PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 12: लाल क़िले की ख़ूनी खंदक, नहर-ए-बहिश्त और आख़िरी मुग़ल का तावीज़

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 14 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
12 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2796
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. ठंडे पानी का विलाप और नंगी इंसानी रूह
इंसान की हड्डियों में जब आग जलती है, तो वह बर्दाश्त कर लेता है; मगर जब उसकी देह से वह शैतानी आग अचानक छिन जाती है, तो जो खालीपन बचता है, वह किसी खुली क़ब्र की तरह ठंडा होता है।

कबीर निज़ामुद्दीन बाओली के उस गहरे, भूमिगत पानी में औंधे मुँह पड़ा था।

उसकी छाती के ठीक बीचों-बीच, जहाँ से वह त्रिकोणीय लोहे का तावीज़ अभी-अभी उखड़ा था, माँस के दो टुकड़े लटक रहे थे। ज़ख़्म से लाल, गर्म ख़ून लगातार उस पवित्र पानी में रिस रहा था। उसके दोनों हाथों की कटी हुई उंगलियों के ठूंठ बर्फ़ की तरह ठंडे पड़ चुके थे। लेकिन इस जानलेवा दर्द के बीच, कबीर ने एक ऐसी चीज़ महसूस की जो उसने पिछले कई दिनों से खो दी थी—उसकी अपनी नब्ज़!

उसकी खोपड़ी के भीतर अब कोई दोहरी आवाज़ नहीं थी। कोई छह उंगलियों वाला जिन्न उसकी सोच को नहीं कुचल रहा था। वह न कोई सुल्तान था, न कोई जिन्न-ज़ादा। वह कबीर मेहरा था—हाड़-माँस, दर्द और कमज़ोरियों से बना एक नश्वर इंसान!

"मीरा..." कबीर के होंठों से एक कांपती हुई सिसकी निकली।

उसने अपने हाथ को पानी के तलछट में मारा। उसकी उंगलियाँ किसी सख्त, ठंडी चीज़ से टकराईं।

वह वही चांदी का खंजर था, जो मीरा के हाथ से छूटकर पानी में गिरा था।

कबीर ने उस खंजर को उठा लिया। खंजर की चांदी पर अब कोई काला धुआँ नहीं था; वह निज़ामुद्दीन के मुक़द्दस पानी में धुल चुकी थी, लेकिन उसकी नोक पर मीरा के जलते हुए जिस्म का एक नीला, रूहानी निशान अब भी किसी चुंबक की तरह चमक रहा था।

कबीर ने दाँत भींच लिए। उसने अपनी फटी हुई जैकेट की आस्तीन को फाड़कर अपनी छाती के उस फटे हुए ज़ख़्म पर कसकर बाँध लिया।

वह उस टूटी हुई बाओली की सीढ़ियों की तरफ़ रेंगने लगा। हर सीढ़ी चढ़ते हुए उसे ऐसा लग रहा था मानो उसकी पसलियों की टूटी हुई हड्डियाँ उसके फेफड़ों में चुभ रही हों। मगर उसके ज़ेहन में मीरा की वह आख़िरी, भयानक मुस्कान और उसकी दहाड़ गूँज रही थी:

‘आज रात दिल्ली के लाल क़िले पर तिरंगा नहीं... हमारे ख़ून का परचम लहराएगा!’

कबीर उस फटे हुए मुहाने से बाहर निकला और निज़ामुद्दीन बस्ती की ज़मीन पर औंधे मुँह आ गिरा।

2. खूनी कोहरा और राजधानी का ब्लैकआउट
भोर के चार बज रहे थे।

लेकिन दिल्ली के आसमान पर सुबह की कोई सफ़ेदी नहीं थी।

आसमान का रंग किसी सड़े हुए बेर जैसा—गहरा, स्याह और ख़ूनी लाल—हो चुका था। यमुना नदी के किनारों से उठकर एक ऐसा घना, ज़हरीला कुहासा पूरी दिल्ली पर फैल रहा था जिसमें सड़े हुए मांस, बारूद और कपूर की वही जानी-पहचानी गंध थी।

कबीर ने सड़क की तरफ़ देखा।

पूरी दिल्ली में एक अभूतपूर्व, महा-ब्लैकआउट छा चुका था।

मथुरा रोड, प्रगति मैदान, आईटीओ, दरियागंज—सैकड़ों किलोमीटर में फैली इस आधुनिक राजधानी की हर एक बिजली की लाइन ट्रिप हो चुकी थी। ऊंची-ऊंची सरकारी इमारतों की खिड़कियाँ अंधी आँखों की तरह वीरान पड़ी थीं। ट्रैफ़िक सिग्नल्स बुझ चुके थे।

हवा में वायरलेस सेटों की भयानक, फटी-फटी आवाज़ें गूँज रही थीं।

सड़क के किनारे दिल्ली पुलिस की एक पीसीआर वैन खड़ी थी, जिसके शीशे टूटे पड़े थे। वैन का रेडियो लगातार चरमरा रहा था:

"कंट्रोल रूम टू ऑल यूनिट्स! कोड ब्लैक! कोड ब्लैक!

लाल क़िला परिसर के चारों तरफ़ अत्यधिक उच्च स्तर का इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डिस्टर्बेंस देखा गया है!

सीआईएसएफ़ (CISF) की तीनों बटालियनों से संपर्क टूट चुका है!

हिंडन एयरबेस से भेजे गए दोनों हेलीकॉप्टरों के रडार जामा मस्जिद के ऊपर फेल हो गए हैं... वे क्रैश होने वाले हैं!

कोई लाल क़िले के मुख्य लाहौरी गेट की तरफ़ मत बढ़ना... वहाँ कुछ ऐसा है जो गोलियों से नहीं मर रहा है!"

कबीर ने उस पीसीआर वैन के पास पड़ी एक पुलिस की भारी बुलेट मोटरसाइकिल को देखा। चाबी इग्निशन में ही लगी थी। ड्राइवर का सिपाही वर्दी समेत ज़मीन पर बेहोश पड़ा था, उसके मुँह से झाग निकल रहा था।

कबीर ने अपनी बची-खुची ताक़त लगाई। उसने उस मोटरसाइकिल को उठाया, किक मारी और इंजन की भारी गूँज के साथ रिंग रोड से होते हुए सीधे उत्तर की दिशा—लाल क़िले की तरफ़ गाड़ी दौड़ा दी।

3. रिंग रोड का श्मशान और 1857 के सायों का हुजूम
यह कोई सामान्य सफ़र नहीं था; यह नरक के गलियारे से गुज़रने जैसा था।

जैसे-जैसे कबीर की मोटरसाइकिल शांति वन और राजघाट के पार आगे बढ़ रही थी, यमुना के कछारों से निकलने वाले साए सड़क पर साफ़ दिखने लगे थे।

वे साए अब हवा में नहीं थे; वे सड़क की डामर पर अपने नंगे पैरों से चल रहे थे।

हज़ारों की तादाद में 1857 के ग़दर में मारे गए सिपाही, मुग़ल दौर के बाशिंदे, 1947 के बँटवारे में कटकर मरे हुए शरणार्थी—उन सबके कंकाल और पारदर्शी रूहें एक ही दिशा में खिंची चली जा रही थीं। जैसे कोई विशाल, अदृश्य रूहानी भँवर लाल क़िले के ऊपर घूम रहा हो और इस शहर के हर एक मुर्दे को अपनी तरफ़ खींच रहा हो।

कबीर के हाथ उस मोटरसाइकिल के हैंडल पर कांप रहे थे।

हवा की ठंड उसकी छाती के ज़ख़्म को छूकर हड्डियों तक उतर रही थी। उसकी जेब में रखा वह चांदी का खंजर अब किसी कम्पास की सुई की तरह लाल क़िले की तरफ़ झुक रहा था।

सामने, घने लाल कोहरे को चीरता हुआ... लाल क़िले का विशाल, लाल बलुआ पत्थर का प्राचीर दिखाई दिया।

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ द्वारा 1648 में तामीर करवाया गया यह ऐतिहासिक क़िला आज किसी शान ओ शौक़ की इमारत नहीं लग रहा था। यह एक विशाल, खूनी मक़बरे की तरह खड़ा था।

क़िले के चारों तरफ़ बनी वह गहरी, चौड़ी खाई (खंदक), जो आमतौर पर सूखी और घास से ढकी रहती थी... इस समय उबलते हुए काले कीचड़ और नीली आग की लपटों से भरी हुई थी!

लाहौरी गेट के सामने बने आधुनिक सुरक्षा बैरिकेड्स, मेटल डिटेक्टर्स और अर्धसैनिक बलों के बख्तरबंद वाहन किसी तिनके की तरह कुचले पड़े थे। दर्जनों जवान ज़मीन पर बेसुध पड़े थे, उनके चेहरों की चमड़ी पीली पड़ चुकी थी, जैसे किसी ने उनकी रूह को एक ही झटके में उनके नथुनों से खींच लिया हो।

कबीर ने मोटरसाइकिल को खाई के किनारे पटका।

उसने वह चांदी का खंजर अपने दाएँ हाथ में थामा और उस टूटे हुए लोहे के पुल के सहारे लाहौरी गेट के भीतर क़दम रख दिया।

4. लाहौरी गेट की प्राचीर और मलिका-ए-आतिश का सिंहासन
क़िले के भीतर छत्ता चौक का वह मशहूर बाज़ार, जहाँ कभी मुग़ल काल में रेशम और ज़ेवरात बिकते थे, पूरी तरह घुप अंधेरे में डूबा था।

दुकानों की मेहराबों से काले, चिपचिपे कफ़न लटक रहे थे। हवा में चमेली के सड़े हुए तेल और लोबान की ऐसी बदबू थी कि कबीर को अपनी नाक पर हाथ रखना पड़ा।

वह छत्ता चौक को पार करके नौबत ख़ाने की तरफ़ बढ़ा।

और फिर, उसने अपना सिर ऊपर उठाया।

लाहौरी गेट की उस ऐतिहासिक प्राचीर पर—जहाँ हर साल 15 अगस्त को आज़ाद भारत का प्रधानमंत्री तिरंगा फहराता है—वहाँ एक ऐसा दृश्य था जिसे देखकर कबीर का ख़ून जम गया।

प्राचीर के कंगूरों के बीच, जहाँ मुख्य ध्वज-दंड (flag mast) लगा था, वहाँ राष्ट्रीय ध्वज नहीं था।

वहाँ एक विशाल, जलता हुआ काला परचम लहरा रहा था, जिस पर ख़ून से वही छह उंगलियों वाला पंजा छपा हुआ था!

और उस ध्वज-दंड के नीचे... मीरा खड़ी थी!

लेकिन वह अब मीरा नहीं थी। वह 'मलिका-ए-आतिश' थी।

उसका शरीर हवा में तीन फीट ऊपर मंडरा रहा था। उसके घुटनों तक फैले काले, सर्पीले बाल हवा के बिना भी फन फैलाए लहरा रहे थे। उसकी आँखें शुद्ध, अंधा कर देने वाले नीलम जैसी नीली आग से धधक रही थीं। उसकी छह-छह उंगलियों वाले दोनों हाथ ऊपर आसमान की तरफ़ उठे हुए थे, और उसकी उंगलियों के पोरों से नीली बिजलियाँ निकलकर लाल क़िले के तीनों गुंबदों से टकरा रही थीं।

उसके चारों तरफ़ लाल क़िले की मुग़ल कालीन तोपों के पास दर्जनों 'कफ़न-पोश' खड़े थे—वही मरे हुए तांत्रिक, जो अपने सीने में मिट्टी भरे हुए, किसी भयानक, प्राचीन भाषा में मंत्र बुदबुदा रहे थे।

"कबीर..."

मलिका-ए-आतिश की आवाज़ आसमान से किसी बिजली की कड़कड़ाहट की तरह गिरी।

उसकी आवाज़ में ज़ोहरा की वह दर्दभरी मिठास और सुल्तान फ़िरोज़ शाह की पाशविक हुकूमत एक साथ गूँज रही थी:

"तू आ ही गया... अपने ख़ानदान के उस अधूरे गुनाह का आख़िरी गवाह बनकर!"

कबीर नौबत ख़ाने की सीढ़ियों पर खड़ा था। उसने अपनी पूरी ताक़त समेटकर उस चांदी के खंजर को अपनी आँखों के सामने उठाया।

"मीरा!" कबीर चीख़ा। "मुझे पता है कि तुम उस आग के भीतर ज़िंदा हो! उस डायन की रूह को अपने ऊपर हावी मत होने दो! याद करो अपने दादा को... याद करो उस अस्पताल को... तुम एक इंसान हो!"

मलिका-ए-आतिश एक भयानक, गूँजते हुए ठहाके के साथ हँसी। उसकी हँसी से लाल क़िले की लाल दीवारें कांप उठीं।

"मीरा कोई इंसान नहीं थी, कबीर! वह तो ज़ोहरा की उस अधूरी कोख का फल थी जिसे तुम्हारे परदादा हरदयाल ने 1954 में अपनी हवस की बलि चढ़ाया था! सत्तर साल तक मेरा ख़ानदान दिल्ली की धूल में अपमान सहता रहा... और तुम्हारा ख़ानदान हमारी बलि पर बनी हवेलियों में ऐश करता रहा! आज इंसाफ़ का तराज़ू बराबर होगा!"

5. दीवान-ए-ख़ास का गुप्त तहख़ाना और नहर-ए-बहिश्त का राज़
कबीर समझ गया कि बातों से यह आग नहीं बुझ सकती।

उसे याद आया कि ज़ोहरा की डायरी में लाल क़िले के बारे में क्या लिखा था।

शाहजहाँ ने जब इस क़िले को बनवाया था, तो उसने यमुना के पानी को क़िले के भीतर लाने के लिए एक अलौकिक नहर बनवाई थी जिसे 'नहर-ए-बहिश्त' (स्वर्ग की नहर) कहा जाता था। वह नहर सिर्फ़ पानी का बहाव नहीं थी; वह मुग़ल सूफ़ियों द्वारा स्थापित एक ऐसा आध्यात्मिक सुरक्षा घेरा था, जो क़िले के नीचे दबे किसी भी जिन्न या शैतानी ताक़त को बाँध कर रखता था।

और उस नहर का सबसे मुख्य नियंत्रण कक्ष कहाँ था?

दीवान-ए-ख़ास के ठीक नीचे!

कबीर ने मलिका-ए-आतिश का ध्यान भटकाने के लिए अपनी जेब में बची पुलिस की एक स्मोक-ग्रेनेड (धुएँ का बम) निकाली, जो उसने उस पीसीआर वैन से उठाई थी। उसने पिन खींची और प्राचीर की सीढ़ियों की तरफ़ फेंक दी।

धड़ाम! हिसस्स!

घना, सफ़ेद धुआँ फैल गया। कबीर बिजली की फुर्ती से मुड़ा और दीवान-ए-आम को पार करते हुए सीधा दीवान-ए-ख़ास के संगमरमर के मंडप की तरफ़ दौड़ा।

दीवान-ए-ख़ास का वह सफ़ेद संगमरमर का हॉल रात के इस ख़ूनी कुहासे में किसी भूतिया महल जैसा लग रहा था।

वही हॉल, जिसकी दीवार पर फ़ारसी का वह मशहूर शेर सोने के अक्षरों में खुदा था:

"अगर फ़िरदौस बर रू-ए ज़मीं अस्त,

हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त!"

(यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है, तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है!)

कबीर उस हॉल के बीचों-बीच बने उस संगमरमर के चौकोर हौज (कुंड) के पास पहुँचा जहाँ कभी 'मयूर सिंहासन' (तख़्त-ए-ताऊस) रखा रहता था।

हौज के तल में संगमरमर की एक भारी, नक्काशीदार जाली लगी थी।

कबीर ने अपने दोनों हाथों से उस जाली को पकड़ा। उसकी कटी हुई उंगलियों से ख़ून रिसने लगा, मगर उसने अपनी पूरी जान लगाकर उस जाली को उखाड़ दिया।

नीचे एक संकरा, अंधेरा कुआँ था जिसमें सीढ़ियाँ उतर रही थीं।

हवा में यमुना के प्राचीन, मीठे पानी की सोंधी महक आ रही थी।

कबीर बिना सोचे-समझे उस कुएँ में कूद गया।

6. आख़िरी मुग़ल का तावीज़ और रूहानी पहरेदार
कबीर दस फीट नीचे, घुटनों तक भरे ठंडे पानी में गिरा।

यह नहर-ए-बहिश्त का भूमिगत कक्ष था।

दीवारों पर मुग़ल कालीन हरी और नीली टाइल्स लगी थीं। कमरे के बीच में एक चौकोर संगमरमर का चबूतरा था, जिस पर एक पीतल का विशाल कलश रखा हुआ था। उस कलश के चारों तरफ़ लाल मोम की मुहरें लगी थीं, जिन पर मुग़ल सल्तनत का आख़िरी शाही निशान छपा था—बहादुर शाह ज़फ़र की निजी मोहर!

और उस कलश के पीछे... हवा में एक धुंधला, सफ़ेद साया बैठा था।

उसने मुग़ल शहज़ादों जैसी पगड़ी और मोतियों की माला पहन रखी थी। उसका चेहरा बूढ़ा था, आँखें गहरी और आंसुओं से भरी थीं।

वह 1857 के अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के ख़ास वज़ीर और आध्यात्मिक सलाहकार—हकीम अहसानुल्लाह ख़ान की रूह थी!

"आ गए तुम, मुसाफ़िर..." उस साए की आवाज़ में किसी वीरान मक़बरे का सन्नाटा था।

"हकीम साहब!" कबीर ने हांफते हुए कहा। "ऊपर वह शैतान दिल्ली को निगलने वाला है! मुझे बताइए कि इस नहर-ए-बहिश्त का ताला कैसे खुलेगा? मैं उस आग को कैसे बुझाऊँ?"

उस साए ने अपनी पारदर्शी उंगली उस पीतल के कलश की तरफ़ उठाई:
"इस कलश के भीतर कोई पानी नहीं है, बेटा। इसके भीतर 1857 में रची गई वह 'ख़ाक-ए-शफ़ाक़त' (दया की भस्म) है, जिसे दिल्ली के अंतिम सूफ़ी संतों ने अपने ख़ून से तैयार किया था।

सुलतान फ़िरोज़ शाह का वह हमज़ाद आग से बना है... और आग को तलवार या खंजर से नहीं काटा जा सकता। आग को सिर्फ़ एक ही चीज़ बुझा सकती है—वह बलिदान जो बिना किसी बदले की भावना के दिया जाए!"

हकीम की रूह ने कबीर की आँखों में देखा:
"ज़ोहरा की रूह बदले की आग में अंधी है। वह समझती है कि हरदयाल का ख़ानदान उसका क़र्ज़दार है। अगर उस ख़ानदान का आख़िरी वारिस—यानी तुम—अपनी मर्ज़ी से इस कलश के भीतर अपने जीवन की अंतिम साँस का संकल्प डाल दो... तो वह रूहानी कर्ज़ हमेशा के लिए चुकता हो जाएगा!

लेकिन याद रखना... इसका मतलब होगा कि तुम्हारी अपनी इंसानी पहचान हमेशा के लिए इस ज़मीन की मिट्टी में समा जाएगी!"

कबीर ने अपने हाथ में पकड़े उस चांदी के खंजर को देखा। फिर उसने अपनी छाती के उस घाव को देखा।

उसने एक लंबी, ठंडी साँस ली।

"अगर मेरे मिटने से यह शहर बच सकता है, हकीम साहब... तो मुझे मंज़ूर है।"

कबीर ने आगे बढ़कर उस पीतल के कलश की मोहर को अपने उस चांदी के खंजर से तोड़ दिया।

7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला महा-ट्विस्ट: 1354 का नरक (The Twist)
कलश का ढक्कन खुलते ही, उसमें से कोई धुआँ या आग नहीं निकली।

उसमें से सफ़ेद, चमकीली भस्म का एक बवंडर उठा और उसने कबीर के उस चांदी के खंजर को पूरी तरह अपनी सफ़ेद रोशनी से ढक लिया। खंजर अब चांदी का नहीं, बल्कि शुद्ध, दिव्य प्रकाश की एक तलवार बन चुका था!

कबीर उस तहख़ाने से बाहर निकला।

वह दौड़ता हुआ वापस लाहौरी गेट की प्राचीर पर पहुँचा।

मलिका-ए-आतिश हवा में अपने अंतिम मंत्र का उच्चारण कर रही थी। आसमान से नीली आग के गोले लाल क़िले की प्राचीर पर गिर रहे थे।

"मीरा!" कबीर ने प्राचीर पर क़दम रखते हुए दहाड़ लगाई।

मलिका-ए-आतिश मुड़ी। उसकी नीली आँखों ने कबीर के हाथ में जलती हुई उस सफ़ेद रोशनी की तलवार को देखा। उसके चेहरे पर पहली बार एक भयानक, असहज शिकन उभरी।

"तू अब भी मरा नहीं, कबीर?"

"मैं मरने ही आया हूँ, ज़ोहरा!" कबीर ने चिल्लाकर कहा। उसने अपनी तलवार को अपनी ही छाती के उस फटे हुए ज़ख़्म की तरफ़ मोड़ लिया!

"तुम मेरा ख़ून चाहती थीं न? तुम अपने सत्तर साल के अपमान की क़ीमत चाहती थीं? लो! मैं हरदयाल का परपोता... अपनी मर्ज़ी से अपना यह ख़ून तुम्हारी रूह की शांति के लिए इस ज़मीन पर बहाता हूँ! इस निर्दोष लड़की (मीरा) को छोड़ दो!"

कबीर ने अपनी तलवार की नोक अपनी ही छाती में उतारनी चाही।

लेकिन—

मलिका-ए-आतिश ने वार नहीं रोका।

वह हँसी।

वह इतनी ज़ोर से, इतनी पाशविक और इतनी वीभत्स हँसी हँसी कि पूरा लाल क़िला हिलने लगा।

"कितने मूर्ख हो तुम, कबीर मेहरा!" मलिका-ए-आतिश की आवाज़ में किसी विजेता का घिनौना घमंड था।

उसने अपनी छह उंगलियों वाला हाथ कबीर की तरफ़ नहीं... बल्कि अपने पीछे फैले हुए उस विशाल दिल्ली शहर की तरफ़ घुमा दिया!

"तूने सोचा कि मैं इस लाल क़िले पर बैठकर इस आधुनिक दिल्ली को जलाना चाहती हूँ?

तूने समझा कि मेरा मक़सद इस शहर को राख बनाना है?

अरे नादान इतिहासकार... आग तो सिर्फ़ एक पर्दा थी!

मेरा असली मक़सद इस शहर को तबाह करना नहीं था... इस शहर को वक़्त के उस सबसे भयानक पाताल में खींच कर ले जाना था जहाँ से मेरी हुकूमत शुरू हुई थी!"

कबीर के हाथ की तलवार थम गई। उसका दिल एक भयानक अनहोनी की आशंका से कांप उठा। "तुम... तुम क्या कह रही हो?"

मलिका-ए-आतिश ने चिल्लाकर कहा: "मुड़कर देखो अपनी दिल्ली को, कबीर!"

कबीर ने कांपते हुए कदमों से प्राचीर के कंगूरे के पास जाकर नीचे झाँका।

और जो उसने देखा...

उस दृश्य ने कबीर के मस्तिष्क की नसें फाड़ दीं। उसकी आत्मा एक ऐसी अंतहीन खाई में गिर गई जहाँ से कोई चीख़ भी वापस नहीं लौट सकती थी!

सामने...

जहाँ चांदनी चौक की चमचमाती दुकानें, गुरुद्वारा शीश गंज, गौरी शंकर मंदिर, मेट्रो स्टेशन और कंक्रीट की इमारतें होनी चाहिए थीं... वहाँ कुछ नहीं था!

कोई आधुनिक शहर नहीं था! कोई 2026 नहीं था!

लाहौरी गेट के सामने, जहाँ तक नज़र जा रही थी... मिट्टी और फूस की बनी हुई हज़ारों मध्यकालीन झोपड़ियाँ जल रही थीं!

चारों तरफ़ लोहे की जंजीरों में बंधे हुए हज़ारों नंगे, भूखे ग़ुलामों के बाज़ार लगे थे!

सड़कों पर घोड़ों पर सवार तुग़लक कालीन बर्बर सैनिक नंगी तलवारें लिए हज़ारों इंसानों के सिर काट रहे थे!

और सबसे भयानक बात—

वे जो लाखों लोग उन मध्यकालीन गलियों में चीख़ते हुए, पागलों की तरह भाग रहे थे... वे आज की 2026 की दिल्ली के आम नागरिक थे!

कोई अपनी जींस और टी-शर्ट में था, कोई अपनी रात की पोशाक में, कोई अपने बच्चों को गोद में लिए रो रहा था—चांदनी चौक, दरियागंज और जामा मस्जिद की लाखों की आबादी अपने आधुनिक घरों से उखड़कर, 1354 ईस्वी के सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक के उस ख़ूनी, बर्बर और शैतानी युग में ज़िंदा फेंक दी गई थी!

मलिका-ए-आतिश हवा में तैरती हुई कबीर के कान के पास आई। उसकी नीली आँखों में कयामत का जश्न था:

"स्वागत है, कबीर...

तुम्हारी पूरी पुरानी दिल्ली... अपने लाखों ज़िंदा इंसानों के साथ...

1354 के जिन्नों के महा-साम्राज्य में क़ैद हो चुकी है!

अब बचाओ अपनी इस दुनिया को... अगर बचा सकते हो!"

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