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भाग 9: प्रोजेक्ट बरज़ख़, सफ़ेद एप्रन और सायों की चीरफाड़
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 16 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 9 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3086
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. कीटाणुनाशक की महक और प्लास्टिक का दमघोंटू निवाला
एक असहनीय, रासायनिक गंध।
आइसोप्रोपिल अल्कोहल, ब्लीच और अस्पतालों के उस ख़ास कीटाणुनाशक की तीखी महक, जो फेफड़ों में उतरते ही साँस की नलियों को छील देती है।
कबीर की पलकें इतनी भारी थीं जैसे किसी ने उन पर सीसे की सिल्लियाँ रख दी हों। जब उसने अपनी आँखों को बमुश्किल एक मिलीमीटर खोला, तो उसकी पुतलियों पर सफ़ेद, नीली फ़्लोरोसेंट ट्यूबलाइटों की तेज़, अंधी कर देने वाली रोशनी किसी खंजर की तरह चुभी।
सामने 1954 का कुहासा नहीं था। न जामा मस्जिद का लाल पत्थर था, न दमिश्की फ़ौलाद की वह तलवार।
वह एक बेहद साफ़, ठंडे और मशीनों से भरे कमरे में एक संकरे, लोहे के झुके हुए बिस्तर पर लेटा था।
उसके गले के भीतर कुछ बहुत मोटा, सख्त और बेजान फँसा हुआ था—एक प्लास्टिक की पारदर्शी एंडोट्रैचियल ट्यूब (वेंटिलेटर पाइप), जो उसके हलक़ को चीरती हुई सीधे उसके फेफड़ों में हवा ठूँस रही थी। हर चार सेकंड बाद एक यांत्रिक आवाज़ आती थी—हिस्स... खट... हूश...—और उसकी छाती बेतरतीब तरीक़े से फूलती और पिचकती थी।
कबीर ने हिलने की कोशिश की, मगर उसका पूरा जिस्म किसी मुर्दे की तरह काठ हो चुका था।
उसकी दोनों कलाइयों और टखनों को चमड़े के भारी पट्टों (medical restraints) से बिस्तर के लोहे के फ़्रेम से बाँध दिया गया था। उसकी उंगलियों में पल्स-ऑक्सीमीटर के लाल संवेदक (sensors) चुभे हुए थे। उसके पूरे सिर पर एक जालीदार रबर का हेलमेट कसा हुआ था, जिससे दर्जनों रंग-बिरंगे तार निकलकर पीछे रखी एक विशाल, ब्लैक-स्क्रीन वाली मॉनिटरिंग मशीन में जा रहे थे।
मशीन के स्क्रीन पर एक हरा ग्राफ पागलों की तरह ऊपर-नीचे कांप रहा था।
बीप... बीप... बीप... बीप...
"डॉक्टर सेन! न्यूरो-रेस्पॉन्स वापस आ रहा है! पेशेंट का कॉर्टिसोल लेवल सामान्य से चार सौ गुना ऊपर जा चुका है!"
एक औरत की आवाज़ आई।
कबीर ने अपनी पुतलियों को दाईं तरफ़ घुमाया। बिस्तर के पास दो लोग खड़े थे। दोनों ने हल्के नीले रंग के सर्जिकल स्क्रब्स, रबर के दस्ताने और पारदर्शी प्लास्टिक के फेस-शील्ड पहन रखे थे।
आगे खड़ी महिला डॉक्टर—जिसके एप्रन पर लगे लेमिनेटेड आई-कार्ड पर 'डॉ. राधिका मेहता, सीनियर न्यूरो-साइंटिस्ट, AIIMS नई दिल्ली' लिखा था—घबराहट में मॉनिटर की नॉब घुमा रही थी।
उसके पीछे खड़े साठ-पैंसठ साल के एक गंजे, चश्मे वाले डॉक्टर—डॉ. वी. के. सेन—ने अपनी गहरी, तनावग्रस्त भौंहों को सिकोड़ रखा था।
"डोज़ बढ़ाओ, राधिका!" डॉ. सेन की आवाज़ में एक अजीब, सर्द घबराहट थी। "अगर इसका सेरेब्रल कॉर्टेक्स उस फ़्रीक्वेंसी को होल्ड नहीं कर पाया, तो इसका दिमाग़ उबल जाएगा! तुरंत पचास मिलीग्राम प्रोपोफ़ोल और फ़ेंटानिल का इंजेक्शन आईवी लाइन में पुश करो!"
कबीर चीखना चाहता था।
वह बताना चाहता था कि वह होश में है! वह कोई पागल नहीं है! मगर उसके मुँह में फँसी उस रबर की नली ने उसकी आवाज़ को सिर्फ़ एक घिनौनी, थूक भरी घुरघुराहट में बदल दिया—घुर्र्र... घुर्र्र...
2. प्रोजेक्ट बरज़ख़: विज्ञान का वहशी खेल
डॉ. राधिका ने एक बड़ी कांच की सिरिंज उठाई और कबीर के दाएँ हाथ की नस में लगे कैन्युला में सुई चुभा दी।
ठंडी दवा कबीर की नसों में बर्फ़ के तेज़ाब की तरह दौड़ी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उस बेहोशी की दवा का कबीर के मस्तिष्क पर कोई असर नहीं हुआ। उसका दिमाग़ और ज़्यादा तेज़, और ज़्यादा खौफ़नाक तरीके से जाग रहा था।
"सर..." राधिका की आवाज़ कांप उठी। उसने मॉनिटर के स्क्रीन की तरफ़ देखा। "ड्रग्स का कोई असर नहीं हो रहा है! इसके ब्रेन-वेव्स... ये इंसान के ब्रेन-वेव्स नहीं हैं! यह 40 हर्ट्ज़ का गामा-वेव पैटर्न नहीं है... यह लगभग 300 हर्ट्ज़ का एक प्लाज़्मा-ऑसिलेशन है! ऐसा लग रहा है जैसे इसके दिमाग़ के न्यूरॉन्स किसी बिजली के तार की तरह सीधे आग पैदा कर रहे हों!"
डॉ. सेन ने अपनी फेस-शील्ड ऊपर की। उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
वे कबीर के बिस्तर के बिल्कुल क़रीब झुके।
"कबीर... अगर तुम मुझे सुन सकते हो, तो अपनी पलकें दो बार झपकाओ," डॉ. सेन ने धीरे से कहा।
कबीर ने अपनी पूरी इच्छाशक्ति समेटकर अपनी पलकें दो बार ज़ोर से झपकाईं।
डॉ. सेन ने एक गहरी, ठंडी साँस ली। उन्होंने राधिका की तरफ़ देखा:
"यह सुन रहा है। इसका कॉन्शियस माइंड उस सिमुलेशन से बाहर आ चुका है।"
सेन वापस कबीर की तरफ़ मुड़े:
"कबीर, शांत रहो। मेरी बात ग़ौर से सुनो। तुम एम्स के न्यूरो-साइंसेज सेंटर के अंडरग्राउंड रिसर्च विंग—लैब नंबर 7 में हो। आज 13 सितंबर 2026 है। तुम पिछले बाईस दिनों से इस कोमा में थे।"
कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
2026? बाईस दिन?
"तुमने ख़ुद इस प्रोजेक्ट के लिए साइन किया था, कबीर," डॉ. सेन ने मॉनिटर के पीछे लगे एक बड़े फ़ोल्डर को खोलते हुए कहा।
"प्रोजेक्ट का कोडनेम था—'प्रोजेक्ट बरज़ख़'। मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर और एम्स का एक सीक्रेट जॉइंट रिसर्च प्रोग्राम। हमारा मक़सद यह साबित करना था कि दिल्ली के ऐतिहासिक खंडहरों—खासकर फ़िरोज़ शाह कोटला—में जो तथाकथित 'जिन्नात' और 'सायों' की घटनाएँ होती हैं, वे असल में कोई भूत-प्रेत नहीं हैं।
वे उस ज़मीन के नीचे दबे हुए टेक्टोनिक प्लेट्स के घर्षण से पैदा होने वाली अत्यधिक शक्तिशाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ़ील्ड्स (EMF) हैं, जो इंसानी दिमाग़ के टेम्पोरल लोब को ट्रिगर करके सामूहिक मतिभ्रम (mass hallucinations) पैदा करती हैं!"
डॉ. सेन ने कबीर के सिर पर लगे उस न्यूरल-हेलमेट की तरफ़ इशारा किया:
"तुमने कोटला की उस बाओली के सातवें कुएँ के पत्थरों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डेटा को अपने दिमाग़ में सीधे मैप करने के लिए इस न्यूरो-इंटरफ़ेस को पहना था।
लेकिन जैसे ही तुमने 22 दिन पहले कोटला के उस कुएँ में क़दम रखा... वहाँ एक अनएक्सप्लेन्ड पावर सर्ज हुआ। तुम्हारा नर्वस सिस्टम क्रैश हो गया।
तुम्हारा दिमाग़ उस डेटा के भँवर में फँस गया। तुमने जो कुछ देखा—वह 1954 की दिल्ली, वह छह उंगलियों वाला जिन्न, वह दीवान हरदयाल, वह आज़ाद हिंद फ़ौज की तलवार... वह सब तुम्हारे सब-कॉन्शियस का बुना हुआ एक क्लासिक न्यूरो-ट्रॉमा इल्यूज़न था! तुम्हारी यादों और इतिहास की किताबों का एक भयानक घालमेल!"
कबीर का पूरा वजूद सुन्न पड़ गया।
क्या सब कुछ सचमुच एक वैज्ञानिक प्रयोग था?
क्या वह 1954 का क्रांतिकारी नहीं था? क्या कोई जिन्न नहीं था? क्या उसके परदादा की वह सत्तर साल पुरानी वसीयत महज़ एक न्यूरोलॉजिकल डिमेंशिया का सपना थी?
3. शीशे का सच और छाती पर खुदा तावीज़
"हम तुम्हें इस वेंटिलेटर से बाहर निकाल रहे हैं, कबीर," डॉ. राधिका ने प्यार से कहा। उसकी आँखों में एक डॉक्टर की सच्ची हमदर्दी थी। "सिमुलेशन ख़त्म हो चुका है। अब तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
डॉ. सेन ने अपने हाथ में एक सर्जिकल कैंची ली ताकि कबीर की छाती पर चिपके ईसीजी इलेक्ट्रोड्स को काटा जा सके।
उन्होंने कबीर का हरा हॉस्पिटल-गाउन ऊपर खींचा।
लेकिन जिस पल गाउन ऊपर उठा... डॉ. सेन के हाथ से वह कैंची छूटकर फ़र्श पर गिर पड़ी।
छनन्न्र!
डॉ. राधिका के मुँह से एक दबी हुई, भयानक चीख़ निकली। वह अपने दोनों हाथों से अपना मुँह ढँककर तीन कदम पीछे हट गई।
कबीर ने अपनी गर्दन को पूरी ताक़त से थोड़ा-सा ऊपर उठाया और अपनी नंगी छाती की तरफ़ देखा।
उसकी छाती पर ईसीजी के पैड्स तो लगे थे... लेकिन उसकी पसलियों के बिल्कुल बीचों-बीच, दिल के ठीक ऊपर...
माँस को काटकर, चमड़ी को जलाकर, एक त्रिकोणीय, काले लोहे का तावीज़ सीधे उसकी हड्डियों के भीतर सीया गया था!
वह तावीज़ किसी आधुनिक सर्जरी का हिस्सा नहीं था। वह तावीज़ उसी प्राचीन, खुरदुरी धातु का था, जिसे चमड़े के एक सड़े हुए, सूखे धागे से कबीर की त्वचा में टांके लगाकर पिरोया गया था! तावीज़ के कोनों से अब भी ताज़ा, काला, चिपचिपा ख़ून रिस रहा था, जिसकी गंध उसी सड़े हुए चमेली के तेल और बाओली के मलबे जैसी थी!
कबीर के दिमाग़ में एक भयानक विस्फोट हुआ।
अगर यह सब कुछ केवल एम्स की लैब का एक न्यूरोलॉजिकल सिमुलेशन था... तो यह सदियों पुराना, तांत्रिक तावीज़ उसकी जीती-जागती, हाड़-मांस की छाती के भीतर किसने सीया था?
"डॉक्टर सेन..." कबीर के दिमाग़ के भीतर वह आवाज़ एक बार फिर गूँजी।
वही आवाज़, जो पिछले भाग के अंत में उसके कान में फुसफुसाई थी!
कबीर ने अपनी नज़रें घुमाईं।
आईसीयू वार्ड की दीवार पर एक बड़ा, शीशे का पार्टीशन था जो डॉक्टर के केबिन और इस आइसोलेशन रूम को अलग करता था। उस शीशे पर ट्यूबलाइटों की रोशनी का अक्स पड़ रहा था।
कबीर ने उस शीशे में देखा।
और जो उसने देखा, उसने उसकी आत्मा को हमेशा के लिए बर्फ़ बना दिया।
शीशे के भीतर... डॉ. वी. के. सेन का कोई इंसानी अक्स नहीं था!
शीशे के परावर्तन में, डॉ. सेन की गर्दन छह फीट लंबी होकर छत से लटकी हुई थी! उसका चेहरा किसी सड़े हुए गिद्ध जैसा था, जिसकी दोनों आँखों की जगह नीली आग जल रही थी। और उसके दोनों हाथों में... पाँच नहीं, बल्कि छह-छह उंगलियाँ थीं, जिनसे वह कबीर के वेंटिलेटर की तारों को नियंत्रित कर रहा था!
और डॉ. राधिका?
शीशे में राधिका के सुंदर चेहरे की जगह एक बिना आँख वाली, सफ़ेद कफ़न ओढ़े चुड़ैल खड़ी थी, जिसके मुँह से लार की जगह काले कीड़े फर्श पर टपक रहे थे!
यह कोई अस्पताल नहीं था!
यह कोई एम्स की लैब नहीं थी!
यह विज्ञान के लिबास में छिपा हुआ कोटला का वही प्राचीन, खूनी पाताल था!
जिन्न ने जब देखा कि कबीर ने 1954 के भ्रम को पहचान लिया है, तो उसने कबीर के 2026 के आधुनिक, वैज्ञानिक ज़ेहन को फँसाने के लिए यह नया, तकनीकी भ्रम बुना था! वे चाहते थे कि कबीर ख़ुद यह मान ले कि वह एक बीमार, लाचार मरीज़ है, ताकि वे वेंटिलेटर बंद करने के बहाने उसकी असली, अंतिम साँस को खींच सकें!
4. वास्तविकता का क्षरण और खूनी ड्रिप
जैसे ही कबीर के ज़ेहन ने इस छलावे को पकड़ा, उस चमचमाते, सफ़ेद अस्पताल का पर्दा फटने लगा।
चर्र्र्र... तड़ाक!
दीवारों पर लगे सफ़ेद टाइल्स अचानक चटकने लगे। टाइल्स के पीछे से सीमेंट नहीं, बल्कि 1354 ईस्वी के वही काले, सीलन भरे तुग़लक कालीन पत्थर बाहर झाँकने लगे।
फ़्लोरोसेंट ट्यूबलाइटें भड़भड़ाकर बुझने लगीं, और उनकी जगह दीवारों पर लोहे की मशालें जल उठीं।
जो सेलाइन ड्रिप कबीर के हाथ में चढ़ रही थी, उसका पारदर्शी पानी अचानक गाढ़े, लाल ख़ून और सरसों के तेल में बदल गया। ड्रिप की प्लास्टिक की बोतल पर 'AIIMS Pharmacy' का लेबल जलकर राख हो गया, और वहाँ एक मिट्टी की हाँडी लटकती दिखने लगी जिसमें इंसानी उंगलियाँ तैर रही थीं!
हार्ट-रेट मॉनिटर की बीप की आवाज़ बदल गई।
अब वह कोई इलेक्ट्रॉनिक आवाज़ नहीं थी; वह हज़ारों लोगों की रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ थी—वही अर्जियाँ जो आज भी कोटला की दीवारों में जल रही थीं!
"पहचान लिया तुमने, कबीर?"
डॉ. सेन का रूप धरे उस शैतान के चेहरे की चमड़ी फटने लगी। उसकी आवाज़ में वही छह उंगलियों वाले मुंसिफ़ जिन्न की दहाड़ लौट आई।
"कितना अफ़सोस है! अगर तुम उस दवा को अपने फेफड़ों में उतरने देते, तो तुम्हारी रूह बिना किसी दर्द के हमारी इस सल्तनत में हमेशा के लिए विलीन हो जाती! लेकिन तुमने जागने की ज़िद की... अब तुम्हें उसी दर्द से गुज़रना होगा जो इस ज़मीन की हर बलि ने झेला है!"
जिन्न ने अपने छह उंगलियों वाले पंजे को आगे बढ़ाया। उसके नाख़ून कबीर की छाती में घुसे उस लोहे के तावीज़ को खींचने के लिए बढ़े।
5. वेंटिलेटर से आज़ादी और कुरुक्षेत्र का तांडव
मौत जब इंसान के हलक़ तक पहुँच जाती है, तो इंसान के भीतर का जानवर जाग उठता है।
कबीर ने अब किसी दया, किसी तर्क या किसी विज्ञान की उम्मीद छोड़ दी थी। उसे समझ आ गया था कि यह लड़ाई सिर्फ़ उसकी जान की नहीं, उसकी आत्मा की स्वतंत्रता की थी।
उसने अपने दाएँ हाथ की कलाई को पूरी ताक़त से खींचा।
चमड़े का वह पट्टा उसकी त्वचा को काटता हुआ हड्डी में धँस गया। कबीर ने दाँत भींच लिए। उसने दर्द की परवाह किए बिना एक भयानक झटका दिया।
कड़क!
लोहे के बिस्तर का वह एंगल टूट गया। कबीर का दायाँ हाथ आज़ाद हो गया।
उसने बिना एक सेकंड गँवाए, अपने उसी हाथ से अपने गले में घुसी उस एंडोट्रैचियल प्लास्टिक की नली को पकड़ लिया।
और उसने उसे बाहर खींच लिया!
सर्र्र्रक!
एक ऐसा भयानक, दमघोंटू दर्द हुआ जैसे किसी ने उसकी साँस की नली को अंदर से बाहर खींच लिया हो। कबीर के मुँह और नाक से ख़ून और बलग़म का एक बड़ा फव्वारा छूटा। उसने ख़ून की उल्टी की, लेकिन उसके फेफड़ों में पहली बार इस पाताल की वास्तविक, ठंडी हवा ने सीधे प्रवेश किया।
उसने अपनी आज़ाद उंगलियों से अपने बाएँ हाथ और दोनों पैरों के पट्टे फाड़ डाले।
कबीर बिस्तर से नीचे कूदा।
वह लड़खड़ाया, उसके नंगे पैर फर्श पर पड़े उस गाढ़े ख़ून में फिसले, मगर वह गिरा नहीं। उसने अपने सिर पर बंधे उस तथाकथित न्यूरल-हेलमेट को नोचकर फेंक दिया। हेलमेट ज़मीन पर गिरते ही लोहे की नुकीली कीलों से भरे एक तांत्रिक पिंजरे में बदल गया।
"तुम मुझे नहीं बाँध सकते!" कबीर दहाड़ा। उसकी आवाज़ में अब किसी कमज़ोर मरीज़ की लाचारी नहीं थी।
उसने ज़मीन पर गिरी वही भारी, लोहे की सेलाइन स्टैंड उठाई।
सामने वह नकली डॉ. राधिका—जो अब एक भयानक चुड़ैल बन चुकी थी—अपनी खूनी बाहें फैलाए उसकी तरफ़ झपटी। कबीर ने अपनी पूरी ताक़त से वह लोहे का स्टैंड उस चुड़ैल की गर्दन पर दे मारा!
धड़ाम!
लोहा छूते ही चुड़ैल का सिर धड़ से अलग होकर ज़मीन पर गिरा और काले धुएँ के गुबार में बदल गया।
जिन्न दहाड़ा: "इसे रोको! यह दरवाज़े की तरफ़ बढ़ रहा है!"
वार्ड के चारों तरफ़ से दर्जनों साए—जो अब तक वॉर्ड बॉय, नर्स और मरीज़ों के रूप में छिपे थे—अपनी असली, कंकाल जैसी भयानक शक्लों में बाहर निकल आए। उनके हाथों में सिरिंज नहीं, बल्कि मुर्दों की हड्डियाँ और लोहे के खंजर थे।
कबीर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उसने आईसीयू के उस विशाल, लाल रंग के 'EMERGENCY EXIT' दरवाज़े पर अपने कंधे से टक्कर मारी!
6. एम्स के तहख़ाने और सीरी के खूनी खंडहर
धड़ाम!
दरवाज़ा टूटा और कबीर बाहर निकला।
लेकिन बाहर कोई अस्पताल का गलियारा नहीं था।
वह दिल्ली के उस प्राचीन, भूमिगत नेटवर्क में था जो इतिहास की किताबों से मिटा दिया गया था।
एम्स और सफ़दरजंग का यह पूरा इलाक़ा चौदहवीं सदी के सीरी फ़ोर्ट और हौज़ ख़ास के पुराने मक़बरों की ज़मीन पर बना हुआ था। इस आधुनिक इमारत के बीस फीट नीचे, सल्तनत-कालीन दिल्ली की वही पुरानी सुरंगे थीं जो कोटला, तुग़लक़ाबाद और निज़ामुद्दीन को आपस में जोड़ती थीं!
गलियारे की कंक्रीट की दीवारों में जगह-जगह पुरानी लखौरी ईंटें और इंसानी खोपड़ियाँ चिनवाई गई थीं।
बिजली के मोटे-मोटे केबल्स प्राचीन ज़ंजीरों के साथ लिपटे हुए थे। आधुनिक सर्वर-रैक्स के बीच में मिट्टी के दीये जल रहे थे, और कंप्यूटर की स्क्रीन पर डेटा नहीं, बल्कि अरबी में लिखे हुए प्राचीन तिलिस्मी नक्श स्क्रॉल हो रहे थे!
यहाँ विज्ञान और जादू एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नाच रहे थे!
कबीर हाँफता हुआ उस अंधेरी सुरंग में भागा।
उसकी छाती में गड़ा वह लोहे का तावीज़ अब आग की तरह तप रहा था। हर कदम के साथ उसे लग रहा था मानो वह तावीज़ उसके दिल की धड़कनों के साथ ताल मिला रहा हो।
तभी, सामने से एक टॉर्च की सफ़ेद रोशनी चमकी।
"कौन है वहाँ? रुक जाओ!"
एक कांपती हुई, इंसानी आवाज़ आई।
कबीर रुक गया। उसने अपने हाथ में पकड़े लोहे के स्टैंड को रक्षात्मक मुद्रा में उठा लिया।
रोशनी के पीछे एक लड़की खड़ी थी।
उसने नीले रंग की नर्स की वर्दी पहन रखी थी, गले में स्टेथोस्कोप था, और उसके चेहरे पर शुद्ध, इंसानी दहशत थी। उसके हाथ में एक भारी मेडिकल टॉर्च थी जो थर-थर कांप रही थी। उसके बैज पर लिखा था: 'मीरा शर्मा — स्टाफ़ नर्स'।
"तुम... तुम कबीर हो?" मीरा ने कांपती आवाज़ में पूछा। उसकी आँखों में कोई जिन्न या साया नहीं था; वह एक जीती-जागती, डरी हुई बीस-बाईस साल की लड़की थी।
कबीर ने अपनी साँसों को संभालते हुए कहा: "हाँ... तुम कौन हो? क्या तुम भी उन सायों की बनाई हुई कोई कठपुतली हो?"
"नहीं!" मीरा रो पड़ी।
वह दौड़कर कबीर के पास आई और उसने कबीर का हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ गर्म था, उसकी कलाई में इंसानी नब्ज़ साफ़ धड़क रही थी।
"मैं पिछले तीन रातों से इस बेसमेंट में फँसी हुई हूँ, कबीर!" मीरा ने घबराकर पीछे देखते हुए फुसफुसाया।
"यहाँ कुछ बहुत भयानक हो रहा है! डॉ. सेन और उनकी टीम... वे सब तीन दिन पहले उस खंडहर में गए थे। जब वे वापस आए, तो वे इंसान नहीं थे! उन्होंने अस्पताल के इस विंग को सील कर दिया। वे तुम्हारे शरीर पर कुछ ऐसा कर रहे थे जिसे देखकर मेरी रूह कांप गई! वे मशीनों के ज़रिये उस क़िले की रूहानी ताक़त को तुम्हारे जिस्म में डाउनलोड कर रहे थे!"
कबीर का दिमाग़ सन्नाटे में आ गया।
"डाउनलोड?"
"हाँ!" मीरा ने एक चाबी का गुच्छा दिखाते हुए कहा। "सामने इमरजेंसी लिफ्ट है जो सीधे सफ़दरजंग रोड के पिछले गेट पर खुलती है। चलो मेरे साथ... अगर हम अभी बाहर नहीं निकले, तो वे पूरे अस्पताल को एक क़ब्रिस्तान बना देंगे!"
7. वह रूह-कँपा देने वाला महा-मोड़: आईने का नया सुल्तान (The Twist)
कबीर और मीरा उस संकरी सुरंग से होते हुए लिफ्ट के लोहे के गेट तक पहुँचे।
मीरा ने अपने कांपते हाथों से ताला खोला।
वे दोनों लिफ्ट के भीतर घुसे। लिफ्ट का बटन दबा। लिफ्ट घिसटती हुई, चीखती हुई ऊपर की मंज़िल की तरफ़ बढ़ने लगी।
डिंग!
लिफ्ट का दरवाज़ा खुला।
सामने रात की ठंडी, ताज़ा दिल्ली की हवा का झोंका आया।
वे एम्स के ट्रॉमा सेंटर के पीछे वाले आपातकालीन निकास से बाहर, रिंग रोड के किनारे एक वीरान पार्किंग लॉट में खड़े थे!
सामने सफ़दरजंग का फ़्लाईओवर दिख रहा था।
सड़क पर पीली डीटीसी बसें दौड़ रही थीं। ऑटो-रिक्शा वाले हॉर्न बजा रहे थे। हवा में दिल्ली की वही जानी-पहचानी ठंड और गाड़ियों का धुआँ था। दूर एम्स मेट्रो स्टेशन का लाल लोगो चमक रहा था।
कबीर घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। उसने सड़क की उस मैली, ठंडी डामर को अपने हाथों से छुआ।
यह कोई भ्रम नहीं था।
यह सचमुच 2026 की रात थी! वह बाहर आ चुका था! वह ज़िंदा था!
"हम बच गए, कबीर..." मीरा ने हांफते हुए अपनी दीवार से पीठ टिका दी। "हम बाहर आ गए..."
कबीर ने राहत की एक गहरी साँस ली। उसने अपनी छाती पर हाथ रखा। वह तावीज़ अब ठंडा पड़ चुका था।
तभी—
पार्किंग लॉट में खड़ी एक एम्बुलेंस की तेज़, हाई-बीम हेडलाइट्स अचानक अपने आप जल उठीं!
सफ़ेद रोशनी का एक प्रचंड दायरा सीधा कबीर के ऊपर आ पड़ा।
कबीर की नज़र सामने वाली सफ़ेद कंक्रीट की दीवार पर पड़ी, जहाँ एम्बुलेंस की रोशनी की वजह से उसकी अपनी परछाईं पड़ रही थी।
लेकिन उस परछाईं को देखते ही... मीरा के गले से ऐसी चीख़ निकली जो पूरी सड़क पर गूँज गई।
वह दहशत के मारे पीछे हटती हुई ज़मीन पर गिर पड़ी। "कबीर... तुम्हारी... तुम्हारी परछाईं..."
कबीर ने धीरे-धीरे, कांपते हुए उस दीवार की तरफ़ देखा।
दीवार पर जो परछाईं पड़ रही थी... वह किसी सामान्य, दुबले-पतले इंसान की परछाईं नहीं थी!
दीवार पर जो साया खड़ा था, उसके सिर पर दो विशाल, मुड़े हुए सींग थे। उसके कन्धों से बारह काले, लपलपाते हुए हाथ निकल रहे थे, और उसके सिर पर एक जलता हुआ, सल्तनत-कालीन मुकुट था!
और सबसे भयानक बात—
कबीर की छाती पर गड़े उस लोहे के तावीज़ के चारों तरफ़, उसकी अपनी त्वचा पर, नीली आग की लकीरों से अरबी में एक शाही फ़रमान अपने आप उभर आया था:
"मुबारक हो, ऐ अहले-ज़मीन...
जिन्न बाहर नहीं आया...
कोटला का असली सुल्तान... तुम्हारे अपने जिस्म को तख़्त बनाकर इस शहर में क़दम रख चुका है!"
कबीर ने कांपते हाथों से अपने चेहरे को छुआ।
उसकी उंगलियों के पोरों से अब ख़ून नहीं... नीली, धधकती हुई आग बह रही थी!
वह शिकार नहीं था। वह शिकारी बन चुका था। जिन्न उसके सामने नहीं... उसके अपने ख़ून की हर बूँद में समा चुका था!