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भाग 11: चांदी का खंजर, बाओली का अक्स और तीन रूहों की अदालत
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 11 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2814
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. चांदी की नोक और लोहे का विस्फोट
वह पल समय के सीने में किसी ज़हरीली सुई की तरह चुभ गया।
निज़ामुद्दीन बस्ती की उस ठंडी, ऐतिहासिक रात में, दरगाह की संगमरमर की दहलीज़ पर, मीरा के हाथों में थमा वह सत्तर साल पुराना चांदी का खंजर हवा को चीरता हुआ नीचे आया।
कबीर हिल नहीं सका। उसकी नसों में दौड़ती वह नीली आग दरगाह की पवित्र हवा—गुलाब और लोबान की उस रूहानी ख़ुशबू—के संपर्क में आते ही सुन्न पड़ चुकी थी। उसका जिस्म किसी पत्थर की मूर्ति की तरह काठ हो गया था।
खचाक!
चांदी की तीखी, प्राचीन धार कबीर की छाती के ठीक बीचों-बीच, उसकी त्वचा में धँसे उस त्रिकोणीय काले लोहे के तावीज़ से टकराई।
यह कोई साधारण धातु का दूसरी धातु से टकराना नहीं था।
यह दो विपरीत रूहानी ताक़तों का महा-विस्फोट था—एक तरफ़ हज़रत सुलेमान के नाम पर दम किया गया पवित्र चांदी का खंजर, और दूसरी तरफ़ चौदहवीं सदी के उस मारिद जिन्न का उल्कापिंडीय काला लोहा!
कड़कड़ाती बिजली! तड़ाक!
एक अंधा कर देने वाला, नीले और बैंगनी रंग का रूहानी धमाका हुआ।
कबीर की छाती से ख़ून और आग का एक मिला-जुला फव्वारा छूटा जिसने दरगाह के सफ़ेद संगमरमर के फर्श को लाल-नीले छींटों से नहला दिया। कबीर के मुँह से निकली चीख़ किसी इंसान की नहीं थी; वह उस प्राचीन हमज़ाद की चीख़ थी जो उसके दिल की धड़कनों में लिपटा हुआ था।
उस धमाके की प्रचंड शॉकवेव इतनी भयानक थी कि पास खड़े उस बूढ़े मलंग—बाबा मस्त-अल-हक़—का लोहे का कश्कोल हवा में उड़कर दस फीट दूर जा गिरा।
मीरा के दोनों हाथों की चमड़ी उस चांदी के खंजर से निकली लपटों से जल गई, मगर उसने खंजर की मूठ नहीं छोड़ी। उसकी आँखें नफ़रत और बदले की आग में अंधी हो चुकी थीं। वह अपनी पूरी देह का वज़न उस खंजर पर डाले हुए थी, उसे कबीर की पसलियों के आर-पार धकेलने की कोशिश कर रही थी।
"मर जा, सुल्तान!" मीरा पागलों की तरह चीख़ी। उसके गले की नसें फूलकर नीली पड़ गई थीं। "सत्तर साल पहले मेरे ख़ानदान का जो ख़ून तुमने अपनी दौलत की हवस में बहाया था... आज उसका हिसाब चुकाना होगा!"
कबीर ने दर्द से कराहते हुए अपने दोनों कांपते हाथों से मीरा की कलाई को पकड़ लिया।
उसकी उंगलियों से ख़ून रिस रहा था। उसने मीरा की आँखों में देखा। उन आँखों में कोई वहशी दरिंदगी नहीं थी; वहाँ सत्तर साल से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होता हुआ वह असहनीय पारिवारिक आघात (generational trauma) था, जिसने एक पढ़ी-लिखी, सीधी-सादी नर्स को एक खूनी हत्यारिन बना दिया था।
"मीरा... मेरी बात सुनो..." कबीर के मुँह से ख़ून का गाढ़ा घूँट बाहर आया। "मैं... मैं सुल्तान नहीं हूँ... मैं कबीर हूँ... तुम्हारे ही शहर का एक बेबस इंसान..."
लेकिन मीरा ने नहीं सुना। उसने खंजर को और गहराई में मरोड़ दिया।
2. दरगाह की ज़मीन का धँसना और पवित्र बाओली का भँवर
तभी—
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के सहन के नीचे की ज़मीन में एक भयानक, दैत्याकार कंपन हुआ।
गड़गड़ाहट... चर्र्र... धड़ाम!
संगमरमर की वे विशाल सिल्लियाँ, जो पिछले सात सौ सालों से लाखों श्रद्धालुओं के सजदों का गवाह रही थीं, अचानक ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगीं।
ज़मीन के नीचे से पानी के खौलने और गर्जने की ऐसी आवाज़ आई जैसे कोई भूमिगत बाँध टूट गया हो।
यह निज़ामुद्दीन की ऐतिहासिक बाओली का वह प्राचीन सोता था, जिसे 1321 ईस्वी में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने सुलतान ग़ियासुद्दीन तुग़लक के हुक्म के ख़िलाफ़ जाकर रातों-रात अपने मुरीदों के साथ खोदा था। वही बाओली, जिसके बारे में इतिहास में हज़रत का वह मशहूर जुमला दर्ज था: "हुनूज़ दिल्ली दूर अस्त" (दिल्ली अभी बहुत दूर है)।
संगमरमर का चबूतरा फट गया।
कबीर, मीरा और वह बूढ़ा मलंग एक साथ उस अंधेरे, गहरे पाताल में समा गए!
छपाक!
तीनों उस बर्फीले, पवित्र पानी के एक विशाल भूमिगत कुंड में जा गिरे।
पानी में गिरते ही कबीर के सिर के भीतर एक ऐसा झटका लगा जैसे उसकी आत्मा को किसी ने खौलते हुए तेल से निकालकर सीधे बर्फ़ के समंदर में फेंक दिया हो।
वह पानी कोई साधारण कुएँ का पानी नहीं था। यह निज़ामुद्दीन की बाओली का वह मूल गंधक-मुक्त, मीठा पानी था जिसमें सात सौ सालों के सूफ़ियों के वज़ीफ़े और आंसुओं की तासीर घुली हुई थी।
पानी की छुअन मिलते ही, कबीर की छाती में गड़ा वह लोहे का तावीज़ अचानक ठंडा पड़ने लगा। उसकी नसों में दौड़ती वह नीली शैतानी आग बुझने लगी।
कबीर पानी की सतह पर आया और हांफते हुए पत्थरों के एक प्राचीन, काई लगे खंभे को पकड़कर लटक गया।
उसके बग़ल में मीरा भी पानी से बाहर निकली। उसका चांदी का खंजर पानी में गिर चुका था। उसके बाल उसके चेहरे पर चिपके थे और वह ज़ोर-ज़ोर से खांस रही थी।
और उनके सामने, पानी के बीचों-बीच बने एक ऊँचे, चौकोर पत्थरीले चबूतरे पर वह बूढ़ा मलंग—बाबा मस्त-अल-हक़—पूरी तरह सूखा, शांत खड़ा था, जैसे पानी की एक बूँद भी उसे छू न पाई हो!
3. मीरा का विलाप और ज़ोहरा की आख़िरी वसीयत
"कहाँ है मेरा खंजर?" मीरा पागलों की तरह उस गहरे, काले पानी में अपने हाथ चला रही थी। "मुझे उसे मारना है... मुझे उस शैतान की छाती चीरनी है!"
"मीरा! बस करो!" कबीर ने अपनी पूरी ताक़त से मीरा के दोनों कंधे पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींचा।
कबीर की आवाज़ में अब वह दोहरी, भयानक जिन्नात वाली गूँज नहीं थी। उसकी आवाज़ वापस अपनी सामान्य, मानवीय, कांपती हुई आवाज़ में लौट आई थी।
"ज़रा अपने होश में आओ! अपनी आँखों से देखो!" कबीर ने अपनी छाती की तरफ़ इशारा किया।
मीरा ने कबीर की छाती पर देखा।
उसकी आँखें अविश्वास से फैल गईं।
कबीर की छाती पर वह लोहे का तावीज़... टूट चुका था!
मीरा के चांदी के खंजर ने उस तावीज़ को दो टुकड़ों में फाड़ दिया था। लोहे के वे दोनों टुकड़े अब कबीर की त्वचा से उखड़कर नीचे पानी में गिर रहे थे। और उस कटे हुए ज़ख़्म से अब कोई नीली आग नहीं, बल्कि शुद्ध, लाल, इंसानी ख़ून बह रहा था जो उस पवित्र पानी में घुलकर गुलाबी हो रहा था।
"यह... यह कैसे हो सकता है?" मीरा के होंठ थरथराए। "अगर तुम सुल्तान होते... अगर तुम वह जिन्न होते... तो यह पानी तुम्हें भस्म कर चुका होता। तुम... तुम ज़िंदा कैसे हो?"
"क्योंकि मैं इंसान हूँ, मीरा!" कबीर ने दर्द से दाँत पीसते हुए कहा।
"तुम्हारा खंजर मुझे मारने के लिए नहीं था... उस खंजर ने अनजाने में उस तावीज़ की उस शैतानी सील को तोड़ दिया है जो एम्स की उस लैब में मेरे सीने में ठोंक दी गई थी! तुमने मुझे मारा नहीं है... तुमने मुझे उस शैतान की सीधी ग़ुलामी से आज़ाद कर दिया है!"
मीरा के घुटने पानी के भीतर ही मुड़ गए। वह उस खंभे का सहारा लेकर रो पड़ी।
"तो... तो क्या मेरे दादा का वह सारा इल्म झूठा था?" मीरा ने अपने चेहरे को दोनों हाथों में छिपा लिया। उसकी रुलाई उस अंधेरे तहख़ाने में गूँजने लगी।
"मेरी माँ... मेरी ख़ाला... वे सब उस कोटला के जिन्नों के ख़ौफ़ में जीती रहीं। जब 1954 में मेरी परदादी ज़ोहरा को दीवान हरदयाल ने क़त्ल किया था, तो उन्होंने अपनी डायरी के आख़िरी पन्ने पर अपने ख़ून से लिखा था कि हरदयाल की तीसरी पीढ़ी का जो वारिस होगा, वह उसी शैतान का नया मुखौटा बनकर आएगा!
मुझे बचपन से सिर्फ़ एक ही सबक़ सिखाया गया था—कि मुझे उस वारिस को ढूँढना है और उसे निज़ामुद्दीन की दहलीज़ पर ख़त्म करना है ताकि मेरे ख़ानदान की रूहों को मुक्ति मिल सके!"
मीरा ने सिर उठाकर कबीर की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब कोई नफ़रत नहीं थी; सिर्फ़ एक गहरा, अपराधबोध से भरा हुआ पछतावा था।
"मैंने... मैंने एक बेकसूर इंसान पर खंजर चला दिया..."
4. कफ़न-पोशों का रहस्य और बाबा मस्त-अल-हक़ का सच
"बेकसूर? हाहाहाहा!"
उस भूमिगत बाओली के सन्नाटे को चीरता हुआ एक ऐसा ठहाका गूँजा जिसने पानी की सतह पर भयानक तरंगें पैदा कर दीं।
चबूतरे पर खड़ा वह बूढ़ा मलंग—बाबा मस्त-अल-हक़—हँस रहा था।
उसकी अंधी आँखों के सफ़ेद ढेले अचानक घूमने लगे। उसके चेहरे की झुर्रियाँ इस तरह खिंचने लगीं जैसे चमड़ी के नीचे कोई कीड़ा रेंग रहा हो। उसने अपने गले में लटकी उन अकीक और रुद्राक्ष की मालाओं को एक झटके में तोड़कर फेंक दिया।
"कितना भावुक तमाशा है!" बाबा की आवाज़ अब किसी सूफ़ी फ़क़ीर की नहीं थी; वह किसी लोहे की भट्टी में जलते हुए कोयले जैसी कर्कश और हुकूमत से भरी आवाज़ थी।
"बाबा... आप कौन हैं?" कबीर ने मीरा को अपने पीछे खींचते हुए पूछा।
बाबा ने अपने हरे, फटे हुए चोगे के बटन खोल दिए।
जो दृश्य सामने आया, उसे देखकर मीरा के हलक़ से एक दबी हुई चीख़ निकली।
बाबा मस्त-अल-हक़ के सीने पर कोई माँस नहीं था!
उसकी पसलियों की सूखी, पीली हड्डियाँ साफ़ दिख रही थीं। उसके सीने के भीतर कोई दिल नहीं धड़क रहा था; वहाँ केवल सूखी, क़ब्रिस्तान की मिट्टी और बबूल की कटीली पत्तियाँ भरी हुई थीं! वह कोई ज़िंदा इंसान नहीं था; वह एक 'कफ़न-पोश' था—एक ऐसी ज़िंदा लाश जिसे 1388 में सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक के ख़ास तांत्रिकों ने काले इल्म के ज़ोर पर सदियों तक ज़िंदा रखा था!
"मैं इस दिल्ली के असली सुल्तान का सबसे पुराना ख़ादिम हूँ, कबीर!" उस कंकाल-रूपी मलंग ने अपनी सूखी उंगलियों को हवा में लहराया।
"सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक कभी मरा ही नहीं था! जब 1388 में उसका जिस्म बूढ़ा हो गया, तो उसने अपनी सल्तनत को बचाने के लिए एक ऐसा खेल रचा जो दुनिया का कोई इतिहासकार नहीं समझ सका। उसने कोटला की बाओली में अपने हमज़ाद को क़ैद किया, और हम जैसे चालीस वफ़ादारों की रूहों को इस शहर के अलग-अलग मक़बरों और दरगाहों में दफ़्न कर दिया ताकि जब वक़्त आए, तो हम उसके नए जिस्म का स्वागत कर सकें!"
कबीर ने अविश्वास में सिर हिलाया। "लेकिन मैं सुल्तान नहीं हूँ! मैंने अभी-अभी साबित किया है कि मैं एक आम इंसान हूँ!"
"तू आम इंसान है, कबीर..." उस कफ़न-पोश के चेहरे पर एक शैतानी, भयानक मुस्कान उभरी, "...लेकिन तेरा ख़ून आम नहीं है!
तेरा परदादा दीवान हरदयाल कोई मामूली सर्राफ़ नहीं था। वह सुलतान फ़िरोज़ शाह के उसी ख़ास मुग़ल-पूर्व वास्तुकार (Chief Royal Mason) की नस्ल से था जिसने कोटला और इस बाओली की नींव में वह रूहानी ताला जड़ा था!
सुलतान की रूह को वापस इस दुनिया में आने के लिए उसी ख़ानदान के ख़ून का एक ऐसा बर्तन चाहिए था जो टूट चुका हो... और तूने... उस तावीज़ को तुड़वाकर उस बर्तन का मुँह खोल दिया है!"
5. पानी की अदालत और तीन रूहों का साक्षात्कार
इससे पहले कि कबीर कुछ समझ पाता, उस भूमिगत बाओली का पानी अचानक उबलने लगा।
गुल... गुल... खदबद!
पानी का तापमान तेज़ी से बढ़ने लगा। कबीर और मीरा जिस खंभे को पकड़े हुए थे, उसके पत्थरों से भाप निकलने लगी।
पानी के भीतर से तीन अलग-अलग रंगों की लपटें उठने लगीं:
एक खूनी लाल लपट: जो 1954 के दीवान हरदयाल और ज़ोहरा के उस अधूरे क़त्ल की गवाही दे रही थी।
एक ज़हरीली नीली लपट: जो 1354 के उस छह उंगलियों वाले मारिद जिन्न की आग थी।
और एक दूधिया सफ़ेद लपट: जो इस बाओली के पानी की सात सौ साल पुरानी सूफ़ी रूहानी ताक़त थी।
कबीर के मस्तिष्क में एक ऐसा रूहानी खिंचाव आया कि उसकी चेतना उसके जिस्म से बाहर खिंचती हुई महसूस हुई।
उसे लगा कि वह किसी विशाल, अलौकिक कचहरी में खड़ा है।
पानी के भीतर उसे अपने परदादा दीवान हरदयाल का चेहरा दिखा—वह चेहरा अब किसी शैतान का नहीं था, वह एक नरक की आग में जलते हुए पापी का चेहरा था जो अपनी मुक्ति की भीख माँग रहा था।
उसे ज़ोहरा का चेहरा दिखा—वह चावड़ी बाज़ार की तवायफ़, जिसकी आत्मा आज भी उस बाओली के पत्थरों में अपने सम्मान की तलाश में भटक रही थी।
और उसे दिखा... सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक का वह विशाल, भयानक साया—जो अब तक कबीर की रीढ़ की हड्डी के भीतर सोया हुआ था, और जो अब उस टूटे हुए तावीज़ के रास्ते बाहर निकलने के लिए कबीर के दिल को चीर रहा था!
"कबीर!" मीरा की आवाज़ पानी के शोर में डूबती हुई सुनाई दी। "वह बाहर आ रहा है! वह तुम्हारे भीतर से निकल रहा है!"
कबीर ने अपनी छाती को देखा।
उसकी छाती के उस फटे हुए ज़ख़्म से गाढ़े, नीले धुएँ का एक विशाल अजगर बाहर निकल रहा था। वह धुआँ हवा में फन फैलाए, कबीर के सिर के ऊपर मंडराने लगा। उस धुएँ के भीतर सुलतान का वही ताज, वही भयानक चेहरा और वही छह उंगलियों वाले पंजे साफ़ दिखाई दे रहे थे!
सुलतान का वह हमज़ाद कबीर के जिस्म से अलग हो चुका था!
कबीर का शरीर हल्का हो गया, मगर उसकी ताक़त पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी। वह पानी में डूबने लगा।
मीरा ने तैरकर कबीर को पकड़ा और उसका सिर पानी से ऊपर बनाए रखा।
"कबीर! होश में रहो! अगर यह साया इस पानी से बाहर निकल गया, तो यह पूरी दिल्ली को भस्म कर देगा!"
6. हमज़ाद की भूख और नए जिस्म की तलाश
हवा में तैरता हुआ वह विशाल जिन्न—सुल्तान का हमज़ाद—उस भूमिगत कक्ष की छत से टकरा रहा था।
उसकी आँखें आग के दो भड़कते हुए कुंड थीं। उसकी दहाड़ से बाओली की पुरानी ईंटें टूट-टूट कर पानी में गिर रही थीं।
"आज़ाद! मैं आज़ाद हूँ!" वह दैत्य गर्जा।
उसकी नज़र नीचे चबूतरे पर खड़े उस कफ़न-पोश मलंग पर पड़ी:
"मेरे वफ़ादार ख़ादिम! तूने अपना वादा निभाया! अब मुझे एक ऐसा जिस्म दे जिसमें मैं इस नई दुनिया पर हुकूमत कर सकूँ!"
वह साया तेज़ी से नीचे झपटा और उस बूढ़े मलंग के शरीर में समाने की कोशिश करने लगा।
लेकिन जैसे ही उस आग के साए ने मलंग के सीने को छुआ—
एक भयानक, निराशाजनक चीख़ गूँजी!
चर्र्र्र्र!
मलंग का शरीर उस आग को बर्दाश्त नहीं कर सका। क्योंकि वह पहले से ही एक सड़ा हुआ, मिट्टी से भरा मुर्दा था। मलंग का कंकाल एक ही पल में जलकर राख का एक काला ढेर बन गया और पानी में बह गया!
"नहीं!" वह जिन्न हवा में छटपटाने लगा।
उसकी नीली आग पानी की पवित्र भाप के संपर्क में आकर कमज़ोर पड़ रही थी। उसे ज़िंदा रहने के लिए तुरंत एक ऐसा ताज़ा, जीवित इंसानी जिस्म चाहिए था जिसकी नसों में कोई प्राचीन, शाही या सूफ़ी ख़ून दौड़ रहा हो!
उसकी भयानक, भूखी नज़रें घूमीं।
वह कबीर की तरफ़ नहीं देख रहा था।
कबीर अब एक ख़ाली, कमज़ोर बर्तन था जिसकी रूहानी ऊर्जा ख़त्म हो चुकी थी।
उस शैतानी साए की नज़र... मीरा पर टिक गई!
7. वह भयानक, दिल दहला देने वाला महा-मोड़: असली ज़ोहरा का पुनर्जन्म (The Twist)
कबीर ने उस साए की नज़र को भाँप लिया।
"मीरा! भागो! पानी के नीचे डुबकी लगाओ!" कबीर अपनी पूरी ताक़त से चीख़ा।
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
वह विशाल, बारह हाथों वाला आग का दैत्य किसी गिरते हुए उल्कापिंड की तरह मीरा की तरफ़ लपका।
मीरा संभल भी नहीं पाई थी कि उस नीले धुएँ के बवंडर ने मीरा के पूरे वजूद को अपने आगोश में ले लिया!
हूशशश!
पानी में एक भयानक भँवर उठा। कबीर उस झटके से दूर फिंक गया और उसका सिर एक पत्थरीले खंभे से टकराया। उसके मुँह से ख़ून निकला और वह अधमरी हालत में पत्थरों की एक मुंडेर पर जा गिरा।
जब कबीर ने धुंधली आँखों से देखा... तो जो मंज़र सामने था, उसने उसकी आत्मा को हमेशा के लिए सुन्न कर दिया।
मीरा अब पानी में नहीं तैर रही थी।
वह धीरे-धीरे, हवा में ज़मीन से चार फीट ऊपर उठ रही थी!
उसकी नर्स की नीली वर्दी जलकर राख हो चुकी थी। उसकी जगह उसके शरीर पर 1954 की वही ज़रीदार, हरी मखमली शाही पोशाक अपने आप बुनती जा रही थी!
मीरा के छोटे, आधुनिक बाल अचानक लंबे होकर उसके घुटनों तक पहुँच गए—काले, रेशमी और नागिनों की तरह हवा में लहराते हुए।
उसका चेहरा... उसका चेहरा अब उस मासूम बीस साल की लड़की का नहीं था।
उसकी आँखों की पुतलियाँ पूरी तरह ग़ायब हो चुकी थीं; उनकी जगह धधकते हुए नीलम जैसी नीली आग जल रही थी। उसकी दोनों हथेलियों की उंगलियाँ खिंचकर लंबी हो गईं, और दोनों हाथों में वही छठी उंगली बिजली की तेज़ी से फूटकर बाहर निकल आई!
और सबसे खौफ़नाक बात—
मीरा के चेहरे पर जो मुस्कान उभरी, वह न उस लड़की की थी, और न किसी कमज़ोर इंसान की।
वह एक ऐसी महारानी की मुस्कान थी जिसने सत्तर साल बाद अपनी मौत के बदले में पूरे ब्रह्मांड का तख़्त हासिल कर लिया हो!
मीरा के होंठ हिले।
उसके गले से जो आवाज़ निकली, वह चावड़ी बाज़ार की उसी गायिका ज़ोहरा और सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक की मिली-जुली, दोहरी, वज्र जैसी आवाज़ थी:
*"धन्यवाद, कबीर मेहरा...
तुमने समझा कि तुम मुझे बचा रहे थे?
तुमने समझा कि तुम्हारे परदादा ने ज़ोहरा को एक बलि का बकरा बनाया था?
अरे नादान लड़के... 1954 में ज़ोहरा मरी नहीं थी... उसने अपनी रूह को इस आग में इसलिए मिलाया था ताकि उसकी आने वाली नस्ल का यह जिस्म... इस आग को संभाल सके!
तुम सिर्फ़ एक 'कुली' (पल्लेदार) थे, कबीर... जिसका काम इस सल्तनत की आग को कोटला के तहख़ाने से ढोकर यहाँ तक पहुँचाना था!
अब मैं सिर्फ़ ज़ोहरा नहीं हूँ... अब मैं 'मलिका-ए-आतिश' (अग्नि की साम्राज्ञी) हूँ!"*
मीरा—जो अब मलिका-ए-आतिश बन चुकी थी—ने अपनी छह उंगलियों वाला हाथ हवा में उठाया।
निज़ामुद्दीन बाओली की विशाल पत्थरीली छत एक भयानक धमाके के साथ फट गई!
ऊपर दिल्ली का काला आसमान दिखाई देने लगा।
और उस फटे हुए मुहाने से बाहर निकलते हुए, वह डायन हवा में तैरती हुई लाल क़िले की दिशा में उड़ गई, और पीछे छोड़ गई एक ऐसा हुक्म जिसने कबीर के होश उड़ा दिए:
"जाओ कबीर... अपनी उस आधुनिक पुलिस और अपनी उस कमज़ोर सरकार को बता दो... कि आज रात दिल्ली के लाल क़िले पर तिरंगा नहीं... हमारे ख़ून का परचम लहराएगा!"
कबीर उस ठंडे, ख़ूनी पानी में अकेला पड़ा था।
उसके सामने कोई रास्ता नहीं था, कोई हथियार नहीं था... और दिल्ली पर इतिहास का सबसे भयानक क़हर टूटने वाला था!