PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 7: जामा मस्जिद के तहख़ाने, लहू का कलमा और 1857 का क़ब्रिस्तान

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 18 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
7 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
18 min
Words
3559
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. कोठे का खूनी तांडव और अफ़साना का चिराग़
चावड़ी बाज़ार की उस पुरानी हवेली की लकड़ी की छत से चूने का सूखा पाउडर किसी सफ़ेद बर्फ़ की तरह झड़ रहा था।

चौखट पर खड़ी ज़ोहरा की वह सड़ी हुई, भयानक लाश अपनी गर्दन को अस्वाभाविक कोण पर मरोड़े खड़ी थी। उसके गले के उस गहरे, कटे हुए घाव से गाढ़ा, काला धुआँ उबल रहा था, और उस घाव के भीतर से जो आवाज़ गूँज रही थी, वह कबीर के परदादा दीवान हरदयाल की थी—एक ऐसी आवाज़ जो कब्र की मिट्टी में सत्तर साल तक सड़ने के बाद भी अपने ख़ून की प्यास नहीं बुझा पाई थी।

"कबीर... पास आ, मेरे बच्चे..." उस लाश के सड़े हुए जबड़े से लार और जमे हुए ख़ून के थक्के टपक रहे थे। उसकी सफ़ेद, अंधी आँखों के भीतर रेंगते हुए कीड़े कबीर को घूर रहे थे। "तूने सोचा कि तू अपनी उंगलियाँ काटकर उस पाताल से बच निकलेगा? तू जहाँ भी जाएगा, तेरा यह ख़ून मुझे पुकारेगा!"

उस लाश ने एक भयानक, चीखती हुई छलांग लगाई।

उसके काले, मुड़े हुए नाख़ून कबीर की आँखों को नोचने के लिए आगे बढ़े। कबीर ने दहशत में अपने दोनों हाथ आगे कर दिए। वह पीछे हटा, मगर उसका पैर फर्श पर पड़े इत्र के टूटे हुए शीशे पर पड़ा। वह बुरी तरह फिसलकर आबनूस के उस भारी संदूक़ से टकराया।

लाश कबीर के सीने पर आ गिरी।

उसका वज़न किसी सामान्य औरत का नहीं था; ऐसा लगा मानो कोई टन भर वजनी गीला पत्थर कबीर की पसलियों पर पटक दिया गया हो। हवा में सड़े हुए मांस, कफ़न के इत्र और बाओली के सड़े हुए पानी की ऐसी भयानक दुर्गंध उठी कि कबीर को लगा उसका दम घुट जाएगा। लाश के ठंडे, चिपचिपे हाथों ने कबीर की गर्दन को दबोच लिया।

कबीर की आँखें बाहर उबलने लगीं। उसकी साँसें हलक़ में अटक गईं। उसने अपने दोनों हाथों से उस लाश की कलाई को मरोड़ने की कोशिश की, मगर उसकी उंगलियाँ लोहे की छड़ों जैसी सख्त थीं।

"या अली मदद!"

अचानक दालान के अंधेरे से एक तीखी, कांपती हुई चीख़ गूँजी।

अफ़साना बेगम—ज़ोहरा की बूढ़ी ख़ाला—ने ज़मीन पर रखी पीतल की जलती हुई बड़ी लालटेन उठाई और अपनी पूरी ताक़त से उस लाश के सिर पर दे मारी!

तड़ाक! भभक!

लालटेन का मिट्टी का तेल छलक पड़ा और लाश के चेहरे पर आग लग गई।

नीली और पीली लपटें ज़ोहरा के सड़े हुए बालों और चेहरे के गोश्त को चाटने लगीं। उस लाश के मुँह से किसी औरत की नहीं, बल्कि हरदयाल की रूह की ऐसी भयानक, रूह-कँपा देने वाली चीख़ निकली जिसने पूरी हवेली की दीवारों को हिला दिया।

लाश ने कबीर की गर्दन छोड़ दी और अपने जलते हुए चेहरे को दोनों हाथों से ढककर ज़मीन पर लोटने लगी।

"भागो, कबीर! यहाँ से भागो!" अफ़साना बेगम ने कबीर की जैकेट खींचकर उसे ज़मीन से उठाया।

बूढ़ी औरत का चेहरा पसीने और आंसुओं से भीगा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब, अंतिम संकल्प चमक रहा था। उसने संदूक़ से वही पीला नक़्शा और ज़ोहरा की चमड़े की जिल्द वाली डायरी कबीर के सीने से चिपका दी।

"ख़ाला... आप भी चलिए!" कबीर ने हांफते हुए कहा। उसकी गर्दन पर लाश की उंगलियों के काले, जले हुए निशान उभर आए थे।

"मेरे जाने का वक़्त पचास साल पहले ही पूरा हो चुका था, बेटा," अफ़साना ने एक फीकी, दर्दभरी मुस्कान के साथ कहा।

उसने ज़मीन पर गिरा हुआ लोबान का भारी मर्तबान उठाया और उसे अपने ही कपड़ों पर उड़ेल लिया।

"यह लाश तब तक नहीं मरेगी जब तक यह कोठा इसके साथ राख नहीं हो जाता। ज़ोहरा की डायरी में उस दरवाज़े का पता है जो जामा मस्जिद के तीसरे तहख़ाने में खुलता है। वहाँ जाओ... वहीं तुम्हें वह मिलेगा जो इस वक़्त की दरार को भर सकता है!"

इससे पहले कि कबीर कुछ समझ पाता, वह जलती हुई लाश ज़मीन से उठी।

उसका आधा चेहरा जलकर कंकाल बन चुका था, खोपड़ी की हड्डियाँ चमक रही थीं। उसने एक दहाड़ के साथ अफ़साना बेगम पर झपट्टा मारा।

"भागो!" अफ़साना ने अपनी जलती हुई लालटेन की बत्ती अपने लोबान से भीगे आँचल से छुआ दी।

एक भयानक धमाका हुआ—बूम!

आग की एक विशाल दीवार कबीर और उस लाश के बीच खिंच गई। कबीर उस झटके से पीछे की ओर फिंक गया और लकड़ी की सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ नीचे गली के मुहाने पर जा गिरा।

पीछे हवेली की ऊपरी मंज़िल से आग की लपटें खिड़कियों को तोड़कर बाहर निकलने लगी थीं। हवा में अफ़साना बेगम के आख़िरी कलमे और उस जिन्न-रूपी हरदयाल की भयानक चीखें गूँज रही थीं।

कबीर ने अपने आँसू पोंछे, डायरी को अपनी छाती से चिपकाया और पुरानी दिल्ली की उस कोहरे से भरी, सर्द सुबह में पागलों की तरह दौड़ पड़ा।

2. शाहजहानाबाद की भूलभुलैया और परछाइयों का ख़ौफ़
सुबह के नौ बज रहे थे।

चावड़ी बाज़ार की उस हवेली से उठते काले धुएँ ने बाज़ार में अफ़रातफ़री मचा दी थी। तांगेवाले अपने घोड़ों को तेज़ी से दौड़ा रहे थे, लाल कुर्ती वाले पुलिस के सिपाही सीटियाँ बजाते हुए उस तरफ़ भाग रहे थे, और लोग अपने घरों की छतों से चिल्ला रहे थे: "आग लग गई! ज़ोहरा बाई के कोठे में आग लग गई!"

कबीर भीड़ के बीच से किसी साए की तरह निकला।

उसने अपनी फटी हुई जैकेट को अपने सीने पर लपेट लिया था। उसकी कटी हुई उंगलियों के घावों में अब फिर से एक अजीब, मीठी सी जलन शुरू हो गई थी—जैसे कोई चुंबक उसे किसी ख़ास दिशा में खींच रहा हो।

वह चितली क़बर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में दाख़िल हुआ।

1954 की यह गलियाँ इतनी तंग थीं कि दो आदमी एक साथ कंधे मिलाकर नहीं चल सकते थे। दोनों तरफ़ तीन-मंज़िला, लखौरी ईंटों की बनी पुरानी हवेलियाँ थीं, जिनकी बालकनियाँ आपस में लगभग जुड़ी हुई थीं। गलियों में धूप का एक क़तरा भी नहीं पहुँच रहा था; सिर्फ़ सफ़ेद, मटमैला कोहरा और तंदूरों से निकलता धुँआ तैर रहा था।

कबीर एक पुरानी, बंद दुकान की ओट में रुका। उसकी साँसें फूल रही थीं।

उसने कांपते हाथों से ज़ोहरा की वह चमड़े की डायरी खोली।

डायरी के पन्ने हाथ से बने हुए पुराने सवाई काग़ज़ के थे। उस पर फ़ारसी और पुरानी उर्दू में बारीक, खूबसूरत लिखावट थी। कबीर ने एक पन्ना पलटा।

वहाँ एक हाथ से बना हुआ नक़्शा था—‘नक़्शा-ए-शहरपनाह व तिलिस्मात’।

उस नक़्शे पर दिल्ली के तीन सबसे बड़े ऐतिहासिक मक़ामात को लाल स्याही से एक त्रिकोण (triangle) के रूप में जोड़ा गया था:

फ़िरोज़ शाह कोटला (जहाँ जिन्नात का पाताल और बाओली थी),

लाल क़िला (जहाँ मुग़ल सल्तनत का तख़्त और 'नहर-ए-बहिश्त' थी), और

जामा मस्जिद (जिसके नीचे दिल्ली का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और तिलिस्मी ताला लगा हुआ था)।

नक़्शे के नीचे ज़ोहरा ने अपनी कटी हुई उंगली के ख़ून से लिखा था:

*"1354 में तुग़लक़ ने कोटला में जिन्नात को क़ैद किया था। मगर 1656 में जब शाहजहाँ ने जामा मस्जिद की तामीर करवाई, तो उसके उस्ताद कारीगरों ने मस्जिद की बुनियाद में 1857 से पहले के सात बड़े संतों के तावीज़ और हज़रत सुलेमान की सील का एक टुकड़ा दफ़्न किया था।

यदि कोटला का कोई जिन्न इंसान का रूप धरकर शहर में दाख़िल हो जाए, तो उसे केवल जामा मस्जिद के उस केंद्रीय तहख़ाने में ही मारा जा सकता है जिसे 'हुजरा-ए-ग़ैब' (अदृश्य कक्ष) कहते हैं।

लेकिन ख़बरदार! वह हुजरा किसी ज़िंदा इंसान के लिए नहीं खुलता... वह केवल उसके लिए खुलता है जिसकी आधी रूह बरज़ख़ में हो और आधा जिस्म मिट्टी में!"*

कबीर की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई।

"आधी रूह बरज़ख़ में... और आधा जिस्म मिट्टी में..." कबीर ने अपने दोनों हाथों को देखा। उसकी कटी हुई उंगलियों से रिसता हुआ ख़ून... उसका वक़्त से उखड़ जाना...

वह न तो 1954 का पूरा इंसान था, और न ही 2026 का! वह ख़ुद उस परिभाषा में बिल्कुल सटीक बैठता था!

तभी, गली के मोड़ पर एक साया उभरा।

कबीर ने झटके से सिर उठाया।

गली के दूसरे छोर पर, जहाँ कबाब की एक पुरानी दुकान थी, वही काले रंग की विंटेज ऑस्टिन कार आकर रुकी थी।

कार का दरवाज़ा खुला। उसमें से वह शख़्स बाहर निकला जिसने दीवान हरदयाल का काला पशमीने का बंदगला कोट पहना हुआ था।

लेकिन इस बार, कबीर उस धोखे में नहीं आ सकता था।

वह इंसान नहीं था। वह मीर-ए-आतिश था—कोटला का वह छह उंगलियों वाला मारिद जिन्न, जिसने हरदयाल की खाल ओढ़ रखी थी!

उसकी चाल में इंसानों जैसी लचक नहीं थी; वह किसी लकड़ी की पुतली की तरह सख्त कदमों से चल रहा था। उसके चेहरे की चमड़ी अजीब तरह से खिंची हुई थी, जैसे किसी छोटे चेहरे पर बड़ा मुखौटा जबरन चढ़ा दिया गया हो। उसकी आँखों के गड्ढों से हल्की, नीली भाप निकल रही थी जो सुबह के कुहासे में विलीन हो रही थी।

और उसके पीछे, छह पुलिस वाले अपनी राइफ़लों के साथ चल रहे थे।

दरोगा रामनाथ शर्मा उनके आगे-आगे चल रहा था, और उसके हाथ में एक लोहे की जंजीर से बंधा हुआ एक शिकारी कुत्ता था। वह कुत्ता ज़मीन को सूंघता हुआ सीधा उसी गली की तरफ़ भौंक रहा था जहाँ कबीर छिपा हुआ था!

"पकड़ो उसे!" दरोगा की आवाज़ गूँजी। "वह इस तरफ़ गया है!"

कबीर ने डायरी को अपनी जैकेट के भीतर खोंसा और जामा मस्जिद के ऊँचे, लाल पत्थरों के कंगूरों की दिशा में दौड़ लगा दी।

3. जामा मस्जिद की लाल सीढ़ियाँ और पीरज़ादा इब्राहिम
जामा मस्जिद का दक्षिणी दरवाज़ा (गेट नंबर 2) सामने दिखाई दिया।

लाल बलुआ पत्थर की वे विशाल, भव्य सीढ़ियाँ आसमान की तरफ़ उठती हुई लग रही थीं। 1954 की उस सुबह सीढ़ियों पर कबूतरों का एक विशाल झुंड दाना चुग रहा था। इक्का-दुक्का फ़क़ीर अपनी फटी हुई गुदड़ियों में लिपटे बैठे थे। हवा में अज़ान के बाद का एक शांत, पवित्र सन्नाटा था जो कबीर के कानों में किसी अमृत की तरह लगा।

कबीर सीढ़ियों को तीन-तीन करके चढ़ने लगा। उसके फेफड़े जल रहे थे, उसका बायाँ पैर बुरी तरह लंगड़ा रहा था।

जैसे ही उसने मस्जिद के मुख्य दालान की पहली चौखट पर क़दम रखा, सीढ़ियों के पास बनी एक छोटी-सी कोठरी का दरवाज़ा खुला।

उस कोठरी में से एक अस्सी-पचासी साल के अत्यंत वृद्ध बुज़ुर्ग बाहर निकले।

उन्होंने सफ़ेद सूती कुर्ता, हरा तहबंद और सिर पर तुर्की शैली की एक ऊँची टोपी पहन रखी थी। उनकी दाढ़ी बर्फ़ की तरह सफ़ेद थी और उनकी कमर झुकी हुई थी। उनके हाथ में जैतून की लकड़ी की एक तस्बीह (माला) थी जिसके दाने वे बहुत तेज़ी से फेर रहे थे।

वे पीरज़ादा इब्राहिम थे—जामा मस्जिद के सबसे पुराने मुतवल्ली (संरक्षक) और इमाम के ख़ानदान के बुज़ुर्ग।

पीरज़ादा ने कबीर को देखते ही अपनी तस्बीह रोक दी।

उनकी बूढ़ी, झुर्रियों से भरी आँखों में कोई हैरानी नहीं थी; वहाँ एक गहरा, सदियों पुराना इल्म था। उन्होंने कबीर के चेहरे को नहीं देखा; उनकी नज़र कबीर के पैरों पर पड़ी।

कबीर के पैरों की परछाईं... ज़मीन पर नहीं पड़ रही थी!

"आ गए तुम..." पीरज़ादा की आवाज़ इतनी धीमी थी जैसे कोई सूखी पत्ती हवा में सरसरा रही हो। "सत्तर बरसों से इस मस्जिद के मीनार उस आग के बुझने का इंतज़ार कर रहे हैं जो आज सुबह कोटला से निकलकर शहर में दाखिल हुई है।"

कबीर हांफता हुआ उनके कदमों में गिर पड़ा। "पीरज़ादा साहब... वे आ रहे हैं... वह कोई इंसान नहीं है, वह कोटला का शैतान है जिसने मेरे परदादा की चमड़ी पहन रखी है!"

पीरज़ादा ने आगे बढ़कर अपने कांपते, ठंडे हाथों से कबीर के सिर को छुआ।

उनके हाथ की छुअन मिलते ही कबीर के बदन की वह भयानक जलन एक पल के लिए शांत हो गई। पीरज़ादा ने कबीर की कटी हुई उंगलियों को देखा।

"यह ज़ख़्म इंसानी नहीं है, बेटा," पीरज़ादा ने कहा। "तुमने अपने भीतर के उस शैतान को काटकर फेंक दिया है जो तुम्हारे ख़ून में बोया गया था। लेकिन जो बाहर खड़ा है, वह इस पूरी दिल्ली को अपनी आग में जलाना चाहता है।"

पीरज़ादा ने मस्जिद के विशाल सहन की तरफ़ इशारा किया, जहाँ सफ़ेद संगमरमर के फर्श पर लाल कालीन बिछे थे।

"वह इस मस्जिद की दहलीज़ लांघने की हिम्मत नहीं कर सकता जब तक उसके पास कोई ऐसा इंसान न हो जो उसे अपने कंधों पर उठाकर लाए। वह दरोगा और उन सिपाहियों के ज़ेहन को अपने वश में कर चुका है। वे सरकारी वर्दी की आड़ में इस मुक़द्दस जगह को ख़ून से नहलाने आ रहे हैं।"

"मुझे कहाँ जाना होगा?" कबीर ने ज़ोहरा की डायरी दिखाते हुए पूछा। "डायरी में 'हुजरा-ए-ग़ैब' का ज़िक्र है।"

पीरज़ादा का चेहरा गंभीर हो गया।

"हुजरा-ए-ग़ैब वह तहख़ाना है जहाँ 1857 के ग़दर में अंग्रेज़ों की तोपों से बचने के लिए दिल्ली के आख़िरी सूफ़ी और बहादुर शाह ज़फ़र के वफ़ादार सिपाहियों ने पनाह ली थी। वहाँ उन शहीदों की रूहें आज भी उस दरवाज़े की पहरेदारी कर रही हैं जो इस दुनिया को बरज़ख़ से जोड़ता है। चलो मेरे पीछे... अगर सूरज सिर पर आने से पहले तुमने वह ताला नहीं खोला, तो वह मारिद इस शहर का सूरज हमेशा के लिए बुझा देगा!"

4. 1857 का अंधियारा और शहीदों की फुसफुसाहट
पीरज़ादा इब्राहिम कबीर को मस्जिद के मुख्य प्रार्थना कक्ष (Prayer Hall) के उत्तरी कोने की तरफ़ ले गए।

वहाँ संगमरमर की दीवार के पीछे, एक भारी, नक्काशीदार लोहे का फाटक था जो ज़मीन के नीचे उतरता था। उस फाटक पर कई पुराने, ज़ंग लगे ताले लटके थे, जिन पर अरबी में हिफ़ाज़त की आयतें खुदी हुई थीं।

पीरज़ादा ने अपनी जेब से पीतल की एक प्राचीन, भारी चाबी निकाली और मुख्य ताले में घुमा दी।

चर्र्र्र... कड़क!

दरवाज़ा खुला। अंदर से ऐसी सड़ी हुई, ठंडी और बारूद जैसी गंध आई कि कबीर को 1857 के उस खूनी मंज़र का अहसास होने लगा।

सीढ़ियाँ नीचे पाताल की ओर उतर रही थीं।

पीरज़ादा ने दीवार पर टंगी एक पुरानी मशाल जलाई। मशाल की पीली, नाचती हुई रोशनी में सीढ़ियों की दीवारें साफ़ दिखाई देने लगीं। उन दीवारों पर जगह-जगह पुरानी गोलियों के गहरे निशान थे, और कहीं-कहीं सूखे हुए ख़ून के ऐसे काले धब्बे थे जो सौ साल बाद भी पत्थरों के सीने में जमे हुए थे।

"यह वह जगह है, कबीर," पीरज़ादा ने मशाल आगे बढ़ाते हुए कहा, "जहाँ 14 सितंबर 1857 को कश्मीरी गेट टूटने के बाद, दिल्ली के तीन सौ बेकसूर शहरियों को अंग्रेज़ फ़ौज ने ज़िंदा चुनवा दिया था। उनकी आहें और उनकी शहादत इस ज़मीन को एक ऐसा तिलिस्मी ढाल देती हैं जिसे आग का कोई भी जिन्न भेद नहीं सकता।"

वे तहख़ाने के सबसे निचले कमरे में पहुँचे।

यह एक विशाल, गुंबदनुमा कमरा था। कमरे के बीचों-बीच संगमरमर का एक विशाल चबूतरा था, जिसके ऊपर काले पत्थर का एक संदूक़ रखा हुआ था। उस संदूक़ के चारों तरफ़ चांदी की जंजीरें लिपटी थीं, और उन ज़ंजीरों के बीच में एक बड़ा, छह-कोने वाला सितारा (Seal of Solomon) खुदा हुआ था।

और उस चबूतरे के चारों तरफ़... हवा में दर्जनों सफ़ेद, धुंधले साए तैर रहे थे!

वे साए कंकाल या भयानक प्रेत नहीं थे। वे 1857 के उन सिपाहियों और औरतों की रूहें थीं जिन्होंने अपने वतन के लिए जान दी थी। उनके चेहरों पर एक गहरा, पवित्र नूर था। जैसे ही कबीर ने उस कमरे में क़दम रखा, वे तमाम साए हरकत में आ गए।

हवा में एक धीमी, सामूहिक फुसफुसाहट गूँज उठी:
"वारिस आया है... उस ख़ून का वारिस जिसने आग को ठुकरा कर मिट्टी को चुना है..."

पीरज़ादा ने कबीर की तरफ़ देखा।

"उस संदूक़ के भीतर वह आख़िरी फ़रमान रखा है जो 1354 में सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक के ख़ास मुफ़्ती ने लिखा था। वह 'फ़रमान-ए-इबताल' (निरस्तीकरण का आदेश) है। अगर तुमने उस पर अपने इन कटे हुए हाथों का ख़ून लगा दिया, तो कोटला के उस छह उंगलियों वाले जिन्न का हर मुआहिदा, हर सौदा और हर तिलिस्म एक पल में राख हो जाएगा!"

कबीर आगे बढ़ा।

उसने चबूतरे की सीढ़ियों पर क़दम रखा। उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। उसने संदूक़ पर लिपटी उन चांदी की ज़ंजीरों को छूने के लिए हाथ बढ़ाया।

तभी—

तहख़ाने की सीढ़ियों पर बूटों की भारी, गूँजती हुई आवाज़ें आईं।

धड़... धड़... धड़!

5. जाल का फटना और खाल ओढ़े दरिंदा
"कितना खूबसूरत ख़्वाब है, पीरज़ादा..."

एक ऐसी आवाज़ गूँजी जिसने तहख़ाने की मशाल की लौ को एक पल के लिए नीला कर दिया।

कबीर और पीरज़ादा दोनों चौंककर मुड़े।

सीढ़ियों के मुहाने पर वही विंटेज ऑस्टिन वाला 'हरदयाल' खड़ा था।

लेकिन अब उसका इंसानी रूप बिखर रहा था। हरदयाल के चेहरे की खाल जगह-जगह से फट चुकी थी, और उन फटे हुए छेदों के भीतर से वही राख जैसी काली चमड़ी और नीली आग की लपटें बाहर झाँक रही थीं। उसके दोनों हाथों में वही छह-छह उंगलियाँ थीं, जिनके नाख़ून अब किसी तलवार जैसे लंबे हो चुके थे।

उसके पीछे दरोगा रामनाथ शर्मा और तीन सिपाही खड़े थे।

उन सिपाहियों की आँखें पूरी तरह सफ़ेद और पथराई हुई थीं—वे पूरी तरह उस जिन्न के रूहानी सम्मोहन (possession) में थे, किसी कठपुतली की तरह अपनी .303 ली-एनफ़ील्ड राइफ़लें ताने खड़े थे।

"तूने सोचा, कबीर, कि तू मुझे चकमा देकर यहाँ पहुँच जाएगा?" उस मारिद जिन्न के मुँह से हरदयाल और शैतान की मिली-जुली आवाज़ निकली।

वह एक-एक कदम नीचे उतरा। हर कदम के साथ तहख़ाने के पत्थरों से धुआँ उठने लगा।

"तू भूल गया कि यह डायरी... यह नक़्शा... यह सब कुछ चावड़ी बाज़ार के उस कोठे में मैंने ही रखवाया था! मैं जानता था कि तू यहाँ आएगा। क्योंकि यह संदूक़... यह सुलेमानी ताला... कोई जिन्न अपनी ताक़त से नहीं खोल सकता! इसे केवल वही खोल सकता है जिसके जिस्म में जिन्न की आग हो और रूह में इंसान की मिट्टी!"

जिन्न ने अपनी छह उंगलियों वाला पंजा कबीर की तरफ़ फैलाया:
"तूने अपनी उंगलियाँ काटकर उस पाताल में अपनी ताक़त खो दी, लेकिन तेरे ख़ून की तासीर नहीं बदली! मुझे इस संदूक़ को खुलवाना था, कबीर! इसके भीतर सिर्फ़ वह फ़रमान नहीं है... इसके भीतर हज़रत सुलेमान की वह अँगूठी है जिसे पहनकर मैं सिर्फ़ कोटला का नहीं, बल्कि इस पूरी दुनिया का शहंशाह बनूँगा!"

"यह कभी नहीं होगा, मलीच्छ!" पीरज़ादा इब्राहिम अपनी पूरी ताक़त से चिल्लाए। उन्होंने अपनी तस्बीह हवा में लहराई और कुछ क़ुरआनी आयतें पढ़ने लगे।

"ख़ामोश, कीड़े!"

जिन्न ने अपनी उंगली का एक हल्का-सा इशारा किया।

एक सिपाही की राइफ़ल से गोली चली—धाँय!

गोली सीधे पीरज़ादा के सीने के पार निकल गई। बूढ़े मुतवल्ली के मुँह से ख़ून का फव्वारा छूटा और वे संगमरमर के चबूतरे पर गिर पड़े। उनकी तस्बीह के दाने टूटकर पूरे फर्श पर बिखर गए।

"पीरज़ादा साहब!" कबीर चीख़ उठा। वह उनकी तरफ़ लपका, मगर जिन्न के इशारे पर दोनों सिपाहियों ने कबीर को दबोच लिया। सिपाहियों की पकड़ किसी लोहे के शिकंजे जैसी थी।

जिन्न धीरे-धीरे कबीर के सामने आया।

उसने हरदयाल के उस सड़े हुए चेहरे को अपने ही पंजों से नोंचकर पूरी तरह उतार दिया!

अब उसके सामने वही दस फीट ऊँचा, आग और धुएँ से बना दैत्य खड़ा था—मीर-ए-आतिश! उसकी छह उंगलियों वाला दहकता हुआ हाथ कबीर की गर्दन पर आ टिका।

"अब इस संदूक़ पर अपना ख़ून बहा, कबीर... या फिर मैं तेरे ज़िंदा जिस्म की एक-एक हड्डी चबाकर इस संदूक़ को तेरे ही ख़ून से नहला दूँगा!"

6. वह रूह-कँपा देने वाला महा-ट्विस्ट: वक़्त का असली शिकार (The Twist)
कबीर बेबस था। मौत उसके सिर पर खड़ी थी।

तभी—

पीछे खड़े दरोगा रामनाथ शर्मा के चेहरे पर एक अजीब, अमानवीय झटका लगा।

दरोगा की आँखें, जो अब तक सफ़ेद और सम्मोहित दिख रही थीं, अचानक सामान्य हो गईं। उसके चेहरे पर खौफ़ की जगह एक बर्फीला, ख़तरनाक गुस्सा भर गया।

उसने अपनी जेब से वही वेब्ली-स्कॉट रिवॉल्वर निकाली और बिना एक पल गँवाए, सीधे उस छह उंगलियों वाले जिन्न की पीठ पर सटाकर छह की छह गोलियाँ दाग दीं!

धाँय! धाँय! धाँय! धाँय! धाँय! धाँय!

गोलियाँ साधारण सीसे की नहीं थीं; वे चांदी की गोलियाँ थीं जिन पर आयतें खुदी हुई थीं!

जिन्न एक भयानक, पाताल-कँपा देने वाली चीख़ के साथ मुड़ा। उसकी पीठ से नीले ख़ून और आग का फव्वारा छूट पड़ा।

"ग़द्दार इंसान!" जिन्न दहाड़ा।

उसने अपने विशाल पंजे से एक ही वार में दरोगा रामनाथ शर्मा की छाती को चीर डाला। दरोगा का शरीर हवा में उछलकर दीवार से टकराया और उसकी पसलियाँ चूर-चूर हो गईं।

मगर उस अप्रत्याशित हमले से कबीर को पकड़ने वाले दोनों सिपाहियों की पकड़ ढीली पड़ गई। कबीर ने अपनी पूरी ताक़त से दोनों को धक्का दिया और नीचे गिरे दरोगा रामनाथ की तरफ़ भागा।

दरोगा ज़मीन पर ख़ून की उल्टी कर रहा था। उसकी छाती से ख़ून का दरिया बह रहा था। उसकी ज़िंदगी के चंद सेकंड बाक़ी थे।

कबीर ने दरोगा का सिर अपनी गोद में रख लिया। "दरोगा जी! आप... आप होश में थे?"

दरोगा रामनाथ ने अपनी कांपती, ख़ून से लथपथ उंगलियों से कबीर की जैकेट की आस्तीन को पकड़ा।

उसने अपनी वर्दी की अंदरूनी जेब से एक पुरानी, पीतल की चाबी और एक पुराना, मुरझाया हुआ फ़ोटो निकाला।

उस फ़ोटो पर जो तस्वीर थी... उसे देखकर कबीर के होश उड़ गए।

वह तस्वीर कबीर की अपनी थी! लेकिन उस तस्वीर के नीचे 1954 की मुहर लगी थी, और उस पर नाम लिखा था: 'कॉमरेड कबीर मेहरा — क्रांतिकारी, आज़ाद हिंद फ़ौज!'

दरोगा रामनाथ ने अपनी अंतिम साँसें लेते हुए जो शब्द कबीर के कान में कहे... उन शब्दों ने कबीर के पूरे अस्तित्व, उसके इतिहास, और उसके पूरे वजूद को एक पल में राख कर दिया:

*"कबीर... तुम 2026 से यहाँ नहीं आए हो...

तुम कभी इक्कीसवीं सदी के थे ही नहीं!

1944 में जब तुम आज़ाद हिंद फ़ौज में थे, तब इस जिन्न ने तुम्हें पकड़ा था। उसने तुम्हारे दिमाग़ में सत्तर साल आगे का एक ऐसा मुकम्मल, झूठा ख़्वाब बोया था—एक ऐसा इल्यूज़न (वहशत का जाल)—जिसमें तुमने ख़ुद को 2026 का एक रिसर्चर समझ लिया!

तुम्हारे बाप, तुम्हारे दादा, तुम्हारी वह मॉडर्न ज़िंदगी... सब कुछ इस जिन्न का रचा हुआ एक तिलिस्मी भरम था ताकि तुम ख़ुद अपनी मर्ज़ी से इस सुलेमानी संदूक़ की चाबी बन सको!

तुम 1954 के ही बाशिंदे हो, कबीर! जागो... अपने इस सत्तर साल के ख़्वाब से बाहर निकलो!"*

दरोगा रामनाथ की गर्दन एक तरफ़ लुढ़क गई। उसकी आँखें हमेशा के लिए खुली रह गईं।

कबीर बुत बना बैठा था।

उसका दिमाग़ एक ऐसी शून्यता में गिर गया जहाँ कोई आवाज़ नहीं थी।

2026... उसकी यूनिवर्सिटी... उसका रिसर्च प्रोजेक्ट... उसका फोन... क्या वह सब महज़ एक जिन्न का रचा हुआ सत्तर साल का सम्मोहन था? क्या वह कभी भविष्य में गया ही नहीं था?

तभी, उसके पीछे वह छह उंगलियों वाला जिन्न, अपनी पीठ से बहती नीली आग के साथ, अपने विशाल पंजों को फैलाए खड़ा हो गया:

"सच बहुत कड़वा होता है न, कबीर? अब इस संदूक़ को खोलो... क्योंकि तुम्हारा वह ख़्वाब अब हमेशा के लिए ख़त्म हो चुका है!"

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कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · सभी भाग →