PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 10: सफ़दरजंग का कुहासा, दहकती नसें और निज़ामुद्दीन की दहलीज़

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
10 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
17 min
Words
3369
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. परछाईं का महादानव और अंगारों की जलन
दिल्ली की सर्द रात का सन्नाटा उस एम्बुलेंस की तेज़, सफ़ेद हेडलाइट्स की रोशनी में किसी टूटे हुए शीशे की तरह बिखर गया था।

सामने एम्स ट्रॉमा सेंटर के पीछे वाली सीमेंट की विशाल दीवार पर कबीर की परछाईं तनकर खड़ी थी। वह परछाईं किसी साढ़े पाँच फीट के मामूली, दुबले-पतले इंसान की नहीं थी।

दीवार पर जो साया पड़ रहा था, वह कम से कम बारह फीट ऊँचा था। उसके सिर पर दो विशाल, मुड़े हुए बकरे और भैंसे जैसे प्राचीन सींग थे, जिनका फैलाव दीवार के दोनों सिरों को छू रहा था। उसकी पीठ और कन्धों से बारह काले, धुएँदार हाथ मकड़ी के पंजों की तरह बाहर निकलकर हवा में लपलपा रहे थे। और उसके सिर पर एक आग से धधकता हुआ, नुकीला सल्तनत-कालीन ताज चमक रहा था।

कबीर ने कांपते हुए अपनी दोनों हथेलियों को देखा।

उसकी कटी हुई उंगलियों के काले खुरंडों में से अब ख़ून नहीं रिस रहा था; वहाँ से एक गाढ़ी, पारदर्शी, नीलम जैसी नीली आग की लपटें निकल रही थीं। वह आग कोई सामान्य लौ नहीं थी जिसमें धुआँ होता है; यह वही ‘नार-ए-समोम’ थी—वह आदिम, ब्रह्मांडीय आग जिससे हज़ारों साल पहले इबलीस और उसके सरकश जिन्नात को गढ़ा गया था।

"दूर हटो! मुझसे दूर रहो, कबीर!"

मीरा ज़मीन पर घिसटती हुई पीछे की तरफ़ भाग रही थी। उसकी नर्स की वर्दी धूल और कीचड़ से सन चुकी थी। उसके चेहरे पर शुद्ध, आदिम इंसानी दहशत का ऐसा रंग था जो इंसान तब महसूस करता है जब वह साक्षात मौत के जबड़े को अपने सामने खुला देखता है।

"मीरा... मेरी बात सुनो..." कबीर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

मगर जैसे ही उसने अपने होंठ खोले, उसके मुँह से निकली आवाज़ सुनकर वह ख़ुद थर्रा गया।

यह कबीर की आवाज़ नहीं थी।

कबीर की सामान्य, इंसानी आवाज़ के ठीक नीचे एक ऐसी भारी, धातु जैसी खुरदुरी और भयानक गूँज थी जैसे किसी गहरे कुएँ के भीतर से कोई प्राचीन दैत्य दहाड़ रहा हो। जब वह बोलता था, तो हवा में गंधक (sulfur) और जलती हुई हड्डियों की तीखी बदबू फैल जाती थी।

"मैं... मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाना चाहता..." कबीर ने अपने दाँत भींच लिए।

उसकी छाती के भीतर, जहाँ वह त्रिकोणीय लोहे का तावीज़ सीधे उसकी हड्डियों में धँसा हुआ था, वहाँ ऐसा भयानक खिंचाव महसूस हुआ मानो उसका दिल अब कोई माँस का लोथड़ा नहीं रहा, बल्कि पिघले हुए ताँबे का एक धधकता हुआ गोला बन चुका हो।

हर धड़कन के साथ उसकी पसलियों की त्वचा पर नीली आग की बारीक लकीरें किसी मकड़ी के जाले की तरह फैल रही थीं।

‘झुक जाओ...’

कबीर की खोपड़ी के भीतर एक ऐसी आवाज़ गूँजी जिसने उसके दिमाग़ के न्यूरॉन्स को झुलसा दिया। यह आवाज़ बाहर से नहीं आ रही थी; यह उसके अपने मस्तिष्क के सबसे गहरे, आदिम हिस्से से उठ रही थी:

‘झुक जाओ, कीड़े! यह मिट्टी की देह अब तुम्हारी नहीं है। सत्तर साल तक मैंने कोटला के पत्थरों में प्यास झेली है... आज इस शहर की हवा मेरे नथुनों में उतरी है! मुझे इस दिल्ली की छाती पर अपना पैर रखने दो!’

"नहीं!" कबीर ने अपनी पूरी ताक़त से अपनी ही छाती पर मुक्का मारा। "यह मेरा जिस्म है! तू एक साया है... तू महज़ एक सड़ा हुआ इतिहास है!"

कबीर ने अपने घुटने ज़मीन पर टेक दिए और अपनी नीली आग उगलती दोनों हथेलियों को पार्किंग लॉट की उस बर्फीली, जमी हुई डामर पर पूरी ताक़त से दबा दिया।

छ्छ्छ्छ्र्र्र!

एक भयानक सिसकारी उठी।

डामर की सड़क कबीर के हाथों के नीचे पिघलने लगी। काला धुआँ उठा और कबीर की चमड़ी जलने लगी। उस असहनीय, रूहानी दर्द ने कबीर के भीतर उठ रही उस शैतानी आग को एक पल के लिए दबा दिया।

दीवार पर पड़ा वह बारह हाथों वाला भयानक साया धीरे-धीरे सिकुड़ा और वापस एक सामान्य इंसान की परछाईं में सिमट गया।

कबीर ने हाँफते हुए, पसीने और ख़ून से लथपथ होकर सिर उठाया।

मीरा सड़क के किनारे खड़ी कांप रही थी। उसकी आँखें कबीर के उन जले हुए, काले हाथों पर टिकी थीं।

2. रिंग रोड का महा-अंधकार और शहर का कंपन
रात के दो बज रहे थे।

जैसे ही कबीर के भीतर वह प्राचीन जिन्न एक पल के लिए जागा था, पूरे दक्षिण दिल्ली के वायुमंडल में एक भयानक, अदृश्य विद्युत-चुंबकीय आघात (occult EMP) फैल गया था।

रिंग रोड की पीली सोडियम स्ट्रीटलाइट्स अचानक पागलों की तरह भड़कने लगीं।

तड़ाक! तड़ाक! चटक!

एक के बाद एक, सफ़दरजंग फ़्लाईओवर से लेकर एम्स चौराहे तक की सैकड़ों स्ट्रीटलाइटों के कांच के बल्ब एक साथ फूट पड़े। पूरी सड़क पर कांच की बारिश हुई।

सड़कों पर दौड़ती हुई गाड़ियों के इंजन अचानक बंद हो गए। डीटीसी बसों की हेडलाइट्स बुझ गईं और वे झटके खाकर सड़क के किनारे रुक गईं। एम्बुलेंसों के सायरन एक अजीब, विकृत और धीमी घुरघुराहट में बदलकर ख़ामोश हो गए।

दूर, एम्स मेट्रो स्टेशन के ऊपर लगा विशाल डिजिटल विज्ञापन बोर्ड अचानक झिलमिलाया। उस पर चल रहा आधुनिक विज्ञापन ग़ायब हो गया, और उसकी जगह काले बैकग्राउंड पर ख़ूनी लाल रंग की प्राचीन अरबी सुलुस (Thuluth script) में एक इबारत स्क्रॉल होने लगी:

"अल-मुल्क लिल्लाह... अल-हुक्म लिल-आतिश!"

(हुकूमत केवल आग की है... और फ़ैसला अंगारों का!)

और फिर, पूरी दिल्ली के आवारा कुत्ते एक साथ रोने लगे।

यह कोई सामान्य भौंकना नहीं था; यह वह आदिम, रूहानी विलाप था जो जानवर तब करते हैं जब वे हवा में किसी ऐसी शैतानी हस्ती की गंध सूंघते हैं जो कब्रों को चीरकर बाहर आई हो। सफ़दरजंग, कोटला मुबारकपुर, और हौज़ ख़ास की गलियों से हज़ारों कुत्तों के एक सुर में रोने की गूँज हवा को कफ़न की तरह भारी बना रही थी। वे सब अपना मुँह दक्षिण दिशा—फ़िरोज़ शाह कोटला के वीराने—की तरफ़ करके ज़मीन पर लोट रहे थे।

"कबीर... हमें यहाँ से भागना होगा," मीरा ने लड़खड़ाते हुए आगे बढ़कर कहा। उसकी आवाज़ में अब भी डर था, लेकिन उसने देखा कि कबीर ने ख़ुद को जलाकर उस शैतान को रोक लिया था। "अस्पताल के लोग... वे यहाँ आ रहे हैं!"

कबीर ने ट्रॉमा सेंटर के पीछे देखा।

इमरजेंसी एग्ज़िट का वह टूटा हुआ दरवाज़ा खुला पड़ा था। अंदर से दर्जनों काले साए, डॉक्टरों और सुरक्षा गार्डों की वर्दी में, अपनी लाल आँखों के साथ बाहर की तरफ़ दौड़ रहे थे। उनके हाथों में आधुनिक ऑटोमैटिक हथियार थे, मगर उनकी आँखों में वही कोटला की सड़ी हुई आग जल रही थी।

"कहाँ जाएँ?" कबीर ने लड़खड़ाते हुए खड़े होकर पूछा। उसका बायाँ पैर अब भी घिसट रहा था। "यह पूरी दिल्ली उनकी गिरफ़्त में है! वे हर जगह हैं!"

मीरा ने कबीर का हाथ पकड़ा। इस बार वह पीछे नहीं हटी।

"एक जगह है, कबीर... जहाँ इस शहर का कोई भी जिन्न, कोई भी शैतान अपनी आग लेकर क़दम नहीं रख सकता। चलो मेरे साथ!"

3. सफ़दरजंग का वीराना और मीरा का ख़ानदानी सच
वे दोनों रिंग रोड की उस अंधेरी, बिना लाइट वाली सड़क से होते हुए सफ़दरजंग के मक़बरे की तरफ़ भागे।

1754 में नवाब शुजाउद्दौला द्वारा अपने पिता सफ़दरजंग की याद में तामीर करवाया गया यह मक़बरा मुग़ल वास्तुकला का आख़िरी चराग़ था। रात के इस पहर, यह विशाल स्मारक कोहरे और सन्नाटे की चादर ओढ़े किसी सोए हुए दैत्य की तरह खड़ा था।

मक़बरे का विशाल, लाल बलुआ पत्थर का मुख्य दरवाज़ा बंद था।

लेकिन मीरा उस इलाक़े की हर एक दरार से वाक़िफ़ थी। वह कबीर को मक़बरे की पश्चिमी चारदीवारी की तरफ़ ले गई, जहाँ नीम के एक पुराने पेड़ की झुकी हुई डालियों के सहारे दीवार की टूटी हुई जाली को पार किया जा सकता था।

कबीर ने किसी तरह अपने भारी, जलते हुए शरीर को दीवार के पार खींचा। दोनों मक़बरे के विशाल, वीरान बाग़ में उतर गए।

यहाँ का सन्नाटा गहरा और डरावना था।

सफ़दरजंग के मुख्य मक़बरे का वह विशाल गुंबद धुंध के भीतर किसी कटी हुई खोपड़ी जैसा दिख रहा था। चारों तरफ़ लगे फव्वारे सूखे पड़े थे, और मुग़ल कालीन नहरों में केवल सूखी, सड़ी हुई पत्तियाँ भरी थीं।

कबीर मक़बरे के संगमरमर के एक चबूतरे पर गिर पड़ा। उसकी छाती की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसकी पसलियों की हड्डियाँ बाहर निकलती हुई महसूस हो रही थीं।

उसने अपनी जलती हुई आँखें मीरा पर गड़ा दीं।

"अब बताओ, मीरा..." कबीर की आवाज़ में वह दोहरी, भयानक गूँज अब भी मौजूद थी, "तुम कौन हो? एक मामूली स्टाफ़ नर्स को इस पाताल, उन सुरंगों और इस तिलिस्म के बारे में कैसे पता हो सकता है? तुम उस बेसमेंट में क्या कर रही थीं?"

मीरा चबूतरे की सीढ़ियों पर बैठ गई। उसने अपने गले से चांदी की एक बहुत पुरानी, बारीक ज़ंजीर बाहर निकाली।

उस ज़ंजीर में एक ताबीज़ लटका हुआ था—काले हक़ीक़ (Agate) का एक गोल पत्थर, जिस पर फ़ारसी में कुछ आयतें खुदी हुई थीं।

"मेरे दादा हकीम अताउल्लाह ख़ान थे, कबीर..." मीरा की आवाज़ में एक गहरा, पुराना दर्द था। "पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में उनका पुराना यूनानी दवाखाना था। लेकिन वे सिर्फ़ हकीम नहीं थे; वे 'इल्म-ए-तसख़ीर' (जिन्नात को वश में करने और उनके असर को काटने वाले इल्म) के दिल्ली के आख़िरी बड़े उस्ताद थे।"

मीरा ने मक़बरे के उस अंधेरे गुंबद की तरफ़ देखा:
"बचपन में मेरे दादा ने मुझे एक पुरानी, हाथ से लिखी किताब दिखाई थी। उस किताब में दर्ज था कि 2026 की सर्दियों में... जब आकाश में सात ग्रहों का एक दुर्लभ योग बनेगा, तब कोटला के उस सातवें पाताल का 'सोया हुआ सुल्तान' एक इंसानी जिस्म का लिबास ओढ़कर बाहर निकलने की कोशिश करेगा।

मेरे दादा ने अपनी पूरी ज़िंदगी उस शैतान की निशानियों को ढूँढने में लगा दी। जब मुझे पता चला कि एम्स के डॉ. सेन 'प्रोजेक्ट बरज़ख़' के नाम पर कोटला के पत्थरों से न्यूरो-डेटा इकट्ठा कर रहे हैं, तो मैं समझ गई कि वे विज्ञान की आड़ में उस शैतान का दरवाज़ा खोल रहे हैं। मैं उस लैब में नौकरी करने केवल इसलिए गई थी ताकि उस दरवाज़े को बंद करने का कोई रास्ता ढूँढ सकूँ!"

"और क्या तुम्हें रास्ता मिला?" कबीर ने हांफते हुए पूछा।

मीरा ने कबीर की आँखों में देखा। उसकी आँखों में एक ऐसी सच्चाई थी जिसने कबीर के सुन्न पड़ते दिल को भीतर तक हिला दिया।

"हाँ, कबीर। रास्ता सिर्फ़ एक ही है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह!"

4. फ़िरोज़ शाह के हमज़ाद का विद्रोह
"निज़ामुद्दीन?" कबीर ने अपनी कटी हुई उंगलियों को सहलाते हुए कहा।

"हाँ," मीरा ने समझाया। "चौदहवीं सदी में, जब सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने कोटला में अपनी जामी मस्जिद और बाओली बनवाई थी, तब हज़रत निज़ामुद्दीन के मुरीदों और सूफ़ियों ने उस क़िले के चारों तरफ़ एक आध्यात्मिक घेरा खींचा था।

सुलतान की मौत के बाद, उसके जिस्म की जो रूह थी वह तो मिट्टी में मिल गई... लेकिन उसका जो 'हमज़ाद' (शैतानी प्रतिरूप) था, जिसे उसने अपने जादू और रक्त-बलि से पुष्ट किया था, वह उस बाओली के सातवें कुएँ में क़ैद हो गया। उसी हमज़ाद को आज की दुनिया 'कोटला का सुल्तान' कहती है!"

मीरा ने आगे बढ़कर कबीर के कंधे पर हाथ रखा:
"वह हमज़ाद अब तुम्हारे भीतर है, कबीर। वह तुम्हारे ख़ून की हर एक कोशिका में फैल रहा है। अगर सूरज निकलने से पहले हम निज़ामुद्दीन की उस प्राचीन बाओली तक नहीं पहुँचे, जहाँ चिराग़-ए-दिल्ली और निज़ामुद्दीन के कदमों की मिट्टी है... तो वह हमज़ाद तुम्हारी इंसानी रूह को पूरी तरह निगल जाएगा। और उसके बाद... इस देह पर केवल उस सुल्तान का क़ब्ज़ा होगा!"

जैसे ही मीरा ने यह शब्द कहे—

कबीर के पेट के भीतर एक भयानक, हिंसक मरोड़ उठा!

"आहहह!"

कबीर मुँह के बल संगमरमर के फर्श पर गिरा। उसकी रीढ़ की हड्डी में ऐसा खिंचाव आया जैसे कोई उसके भीतर से उसकी रीढ़ को तोड़कर बाहर निकलना चाहता हो।

उसकी छाती पर जड़ा वह लोहे का तावीज़ धधक उठा। कबीर की आँखें पूरी तरह नीली पड़ गईं।

उसके मुँह से कबीर की नहीं, बल्कि उस भयानक हमज़ाद की आवाज़ गूँज उठी:

"नादान लड़की! तू उस दरगाह की बात करती है जिसके पत्थरों को मैंने 1388 में अपने खंजरों से तराशा था? तू सोचती है कि यह मिट्टी का कीड़ा (कबीर) मुझे रोक पाएगा? मैं सुलतान हूँ! मैं इस शहर की हर एक ईंट का मालिक हूँ!"

कबीर का दायाँ हाथ अपने आप उठा और उसकी उंगलियाँ मुड़कर मीरा की गर्दन की तरफ़ झपटीं!

"कबीर! लड़ो उससे!" मीरा चीख़ी। उसने अपने गले का वह काला हक़ीक़ का तावीज़ कबीर की जलती हुई कलाई से छुआ दिया।

तड़ाक!

एक चिंगारी फूटी। कबीर के मुँह से एक दर्दनाक चीख़ निकली।

कबीर की अपनी इंसानी चेतना ने उस भयानक शैतानी ताक़त का मुकाबला किया। उसने अपने बाएँ हाथ से अपने ही दाएँ हाथ को पकड़कर पीछे खींचा। उसने अपनी गर्दन को पत्थरों पर पटक दिया ताकि उस दर्द से उसका दिमाग़ जाग सके।

"भागो मीरा... मुझे... मुझे बांध दो!" कबीर अपने दाँतों से ख़ून थूकते हुए चिल्लाया। "मैं... मैं अपने हाथ नहीं रोक पा रहा हूँ!"

"नहीं कबीर! हमें निज़ामुद्दीन पहुँचना ही होगा!" मीरा ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर कबीर के जलते हुए दाएँ हाथ पर कसकर बाँध दिया। तावीज़ की छुअन से वह नीली आग एक बार फिर चमड़ी के नीचे दब गई।

5. लोधी रोड का खूनी घेरा और धातु का तांडव
वे दोनों सफ़दरजंग मक़बरे के पिछले दरवाज़े से बाहर निकले और लोधी रोड की तरफ़ बढ़े।

यह रास्ता दिल्ली का सबसे शांत और वीरान इलाक़ा माना जाता था। दोनों तरफ़ घने जामुन और गुलमोहर के पुराने पेड़ थे, जिनके पीछे लोधी गार्डन के ऐतिहासिक गुंबद अंधेरे में छुपे थे।

हवा में कड़ाके की ठंड थी। सड़क पर कोई ट्रैफ़िक नहीं था।

लेकिन जैसे ही वे लोधी रोड के मुख्य चौराहे के पास पहुँचे—

अचानक सड़क के दोनों तरफ़ से चार काली, विशाल स्कॉर्पियो गाड़ियाँ तेज़ रफ़्तार से आईं और उन्होंने कबीर और मीरा को चारों तरफ़ से घेर लिया!

गाड़ियों की तेज़, अंधी कर देने वाली एलईडी लाइट्स उन दोनों के चेहरों पर आ टिकीं।

गाड़ियों के दरवाज़े खुले।

उनमें से बारह लोग बाहर निकले। उन्होंने काले कमांडो जैसे कपड़े पहन रखे थे, चेहरों पर टैक्टिकल मास्क थे, और उनके हाथों में आधुनिक MP5 सब-मशीन गनें थीं।

लेकिन उनकी गनों के आगे लेज़र लाइट नहीं थी; उनकी गनों की नालियों पर वही त्रिकोणीय लोहे के तावीज़ बंधे थे!

गाड़ियों के बीच में से एक शख़्स बाहर निकला।

वह डॉ. वी. के. सेन था! वही एम्स का न्यूरो-साइंटिस्ट! मगर अब उसने कोई सर्जिकल गाउन नहीं पहना था; उसने एक लंबा, काला कश्मीरी चोला पहन रखा था, और उसके हाथ में छह उंगलियों वाला वही प्राचीन खंजर चमक रहा था।

"कितनी दूर भागोगे, कबीर?" डॉ. सेन के चेहरे की चमड़ी एक तरफ़ से गल चुकी थी, जिससे उसकी खोपड़ी के पीले दाँत बाहर दिख रहे थे।

"तुम हमारी सबसे मुकम्मल खोज हो! इस मुल्क की हुकूमत, इस मुल्क की फ़ौज, इस मुल्क की दौलत... सब कुछ हमारे पैरों पर झुकने वाला है! उस जिस्म को हमें सौंप दो!"

कमांडोज़ ने अपनी गनें तान दीं।

क्लिक-क्लिक-क्लिक!

"मीरा, मेरे पीछे छिप जाओ," कबीर ने कहा।

उसके भीतर का वह शैतान... उस ख़तरे को देखकर अचानक जाग उठा।

इस बार कबीर ने उसे दबाने की कोशिश नहीं की। उसने अपनी इंसानी लाचारी को किनारे कर दिया। अगर ज़िंदा रहना था, अगर निज़ामुद्दीन पहुँचना था, तो उसे उस शैतानी आग को हथियार बनाना ही था!

कबीर ने अपनी छाती को तान लिया।

उसने अपनी दोनों हथेलियों को आगे बढ़ाया। उसकी उंगलियों से नीली आग का एक भयानक, तूफ़ानी बवंडर छूटा!

हूशशश!

एक प्रचंड शॉकवेव हवा में फैली।

सामने खड़ी दो स्कॉर्पियो गाड़ियाँ खिलौनों की तरह हवा में दस फीट ऊपर उछल गईं और सड़क पर उल्टी जा गिरीं! पेट्रोल की टंकियों में आग लग गई—धड़ाम! बूम!

कमांडोज़ चीख़ते हुए इधर-उधर भागे। गोलियों की तड़तड़ाहट शुरू हो गई—तड़ातड़! तड़ातड़!

लेकिन गोलियाँ जैसे ही कबीर के शरीर के पास पहुँचती थीं, उस नीली आग के रूहानी घेरे से टकराकर पिघल जाती थीं और ज़मीन पर सीसे के पानी की तरह टपकने लगती थीं।

डॉ. सेन ने अपनी छह उंगलियों वाला खंजर हवा में लहराया और एक भयानक, अमानवीय चीख़ निकाली: "उसे मारना मत! उसकी टाँगें तोड़ दो!"

"दौड़ो मीरा!"

कबीर ने मीरा का हाथ पकड़ा और उस जलती हुई गाड़ियों के मलबे के बीच से छलांग लगाकर निज़ामुद्दीन बस्ती की संकरी, अंधेरी गलियों की तरफ़ दौड़ लगा दी।

6. निज़ामुद्दीन की गलियाँ और लोबान की ख़ुशबू
सुबह के तीन बज रहे थे।

निज़ामुद्दीन बस्ती की गलियों में दाख़िल होते ही दुनिया एक बार फिर बदल गई।

यहाँ चौड़ी सड़कें नहीं थीं; यहाँ सदियों पुरानी, लखौरी ईंटों से बनी संकरी, घुमावदार गलियाँ थीं। गलियों में मज़ार पर चढ़ाने वाले लाल गुलाबों की ताज़ा महक, लोबान का मीठा, पवित्र धुआँ और कव्वालियों की बहुत हल्की, दूर से आती गूँज हवा में तैर रही थी।

कबीर के जिस्म की वह नीली आग इस पवित्र हवा के छूते ही छटपटाने लगी।

कबीर के नथुनों में जैसे ही गुलाब और लोबान की महक गई, उसकी छाती में गड़े उस तावीज़ से काला धुआँ फूटने लगा। उसके भीतर बैठा वह हमज़ाद दर्द से बिलबिला उठा:

‘मुझे यहाँ से बाहर निकालो! यह जगह आग को मार देती है! यह जगह मुझे जला रही है!’

कबीर अपने घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। वह दर्द से चीख़ रहा था। उसके मुँह से झाग निकल रहा था।

"हम पहुँच गए, कबीर! बस थोड़ी दूर और!" मीरा उसे सहारा देकर उठा रही थी।

सामने निज़ामुद्दीन दरगाह का मुख्य प्रवेश द्वार था। संगमरमर की वह पवित्र चौखट, जहाँ चौबीसों घंटे सूफ़ी फ़क़ीर और दरवेश सजदे में पड़े रहते थे।

तभी—

दरगाह के पास बने 'चौंसठ खंभा' के अंधेरे दालान से एक साया बाहर निकला।

वह कोई आम इंसान नहीं था।

उसने हरे रंग का फटा हुआ चोगा पहन रखा था। उसके सिर पर उलझे हुए, जटा जैसे लंबे सफ़ेद बाल थे। उसके गले में सैकड़ों रुद्राक्ष, अकीक और लोहे की ज़ंजीरें लटकी थीं। उसकी आँखें अंधी थीं, मगर उन अंधी आँखों में एक ऐसा अलौकिक, रूहानी नूर था जिसने पूरे अंधेरे को चीर दिया था।

वह निज़ामुद्दीन दरगाह का सबसे पुराना, रहस्यमयी मलंग था—बाबा मस्त-अल-हक़!

बाबा अपने हाथ में पकड़े लोहे के कश्कोल (भिक्षापात्र) को ज़मीन पर खड़खड़ाते हुए आगे बढ़े।

कबीर हांफता हुआ उस मलंग के कदमों के पास गिरा।

"बाबा... मुझे बचाइए..." कबीर ने अपनी कांपती आवाज़ में गिड़गिड़ाते हुए कहा। "मेरे भीतर कोटला का शैतान घुस चुका है... यह मेरी रूह को खा रहा है... मुझे इस आग से आज़ाद कर दीजिए!"

7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-मोड़: असली शिकारी और 650 साल का बदला (The Twist)
कबीर को उम्मीद थी कि वह मलंग कोई दुआ पढ़ेगा, कोई मुक़द्दस पानी उस पर छिड़केगा या उस जिन्न को ललकारेगा।

लेकिन जो हुआ... उसने कबीर के दिमाग़ के परखच्चे उड़ा दिए।

उस बूढ़े मलंग—बाबा मस्त-अल-हक़—ने अपना लोहे का कश्कोल नीचे रख दिया।

उसने अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ीं। और फिर, वह घुटनों के बल झुका और उसने अपना बूढ़ा माथा कबीर के उन ख़ून और आग से सने पैरों पर रख दिया!

कबीर सन्न रह गया। "बाबा! यह... यह आप क्या कर रहे हैं? मैं तो एक अभिशप्त, गुनाहगार इंसान हूँ!"

बाबा मस्त-अल-हक़ ने अपना सिर उठाया।

उनकी अंधी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उनके चेहरे पर एक ऐसी भयानक, दीवानी श्रद्धा थी जिसे देखकर कबीर की रीढ़ की हड्डी में बर्फ़ जम गई।

बाबा ने कांपती आवाज़ में, पूरे अदब के साथ कहा:

"सलाम... ऐ जहाँपनाह!

सलाम, ऐ सुल्तान-ए-फ़िरोज़ शाह तुग़लक!

छह सौ पचास साल बाद... हमारी सात पीढ़ियों की मन्नत पूरी हुई!

आप अपनी सल्तनत में वापस लौट आए, मेरे मौला!"

कबीर के पैरों तले की ज़मीन सचमुच धँस गई। "क्या?! बकवास बंद करो, बाबा! मैं कबीर हूँ! मैं कोई सुल्तान नहीं हूँ!"

बाबा मस्त-अल-हक़ ने एक रहस्यमयी, सर्द हँसी हँसते हुए कहा:

*"आप भूल गए हैं, हुज़ूर... 1388 में जब आपकी मौत का वक़्त आया था, तो आपने किसी शैतान से सौदा नहीं किया था। आपने अपनी ही रूह को इस आग में महफ़ूज़ किया था ताकि कलयुग के इस दौर में अपनी ही गद्दी दोबारा हासिल कर सकें!

और यह लड़की..."*

बाबा की अंधी आँखें अचानक घूमकर मीरा के चेहरे पर टिक गईं। बाबा की आवाज़ में अचानक भयानक नफ़रत भर गई:

*"यह लड़की कोई नर्स नहीं है, हुज़ूर!

यह कोई अताउल्लाह ख़ान की पोती नहीं है!

यह चावड़ी बाज़ार की उसी तवायफ़ ज़ोहरा की आख़िरी ख़ूनी वारिस है!

यह आपको यहाँ बचाने नहीं लाई थी... यह आपको निज़ामुद्दीन की इस चौखट पर इसलिए खींच कर लाई है ताकि उस पवित्र पानी की ताक़त से आपके जिस्म को कमज़ोर करके... सत्तर साल पहले के उस क़त्ल का बदला ले सके!"*

कबीर का पूरा जिस्म काठ हो गया।

उसने झटके से अपनी गर्दन घुमाई और अपने पीछे खड़ी मीरा की तरफ़ देखा।

मीरा के चेहरे पर अब कोई डर नहीं था। कोई बेबसी नहीं थी।

उसकी आँखों में आँसू नहीं थे; वहाँ एक प्राचीन, ठंडी और ज़हरीली मुस्कान फैल चुकी थी।

मीरा ने अपनी नर्स की वर्दी की जेब से एक पुराना, चमचमाता हुआ चांदी का खंजर बाहर निकाल लिया। वही खंजर, जिसकी मूठ पर 1954 के दीवान हरदयाल का ख़ानदानी निशान खुदा हुआ था!

मीरा की आवाज़ अब किसी बीस साल की लड़की की नहीं थी; वह चावड़ी बाज़ार की उसी गायिका ज़ोहरा की तीखी, रूह-कँपा देने वाली आवाज़ में बदल चुकी थी:

*"पहचानने में बहुत देर कर दी, सुल्तान...

सत्तर साल पहले तुम्हारे उस दरिंदे हरदयाल ने मुझे इसी खंजर से काटा था!

आज इस दरगाह की दहलीज़ पर... मैं तुम्हारे इस नए जिस्म के टुकड़े-टुकड़े करके अपने ख़ानदान के उस ख़ून का बदला लूँगी!"*

मीरा ने वह चांदी का खंजर दोनों हाथों में थामा और पूरी ताक़त से कबीर के सीने में गड़े उस लोहे के तावीज़ की तरफ़ घोंप दिया!

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