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भाग 13: 1354 का नरमेध, ग़ुलामों का बाज़ार और पहले मेहरा की तलाश
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 13 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2658
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. वक़्त के गर्त में चीख़ती इक्कीसवीं सदी
संसार में इससे भयानक कोई मंज़र नहीं हो सकता कि एक इंसान अपनी खिड़की खोले और सामने उसकी अपनी सदी ग़ायब हो चुकी हो।
लाहौरी गेट की प्राचीर से जब कबीर ने नीचे देखा, तो उसकी आँखों की पुतलियाँ दहशत से जम चुकी थीं।
सामने वह चांदनी चौक नहीं था जहाँ कुछ घंटे पहले तक स्ट्रीटलाइटों की रोशनी में चाय की दुकानें सज रही थीं, जहाँ मेट्रो स्टेशनों के लाल बोर्ड चमक रहे थे, और जहाँ गाड़ियों की आवाज़ें दिल्ली के जागने का एलान कर रही थीं।
वहाँ 2026 की एक भी ईंट नहीं बची थी।
नीचे ज़मीन पर सिर्फ़ कच्ची, दलदली, लाल मिट्टी थी।
मुग़ल कालीन लाल क़िला, जो अभी कबीर के पैरों के नीचे था, अचानक अपनी बनावट बदलने लगा। संगमरमर की दीवारें पिघलकर खुरदुरे, काले-धूसर पत्थरों में तब्दील हो गईं। वह मुग़ल क़िला नहीं रह गया था; वह 1354 ईस्वी का सलीमगढ़ का पुराना सैनिक क़िला और उसके पीछे फैलता हुआ सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक का नया बसाया हुआ शहर—फ़िरोज़ाबाद था!
और उस दलदली, वीरान ज़मीन पर... लाखों की तादाद में आधुनिक दिल्लीवासी पागलों की तरह चीख़ते हुए भाग रहे थे।
यह मंज़र किसी प्रलयंकारी दुःस्वप्न जैसा था।
चांदनी चौक, बल्लीमारान, कूचा पाती राम और दरियागंज के वे आम नागरिक, जो अपनी रज़ाइयों में सो रहे थे, अचानक इस मध्यकालीन नर्क में बिना छत के, कड़ाके की ठंड में आ गिरे थे।
कोई अपनी नीली जींस और टी-शर्ट में था, कोई पायजामा-कुर्ता पहने अपनी कांपती हुई बच्ची को छाती से चिपकाए हुए था। लोगों के हाथों में उनके स्मार्टफ़ोन थे। वे कांपती उंगलियों से स्क्रीन पर देख रहे थे, जहाँ लाल रंग से फ़्लैश हो रहा था: ‘NO NETWORK — TIME SYNCHRONIZATION ERROR 1354 CE’।
"मम्मी! कहाँ हो तुम?" एक सात साल की बच्ची अपनी फ्रॉक में लिपटी कीचड़ में रो रही थी।
"अरे कोई पुलिस को बुलाओ! यह क्या मज़ाक है? कोई फ़िल्म की शूटिंग चल रही है क्या?" एक पचास साल का दुकानदार अपनी बनियान में कांपता हुआ चिल्ला रहा था।
लेकिन सामने जो खड़ा था, वह कोई फ़िल्म का सेट नहीं था।
हवा में सैकड़ों घोड़ों की टापों की गड़गड़ाहट उठी—धड़-धड़-धड़!
कोहरे को चीरते हुए, तुग़लक़ सल्तनत के सैकड़ों बर्बर, वहशी घुड़सवार सैनिक बाहर निकले। उन्होंने उबले हुए चमड़े के भारी बख्तरबंद पहन रखे थे, सिरों पर लोहे के नुकीले टोप थे, और उनके हाथों में छह-छह फीट लंबी, मुड़ी हुई खूनी तलवारें थीं।
"काफ़िर! जादूगर!" एक तुर्क सेनापति अपनी भारी आवाज़ में दहाड़ा।
"ये शैतान के भेजे हुए अजनबी हैं जिन्होंने अजीबोगरीब लिबास पहन रखे हैं! पकड़ लो इन सबको! सुल्तान के नए क़िले (कोटला) की नींव खोदने के लिए ग़ुलामों की ज़रूरत है! जो विरोध करे, उसकी गर्दन उसी पल ज़मीन पर गिरा दो!"
सननन्र! खचाक!
एक घुड़सवार की तलवार चली। एक आधुनिक नौजवान—जो अपने फोन से उस घुड़सवार की वीडियो बनाने की कोशिश कर रहा था—का सिर धड़ से अलग होकर दलदल में जा गिरा।
गर्म, लाल ख़ून का फव्वारा फूटा।
चीखों का ऐसा भयानक सैलाब उमड़ा जिसने पूरी यमुना के कछार को कँपा दिया। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन तुग़लक़ी सैनिक अपने चमड़े के कोड़े और भालों से उन्हें भेड़ों और बकरियों की तरह घेर रहे थे।
2. प्राचीर से छलांग और खंदक का कीचड़
"देखा तुमने, कबीर?"
हवा में तैरती हुई मलिका-ए-आतिश (मीरा) की आवाज़ कबीर के कानों में किसी ज़हरीले खंजर की तरह चुभी।
उसकी छह उंगलियों वाला हाथ उस चीख़ती हुई भीड़ की तरफ़ उठा हुआ था:
"तुम्हारी उस बीसवीं और इक्कीसवीं सदी ने बहुत गुरूर किया था अपनी विज्ञान और अपनी आज़ादी पर! आज वे सब इस मिट्टी में हमारे ग़ुलाम बनकर अपने नाख़ूनों से हमारे महलों की नींव खोदेंगे!"
कबीर के सीने में आग भड़क उठी।
उसने अपनी छाती के घाव के दर्द को भुला दिया। उसने अपने दाएँ हाथ में पकड़े उस मुग़ल सूफ़ी भस्म से जगमगाते हुए चांदी के खंजर को कसकर भींच लिया।
"मैं तुम्हें इन बेकसूरों की रूहों का सौदा नहीं करने दूँगा, ज़ोहरा!" कबीर दहाड़ा।
उसने अपनी पूरी ताक़त से छलांग लगाई और उस खंजर को मलिका-ए-आतिश की गर्दन की तरफ़ झोंक दिया।
लेकिन वह अब कोई हाड़-मांस की औरत नहीं थी; वह आग और हवा की मल्लिका थी।
कबीर का वार हवा के आर-पार निकल गया। मलिका-ए-आतिश ने अपनी छह उंगलियों वाले पंजे से एक हल्का-सा झटका दिया।
तड़ाक!
नीली आग की एक प्रचंड तरंग कबीर की छाती से टकराई। कबीर हवा में उछला और तीस फीट ऊँचे उस बुर्ज से सीधा नीचे, उस प्राचीन, बदबूदार खंदक (moat) के कीचड़ में जा गिरा!
धड़ाम! छपाक!
काला, बर्फीला कीचड़ कबीर के मुँह और नथुनों में भर गया। उसका सिर एक नुकीले पत्थर से टकराया, और उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
अगर वह खंजर उसके हाथ में न होता, तो वह उसी पल मर जाता। मगर उस पवित्र चांदी की धार से निकलती हुई सफ़ेद रोशनी ने उसके दिल की धड़कन को रुकने नहीं दिया।
कबीर ने हांफते हुए अपना सिर कीचड़ से बाहर निकाला।
ऊपर बुर्ज पर मलिका-ए-आतिश अब नहीं थी; वह एक नीले बवंडर की शक्ल में दक्षिण दिशा—फ़िरोज़ शाह कोटला के उस मुख्य निर्माण स्थल—की तरफ़ उड़ चुकी थी।
कबीर ने अपने मुँह से कीचड़ थूका।
वह लड़खड़ाता हुआ खंदक से बाहर निकला। उसे समझ आ गया था कि रोने या पछताने का वक़्त नहीं था। यह 1354 ईस्वी थी। अगर इस वक़्त के ताने-बाने को यहीं नहीं तोड़ा गया, तो 2026 की वह दुनिया इतिहास के पन्नों से हमेशा के लिए मिट जाएगी!
3. फ़िरोज़ाबाद का दास-बाज़ार और आधुनिक लाचारी
कबीर ने ज़मीन पर पड़े एक मरे हुए तुग़लक सैनिक का फटा हुआ ऊनी चोगा उठाया और उसे अपने आधुनिक कपड़ों के ऊपर लपेट लिया। उसने अपने सिर पर कपड़ा बाँध लिया ताकि उसके बाल और चेहरा छिप सकें।
वह उस भागती हुई, रोती हुई भीड़ के पीछे-पीछे चला।
सामने जो इलाक़ा था, वह आज का दरियागंज और कोटला का इलाक़ा था।
लेकिन 1354 में यहाँ केवल एक विशाल, धूल-धूसरित निर्माण स्थल और 'नख़्ख़ास' (ग़ुलामों का बाज़ार) था।
सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक के बारे में इतिहास में दर्ज है कि उसे ग़ुलाम जमा करने का सनक की हद तक शौक़ था। उसके पास 1,80,000 ग़ुलाम थे, जिन्हें उसने अलग-अलग शिल्पों और निर्माण कार्यों में झोंक रखा था।
और आज... 2026 की उस आधुनिक दिल्ली के लाखों नागरिक उसी ग़ुलाम-बाज़ार में बेचे जा रहे थे!
मंज़र इतना दर्दनाक था कि कबीर के सीने में आँसू सूख गए।
लोहे के बड़े-बड़े तवे जल रहे थे, जिन पर लाल-गर्म लोहे की मुहरें दहक रही थीं।
सैनिक आधुनिक डॉक्टरों, वकीलों, कॉलेज के छात्रों और महिलाओं को ज़मीन पर पटक रहे थे, और उनकी नंगी पीठ पर वह छह उंगलियों वाला शाही निशान गर्म लोहे से दाग रहे थे!
छ्छ्छ्छ्र्र्र!
चमड़ी के जलने की भयानक दुर्गंध और इंसानी चीखों से पूरा आसमान गूँज रहा था।
"छोड़ दो मुझे! मैं सुप्रीम कोर्ट का एडवोकेट हूँ!" एक सूट-बूट पहने पचास साल के वकील साहब चिल्ला रहे थे।
एक तुर्क सैनिक ने ज़ोर से ठहाका लगाया: "अदालत? यहाँ सिर्फ़ सुल्तान की अदालत चलती है, जादूगर!" और उसने एक भारी लोहे का डंडा वकील के घुटने पर दे मारा। वकील साहब चीख़ते हुए धूल में गिर पड़े।
पास ही, एक पच्चीस साल का स्कूल मास्टर अपनी दस साल की कांपती हुई बेटी को अपनी बाहों में छुपाए हुए था। दो सैनिक उस बच्ची को खींचने के लिए आगे बढ़े।
"बाबूजी! बचा लो!" बच्ची रोई।
कबीर अपने आप को रोक नहीं सका।
उसका सारा इतिहासकार का धीरज ख़त्म हो गया। वह बिजली की तेज़ी से आगे बढ़ा। उसके हाथ में छिपा वह चांदी का खंजर चमका।
खचाक! खचाक!
कबीर ने एक ही सांस में दोनों सैनिकों की गर्दन पर वार किया। वे दोनों सैनिक ज़मीन पर गिर पड़े।
"चुपचाप इस नाले के रास्ते यमुना के जंगलों की तरफ़ भागो!" कबीर ने उस मास्टर के कान में फुसफुसाया। "वहाँ छिप जाओ! जब तक मैं वापस न आऊँ, बाहर मत निकलना!"
मास्टर ने हाथ जोड़कर कांपते हुए कबीर की तरफ़ देखा: "भाई साहब... आप कौन हैं? यह हम कहाँ आ गए हैं? क्या क़यामत आ गई है?"
"क़यामत ही है भाई साहब..." कबीर ने भारी गले से कहा, "...लेकिन मैं इसे वापस पलटने की कोशिश कर रहा हूँ। भागो यहाँ से!"
4. महा-वास्तुकार का सुराग़: पंडित महाशर्मा मेहरा
मास्टर अपनी बच्ची को लेकर झाड़ियों में ग़ायब हो गया।
कबीर एक विशाल पत्थरीली दीवार की ओट में झुक गया।
उसे सोचना था। गहराई से सोचना था।
यह पूरा तिलिस्म शुरू कहाँ से हुआ था?
1354 में सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने कोटला की उस जामी मस्जिद और बाओली को बनवाया था। लेकिन उस बाओली का जो गुप्त, भूमिगत नक़्शा था—वह सातवाँ कुआँ, वह पाताल की खिड़की, वह सुलेमानी तिलिस्म—वह किसी सुल्तान के दिमाग़ की उपज नहीं हो सकती थी!
इतिहास के पुराने दस्तावेज़ों में कबीर ने एक बार पढ़ा था कि सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने इस क़िले को बनाने के लिए उस दौर के सबसे बड़े हिंदू और सूफी वास्तुकारों (Architects & Geomancers) को बंदी बनाया था।
और उन वास्तुकारों का जो मुखिया था...
कबीर के दिमाग़ में बिजली कौंधी!
उस मुखिया का नाम था—पंडित महाशर्मा मेहरा!
वही महाशर्मा, जो कबीर के ख़ानदान का आदि-पुरुष था! वही इंसान जिसके ख़ून से 1954 के दीवान हरदयाल और 2026 का कबीर पैदा हुआ था!
अगर महाशर्मा ने वह नक्शा नहीं बनाया होता... अगर उसने उस बाओली के सातवें कुएँ में उस पाताल-अग्नि का द्वार नहीं जोड़ा होता... तो यह पूरा शैतानी साम्राज्य कभी वजूद में ही नहीं आता!
कबीर ने अपने पास पड़े एक घायल सैनिक के गिरेबान को पकड़ा। उसने खंजर उसकी आँख के सामने लहराया।
"बता! इस क़िले का शाही नक्शानवीस... पंडित महाशर्मा कहाँ है?"
सैनिक ने डर के मारे कांपते हुए दूर, यमुना के किनारे बन रहे उस विशाल खंभे की तरफ़ इशारा किया:
"वह... वह वहाँ है... जहाँ सम्राट अशोक की उस पुरानी लाट को गाड़ने के लिए मुख्य नींव खोदी जा रही है! सुल्तान ने उसे ज़ंजीरों में बाँध रखा है... अगर आज शाम तक उसने वह अंतिम ताबीज़ उस पत्थर में नहीं जड़ा, तो उसके पूरे परिवार को खौलते तेल के कड़ाह में फेंक दिया जाएगा!"
5. कोटला की नींव और खौलता हुआ तेल
कबीर ने सैनिक को बेहोश किया और उस निर्माण स्थल की तरफ़ भागा।
सामने का मंज़र किसी प्राचीन मिस्र के पिरामिडों के निर्माण से भी ज़्यादा वीभत्स था।
हज़ारों की तादाद में 2026 के आधुनिक नागरिक और उस दौर के गुलाम भारी-भारी लाल पत्थरों को रस्सियों से खींच रहे थे। चाबुकों की मार से लोगों की पीठ लहूलुहान थी।
और उस विशाल गड्ढे के बीचों-बीच—जहाँ कोटला की वह ऐतिहासिक बाओली बननी थी—हज़ारों टन वजनी सम्राट अशोक का वह विशाल पाषाण स्तंभ लकड़ी के विशाल पहियों और रस्सियों के सहारे खड़ा किया जा रहा था।
उस गड्ढे के मुहाने पर एक ऊँचा, लकड़ी का मचान (scaffold) बना था।
उस मचान पर दो विशाल लोहे के कड़ाह रखे थे, जिनके नीचे आग धधक रही थी और उनके भीतर का तेल खौल रहा था। कड़ाह के पास एक बूढ़ी औरत और एक दस साल का लड़का रस्सियों से बंधे रो रहे थे—वे महाशर्मा की पत्नी और उनका बेटा थे!
और मचान के बीच में, एक पचास-पचपन साल का ब्राह्मण वास्तुकार घुटनों के बल बैठा था।
उसने फटी हुई धोती पहन रखी थी, गले में जनेऊ था, और उसके दोनों हाथों में लोहे की छेनी और हथौड़ा था। वह रोते-रोते, अपने कांपते हाथों से उस पाषाण स्तंभ की नींव में एक त्रिकोणीय, छह-कोने वाला यंत्र तराश रहा था—वही यंत्र, जो कबीर ने 2026 में अपनी छाती पर और 1954 के संदूक़ पर देखा था!
उसके पीछे तुग़लक सल्तनत का वही मुख्य तांत्रिक खड़ा था—मसूद अल-फ़ारूक़ी! वही दरिंदा, जिसे कबीर ने पाताल में जलते देखा था, लेकिन इस 1354 के दौर में वह पूरी तरह ज़िंदा, क्रूर और ताक़तवर था!
"तेज़ी से हाथ चला, महाशर्मा!" मसूद ने अपनी ज़हरीली आवाज़ में कहा। "अगर सूरज ढलने से पहले इस लाट की छाती में वह जिन्नात का कलमा पूरा नहीं खुदा, तो तेरे इस बच्चे को मैं ख़ुद इस खौलते तेल में डाल दूँगा!"
महाशर्मा की आँखों से आँसू बहकर उस पत्थर पर गिर रहे थे: "मुझे बख़्श दो, आलिम साहब... यह यंत्र इस पूरी पृथ्वी के संतुलन को बिगाड़ देगा... यह पाताल की आग को जगा देगा..."
"हमें वही आग चाहिए!" मसूद हँसा।
6. पूर्वज से साक्षात्कार और इतिहास की दहलीज़
कबीर ने मौका ताड़ा।
मसूद अल-फ़ारूक़ी कुछ पल के लिए नीचे गड्ढे में सैनिकों को निर्देश देने के लिए मचान से उतरा।
कबीर बिजली की फुर्ती से लकड़ियों के खंभों पर चढ़ता हुआ सीधा उस मचान पर पहुँचा।
उसने पीछे से जाकर महाशर्मा के कंधे पर हाथ रखा।
"महाशर्मा जी!" कबीर ने फुसफुसा कर कहा।
बूढ़ा वास्तुकार चौंककर मुड़ा। उसने छेनी नीचे गिरा दी।
उसने सामने खड़े कबीर को देखा। कबीर का चेहरा... कबीर की आँखों की बनावट... और कबीर के दाएँ हाथ की वह उंगली, जहाँ वही ख़ानदानी तिलिस्मी निशान था!
"तुम... तुम कौन हो?" महाशर्मा के होंठ थरथराए। "तुम्हारा लिबास... तुम भी उन अजनबियों में से हो जो आज सुबह आसमान से गिरे हैं?"
कबीर ने अपने दोनों हाथ महाशर्मा के सामने जोड़ दिए। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।
"बाबा... मैं आपका परपोता... आपकी सातवीं पीढ़ी का ख़ून हूँ! मेरा नाम कबीर मेहरा है!"
कबीर ने उस पत्थर पर खुदे उस आधे बने यंत्र की तरफ़ इशारा किया:
"रुक जाइए, बाबा! इस यंत्र को पूरा मत कीजिए! यह कोई महल की नींव नहीं है... यह एक ऐसा नर्क का दरवाज़ा है जो सत्तर साल बाद... सात सौ साल बाद आपकी ही आने वाली पीढ़ियों को निगल जाएगा!
इस यंत्र की वजह से आज 2026 की पूरी दिल्ली इस पाताल में खींच ली गई है! अगर आपने यह छेनी रोक दी... तो यह इतिहास बदल जाएगा! हम सब आज़ाद हो जाएँगे!"
कबीर को लगा था कि महाशर्मा उसकी बात सुनकर चौंक जाएँगे, डर जाएँगे, या उसे पागल समझेंगे।
लेकिन जो हुआ...
उसने कबीर के पैरों के नीचे की ज़मीन ही नहीं, उसके पूरे वजूद के एक-एक परमाणु को हिला कर रख दिया।
7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: सुल्तान का असली चेहरा (The Twist)
पंडित महाशर्मा मेहरा के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।
कोई डर नहीं था।
उनकी बूढ़ी, आंसुओं से भरी आँखों में एक ऐसा गहरा, अंतहीन, सदियों पुराना दर्द था जिसे देखकर कबीर का कलेजा कांप गया।
महाशर्मा ने अपनी छेनी नहीं उठाई। उन्होंने बहुत धीरे से, कांपते हाथों से कबीर के गाल को छुआ।
उनका हाथ कबीर की त्वचा पर ठीक वैसे ही महसूस हुआ जैसे कोई दादा अपने पोते को पहली बार छूता है।
"कबीर..." महाशर्मा की आवाज़ किसी टूटे हुए मंदिर की घंटी जैसी बजी।
"तुम बहुत देर से आए, मेरे बच्चे..."
कबीर का दिमाग़ चकरा गया। "देर से? आप... आप मेरा नाम जानते हैं?"
महाशर्मा ने अपनी धोती के भीतर से ताँबे का एक बहुत पुराना, मुड़ा हुआ पत्तर (copper scroll) निकाला।
उस पत्तर पर कबीर का पूरा चेहरा, उसका जन्म, उसकी 2026 की तारीख़... सब कुछ पहले से खुदा हुआ था!
"तुमने क्या सोचा, कबीर..." महाशर्मा ने रोते हुए कहा, "...कि मैंने यह नक्शा इस सुल्तान के डर से बनाया है? तुमने सोचा कि मसूद के खौलते तेल ने मुझे मजबूर किया था?"
महाशर्मा ने अपनी कांपती उंगली उस दूर बने शाही तंबू (Royal Pavilion) की तरफ़ उठाई, जहाँ सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक अपने सिंहासन पर बैठा इस पूरे मंज़र को देख रहा था:
*"नहीं, कबीर...
मैंने यह नक्शा इसलिए बनाया... क्योंकि आज से ठीक सात दिन पहले...
भविष्य के उसी 2026 के नर्क से एक नौजवान इस दौर में आया था!
उसी नौजवान ने मुझे यह नक्शा दिया था... उसी ने कहा था कि इस यंत्र को तराशना ज़रूरी है ताकि वह इस ज़मीन के नीचे सोए हुए जिन्नों को अपने वश में कर सके!
और उस नौजवान ने जो ताज पहना था... वह तुग़लक का ताज था!"*
कबीर की साँसें हलक़ में अटक गईं। उसकी आँखों के आगे सफ़ेद धुंध छाने लगी।
"कौन था वह नौजवान, बाबा?" कबीर की आवाज़ सूखकर काँटा हो गई।
तभी—
शाही तंबू का पर्दा हटा।
सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक अपने तख़्त से उठा। उसने अपने चेहरे पर पड़ा वह शाही नक़ाब (शाही घूँघट) धीरे से पीछे हटा दिया।
दोपहर की कड़कती धूप उस चेहरे पर पड़ी।
कबीर के हाथ से वह चांदी का खंजर छूटकर पत्थरों पर गिर पड़ा।
कबीर की चीख़ उसके फेफड़ों के भीतर ही फट गई।
सामने जो सुल्तान खड़ा था...
उसका कद, उसका रंग, उसकी तीखी नाक, उसके माथे की वह लकीर...
वह चेहरा कबीर का अपना चेहरा था!
सुल्तान कोई दूसरा इंसान नहीं था। वह कबीर का ही भविष्य या अतीत था—एक ऐसा चक्रव्यूह जहाँ कबीर ख़ुद ही सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक था, और ख़ुद ही उस जिन्न के मुआहिदे को रचने वाला पहला मुजरिम!
सुल्तान ने दूर खड़े कबीर की तरफ़ देखा।
उसके होंठों पर वही जानी-पहचानी, शांत और भयानक मुस्कान उभरी। उसने अपनी छह उंगलियों वाला हाथ हवा में उठाया और कबीर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा:
"कबीर... इस क़िले को बनाने वाला कोई और नहीं... तुम ख़ुद हो!
आओ, अपनी गद्दी संभालो... क्योंकि इस चक्रव्यूह का न कोई आदि है, और न कोई अंत!"