PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 8: ख़्वाबों का शीशमहल, आज़ाद हिंद की तलवार और सुलेमानी संदूक़

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 14 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
8 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2608
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. वजूद की राख और यादों का कुरुक्षेत्र
इंसान की देह पर जब तलवार का घाव लगता है, तो माँस कटता है और ख़ून बहता है; मगर जब इंसान की पहचान पर चोट पड़ती है, तो उसकी पूरी चेतना एक ख़ाली, अथाह कुएँ में गिर जाती है।

कबीर उस ठंडे, संगमरमर के फर्श पर घुटनों के बल बैठा था। उसके हाथ में दरोगा रामनाथ शर्मा का वह पुराना, ख़ून से भीगा हुआ फ़ोटो था।

उस तस्वीर पर 1954 की मुहर साफ़ चमक रही थी: ‘कॉमरेड कबीर मेहरा — क्रांतिकारी, आज़ाद हिंद फ़ौज!’

कबीर की उंगलियाँ कांप रही थीं। उसने अपने दूसरे हाथ से अपनी जैकेट को टटोला। वह नायलॉन का आधुनिक कपड़ा... उसकी जेब में रखा वह सैमसंग का स्मार्टफ़ोन, जिसकी स्क्रीन पर उसकी माँ की तस्वीर और दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड अब भी मौजूद था।

"यह झूठ है..." कबीर की आवाज़ किसी सूखे पत्ते की तरह चरमराई। "यह नहीं हो सकता! अगर मैं 1954 का सिपाही हूँ, तो मेरे पास यह फ़ोन कैसे है? मुझे मेट्रो की वे नीली सीटें, कनाट प्लेस के कैफ़े, 2024 के लोकसभा चुनाव, मेरी यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी... वे सत्तर साल की तारीख़ें, वे किताबें, वे चेहरे... क्या एक जिन्न सत्तर साल की पूरी सदी का इतिहास मेरे दिमाग़ में गढ़ सकता है?"

तहख़ाने की सीढ़ियों पर खड़ा वह विशाल, दस फीट ऊँचा मारिद जिन्न—मीर-ए-आतिश—ज़ोर से हँसा।

उसकी हँसी ऐसी थी जैसे किसी प्राचीन क़ब्रिस्तान में सैकड़ों खोपड़ियाँ एक साथ चटक रही हों। उसकी पीठ से दरोगा की चांदी की गोलियों से निकला नीला लहू अब भी रिस रहा था, जो पत्थरों पर गिरते ही फुसफुसाती हुई आग में बदल रहा था।

"तू इंसान की छोटी-सी खोपड़ी का क़ैदी है, कबीर!" जिन्न ने अपने बचे हुए छह उंगलियों वाले पंजे को हवा में लहराया।

हवा में सैकड़ों तस्वीरें, हज़ारों दृश्य धुएँ की तरह तैरने लगे:
"जिन्नात के लिए वक़्त कोई सीधी लकीर नहीं है जिसमें तुम इंसान एक-एक दिन करके मरते हो! हमारे लिए वक़्त पानी का एक समंदर है, जहाँ कल, आज और आने वाला कल एक ही भँवर में घूमते हैं। जब 1944 में सिंगापुर के जंगलों में आज़ाद हिंद फ़ौज के टूटने के बाद तू कोटला के खंडहरों में भटकता हुआ आया था, तब मैंने तेरे दिमाग़ की नस को छुआ था। मैंने तुझे वह सब दिखाया जो इस मुल्क के साथ अगले सत्तर बरसों में होने वाला था! मैंने तुझे एक ऐसा मुकम्मल ख़्वाब दिया जिसमें तूने ख़ुद को भविष्य का एक कमज़ोर, क़लम घिसने वाला इतिहासकार मान लिया... ताकि तेरी वह फौजी हिम्मत, वह आज़ादी की आग तेरे भीतर ही सो जाए!"

जिन्न एक कदम आगे बढ़ा। उसके चेहरे की आग इतनी तेज़ थी कि कबीर के नायलॉन की जैकेट का कॉलर पिघलकर उसकी गर्दन की चमड़ी से चिपकने लगा।

"और अब, जब तू इस मुक़द्दस तहख़ाने में पहुँच चुका है, तो तेरा वह सत्तर साल का ख़्वाब पूरा हो गया। चाबी तेरे हाथ में है, कबीर! इस संदूक़ को खोल... क्योंकि जिस दिन यह संदूक़ खुला, उस दिन न 1954 बचेगा और न 2026... सिर्फ़ मेरी आग का राज होगा!"

2. सुलेमानी संदूक़ और चांदी की ज़ंजीरें
कबीर का दिमाग़ दो अलग-अलग ज़मानों के बीच पिस रहा था।

एक तरफ़ उसकी पच्चीस साल की आधुनिक ज़िंदगी थी—उसकी पढ़ाई, उसके दोस्त, उसके तर्कवादी विचार। दूसरी तरफ़, उसके भीतर कोई पुरानी, दबी हुई मर्दानगी, कोई पुराना फौजी अनुशासन अंगड़ाई ले रहा था। उसके हाथों की पकड़ उस पीतल की पुरानी चाबी पर मज़बूत हो गई।

वह चबूतरे की तरफ़ मुड़ा।

सामने वह काले, भारी उल्कापिंडीय पत्थर (meteoritic stone) का बना संदूक़ रखा था।

उस संदूक़ के चारों तरफ़ चांदी की सात मोटी ज़ंजीरें कसी हुई थीं। हर ज़ंजीर के जोड़ पर हज़रत सुलेमान की वह छह-कोने वाली मोहर (Hexagram Seal) खुदी थी, जिसके चारों तरफ़ प्राचीन इब्रानी (Hebrew) और सुमेरियन भाषा के मंत्र जड़े हुए थे।

कबीर ने उस चाबी को देखा।

चाबी के सिरे पर वही दो तलवारों और तराज़ू का निशान था जो उसकी पुस्तैनी अंगूठी पर था।

"खोलो इसे, कबीर..." उसके पीछे खड़े 1857 के शहीदों के साए हवा में तैरते हुए फुसफुसाए।

पीरज़ादा इब्राहिम की लाश से उठती हुई रूहानी रोशनी ने कबीर के कन्धों को छुआ। पीरज़ादा की आत्मा कबीर के कान में बोली:
"वक़्त कोई भी हो, बेटा... तुम्हारा जिस्म चाहे जिस सदी का हो, तुम्हारी नीयत इस वक़्त की मालिक है। इस संदूक़ के भीतर वह नहीं है जो यह जिन्न सोच रहा है। इस संदूक़ में वह ताक़त है जिसे इस ज़मीन के वफ़ादारों ने कयामत के दिन के लिए छुपा कर रखा था!"

कबीर ने अपने दाँत भींच लिए।

उसने अपनी कटी हुई उंगलियों से बहते हुए ताज़े ख़ून को उस संदूक़ के मुख्य ताले के सुराख़ पर मल दिया।

जैसे ही उसका ख़ून उस प्राचीन धातु से छुआ, संदूक़ की चांदी की ज़ंजीरें बर्फ़ की तरह चटकने लगीं। ताले के भीतर से किसी विशाल घड़ी के गियर घूमने जैसी आवाज़ आई—खट... खट... चटक!

कबीर ने पीतल की वह चाबी ताले में डाली और उसे दाहिनी तरफ़ पूरा 360 डिग्री घुमा दिया।

धड़ाम!

एक ऐसा धमाका हुआ जैसे जामा मस्जिद के तीनों गुंबद एक साथ ज़मीन पर आ गिरे हों।

3. नेताजी का फ़रमान और दमिश्क की तलवार
संदूक़ का भारी, पत्थरीला ढक्कन अपने आप पीछे खिसक गया।

कमरे के भीतर एक ऐसी अंधी कर देने वाली, दूधिया सफ़ेद रोशनी फैली जिसने तहख़ाने की मशालों और जिन्न की नीली आग को एक पल के लिए पूरी तरह बुझा दिया।

मीर-ए-आतिश एक लालची, वहशी चीख़ के साथ आगे झपटा: "मेरी अंगूठी! मेरी सल्तनत!"

लेकिन जैसे ही उस जिन्न ने अपना छह उंगलियों वाला हाथ उस संदूक़ के भीतर डाला, एक भयानक बिजली कौंधी!

कड़कड़ाती बिजली!

संदूक़ से निकली पवित्र ऊर्जा ने जिन्न के पंजे को छूते ही जलाकर कोयला कर दिया। जिन्न दर्द से दहाड़ता हुआ पीछे फिंक गया। उसकी दो उंगलियाँ जलकर ज़मीन पर राख की तरह बिखर गईं।

"यह क्या है?" जिन्न चीख़ा। "सुलेमान की अंगूठी कहाँ है?"

कबीर ने संदूक़ के भीतर देखा।

वहाँ कोई अंगूठी नहीं थी। कोई तांत्रिक मुकुट नहीं था।

उस संदूक़ के भीतर, लाल मखमल के एक पुराने, सड़े हुए अस्तर पर एक चार फीट लंबी, दमिश्की फ़ौलाद (Damascus Steel) की मुड़ी हुई तलवार रखी हुई थी!

उस तलवार की धार इतनी तेज़ थी कि उस पर पड़ रही सफ़ेद रोशनी भी दो टुकड़ों में बंटती हुई महसूस हो रही थी। तलवार की मूठ पर शुद्ध सोने से 'आयत-उल-कुर्सी' और ऋग्वेद का 'अग्नि सूक्त' एक साथ खुदा हुआ था।

और उस तलवार के चारों तरफ़ लिपटा हुआ था—आज़ाद हिंद फ़ौज का तिरंगा पट्टा, जिस पर 1944 के नेताजी सुभाष चंद्र बोस के दस्तख़त थे!

तलवार के बगल में एक पीला पड़ चुका, सीलबंद लिफ़ाफ़ा रखा था। उस पर कबीर की अपनी लिखावट में, पेंसिल से लिखा था:

"बनाम: कबीर मेहरा (कैप्टन, आज़ाद हिंद फ़ौज)

स्थान: लाल क़िला, दिल्ली (कैदी बैरक नंबर 7)

तारीख़: 15 अगस्त 1945

कबीर, अगर तू यह पढ़ रहा है, तो समझ ले कि 'ग़ैबत' (दीर्घकालिक रूहानी निद्रा) का तिलिस्म टूट चुका है। जब अंग्रेज़ों ने लाल क़िले में हमारे ख़िलाफ़ मुक़द्दमा शुरू किया था, तब हमें पता चला था कि ब्रिटिश हुकूमत इस मुल्क को छोड़ते वक़्त कोटला के जिन्नात से एक ऐसा ख़ूनी मुआहिदा कर रही है जिससे यह मुल्क हमेशा के लिए नफ़रत और ख़ून-ख़राबे की आग में जलता रहे।

उस मुआहिदे को तोड़ने के लिए, निज़ामुद्दीन के दरगाह के पीर और आज़ाद हिंद के सिपाहियों ने मिलकर यह तलवार यहाँ दफ़्न की थी। और तूने... अपनी मर्ज़ी से अपनी चेतना को इस काल-कोठरी में सुला दिया था ताकि जब यह मारिद बाहर निकले, तो तू अपनी उसी तलवार से इसकी गर्दन काट सके!"

4. यादों का तूफ़ान: 1945 का लाल क़िला
कबीर का हाथ जैसे ही उस तलवार की मूठ से छुआ, उसके दिमाग़ के भीतर बंद सारे दरवाज़े एक झटके में टूटकर खुल गए!

वह कोई भ्रम नहीं था। वह कोई सामान्य भूलभुलैया नहीं थी।

कबीर की आँखों के सामने उसकी असली ज़िंदगी किसी बिजली की चमक की तरह कौंध गई:

उसने देखा: 1943 का सिंगापुर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मंच पर खड़े होकर कह रहे थे—"तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा!"

उसने देखा: वह ख़ुद, खाकी फौजी वर्दी पहने, सीने पर तिरंगा बैज लगाए, बर्मा के जंगलों में अंग्रेज़ों की तोपों के आगे अपनी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था।

उसने देखा: 1945 की सर्दियाँ। दिल्ली का लाल क़िला। कर्नल प्रेम सहगल, मेजर शाहनवाज़ ख़ान और कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों के साथ वह भी उस ऐतिहासिक मुक़द्दमे का एक गुप्त सिपाही था।

लेकिन अंग्रेज़ सिर्फ़ क़ानूनी मुक़द्दमा नहीं लड़ रहे थे; अंग्रेज़ों के गुप्तचर विभाग ने फ़िरोज़ शाह कोटला के उस छह उंगलियों वाले जिन्न से संपर्क किया था ताकि आज़ाद हिंद के सिपाहियों की रूहों को तोड़कर इस मुल्क को बाँटा जा सके।

तब कबीर ने अपने पीर और अपने साथियों के साथ मिलकर यह योजना बनाई थी। उसने अपने शरीर को एक 'ज़िंदा तावीज़' बना लिया था, और अपनी रूह को एक ऐसे रूहानी भ्रम में सुला दिया था जो सत्तर साल बाद की तारीख़ (2026) पर जाकर खुलना था!

कबीर ने तलवार को संदूक़ से बाहर खींच लिया।

झनन्नन्र!

तलवार के हवा में लहराते ही पूरी जामा मस्जिद के नीचे का तहख़ाना एक पवित्र, दिव्य रोशनी से जगमगा उठा। कबीर की आँखों में अब एक इतिहासकार का संकोच या डर नहीं था; उसकी आँखों में आज़ाद हिंद फ़ौज के एक जाँबाज़ कैप्टन की वह आग थी जो मौत को भी सलाम ठोकने पर मजबूर कर दे!

"मीर-ए-आतिश!" कबीर की आवाज़ किसी तोप के गोले की तरह तहख़ाने की पत्थरीली दीवारों से टकराई। "सत्तर साल का इंतज़ार ख़त्म हुआ! आज न तेरी आग बचेगी, और न तेरा यह पाताल!"

5. तहख़ाने में महासंग्राम
जिन्न ने जब कबीर के हाथ में वह तलवार देखी, तो उसकी आँखों में पहली बार असली, आदिम मौत का ख़ौफ़ दिखाई दिया।

वह तलवार साधारण लोहे की नहीं थी; वह उस दमिश्की फ़ौलाद की थी जिसे पीरों के दम और शहीदों के ख़ून से बुझाया गया था। वह आग के जिन्नात की रूहानी डोर को हमेशा के लिए काटने वाला एकमात्र हथियार था।

"तू मुझे नहीं मार सकता, कीड़े!" जिन्न अपनी बची हुई ताक़त समेटकर दहाड़ा।

उसने तहख़ाने की ज़मीन पर अपने दोनों पैरों को पटका। ज़मीन फटी और पत्थरों के जोड़ों से काले, जहरीले धुएँ के सैकड़ों हाथ बाहर निकले। वे हाथ 1857 के उन शहीदों की रूहों को नोचने लगे। जिन्न ने हवा में तैरते हुए अपनी छह उंगलियों वाले जले हुए पंजे से कबीर के सिर पर वार किया।

कबीर एक फौजी की फुर्ती से नीचे झुका।

उसने अपने शरीर को बाईं तरफ़ मोड़ा और तलवार को नीचे से ऊपर की ओर एक ख़तरनाक चाप (arc) में घुमा दिया।

खचाक!

तलवार की धार जिन्न की दाईं जांघ को चीरती हुई निकल गई।

जिन्न के जिस्म से ख़ून नहीं, बल्कि खौलता हुआ नीला लावा और आग का बवंडर छूटा। जिन्न दर्द से इस तरह चीख़ा कि जामा मस्जिद के ऊपर के फर्श पर बिछी संगमरमर की कई सिल्लियाँ चटक गईं।

"आहहह! आग... यह आग मुझे ही जला रही है!" जिन्न दीवारों से टकराने लगा।

कबीर रुका नहीं। वह एक पेशेवर लड़ाके की तरह आगे बढ़ा।

उसने तलवार के हैंडल को दोनों हाथों से थाम लिया। उसके कटे हुए हाथों के खुरंडों से बहता हुआ ख़ून उस तलवार की मूठ पर खुदे हुए आयत-उल-कुर्सी के अक्षरों में समा गया। तलवार की नोक से नीली और सुनहरी बिजलियाँ कड़कने लगीं।

"यह वार नेताजी के उन हज़ारों सिपाहियों के नाम, जिनकी रूहों को तुमने इस ज़मीन के नीचे तड़पाया!"

कबीर ने पहला वार किया। जिन्न का बायाँ हाथ कटकर ज़मीन पर गिरा और राख बन गया।

"यह वार ज़ोहरा और अफ़साना के नाम, जिनकी बेबसी का तुमने सत्तर साल तक मज़ाक उड़ाया!"

कबीर ने दूसरा वार किया। जिन्न की छाती पर एक गहरा, जलता हुआ क्रॉस का निशान बन गया।

और फिर, कबीर ने हवा में छलांग लगाई।

उसने अपनी पूरी ज़िंदगी का दर्द, अपनी पूरी साधना और अपने मुल्क की मिट्टी की सारी ताक़त उस तलवार की नोक पर केंद्रित कर दी।

"और यह वार इस दिल्ली की मिट्टी के नाम... जिस पर सिर्फ़ इंसानों का हक़ है, किसी शैतान का नहीं!"

तड़ाक! भभक!

कबीर ने तलवार को सीधा उस मारिद जिन्न के माथे के बीचों-बीच, उसकी तीसरी आँख की जगह पर घोंप दिया!

6. शैतान का अंत और वक़्त की चादर का फटना
एक ऐसा अंधा कर देने वाला धमाका हुआ जिसने पूरे तहख़ाने को हिलाकर रख दिया।

जिन्न की देह किसी फटते हुए ज्वालामुखी की तरह फट गई। नीली लपटें, काला धुआँ और ज़हरीली हवा उस तहख़ाने के मेहराबों से टकराकर बिखरने लगी। जिन्न की आत्मा उस तलवार की धार से बंधकर तिनके-तिनके होकर जलने लगी।

उसकी आख़िरी चीख़ हवा में गूँजी:
"कबीर... तूने मुझे मार दिया... लेकिन तूने जिस वक़्त के ताले को तोड़ा है... उसकी क़ीमत तू कभी नहीं चुका पाएगा... तू कभी नहीं जान पाएगा कि तू कौन है..."

और इसके साथ ही, मीर-ए-आतिश का वह विशाल, भयानक साया ज़मीन पर राख के एक काले ढेर में तब्दील हो गया।

तहख़ाना शांत हो गया।

मशालों की पीली रोशनी वापस लौट आई। 1857 के शहीदों के साए हवा में मुस्कुराए और धीरे-धीरे उस संगमरमर के संदूक़ के भीतर विलीन हो गए।

कबीर हांफता हुआ उस राख के ढेर के सामने घुटनों के बल गिर पड़ा।

उसके दोनों हाथ जल रहे थे, उसकी तलवार ज़मीन पर टिकी थी। उसने अपने सिर को ऊपर उठाया। सब कुछ ख़त्म हो चुका था। 1954 की दिल्ली बच चुकी थी। वह आज़ाद हिंद फ़ौज का सिपाही था, उसने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया था।

वह मुस्कुराया। उसने सीढ़ियों की तरफ़ देखा। अब वह बाहर जा सकता था—1954 की उस धूप में, अपने मुल्क की उस ताज़ा आज़ादी की हवा में साँस लेने के लिए।

वह लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ और सीढ़ियों की तरफ़ पहला क़दम बढ़ाया।

7. वह भयानक, होश उड़ा देने वाला मोड़: न्यूरो-सिमुलेशन का सच (The Twist)
लेकिन जैसे ही कबीर का बूट सीढ़ियों के पहले पत्थर पर पड़ा...

एक बहुत अजीब घटना घटी।

पत्थर के दबने की कोई आवाज़ नहीं आई।

बल्कि, उसके पैर के नीचे की ज़मीन अचानक हरी, डिजिटल रोशनी की पिक्सल (pixels) में बदलने लगी!

कबीर ठिठक गया। उसने अपने हाथों को देखा।

वे हाथ, जो अभी कुछ पल पहले दमिश्की फ़ौलाद की तलवार को थामे हुए थे... वे हाथ अचानक पारदर्शी होने लगे। उनकी त्वचा के नीचे माँस और नसें नहीं, बल्कि हरी और नीली बाइनरी कोड (010101) की लकीरें दौड़ती हुई दिखाई देने लगीं!

"यह... यह क्या है?" कबीर का गला सूख गया।

तलवार उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी, मगर ज़मीन पर गिरते ही वह तलवार किसी कंप्यूटर ग्राफ़िक्स की तरह हवा में ग़ायब हो गई!

तहख़ाने की लाल दीवारें, जामा मस्जिद के मेहराब, 1954 का वह कुहासा... सब कुछ किसी पुराने टेलीविज़न की स्क्रीन की तरह झिलमिलाने लगा।

और फिर, उस सन्नाटे को चीरती हुई एक ऐसी आवाज़ कबीर के कानों में गूँजी, जो न 1954 की थी और न किसी जिन्न की।

यह एक आधुनिक, मशीनी, इलेक्ट्रॉनिक बीप की आवाज़ थी:

टी... टी... टी... टीटीटीटी... (हार्ट रेट मॉनिटर की तेज़ बीप)

और उसके ठीक बाद, एक आधुनिक, वातानुकूलित कमरे में बोली जाने वाली एक घबराई हुई, अंग्रेज़ी मिश्रित महिला डॉक्टर की आवाज़ कबीर की खोपड़ी के भीतर गूँज उठी:

"डॉक्टर मेहता! कोड रेड! पेशेंट कबीर मेहरा का न्यूरो-सिग्नल क्रैश हो रहा है!"

एक दूसरे, वरिष्ठ डॉक्टर की भारी, हाँफती हुई आवाज़ आई:

"शट डाउन करो! तुरंत सिमुलेशन पॉड-4 को डिस्कनेक्ट करो! एम्स (AIIMS) के इस न्यूरो-टेक्नोलॉजी ट्रायल में फ़िरोज़ शाह कोटला का जो पैरानॉर्मल ब्रेन-डेटा हमने फ़ीड किया था, वह इसके सब-कॉन्शियस को निगल रहा है!

इसका ब्रेन-डेथ होने वाला है... यह लड़का पिछले बाईस दिनों से वेंटिलेटर पर है! इसे अभी बाहर खींचो, वर्ना यह उसी कोमा में हमेशा के लिए मर जाएगा!"

कबीर की आँखें दहशत से पूरी तरह फैल गईं।

उसने अपने चेहरे को दोनों हाथों से छुआ।

उसके चेहरे पर कोई त्वचा नहीं थी... उसके सिर पर दर्जनों इलेक्ट्रोड और तार (neural sensors) चिपके हुए महसूस हो रहे थे!

1954... आज़ाद हिंद फ़ौज... नेताजी की तलवार... कोटला का जिन्न...

क्या वह न 1954 का क्रांतिकारी था, और न 2026 का आज़ाद रिसर्चर? क्या वह दिल्ली के एम्स अस्पताल के किसी न्यूरो-साइंस रिसर्च वार्ड में कोमा में पड़ा हुआ एक ऐसा मरीज़ था जिसके दिमाग़ पर एक भयानक वैज्ञानिक प्रयोग चल रहा था?

या फिर... यह जिन्न का बुना हुआ तीसरा और सबसे ख़तरनाक जाल था?

तभी, उस मशीनी आवाज़ के बीच, एक बहुत धीमी, पुरानी, पहचानी हुई फुसफुसाहट कबीर के ठीक कान के पीछे गूँजी:

"सिम्युलेटर का बटन दबाने से पहले ज़रा अपनी नब्ज़ देख लो, कबीर... अगर तुम अस्पताल में हो, तो तुम्हारे सीने पर यह खूनी तावीज़ किसने बाँधा है?"

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