओमकार ने अपनी छड़ी को मेज़ पर रखते हुए कहा। उनकी आँखों के चश्मे के शीशों पर सेंट्रल हॉल के झूमरों में जलती नीली लपटों का अक्स नाच रहा था।
"यह दुनिया का सबसे मुकम्मल दस्तावेज़ है, कबीर। तुम्हारे उन 1950 के संविधान निर्माताओं ने समझा था कि वे क़ानून से इस देश को चलाएँगे। कितने नादान थे वे!
असली सत्ता क़ानून में नहीं, रूहों के मालिकाना हक़ में होती है! इस दस्तावेज़ के ज़रिये मैंने दिल्ली के सातों ऐतिहासिक शहरों के हर एक नागरिक की रूह को इस संसद के नीचे दबे जिन्नात के हवाले कर दिया है। आज के बाद, जो भी इस शहर में साँस लेगा... वह जन्म लेते ही इस आग का ग़ुलाम होगा!"
4. पिता का सच्चा साया और ख़ून का प्रतिरोध
"तुम एक राक्षस हो, ओमकार मेहरा!" कबीर ने उस सेंट्रल हॉल के फर्श पर आगे बढ़ते हुए दहाड़ लगाई।
"तुमने अपने बाप हरदयाल को एक कायर समझा, लेकिन तुम उससे भी बड़े दरिंदे निकले! तुमने अपने ही बेटे... मेरे पिता राजीव मेहरा को इस आग की वेदी पर चढ़ा दिया!"
ओमकार के चेहरे पर एक पल के लिए एक ठंडी, व्यंग्यात्मक मुस्कान उभरी।
"राजीव? वह लड़का हमेशा से कमज़ोर था। वह तुम्हारी तरह किताबों और कविताओं में उलझा रहता था। जब 1970 में मैंने उसे इस योजना का हिस्सा बनने को कहा, तो उसने बगावत कर दी। उसने कहा कि वह अपने बेटे (तुम्हें) इस आग से बचाएगा। इसलिए मुझे अपनी झूठी आत्महत्या का नाटक करके उसे उस बाओली के कुएँ में धकेलना पड़ा!"
ओमकार ने मेज़ पर रखे उस 'संविधान-ए-आतिश' की तरफ़ इशारा किया:
"अब बस एक ही दस्तख़त बाक़ी है। इस दस्तावेज़ पर तुम्हारे इस ख़ानदान के आख़िरी वारिस के ख़ून की मुहर लगनी है। या तो तुम ख़ुद इस पर अपना अँगूठा लगा दो... या मैं तुम्हारी लाश से यह ख़ून निचोड़ लूँगा!"
तभी—
उस खूनी सिंहासन के पीछे के अंधेरे से एक हल्की, कांपती हुई, नीली रोशनी उभरी।
हॉल का तापमान अचानक गिर गया।
उस रोशनी के भीतर से एक दुबला-पतला, खाकी पैंट और सफ़ेद कमीज़ पहने हुए साया बाहर निकला। उसकी आँखों में वही चश्मा था, वही झुके हुए कंधे थे, और उसके चेहरे पर अपार दुखों का समंदर था।
राजीव मेहरा! कबीर के पिता की वास्तविक, पवित्र रूह!
"कबीर... मेरे बच्चे..." राजीव की आवाज़ सेंट्रल हॉल के गुंबद में किसी मंदिर के घंटे की तरह गूँज उठी।
कबीर की आँखें आंसुओं से भर गईं। "पापा..."
राजीव की रूह ने अपने पिता—ओमकार मेहरा—के सिंहासन की तरफ़ देखा। राजीव की आँखों में अब कोई डर नहीं था; वहाँ एक पिता का वह असीम, आदिम क्रोध था जो अपनी औलाद की रक्षा के लिए मौत की सीमाओं को भी लांघ जाता है।
"पिताजी!" राजीव की रूह चीख़ी।
"आपने समझा था कि आपने मुझे 1970 में उस बाओली के कुएँ में क़ैद कर दिया था? आप भूल गए कि मैं आपका बेटा था! जब मैं तीन साल पहले अपोलो अस्पताल में अपनी अंतिम साँसें ले रहा था, तब मैंने इस ख़ानदान के कुल-ग्रंथ (Genealogical Registry) में अपना ख़ून मिलाकर एक ऐसा रूहानी ताला लगा दिया था... जिसे आपकी यह शैतानी छड़ी कभी नहीं खोल सकती!"
राजीव की रूह ने आगे बढ़कर अपनी दोनों पारदर्शी, ठंडी बाहें ओमकार मेहरा की गर्दन के चारों तरफ़ लपेट दीं!
"आहहह! हट यहाँ से, नालायक रूह!"
ओमकार पागलों की तरह छटपटाने लगे। राजीव के रूहानी स्पर्श से ओमकार के जिस्म में दौड़ती वह शैतानी आग बुझने लगी। उनकी ताँबे की छड़ी उनकी उंगलियों से फिसलकर मेज़ पर गिर पड़ी!
"कबीर! अभी वार करो!" राजीव की रूह अपने पिता के साए को जकड़े हुए चीख़ी। "इस छड़ी को तोड़ दो!"
5. सेंट्रल हॉल का महा-विनाश और छड़ी का टूटना
कबीर ने एक पल की भी देरी नहीं की।
वह चीते की तरह उछला।
उसने अपने दोनों हाथों से उस मुग़ल भस्म से जगमगाते हुए चांदी के खंजर को उठाया और पूरी ताक़त से उस मेज़ पर रखी ताँबे की सुलेमानी छड़ी के बीचों-बीच दे मारा!
तड़ाक! भभक!
एक ऐसा भयानक, कान के पर्दे फाड़ देने वाला धमाका हुआ जैसे किसी ने एक साथ दस परमाणु बम फोड़ दिए हों।
सुलेमानी छड़ी के दो टुकड़े हो गए।
छड़ी के सिरे पर बंधा वह जीवित इंसानी दिल फट गया, और उसमें से हज़ारों सालों से क़ैद रूहों की चीखें एक काले बवंडर के रूप में बाहर निकलीं।
उस धमाके के साथ ही, वह मेज़ पर रखा 'संविधान-ए-आतिश' सफ़ेद आग की लपटों में जलकर राख होने लगा।
"नहीं! मेरा साम्राज्य! मेरी हुकूमत!"
ओमकार मेहरा एक भयानक चीख़ के साथ पीछे गिरे।
छड़ी के टूटते ही, उनका वह खाकी सफ़ारी सूट जलने लगा। उनकी चमड़ी से वह छलावा उतरने लगा। उनका शरीर अचानक सिकुड़ने लगा—सत्तर साल की उम्र एक ही पल में सौ, डेढ़ सौ, दो सौ साल की सड़ती हुई हड्डियों में बदलने लगी।
राजीव की रूह ने कबीर की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर एक असीम, शांत और तृप्त मुस्कान थी।
"शाबाश, मेरे बेटे... तुमने इस ख़ानदान को आज़ाद कर दिया..."
राजीव की रूह धीरे-धीरे एक सुनहरी, शांत रोशनी में बदलकर उस सेंट्रल हॉल की छत को चीरती हुई मोक्ष की ओर उड़ गई।
ओमकार का शरीर अब फर्श पर पड़ा हुआ तड़प रहा था। वह केवल हड्डियों का एक काला, झुलसा हुआ ढाँचा बचा था।
उस संसद-मक़बरे की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढहने लगी थीं। संगमरमर के खंभे टूटकर लावे के समंदर में गिर रहे थे। छत से भारी पत्थर गिर रहे थे।
कबीर हांफता हुआ उस मलबे के बीच खड़ा था। उसने राहत की एक लंबी साँस ली।
सब कुछ ख़त्म हो चुका था। छड़ी टूट चुकी थी। उसका दादा मारा गया था।
वह मुड़ा और उस ढहते हुए दरवाज़े की तरफ़ भागा।
6. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: 2026 पर कयामत का जन्म (The Twist)
लेकिन जैसे ही कबीर उस मुख्य दरवाज़े के पास पहुँचा...
ज़मीन पर पड़े उस मरते हुए, कंकाल-रूपी ओमकार मेहरा के जबड़ों से एक ऐसी हँसी निकली जिसने कबीर के क़दमों को वहीं जमा दिया।
वह हँसी किसी हारे हुए इंसान की नहीं थी।
वह एक ऐसी हँसी थी जिसमें दुनिया के सबसे बड़े, सबसे ख़तरनाक धोखे का उल्लास भरा हुआ था!
ओमकार ने अपने जलते हुए, हड्डियों वाले हाथ से कबीर के बूट को पकड़ लिया।
उसने अपनी अंतिम साँसों में, ख़ून और राख थूकते हुए कहा:
*"कबीर... मेरे भोले, बेवक़ूफ़ पोते...
तूने सोचा कि मैं इस पाताल में बैठकर राज करना चाहता था?
तूने समझा कि यह संसद भवन मेरा अंतिम मक़सद था?
अरे नादान... यह पूरा तमाशा... यह संसद... मेरी यह छड़ी... यह सब सिर्फ़ एक 'डायवर्सन' (ध्यान भटकाने का छलावा) था!"*
कबीर का दिमाग़ सन्न रह गया। उसकी रीढ़ की हड्डी में बर्फ़ जम गई। "डायवर्सन? किसके लिए?"
ओमकार की अंधी, जलती हुई खोपड़ी ने ऊपर, उस फटती हुई छत की तरफ़ देखा:
*"जब तू मुझसे यहाँ लड़ रहा था... तब नदी के उस पार कौन था, कबीर?
उस लाट की नींव के पास कौन खड़ा था?
मलिका-ए-आतिश! (ज़ोहरा और मीरा का वह संयुक्त रूप!)
इस छड़ी के टूटने से यह पाताल नहीं मिटा, कबीर...
इस छड़ी के टूटने से वह रूहानी बाँध टूट गया है जिसने इस लावे को यहाँ रोक रखा था!
यह पूरा पाताल... यह पूरी आग... अब वक़्त की दरार को चीरकर... सीधे तुम्हारी उस 2026 की आधुनिक दिल्ली में फट चुकी है!"*
कबीर की चीख़ उसके गले में ही घुट गई।
उसने अपना सिर उठाया और उस संसद-मक़बरे की ढहती हुई छत के फटे हुए मुहाने से ऊपर देखा।
ऊपर 1354 का आसमान नहीं था।
ऊपर वक़्त की चादर पूरी तरह फट चुकी थी!
ऊपर... 2026 की आधुनिक नई दिल्ली का आसमान साफ़ दिखाई दे रहा था!
लेकिन उस आसमान में तारे या बादल नहीं थे।
इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन, विजय चौक और कनॉट प्लेस के ऊपर का आसमान जलते हुए उल्कापिंडों और काले बादलों से ढका हुआ था। पूरी दिल्ली पर नीली आग की बारिश हो रही थी!
और सबसे भयानक मंज़र—
2026 के उस ऐतिहासिक 'इंडिया गेट' की अमर जवान ज्योति वाली मेहराब के ठीक ऊपर...
मलिका-ए-आतिश हवा में तैर रही थी!
उसके पीछे लाखों की तादाद में आग के दैत्य और जिन्नात आधुनिक दिल्ली की सड़कों, मेट्रो स्टेशनों और इमारतों पर टिड्डी-दल की तरह टूट रहे थे!
और मलिका-ए-आतिश की गोद में...
एक नवजात, काला, नीली आग में लिपटा हुआ शिशु था!
वह कोई सामान्य बच्चा नहीं था। वह जिन्नात के महा-सम्राट और मनुष्य के ख़ून से जन्मा वह 'इफ़्रीत-ए-आज़म' (The Anti-Christ of Fire) था, जिसकी पैदाइश के लिए 650 साल से यह पूरी बिसात बिछाई गई थी!
उस नवजात दैत्य की पहली रोने की आवाज़ ने... 2026 की आधुनिक पृथ्वी के वायुमंडल के साउंड-बैरियर को एक ही झटके में फाड़ दिया!
और नीचे, मलबे में दबे ओमकार ने अपनी आख़िरी साँस लेते हुए कहा:
"साम्राज्य शुरू हो चुका है, कबीर...
अब तुम्हारी उस इक्कीसवीं सदी को बचाने वाला कोई ख़ुदा भी नहीं बचा!"