PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 14: हमज़ाद-ए-सुल्तान, आइनों का तिलिस्म और काल-भ्रम का जाल

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
14 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
15 min
Words
2893
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. अपने ही चेहरे का आतंक और काल-चक्र की विभीषिका
इंसान जब किसी दैत्य, किसी पिशाच या किसी जंगली जानवर को अपने सामने देखता है, तो उसकी देह में भय की एक स्वाभाविक लहर उठती है—वह भागने या लड़ने की तैयारी करता है।

लेकिन जब इंसान अपनी ही आँखों के सामने, अपने ही कद-काठी, अपने ही चेहरे-मोहरे और अपनी ही आवाज़ वाले किसी ऐसे वजूद को देखता है जो सदियों पहले की तारीख़ में सुल्तान का ताज पहने खड़ा हो... तब दिमाग़ सोचना बंद कर देता है। चेतना शून्य में गिर जाती है। उस पल इंसान को लगता है कि या तो वह पागल हो चुका है, या फिर यह पूरा ब्रह्मांड एक क्रूर, बीमार मज़ाक है।

कबीर उस कांपते हुए लकड़ी के मचान पर बुत बना खड़ा था।

नीचे, कोटला के उस विशाल निर्माण-गड्ढे में हज़ारों ग़ुलामों की चीखें, चाबुकों की फड़फड़ाहट और सम्राट अशोक के विशाल पाषाण खंभे को खींचते हुए लकड़ी के पहियों की गड़गड़ाहट गूँज रही थी।

लेकिन कबीर के कानों में केवल एक ही आवाज़ गूँज रही थी—उस सुल्तान के वे शब्द:
‘इस क़िले को बनाने वाला कोई और नहीं... तुम ख़ुद हो! आओ, अपनी गद्दी संभालो!’

सामने, उस सुनहरी ज़रीदार शाही शामियाने (Royal Pavilion) के चबूतरे पर खड़ा वह युवा सुल्तान अपनी आँखों में एक सर्द, अलौकिक चमक लिए कबीर को ही घूर रहा था।

उसने काले मख़मल का शाही चोला पहन रखा था, जिस पर सोने के तारों से फ़ारसी में सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक का शाही फ़रमान कढ़ा हुआ था। उसके माथे पर जो ताज था, उसमें एक विशाल, ख़ूनी लाल माणिक (ruby) जड़ा था।

और उसका चेहरा...

कबीर ने कांपते हाथों से अपने ही गालों को छुआ।

वही तीखी, थोड़ी मुड़ी हुई नाक। वही घनी, कटी हुई भौहें। वही चौड़ा, सोचमग्न माथा। यहाँ तक कि सुल्तान के बाएँ गाल पर ठीक वही हल्का-सा बचपन का कटने का निशान था, जो कबीर को सात साल की उम्र में साइकिल से गिरते वक़्त लगा था!

"यह... यह कैसे हो सकता है?" कबीर के मुँह से निकली आवाज़ किसी मरते हुए परिंदे की फड़फड़ाहट जैसी थी।

"मैं... मैं 2001 में पैदा हुआ था! मेरा जन्म सफ़दरजंग अस्पताल में हुआ था... मेरे पास बर्थ सर्टिफ़िकेट है... आधार कार्ड है... मेरी माँ... मेरे पिता..."

सुल्तान धीरे-धीरे उस मचान की तरफ़ बढ़ा।

उसकी चाल में एक ऐसी नज़ाकत और बादशाहत थी जो केवल उन इंसानों में होती है जिन्होंने जन्म से ही लाखों जिंदगियों और मौतों के फ़ैसले अपनी एक उंगली के इशारे पर किए हों।

"आधार कार्ड? अस्पताल?" सुल्तान एक बहुत धीमी, परिष्कृत और ज़हरीली हँसी हँसा। उसकी आवाज़ में शुद्ध, प्राचीन फ़ारसी मिश्रित हिन्दुस्तानी का लहज़ा था।

"कबीर... तुमने इतिहास की किताबों में पढ़ा था कि समय एक सीधी सड़क है जो अतीत से भविष्य की तरफ़ जाती है। कितनी बचकानी सोच है! समय कोई सड़क नहीं है... समय एक 'उरोबोरोस' (Ouroboros) है—वह साँप जो अपनी ही पूँछ को अपने मुँह में दबाए हुए एक वृत्त में घूम रहा है!"

सुल्तान ने अपनी छह उंगलियों वाला हाथ हवा में उठाया:
"तूने सोचा कि तू 2026 का एक साधारण इतिहासकार है जो इस खंडहर पर शोध करने आया था? नहीं! तू मेरा ही वह कमज़ोर, भावुक और डरपोक अंश था जिसे मैंने 1388 में अपने इस तख़्त से अलग करके भविष्य के अंधियारे में फेंक दिया था! मैंने अपनी उस कमज़ोर मानवीय रूह को सत्तर साल तक भविष्य की धूल में पकने दिया... ताकि जब 2026 में सात ग्रह एक सीध में आएँ, तो तू उस आग को वापस अपने सीने में समेटकर यहाँ लौट सके!"

2. मसूद का शिकंजा और शाही शामियाने का तिलिस्म
"पकड़ लो इसे!"

एक तीखी, गुर्राती हुई आवाज़ गूँजी।

इससे पहले कि कबीर कुछ समझ पाता, मचान के नीचे से मसूद अल-फ़ारूक़ी—सुलतान का वह 650 साल पुराना दरबारी तांत्रिक—बिजली की फुर्ती से ऊपर चढ़ा।

उसके पीछे चार विशालकाय हब्शी ग़ुलाम सिपाही थे, जिनकी देहों पर केवल लोहे की जंजीरें लिपटी थीं और उनके हाथों में भारी, दाँतेदार लोहे के जाल (barbed capture nets) थे।

कबीर ने अपने हाथ में पकड़े उस चांदी के खंजर को हवा में लहराया: "पीछे हटो! अगर किसी ने क़दम आगे बढ़ाया, तो मैं इस खंजर से उसका सीना चीर दूँगा!"

मसूद अल-फ़ारूक़ी ज़ोर से हँसा। उसने अपनी उंगलियों से हवा में एक गोल दायरा खींचा और अरबी में कुछ फुसफुसाया।

सननन्र!

हवा में एक अदृश्य, भारी दबाव का बवंडर उठा। कबीर के हाथ का वह चांदी का खंजर किसी विशाल चुंबक के खिंचाव से खिंचकर मसूद के हाथ में जा गिरा।

और अगले ही पल, उन चारों ग़ुलामों ने वह लोहे का भारी, कँटीला जाल कबीर के ऊपर फेंक दिया!

छनन्न्र!

जाल की लोहे की कीलें कबीर के कंधों, उसकी जांघों और उसकी पीठ में धँस गईं। कबीर दर्द से चीख़ उठा और मुँह के बल उस लकड़ी के मचान पर गिर पड़ा।

"नहीं! इसे छोड़ दो!"

बूढ़ा वास्तुकार पंडित महाशर्मा मेहरा रोते हुए आगे बढ़े। उन्होंने मसूद के पैर पकड़ लिए: "आलिम साहब! इसे छोड़ दीजिए! यह मेरा ख़ून है... यह मेरी आने वाली पीढ़ी का बच्चा है! मैंने आपका सारा काम कर दिया है... मैंने वह नक्शा बना दिया है!"

मसूद ने अपनी भारी, नोकदार जूती से महाशर्मा के चेहरे पर ठोकर मारी।

बूढ़े ब्राह्मण के मुँह से ख़ून का फव्वारा छूटा और वे मचान के किनारे जा गिरे।

"ले चलो इसे जहाँपनाह के शामियाने में!" मसूद ने सैनिकों को हुक्म दिया। "यज्ञ का समय हो चुका है। सम्राट अशोक की लाट को ज़मीन में गाड़ने से पहले इस दोहरी आत्मा का ख़ून उस गड्ढे में बहना चाहिए!"

3. सात बाबिली आईनों की महफ़िल
कबीर को उस लोहे के जाल में घसीटते हुए शाही शामियाने के भीतर ले जाया गया।

शामियाने के भीतर का माहौल बाहर की धूल और धूप से बिल्कुल अलग था।

यहाँ ज़मीन पर कीमती ईरानी और समरकंदी क़ालीन बिछे हुए थे। हवा में अंबर, मुश्क और कस्तूरी की इतनी तेज़, मादक महक थी कि कबीर का सिर चकराने लगा। शामियाने के बीचों-बीच आबनूस की लकड़ी और हाथी-दाँत का बना एक विशाल तख़्त रखा था, जिस पर सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक बैठ चुका था।

और उस तख़्त के चारों तरफ़... सात विशाल, काले शीशे (Obsidian Mirrors) एक घेरे में खड़े किए गए थे!

वे शीशे कांच के नहीं थे; वे ज्वालामुखी के ठंडे, काले पाषाण को तराशकर बनाए गए बाबिली (Babylonian) तिलिस्मी आईने थे।

कबीर को जाल से निकालकर तख़्त के सामने घुटनों के बल पटक दिया गया। उसके शरीर से ख़ून की बूँदें टपककर उस बहुमूल्य क़ालीन पर गिर रही थीं।

कबीर ने अपनी आँखें उठाईं और उन सात शीशों की तरफ़ देखा।

और जो उसने देखा, उसने उसके दिमाग़ को एक बार फिर दहला दिया।

उन सातों काले शीशों में कबीर और सुल्तान का प्रतिबिंब पड़ रहा था।

लेकिन उन शीशों में वे दोनों अलग-अलग नहीं दिख रहे थे!

पहले शीशे में कबीर 1945 के आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही के रूप में दिख रहा था।

दूसरे शीशे में वह 1954 के उस तहख़ाने में अपने परदादा की लाश के पास खड़ा था।

तीसरे शीशे में वह 2026 के एम्स अस्पताल के वेंटिलेटर पर तड़प रहा था।

और सातवें शीशे में... वह सुल्तान के रूप में उस सिंहासन पर बैठकर दिल्ली को जलते हुए देख रहा था!

"देखा तुमने, कबीर?" सुल्तान ने अपने तख़्त से उठकर कबीर की ठुड्डी को अपने छह उंगलियों वाले ठंडे पंजे से ऊपर उठाया।

उसकी उंगलियों के स्पर्श से कबीर की त्वचा पर बर्फ़ जैसी जलन हुई।

"हम दोनों अलग नहीं हैं। तू मेरी ही परछाईं है जो वक़्त के भँवर में भटक रही थी। तूने सोचा कि तू उन आधुनिक, कमज़ोर इंसानों को बचा लेगा? वे इंसान कीड़े हैं, कबीर! वे अपनी ही आज़ादी और अपनी ही लालच के बोझ तले दबकर सड़ रहे थे।

मैंने उन्हें एक मक़सद दिया है! वे मेरे इस नए शहर की ईंटें बनेंगे। और तू... तू मेरी छाती में वापस समा जाएगा ताकि हम दोनों मिलकर इस पूरे ब्रह्मांड पर अपनी हुकूमत क़ायम कर सकें!"

सुल्तान ने अपनी कमर से एक छोटा, सोने का खंजर निकाला।

"बस एक बूँद... तेरी इस इंसानी गर्दन से एक बूँद ख़ून, और उस लाट की नींव हमेशा के लिए बंद हो जाएगी!"

4. महाशर्मा का गुप्त फुसफुसाना और कान के पीछे का राज़
तभी—

शामियाने के पिछले पर्दे से एक साया अंदर रेंगता हुआ आया।

वह पंडित महाशर्मा मेहरा थे!

उनका चेहरा ख़ून से लथपथ था, उनकी धोती फटी हुई थी, लेकिन वे किसी तरह पहरेदारों की नज़र से बचकर उस तख़्त के पिछले खंभे की ओट में छिप गए थे।

जब सुल्तान ने खंजर उठाया और कबीर की गर्दन पर रखने के लिए आगे झुका, तभी महाशर्मा की नज़र कबीर की आँखों से मिली।

महाशर्मा ने अपनी कांपती हुई उंगली से अपने ख़ुद के बाएँ कान के पीछे इशारा किया।

और फिर, महाशर्मा ने अपने होंठ हिलाए। कोई आवाज़ नहीं निकली, लेकिन कबीर ने उनके होंठों की हरकत को पढ़ लिया:

"यह सुल्तान नहीं है... यह तुम नहीं हो, कबीर!

इसके बाएँ कान के पीछे देखो!

यह मिट्टी और आग का बना हुआ पुतला है... इसका दिल इसके सीने में नहीं है!"

कबीर के दिमाग़ में जैसे हज़ार वोल्ट का करंट दौड़ा!

उसने अपनी पूरी चेतना को केंद्रित किया।

सुल्तान जब उसके ऊपर झुका, तो उसके बाल एक पल के लिए हवा में उड़े। कबीर की नज़र सुल्तान के बाएँ कान के ठीक पीछे, उसकी गर्दन के जोड़ पर पड़ी।

वहाँ कोई मानवीय चमड़ी नहीं थी!

वहाँ एक गहरा, काला, चौकोर छेद था, जिसके भीतर से हरी और नीली बाइनरी रोशनी (010101) और सड़े हुए लोबान का धुआँ एक साथ बाहर रिस रहा था! उस छेद के भीतर छोटे-छोटे, जीवित काले कीड़े रेंग रहे थे जो उस शरीर को भीतर से संचालित कर रहे थे!

सच्चाई एक बिजली की कौंध की तरह कबीर के दिमाग़ में साफ़ हो गई!

यह कोई टाइम-लूप नहीं था!

वह ख़ुद सुल्तान नहीं था!

यह मसूद अल-फ़ारूक़ी और उस छह उंगलियों वाले जिन्न का रचा हुआ 'हमज़ाद-ए-अकबर' (The Great Counterfeit) था!

उन्होंने 2026 की उस एम्स वाली लैब से कबीर के डीएनए, उसके बालों और उसके न्यूरोलॉजिकल डेटा को चुराकर, 1354 के इस पाताल में आग और मिट्टी के ज़रिये कबीर का यह हूबहू क्लोन (पुतला) तैयार किया था!

उनका मक़सद कबीर को यह विश्वास दिलाना था कि वह ख़ुद ही मुजरिम है, ताकि कबीर की मानवीय इच्छाशक्ति (willpower) टूट जाए और वह बिना किसी विरोध के अपनी बलि दे दे!

"तुम... तुम एक बहरूपिया हो!" कबीर के गले से एक भयानक, गर्जना भरी आवाज़ निकली।

सुल्तान का चेहरा एक पल के लिए जम गया। उसकी आँखों में वह घमंड अचानक एक हिंसक, जानवर जैसे डर में बदल गया।

5. काल-भ्रम का टूटना और आधुनिक इंसानों का महा-विद्रोह
"तूने बहुत देर से पहचाना, कीड़े!" वह नकली सुल्तान दहाड़ा। उसने अपना खंजर कबीर की गर्दन में घोंपने के लिए पूरी ताक़त से हाथ नीचे लाया।

लेकिन कबीर अब वह लाचार, भ्रमित लड़का नहीं था!

सच्चाई के ज्ञान ने उसके भीतर के सारे डर को भस्म कर दिया था। उसने अपने दोनों बंधे हुए पैरों को समेटा और पूरी ताक़त से उस नकली सुल्तान के घुटने पर दे मारा!

कड़क!

हड्डी टूटने की आवाज़ आई। वह नकली सुल्तान लड़खड़ाकर पीछे गिरा और उन सात बाबिली काले आईनों में से एक से टकराया।

तड़ाक! छनन्न्र!

पहला शीशा टूटकर चकनाचूर हो गया!

शीशे के टूटते ही, पूरे शामियाने में एक भयानक रूहानी चीख़ गूँजी। हवा का दबाव बदल गया।

कबीर ने ज़मीन पर गिरे उस शीशे के एक बड़े, नुकीले टुकड़े को अपने हाथों में उठाया। उस तेज़ धार वाले पत्थर से उसने अपनी कलाइयों और पैरों में बंधे उस लोहे के जाल की रस्सियों को एक ही झटके में काट डाला।

कबीर आज़ाद हो गया!

उसने ज़मीन पर पड़े उस सोने के खंजर को उठाया और शामियाने का पर्दा फाड़कर बाहर आ गया।

बाहर, दोपहर का सूरज ठीक सिर पर आ चुका था।

सम्राट अशोक की उस विशाल लाट को रस्सियों से खींचकर उस खूनी गड्ढे में उतारा जा रहा था। मसूद अल-फ़ारूक़ी गड्ढे के मुहाने पर खड़ा अपने अंतिम मंत्र चिल्ला रहा था।

कबीर उस ऊँचे चबूतरे पर खड़ा हो गया। उसने अपनी पूरी ताक़त से, अपने फेफड़ों का आख़िरी कतरा लगाकर चिल्लाया:

"दिल्ली वालो! सुनो!

यह कोई तक़दीर नहीं है! यह कोई भगवान का अज़ाब नहीं है!

ये सिर्फ़ सदियों पुराने तांत्रिक और प्रेत हैं जो हमारे ख़ौफ़ की रोटी खा रहे हैं!

तुम इक्कीसवीं सदी के आज़ाद इंसान हो!

तुम लाखों में हो और ये मुट्ठी भर शैतान हैं!

उठो! और अपनी इस ज़मीन को इस आग से छीन लो!"

कबीर की आवाज़ उस खूनी गड्ढे में किसी तोप के धमाके की तरह गूँजी।

और उस आवाज़ ने उस चमत्कार को जन्म दिया जिसकी उम्मीद किसी मध्यकालीन सुल्तान ने नहीं की थी।

वह जो लाखों आधुनिक नागरिक—इंजीनियर, मज़दूर, छात्र, औरतें—अब तक भेड़ों की तरह चाबुकों की मार सह रहे थे... उनके भीतर का आधुनिक, स्वतंत्र नागरिक अचानक जाग उठा!

"मारो इन दरिंदों को!"

उस सुप्रीम कोर्ट के वकील ने अपनी टूटी हुई छड़ी उठाई और सामने खड़े एक तुर्क सैनिक की आँख में घोंप दी!

उस स्कूल मास्टर ने पास पड़े एक लोहे के भारी सरिए को उठाया और घुड़सवार के घोड़े की टाँग पर दे मारा!

एक ही पल में, वह पूरा निर्माण-स्थल एक भयानक, विशाल जन-विद्रोह में बदल गया! लाखों आधुनिक लोगों ने पत्थरों, रस्सियों, लोहे की छैनी और हथौड़ों को हथियार बना लिया। तुग़लक के सैनिकों के पास तलवारें थीं, लेकिन इन आधुनिक इंसानों के पास अपनी ज़िंदगी और अपने बच्चों को बचाने का वह अंधा, पाशविक क्रोध था जो किसी भी फ़ौज को रौंद सकता था!

सैनिकों की कतारें टूटने लगीं। घोड़े बिदककर खंदक में गिरने लगे। मसूद अल-फ़ारूक़ी पागलों की तरह चीख़ रहा था: "रोको इन्हें! इन्हें मार डालो!"

6. पाषाण लाट पर महा-द्वंद्व
इस अभूतपूर्व महा-विद्रोह के बीच, कबीर सीधा उस गड्ढे के मुहाने की तरफ़ दौड़ा जहाँ वह पाषाण लाट लटकी हुई थी।

पीछे से वह नकली सुल्तान—लंगड़ाता हुआ, अपनी आँखों से नीली आग की लपटें उगलता हुआ—एक दैत्याकार तलवार लेकर कबीर पर झपटा।

"कबीर! तू इतिहास नहीं बदल सकता!"

उस नकली सुल्तान ने तलवार का एक भयानक वार किया। तलवार पत्थरों से टकराई और चिंगारियों की बारिश हुई।

कबीर नीचे झुका। उसने उस बाबिली शीशे के नुकीले टुकड़े को अपने दाएँ हाथ में और सोने के खंजर को बाएँ हाथ में कसकर पकड़ा।

दोनों एक-दूसरे से भिड़ गए।

यह लड़ाई केवल दो शरीरों की नहीं थी; यह सत्य और भ्रम की लड़ाई थी।

नकली सुल्तान ने अपनी छह उंगलियों वाला पंजा कबीर के गले पर दे मारा। कबीर की साँस रुक गई, उसकी गर्दन से ख़ून रिसने लगा। लेकिन कबीर ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने बाएँ हाथ से उस नकली सुल्तान के मुकुट को खींचकर फेंक दिया।

और फिर—

कबीर ने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस काले, नुकीले शीशे के टुकड़े को... सीधा उस नकली सुल्तान के बाएँ कान के पीछे उस चौकोर छेद में पूरी ताक़त से घोंप दिया!

चर्र्र्र्र्र्र्क!

एक ऐसी अमानवीय, कान के पर्दे फाड़ देने वाली चीख़ निकली जिसने पूरी यमुना के कछार को हिला दिया।

उस नकली सुल्तान के शरीर के भीतर से कोई ख़ून नहीं निकला।

उसके उस घाव से काला, गाढ़ा, खौलता हुआ समय (Liquid Time) और नीली आग का एक विशाल फव्वारा छूटा! उसका चेहरा किसी कंप्यूटर स्क्रीन की तरह फटने लगा, पिक्सल टूटने लगे, और उसकी त्वचा राख बनकर हवा में बिखरने लगी।

कबीर ने अपना सोने का खंजर उसकी छाती के आर-पार उतार दिया।

नकली सुल्तान घुटनों के बल गिरा।

मरने से पहले, उसके फटे हुए, जलते हुए चेहरे पर एक ऐसी भयानक, शैतानी मुस्कान उभरी जिसने कबीर के रोंगटे खड़े कर दिए।

उसने कबीर का कॉलर पकड़ लिया और अपनी अंतिम साँसों में फुसफुसाया:

*"तूने... तूने मुझे मार दिया, कबीर...

लेकिन तूने मुझे मारकर उस 'काल-बंधन' (Temporal Anchor) को तोड़ दिया है जिसने इस नदी को बाँध रखा था...

ज़रा मुड़कर अपनी उस यमुना को देख...

तेरा असली दुश्मन कभी सुल्तान था ही नहीं!"*

नकली सुल्तान का शरीर पूरी तरह जलकर काले कोयले के ढेर में बदल गया।

7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-मोड़: नदी का प्रेत और दादा का राज़ (The Twist)
कबीर हांफता हुआ उस राख के ढेर के पास खड़ा था।

नीचे ग़ुलामों ने तुग़लक के ज़्यादातर सैनिकों को खदेड़ दिया था। लोग खुशी से चिल्ला रहे थे: "हम जीत गए! हम जीत गए!"

लेकिन कबीर के दिल में कोई खुशी नहीं थी।

उसे उस नकली सुल्तान के आख़िरी शब्द याद आ रहे थे।

कबीर ने धीरे-धीरे अपनी गर्दन घुमाई और पूर्व दिशा में बहने वाली उस ऐतिहासिक यमुना नदी की तरफ़ देखा।

और जो उसने देखा...

उस दृश्य ने कबीर की रीढ़ की हड्डी को हमेशा के लिए तोड़कर रख दिया।

यमुना नदी में अब कोई पानी नहीं बह रहा था।

पूरी की पूरी नदी... पिघले हुए, खौलते हुए ताँबे और लाल-पीले लावे के एक विशाल, धधकते हुए समंदर में बदल चुकी थी!

और उस लावे की नदी के बीचों-बीच से...

एक विशाल, अस्सी फीट ऊँची, काले पत्थरों की एक विकराल इमारत ज़मीन फाड़कर बाहर निकल रही थी।

वह इमारत 1354 की नहीं थी... वह मुग़ल दौर की भी नहीं थी...

वह भारत के संसद भवन (पुराना पार्लियामेंट हाउस) और फ़िरोज़ शाह कोटला की जामी मस्जिद का एक ऐसा वीभत्स, डरावना और संकर (hybrid) रूप था जिसकी दीवारों से हज़ारों इंसानी खोपड़ियाँ लटक रही थीं!

और उस जलते हुए संसद-रूपी मक़बरे के सबसे ऊँचे गुंबद पर... एक इंसान खड़ा था।

उसने आधुनिक, खाकी रंग का सफ़ारी सूट पहन रखा था, आँखों पर मोटा चश्मा था, और उसके हाथ में वही ताँबे की सुलेमानी छड़ी थी।

कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं।

उसकी चीख़ उसके फेफड़ों के भीतर ही जम गई।

वह इंसान... न कोई जिन्न था, न सुल्तान, और न दीवान हरदयाल।

वह कबीर का अपना सगा दादा था—ओमकार मेहरा!

वही दादा, जिनके बारे में कबीर के पिता ने कहा था कि उन्होंने इस अभिशाप के डर से 1970 में आत्महत्या कर ली थी!

ओमकार मेहरा उस लावे के समंदर के ऊपर खड़े होकर हँस रहे थे। उनकी आवाज़ पूरे आसमान में किसी कयामत के लाउडस्पीकर की तरह गूँज उठी:

**"कबीर, मेरे प्यारे पोते!

तुमने अपने परदादा को कोसा... तुमने उस जिन्न से लड़ाई की...

लेकिन तुम यह भूल गए कि 1954 के उस सौदे की वसीयत लिखने वाला हाथ... तुम्हारे इस दादा का था!

मैंने अपनी मौत का ढोंग रचा था ताकि मैं वक़्त के इस गुप्त मुहाने पर बैठकर 2026 और 1354 को एक साथ अपनी मुट्ठी में भींच सकूँ!

अब यह पूरी दिल्ली... इस नए आग के संसद की ग़ुलाम होगी!"**

कबीर उस लावे की लपटों के सामने अकेला खड़ा था... और उसका अपना ख़ून, उसका अपना दादा, दिल्ली के विनाश का सबसे बड़ा महा-दानव बनकर उसके सामने खड़ा था!

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