PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 6: 1954 का कुहासा, ज़िंदा परदादा और तवायफ़ का आशियाना

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 20 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
6 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
20 min
Words
3929
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. कोयले का धुआँ और वक़्त की दरार
14 दिसंबर 1954 की सुबह दिल्ली के सीने पर किसी गीले, गंदे कफ़न की तरह लिपटी हुई थी।

यह इक्कीसवीं सदी का वह स्मॉग नहीं था जिसमें गाड़ियों का पेट्रोल और फैक्ट्रियों का कार्बन घुला होता है। यह पुराने ज़माने की दिल्ली की ख़ालिस, देहाती और भारी धुंध थी—जिसमें घरों के चूल्हों से निकलता कंडे और कोयले का तीखा धुआँ, यमुना के ठंडे पानी से उठती भाप, और सदियों पुरानी मस्जिदों व हवेलियों की सीलन एक साथ घुली हुई थी।

कबीर फ़िरोज़ शाह कोटला के मुख्य प्रवेश द्वार के पत्थरों से पीठ टिकाए खड़ा था।

उसकी साँसें इतनी तेज़ चल रही थीं कि उसकी पसलियों में असहनीय दर्द उठ रहा था। उसने अपने दोनों हाथों को देखा। जिन दो अतिरिक्त उंगलियों को उसने पाताल के कुएँ में काटा था, वहाँ अब केवल सूखे, काले खुरंड बचे थे। दर्द पूरी तरह ग़ायब नहीं हुआ था, लेकिन एक सुन्न, झनझनाहट भरी ठंडक उसकी हड्डियों में बैठ चुकी थी।

मगर सबसे भयानक बात यह थी कि वह इस दुनिया में होकर भी इस दुनिया का हिस्सा नहीं था।

जब वह गार्ड की चौकी के पास गया था, तो उसका हाथ उस सिपाही के कंधे के आर-पार निकल गया था। वह 'बरज़ख़ी हालत' (liminal state) में था—वक़्त के दो छोरों के बीच फंसा हुआ एक ऐसा साया, जिसका वजूद 2026 से उखड़ चुका था, लेकिन 1954 की भौतिक दुनिया ने अभी उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था।

सामने, क़िले के फाटक के बाहर, वह काले रंग की चमचमाती विंटेज ऑस्टिन कार खड़ी थी।

कार के पहियों पर सफेद रंग की रबर की धारियाँ थीं। ड्राइवर ने खाकी वर्दी और सिर पर गोल टोपी पहन रखी थी। कार के बोनट पर ताँबे का एक छोटा-सा शेर बना हुआ था जो सुबह के मंद धुंधलके में चमक रहा था।

और उस कार के सामने खड़ा था—दीवान हरदयाल मेहरा।

कबीर ने अपनी ज़िंदगी में अपने परदादा को केवल अपने ड्राइंग रूम की दीवार पर लटकी एक धुंधली, तेल-चित्र (oil painting) वाली तस्वीर में देखा था। तस्वीर में वे एक शांत, गंभीर और धार्मिक बुज़ुर्ग दिखते थे, जिनके गले में मोतियों की कंठी और माथे पर चंदन का टीका होता था।

लेकिन सामने जो हाड़-मांस का इंसान खड़ा था, वह उस तस्वीर से कोसों दूर था।

हरदयाल की उम्र लगभग पचास-पचपन साल रही होगी। उसका कद लंबा और रोबदार था। उसने कश्मीरी पशमीने का गहरा काला बंदगला कोट और बारीक लट्ठे की सफ़ेद धोती पहन रखी थी। उसके पैरों में रामपुर की बनी हुई नोकदार, ज़रीदार जूतियाँ थीं। उसके चेहरे पर घनी, घुमावदार मूंछें थीं, मगर उसकी आँखें... वे आँखें वैसी ही थीं जैसी कबीर ने पाताल के सिंहासन पर देखी थीं—लाल, धूर्त, और दुनिया भर के लालच से भरी हुई।

हरदयाल के हाथ में चांदी की मूठ वाली एक भारी बेंत (walking stick) थी, जिसे वह बार-बार ज़मीन पर पटक रहा था।

"दरोगा जी," हरदयाल ने अपने पास खड़े नौजवान पुलिस अफ़सर से कहा। उसकी आवाज़ में वही भारीपन था जो कबीर के कानों में अब भी गूँज रहा था। "आपने दरियागंज थाने के रोजनामचे (police diary) में वही दर्ज किया है न, जो मैंने कल रात आपसे कहा था?"

सब-इंस्पेक्टर रामनाथ शर्मा—जिसकी उम्र बमुश्किल सत्ताईस-अट्ठाईस साल रही होगी—ने अपनी खाकी टोपी ठीक की। उसके चेहरे पर एक अजीब, छिपा हुआ खौफ़ और अपराधबोध तैर रहा था। उसने अपनी बगल में दबी वही भूरी फ़ाइल—फ़ाइल संख्या 42/बी—को कसकर दबा लिया।

"दीवान साहब, मैंने सब संभाल लिया है," दरोगा ने अपनी आवाज़ को धीमा करते हुए कहा। वह बार-बार इधर-उधर देख रहा था, जैसे उसे डर हो कि खंडहरों के पत्थर भी उसकी बात सुन रहे हों। "सरकारी रपट में यही लिखा गया है कि आप कल शाम से अपने कूचा पाती राम वाले मकान में ख़ानदानी मुंशी के साथ बही-खाते देख रहे थे। लेकिन... लेकिन उस लड़की का क्या? अगर किसी ने उस तवायफ़ की लाश देख ली..."

"लाश कोई तब देखता है दरोगा जी, जब लाश बचती है," हरदयाल के होंठों पर एक घिनौनी, सर्द मुस्कान उभरी।

उसने अपनी जेब से सोने की एक भारी पॉकेट-वॉच निकाली। घड़ी का ढक्कन 'टिक' की आवाज़ के साथ खुला।

"पौने सात बज रहे हैं," हरदयाल ने कहा। "सवेरा पूरी तरह होने से पहले हमें बाओली के उस तीसरे दालान में जाना होगा। मुझे देखना है कि 'उसने' अपना काम पूरा किया या नहीं। अगर वह रूह पूरी तरह क़फ़स (पिंजरे) में उतर गई होगी, तो आज दोपहर तक बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के कनाट प्लेस वाले दफ़्तर से मेरी कंपनी के नाम पचास लाख रुपयों का कर्ज़ मंज़ूर हो जाएगा।"

हरदयाल ने अपनी बेंत घुमाई और क़िले के मुख्य फाटक से भीतर दाखिल हो गया। दरोगा रामनाथ शर्मा ने एक गहरी, घबराई हुई साँस ली और अपने हाथ में पकड़ी तीन-सेल वाली भारी टॉर्च को ऑन करके उसके पीछे चल पड़ा।

कबीर वहीं पत्थरों की ओट में खड़ा था।

उसका ख़ून खौल उठा। जिस इंसान की वजह से उसका परिवार सत्तर साल तक इस अभिशाप में जलता रहा, जिस इंसान ने एक बेकसूर लड़की की बलि देकर अपनी रईसी की इमारत खड़ी की थी... वह इंसान उसके सामने ज़िंदा चल रहा था!

कबीर ने अपने दाँत भींच लिए। उसने अपनी जेब टटोली।

उसकी जेब में वही ख़ूनी सील वाला लिफ़ाफ़ा रखा था। उसने उस पर उंगलियाँ फेरीं। लिफ़ाफ़ा अब भी गर्म था—जैसे उसके भीतर कोई अंगारा सुलग रहा हो।

कबीर बिना आवाज़ किए, साए की तरह उन दोनों के पीछे चल पड़ा।

2. बाओली का तीसरा दालान और ख़ाली ताक़
1954 का फ़िरोज़ शाह कोटला 2026 के कोटला से बहुत अलग था।

यहाँ न कोई लोहे की ग्रिलें थीं, न पर्यटकों के लिए बनाए गए पक्के रास्ते, और न ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वे नीले चेतावनी बोर्ड। पूरा क़िला जंगली कीकर, बबूल और ढाक के घने, कटीले पेड़ों से अटा पड़ा था। ज़मीन पर सदियों पुरानी टूटी हुई ईंटें और चूने का मलबा बिखरा था।

कोहरा इतना घना था कि दस कदम आगे चल रहे हरदयाल और दरोगा केवल काले सायों की तरह दिखाई दे रहे थे।

दरोगा की टॉर्च की पीली, कमज़ोर रोशनी उस कुहासे में किसी खंजर की तरह रास्ता बना रही थी।

कबीर उनके पीछे-पीछे जामी मस्जिद के वीराने से गुज़रा। मस्जिद का वह विशाल सहन, जो 2026 में केवल नंगे पत्थरों का फर्श था, इस समय हरी घास और जंगली बेलों से ढका हुआ था। मस्जिद की दीवारों पर ताज़ा अगरबत्तियों के निशान नहीं थे—1954 में यहाँ आम लोगों का वह हुजूम नहीं लगता था जो बाद के दशकों में अंधविश्वास के चलते शुरू हुआ था। इस दौर में कोटला केवल एक डरावना, मनहूस और वीरान खंडहर माना जाता था जहाँ सूरज ढलने के बाद परिंदे भी पर नहीं मारते थे।

वे दोनों बाओली के मुहाने पर पहुँचे।

गोल बाओली का वह विशाल कुआँ कोहरे के समंदर में किसी काले गड्ढे की तरह दिख रहा था।

कबीर ने देखा कि बाओली के ऊपर सम्राट अशोक का वही लाट शान से खड़ा था। 1954 की इस सुबह उस स्तंभ पर कोई रहस्यमयी नीली रोशनी नहीं थी; वह एक सामान्य, प्राचीन पाषाण खंभा लग रहा था जिस पर ओस की ठंडी बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।

"सीढ़ियाँ बहुत फिसलन भरी हैं, दीवान साहब," दरोगा रामनाथ ने कांपती आवाज़ में कहा। उसकी टॉर्च की रोशनी नीचे उतरती सीढ़ियों पर कांप रही थी। "हवा में... हवा में कुछ अजीब बू आ रही है।"

हरदयाल ने अपनी नाक पर ज़रीदार रूमाल रख लिया।

कबीर को भी वह गंध आई। यह वही गंध थी जिससे उसका सामना पाताल में हुआ था—सड़े हुए चमेली के तेल, कफ़न के इत्र और ताज़े, कच्चे ख़ून की मिली-जुली महक।

वे दोनों आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियों से नीचे उतरे। कबीर उनके ठीक पीछे था।

जैसे ही वे तीसरे दालान के उस मेहराबदार तहख़ाने के सामने पहुँचे—वही जगह जहाँ कबीर को 2026 में वह सीलबंद लिफ़ाफ़ा मिला था—दरोगा रामनाथ अचानक चीख़कर पीछे हटा।

उसकी टॉर्च की रोशनी ज़मीन पर पड़ी।

"दीवान साहब! यह... यह क्या है?" दरोगा की उंगली कांप रही थी।

हरदयाल ने आगे बढ़कर देखा। उसके चेहरे का सारा रोब, सारा घमंड एक सेकंड में उड़ गया। उसकी आँखों में वहशत का ऐसा सैलाब उमड़ा जिसे देखकर कबीर भी दंग रह गया।

दालान के फर्श पर, जहाँ रात को ज़ोहरा की बलि दी गई थी, वहाँ केवल काले, जमे हुए ख़ून का एक बड़ा सा तालाब था।

लेकिन वहाँ कोई लाश नहीं थी!

और सबसे खौफ़नाक बात यह थी कि उस ख़ून के तालाब के बीच से नंगे पैरों के निशान शुरू हो रहे थे।

वे किसी औरत के छोटे, नाज़ुक पैरों के निशान थे। वे खूनी पदचिह्न उस तहख़ाने से बाहर निकल रहे थे, सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ रहे थे, और हर कदम के साथ ख़ून के छींटे पत्थरों पर इस तरह पड़े थे जैसे वह लाश ज़मीन पर घिसटती हुई, लड़खड़ाती हुई अपने पैरों पर खड़ी होकर बाहर गई हो!

"यह नामुमकिन है!" हरदयाल की आवाज़ कांप रही थी। उसने अपनी चांदी की बेंत ज़मीन पर पटक दी। "मैंने ख़ुद अपनी आँखों से देखा था! उस छह उंगलियों वाले मारिद ने ज़ोहरा की गर्दन की नस अपने पंजों से काट दी थी! उसका ख़ून इस ताक़ में भरे पीतल के दीये में जमा किया गया था! वह मर चुकी थी!"

"तो फिर यह लाश कहाँ गई, दीवान जी?" दरोगा की पिंडलियाँ कांप रही थीं। उसने अपनी सरकारी रिवॉल्वर का होल्स्टर खोल लिया। "अगर वह ज़िंदा बच गई... अगर वह किसी तरह रेंगते हुए थाने या अस्पताल पहुँच गई... तो हम दोनों फाँसी के फंदे पर लटकेंगे!"

"ख़ामोश, बुज़दिल!" हरदयाल गुर्राया, मगर उसका अपना निचला होंठ थरथरा रहा था।

वह उस ताक़ के पास गया। ताक़ के भीतर वही पीतल का दीया रखा हुआ था।

मगर दीया ख़ाली था। उसके भीतर का ख़ून ग़ायब था। और दीये के नीचे, पत्थरों पर किसी नुकीले नाख़ून से एक पंक्ति खुरच कर लिखी गई थी:

"हरदयाल... जो सौदा तुमने आग से किया था, उसकी पहली किस्त तुम्हारी रूह होगी। मैं आ रही हूँ।"

3. साए का ठोस होना और परदादा की नज़र
कबीर उस तहख़ाने के कोने में खड़ा यह सब देख रहा था।

उसे सब समझ आ रहा था। 1954 की इस सुबह जो हुआ था, वह किसी इंसानी क़त्ल का मामला नहीं था। हरदयाल ने जिस शैतानी ताक़त को जगाया था, उसने ज़ोहरा के जिस्म को एक ख़ाली बर्तन की तरह इस्तेमाल किया था। ज़ोहरा की रूह तो पाताल के कुएँ में क़ैद हो गई थी, मगर उसका मुर्दा शरीर... उस शरीर को किसी 'इफ़्रीत' या 'ख़बीस' ने अपने वश में कर लिया था!

तभी, कबीर के भीतर एक भयानक परिवर्तन हुआ।

जैसे ही हरदयाल ने उस ताक़ पर लिखे हुए उन खूनी शब्दों को अपनी उंगलियों से छुआ, हवा में एक तेज़ रूहानी झटका लगा। वह तांत्रिक बंधन, जो उस जगह पर सत्तर साल पहले बना था, एक पल के लिए थर्राया।

और उस झटके के साथ ही, कबीर का शरीर... ठोस (physical) हो गया!

उसकी साँसें वापस हवा में भाप बनकर दिखने लगीं। उसके जूतों के नीचे पड़े सूखे पत्तों और कंकड़ों के दबने की एक साफ़, तीखी आवाज़ आई—चर्र्र!

"कौन है वहाँ?"

दरोगा रामनाथ ने बिजली की तेज़ी से अपनी टॉर्च घुमाई।

सफ़ेद-पीली रोशनी का पूरा दायरा सीधा कबीर के चेहरे पर आ टिका।

"हाथ ऊपर करो! वर्ना गोली मार दूँगा!" दरोगा ने अपनी वेब्ली-स्कॉट रिवॉल्वर कबीर के सीने पर तान दी।

कबीर अपनी जगह पर जम गया।

उसने अपनी खुली हथेलियों को ऊपर उठाया। उसकी कटी हुई उंगलियों के काले खुरंड उस रोशनी में साफ़ दिखाई दे रहे थे। उसकी फटी हुई आधुनिक जैकेट, उसकी नीली डेनिम जींस और उसके चेहरे की हड्डियों की बनावट—सब कुछ 1954 की उस दुनिया के लिए किसी दूसरी दुनिया के अजूबे जैसा था।

लेकिन दरोगा से ज़्यादा भयानक प्रतिक्रिया दीवान हरदयाल की थी।

हरदयाल अपनी चांदी की बेंत को दोनों हाथों में थामे, एक-एक कदम आगे बढ़ा। उसकी आँखें कबीर के चेहरे पर गड़ गईं।

उसकी नज़र कबीर के चेहरे के नक्शों पर गई—वही चौड़ा माथा, वही तीखी नाक, और आँखों की वही बनावट जो मेहरा ख़ानदान की पहचान थी। और फिर, हरदयाल की नज़र कबीर की बायीं अनामिका उंगली पर पड़ी, जहाँ वह पुस्तैनी अंगूठी उतारे जाने के बाद का गहरा, लाल-नीला घाव अभी-भी ताज़ा था!

"तुम..." हरदयाल की आवाज़ गले में अटक गई। उसके चेहरे का रंग हल्दी की तरह पीला पड़ गया। "तुम कौन हो? तुम्हारे हाथ पर... वह निशान कैसा है?"

"दीवान जी, आप इसे जानते हैं?" दरोगा ने रिवॉल्वर का घोड़ा पीछे खींचते हुए पूछा। "यह कोई चोर-उचक्का लगता है... या शायद उस तवायफ़ का कोई आशिक़!"

"नहीं..." हरदयाल ने फुसफुसा कर कहा। उसकी आँखें किसी प्रेत को देखने जैसी फैली हुई थीं। "यह कोई आशिक़ नहीं है। इसका चेहरा... यह चेहरा काशीनाथ जी (कबीर के पड़दादा) से मिलता है... यह मेरी अपनी माँ के खानदान का चेहरा है! लेकिन यह लिबास... यह कपड़े..."

हरदयाल ने अपनी बेंत उठाई और उसकी नोक कबीर के सीने पर रख दी:
"सच-सच बता, लड़के! तू कौन है? तुझे यहाँ किसने भेजा है? क्या तू उस मारिद का भेजा हुआ कोई बहरूपिया है?"

कबीर ने सीधा अपने परदादा की आँखों में देखा। उन आँखों में अब वह दरिंदगी नहीं थी जो पाताल में थी; यहाँ एक ज़िंदा, पापी इंसान का वह आदिम ख़ौफ़ था जो अपने ही किए हुए पापों की परछाईं देखकर थर्रा उठता है।

"मैं वही हूँ, दीवान साहब..." कबीर की आवाज़ भारी और सर्द थी, "जिसकी क़ीमत आपने कल रात इस बाओली के शैतान को चुकाई है। मैं आपका परपोता हूँ... कबीर मेहरा!"

4. फ़ायरिंग, फ़रारी और पुरानी दिल्ली की सुबह
"बकवास!"

हरदयाल एक भयानक चीख़ के साथ पीछे हटा। "परपोता? मेरा बेटा ओमकार अभी महज़ बारह साल का बच्चा है! तू मुझे डराने आया है? दरोगा! गोली मारो इसे! यह उस तवायफ़ के गिरोह का आदमी है!"

धाँय!

दरोगा रामनाथ की उंगली ने ट्रिगर दबा दिया।

रिवॉल्वर की नली से निकली गोली कबीर के बाएँ कान के बिल्कुल पास से पत्थरों से टकराई। बारूद की तेज़ महक और सीसे की चिंगारी कबीर के गाल को झुलसा गई।

कबीर को सोचने का एक पल भी नहीं मिला।

वह मुड़ा और पागलों की तरह सीढ़ियों की ओर भागा।

"पकड़ो उसे! ज़िंदा नहीं बचना चाहिए!" पीछे से हरदयाल की पाशविक चीख़ गूँजी।

कबीर ने अपनी पूरी ताक़त अपने पैरों में झोंक दी। वह बाओली की सीढ़ियों को दो-दो, तीन-तीन करके फांदता हुआ ऊपर की ओर लपका। पीछे से दरोगा की दूसरी गोली चली—धाँय!—जो कबीर की जैकेट की पीठ को चीरती हुई निकल गई।

कबीर खुले मैदान में आया।

कोहरा अब थोड़ा छँट चुका था, मगर सुबह की पीली धूप अभी भी पत्थरों पर सुलग रही थी। कबीर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह क़िले के टूटे हुए पश्चिमी परकोटे की तरफ़ भागा, जहाँ दीवार की ऊँचाई कम थी और नीचे दिल्ली की पुरानी रिंग रोड जैसी एक कच्ची सड़क जाती थी।

उसने दीवार पर छलांग लगाई, कटीली झाड़ियों को चीरता हुआ नीचे गिरा और मुँह के बल कच्ची मिट्टी में जा धँसा।

उसकी कोहनी छिल गई, लेकिन उसने रुकने की ग़लती नहीं की। वह उठा और सामने दिख रही पुरानी दिल्ली की घनी, संकरी बस्तियों की तरफ़ दौड़ पड़ा।

5. 1954 का शाहजहानाबाद और चावड़ी बाज़ार की ओर क़दम
पंद्रह मिनट तक लगातार भागने के बाद, जब उसके फेफड़ों में हवा ख़त्म होने लगी, तब कबीर एक संकरी, पथरीली गली के मोड़ पर आकर रुका।

सामने जो दृश्य था, उसने कबीर को एक पल के लिए अपना सारा दर्द भुलाने पर मजबूर कर दिया।

वह दिल्ली गेट के पार, पुरानी दिल्ली के उस ऐतिहासिक शाहजहानाबाद में खड़ा था जो उसने केवल मंटो की कहानियों या पुरानी श्वेत-श्याम फ़िल्मों में देखा था।

सड़कों पर कोई मोटर गाड़ियाँ नहीं थीं; इक्का-दुक्का पुरानी काली टैक्सियाँ थीं। ज़्यादातर लोग तांगों, साइकिलों और नंगे पाँव चल रहे थे। तांगों के घोड़ों की टापों की 'टप-टप' की आवाज़ और तांगेवालों की घंटियाँ—टिन-टिन—हवा में गूँज रही थीं।

सड़क के किनारे पुराने ढाबों पर पीतल के बड़े-बड़े पतीलों में चाय उबल रही थी। जलेबियों और समोसों की खस्ता महक आ रही थी। दुकानों के बाहर लकड़ी के तख़्तों पर मुंशी लोग लाल जिल्द वाले बही-खाते खोले बैठे थे।

किसी पान की दुकान पर रखे फिलिप्स के बड़े, लकड़ी के रेडियो से अमीन सयानी की आवाज़ में बिनाका गीतमाला की धुन आ रही थी।

लोग कबीर को ऐसे घूर रहे थे जैसे वह आसमान से टपका कोई अजूबा हो। उसकी नीली जींस, उसकी ज़िप वाली जैकेट और उसके बाल—1954 की उस रूढ़िवादी, तहज़ीब-याफ़्ता दिल्ली के लिए यह लिबास किसी जोकर या विदेशी जासूस जैसा था।

"ऐ मियाँ! कौन से नाटक की कंपनी से भागे हो?" एक तांगेवाले ने अपनी चाबुक हवा में लहराते हुए हँसकर आवाज़ लगाई।

कबीर ने अपनी जैकेट का हुड अपने सिर पर खींच लिया। उसने अपने दोनों हाथों को जेबों में ठूँस लिया ताकि लोगों को उसकी कटी हुई उंगलियों के ख़ूनी खुरंड न दिखें।

उसे कहाँ जाना था?

वह इस दौर में किसी को नहीं जानता था। अगर वह अपने ख़ानदानी मकान—कूचा पाती राम—जाता, तो वहाँ उसका बारह साल का दादा (ओमकार) मिलता और हरदयाल के लट्ठैत उसे वहीं काटकर यमुना में बहा देते।

उसके पास सिर्फ़ एक ही सुराग़ था।

ज़ोहरा।

वह औरत जिसकी लाश बाओली से अपने आप चलकर ग़ायब हो चुकी थी।

कबीर ने अपनी चाल तेज़ की और जामा मस्जिद के दक्षिणी दरवाज़े से होते हुए उस मशहूर बाज़ार की तरफ़ मुड़ गया जिसे उस ज़माने में संगीत, शायरी और हुस्न का मरकज़ कहा जाता था—चावड़ी बाज़ार।

6. कोठा नंबर 42 और रोती हुई उस्तानी
1954 का चावड़ी बाज़ार आज के काग़ज़ और शादी के कार्डों के बाज़ार जैसा नहीं था।

यहाँ की तीन-मंज़िला पुरानी हवेलियों की बालकोनियों पर नक्काशीदार लकड़ी के झरोखे बने हुए थे। शाम को यहाँ घुँघरुओं और तबलों की थाप गूँजती थी, मगर इस वक़्त, सुबह के आठ बजे, यहाँ एक अजीब, उदास और भयावह सन्नाटा पसरा हुआ था।

कबीर ने एक पान वाले से पूछा: "ज़ोहरा बाई का कोठा कौन सा है?"

पान वाले ने कबीर को ऊपर से नीचे तक घूरा, फिर एक ख़ास, खौफ़नाक अंदाज़ में थूकते हुए एक पीली, पुरानी हवेली की तरफ़ इशारा किया:
"सामने वाली हवेली... कत्थई दरवाज़ा। लेकिन मियाँ, आज वहाँ मौत का मातम है। कल रात से ज़ोहरा बाई ग़ायब हैं, और उनकी बूढ़ी ख़ाला छाती पीट-पीट कर रो रही हैं।"

कबीर ने भारी कदमों से उस कत्थई दरवाज़े को पार किया।

अंदर एक घुमावदार, अंधेरी सीढ़ी ऊपर जाती थी। सीढ़ियों पर चमेली के मुरझाए हुए फूलों की पत्तियाँ और इत्र की शीशियों के टूटे हुए काँच बिखरे पड़े थे। हवा में धूप-बत्ती और लोबान का घना धुआँ था।

ऊपर के बड़े दालान में एक साठ-पैंसठ साल की बूढ़ी औरत सफ़ेद मलमल का दुपट्टा ओढ़े ज़मीन पर बैठी रो रही थी। उसके चेहरे पर आंसुओं से धुला हुआ सुरमा फैला था। वह ज़ोहरा की उस्तानी (नाच-गाने की गुरु) और ख़ाला—अफ़साना बेगम—थी।

"कौन हो तुम?" अफ़साना ने कबीर की आहट सुनकर लाल, सूजी हुई आँखें उठाईं। "अगर पुलिस के मुख़बिर हो, तो निकल जाओ यहाँ से! मेरी बच्ची को उस हरदयाल दरिंदे ने मार डाला... मैं सब जानती हूँ!"

कबीर दालान के फर्श पर घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपना हुड पीछे किया।

"मैं पुलिस वाला नहीं हूँ, ख़ाला," कबीर ने बेहद धीमी और टूटी हुई आवाज़ में कहा। "और न ही मैं दीवान हरदयाल का आदमी हूँ। मैं उस ज़ोहरा का हमदर्द हूँ, जिसकी रूह कोटला के पाताल में रो रही है।"

'कोटला' का नाम सुनते ही अफ़साना बेगम का रोना अचानक थम गया।

उसकी आँखों में एक ऐसा भयानक, सिहरा देने वाला सन्नाटा छा गया जिसने कबीर की रीढ़ को ठंडा कर दिया। उसने अपने दोनों कांपते हाथ आगे बढ़ाए और कबीर के फटे हुए कोट की आस्तीन पकड़ ली।

"तुम... तुम वहाँ गए थे?" अफ़साना ने फुसफुसा कर पूछा। उसकी आवाज़ में अब आँसू नहीं, एक भयानक रहस्य था। "क्या तुमने उस ताक़ को देखा? क्या तुमने वह ख़ून देखा?"

"हाँ," कबीर ने कहा। "और मैंने यह भी देखा कि ज़ोहरा की लाश वहाँ नहीं है। वह लाश अपने पैरों पर चलकर बाहर आ चुकी है।"

अफ़साना बेगम ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया। उसके गले से एक ऐसी दबी हुई चीख़ निकली जैसे कोई रूह क़ब्र के भीतर घुट रही हो।

"वह वापस आ गई..." अफ़साना पागलों की तरह बुदबुदाने लगी। "मैंने उससे मना किया था... मैंने ज़ोहरा से कहा था कि आग के जिन्नों से खेलना इंसानों का काम नहीं है! लेकिन वह नहीं मानी... वह इंतक़ाम की आग में अंधी हो चुकी थी!"

कबीर चौंक गया। "इंतक़ाम? कैसा इंतक़ाम, ख़ाला? ज़ोहरा तो एक बेकसूर गायिका थी जिसे हरदयाल ने धोखे से मार डाला!"

"बेकसूर?" अफ़साना ने एक सर्द, खोखली हँसी हँसते हुए कबीर की आँखों में देखा।

"ज़ोहरा कोई मामूली गाने वाली नहीं थी, लड़के! वह उस प्राचीन सूफ़ी ख़ानदान की आख़िरी वारिस थी जिसे तुग़लक़ के दौर में 'आलिम-ए-ग़ैब' (अदृश्य के ज्ञाता) कहा जाता था!

सत्तर साल पहले हरदयाल ने ज़ोहरा को अपने जाल में नहीं फँसाया था... ज़ोहरा ने हरदयाल को कोटला की बाओली तक खींचने का जाल बुना था!"

कबीर का दिमाग़ चकरा गया। "क्या?!"

"ज़ोहरा जानती थी कि दीवान हरदयाल के ख़ानदान में वह पुराना शैतानी ख़ून दौड़ रहा है," अफ़साना ने दालान के कोने में रखे एक भारी, आबनूस की लकड़ी के संदूक़ की तरफ़ इशारा किया।

"ज़ोहरा ने अपनी जान की बाज़ी लगाई थी ताकि वह कोटला के उस छह उंगलियों वाले जिन्न को हमेशा के लिए एक इंसानी जिस्म में क़ैद करके ख़त्म कर सके! लेकिन हरदयाल ने ऐन वक़्त पर उस मंत्र को उलट दिया... उसने अपनी जगह ज़ोहरा की बलि चढ़ा दी!"

7. वह भयानक मोड़: देहरी पर खड़ी मौत (The Twist)
कबीर अविश्वास में अपना सिर हिला रहा था। इतिहास की हर एक परत, जिसे वह सच मानता आया था, झूठ निकल रही थी!

"तो फिर... अब जो बाओली से बाहर निकला है..." कबीर की आवाज़ सूख गई, "...वह कौन है?"

अफ़साना ने उस संदूक़ में से एक पीला, फटा हुआ नक़्शा और ज़ोहरा की हाथ से लिखी एक डायरी बाहर निकाली।

"जो बाहर निकला है, कबीर..." अफ़साना की आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि कबीर को सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा, "...वह न ज़ोहरा है, और न कोई रूह।

जब किसी तांत्रिक बलि के वक़्त मंत्र उल्टा पड़ता है, तो मरने वाले का जिस्म एक 'ख़ाली क़ब्र' बन जाता है। उस ख़ाली जिस्म में वह जिन्न दाख़िल हो जाता है जो उस ज़मीन का सबसे भूखा शैतान होता है। ज़ोहरा का जिस्म अब 'उम्म-उस-सिब्यान' (बच्चों और नस्लों को निगलने वाली प्राचीन जिन्नात-डायन) का घर बन चुका है!"

तभी—

हवेली की लकड़ी की सीढ़ियों पर एक भयानक, गीली आवाज़ गूँजी।

छप... छप... छप...

जैसे कोई अपने सड़े हुए, कीचड़ से सने नंगे पैरों को घसीटता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो।

हवा में अचानक वही घिनौनी, सड़ी हुई चमेली के तेल और कफ़न की बासी गंध इतनी तेज़ हो गई कि अफ़साना बेगम का दम घुटने लगा। दालान में जल रही पीतल की लालटेन की लौ अचानक नीली पड़ गई।

दरवाज़े की चौखट पर एक साया आकर खड़ा हो गया।

कबीर ने कांपते हुए अपनी गर्दन घुमाई।

चौखट पर ज़ोहरा खड़ी थी।

उसने वही ज़रीदार, हरी मखमली पोशाक पहनी हुई थी जो कबीर ने पाताल के दृश्य में देखी थी। लेकिन अब वह पोशाक बाओली के काले कीचड़ और जमे हुए ख़ून से सनी हुई थी।

उसका सुंदर, गोरा चेहरा एक तरफ़ से पूरी तरह सड़ चुका था; त्वचा गलकर नीचे लटक रही थी और दाँत बाहर निकल आए थे। उसकी गर्दन की नसें कटी हुई थीं, जहाँ से अब भी काला धुआँ रिस रहा था।

और उसकी आँखें...

वे आँखें इंसानी नहीं थीं। वे पूरी तरह सफ़ेद, पथराई हुई और गोल थीं, जिनके भीतर पुतलियों की जगह दो काले कीड़े रेंग रहे थे।

ज़ोहरा के उन सड़े हुए होंठों में हरकत हुई।

उसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से एक तरफ़ 90 डिग्री पर झुक गई। उसके गले के उस कटे हुए घाव के भीतर से एक ऐसी आवाज़ निकली जिसने कबीर के पूरे जिस्म के रोंगटे खड़े कर दिए:

"कबीर... बेटा..."

वह आवाज़ किसी औरत की नहीं थी।

वह आवाज़... दीवान हरदयाल की थी!

कबीर की चीख़ उसके हलक़ में ही जम गई।

"तुम... तुम्हारी आवाज़..." कबीर लड़खड़ाकर दीवार से जा सटा।

उस सड़ी हुई लाश के चेहरे पर वही धूर्त, जानी-पहचानी मुस्कान उभरी जो कबीर ने आज सुबह उस विंटेज कार वाले हरदयाल के चेहरे पर देखी थी:

*"तूने सोचा कि जो कार में घूम रहा है, वह हरदयाल है, कबीर?

नहीं मेरे बच्चे... जो कार में दरोगा के साथ घूम रहा है, वह तो कोटला का छह उंगलियों वाला मारिद जिन्न है, जिसने आज सुबह मेरे जिस्म की खाल ओढ़ ली है!

और मैं... तेरा असली परदादा... मैं तो कल रात ही मर चुका था! मेरी रूह इस तवायफ़ की सड़ी हुई लाश के भीतर क़ैद कर दी गई है!

और मुझे भूख लगी है, कबीर... अपने ही ख़ून की भूख!"*

उस लाश ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए। उसके सड़े हुए हाथों की उंगलियों के नाख़ून अचानक छुरियों की तरह लंबे हो गए, और वह कबीर की गर्दन की तरफ़ झपटी!

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