PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 5: पाताल की राख, वक़्त का भँवर और 1954 का कुहासा

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 16 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
5 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
16 min
Words
3026
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. विश्वासघात की राख और लहू का विलाप
इंसान का दिल जब टूटता है, तो उसकी आवाज़ नहीं होती; मगर जब इंसान का यक़ीन टूटता है, तो उसकी गूँज रूह की दीवारों को ढहा देती है।

कबीर उस ठंडे, काई लगे चबूतरे पर औंधे मुँह पड़ा था। उसकी दोनों हथेलियों के कटे हुए किनारों से ताज़ा, सुर्ख़ ख़ून लगातार रिस रहा था। जिन दो अतिरिक्त उंगलियों को उसने अपने पिता के कहने पर अपनी ही इच्छा से लोहे की प्राचीन छुरी से काटा था, वे कटी हुई हड्डियाँ उस पाताल-कुंड के पानी में तैर रही थीं। उनका रंग अब नीला नहीं था; वे किसी सूखी लकड़ी की तरह काली पड़ चुकी थीं।

लेकिन शारीरिक पीड़ा उस मानसिक आघात के सामने कुछ भी नहीं थी, जो अभी-अभी उस पर टूटा था।

सामने खड़ा वह बूढ़ा वजूद—मसूद अल-फ़ारूक़ी—अब किसी कमज़ोर, लाचार पिता के रूप में नहीं था। उसकी आँखों में वह घिनौनी, शैतानी चमक थी जो केवल उन तांत्रिकों के चेहरों पर होती है जिन्होंने सदियों तक कब्रों की मिट्टी फांकी हो। उसकी लंबी, सफ़ेद दाढ़ी के भीतर से काले बिच्छुओं जैसी परछाइयाँ रेंगती हुई दिख रही थीं। उसका 14वीं सदी का ज़रीदार शाही चोला हवा में इस तरह लहरा रहा था जैसे कोई विशाल चमगादड़ अपने डैने फैला रहा हो।

"तुम... तुम एक वहशी हो, मसूद..." कबीर ने अपने फटे हुए होंठों को हिलाते हुए कहा। हर शब्द के साथ उसके मुँह से ख़ून का बुलबुला फूट रहा था। "तुमने एक बेटे के आंसुओं का मज़ाक उड़ाया... तुमने मेरे मरे हुए पिता की रूह का रूप धरकर मुझे छला..."

मसूद अल-फ़ारूक़ी ने अपनी गर्दन को एक झटके से टेढ़ा किया। उसकी हड्डियों के चटकने की तीखी आवाज़ पत्थरों से टकराई।

"मज़ाक?" मसूद की आवाज़ किसी सूखी खाई में पत्थरों के गिरने जैसी थी। "अरे नादान औलाद-ए-आदम! जज़्बात और रिश्ते तो कमज़ोर इंसानों के बनाए हुए खिलौने हैं, जिनसे तुम अपनी छोटी-सी ज़िंदगी के ख़ौफ़ को बहलाते हो। जिन्नात और जादू की दुनिया में सिर्फ़ एक ही क़ानून चलता है—ताक़त! और ताक़त पाने के लिए छल सबसे पहला सबक़ होता है।"

मसूद ने ज़मीन पर पड़ी उन लोहे की भारी हथकड़ियों को अपने हाथों में उठाया। वे हथकड़ियां, जो 650 साल से उस कुएँ के पत्थरों में जड़ी थीं, अब कबीर के जिन्न-अंश के ख़ून से भीगकर पूरी तरह आज़ाद हो चुकी थीं। मसूद की कलाई पर अब कोई ज़ंजीर नहीं थी।

"सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक का यह सातवाँ कुआँ कभी ख़ाली नहीं रह सकता, कबीर," मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसके नंगे पैर जब पत्थरों पर पड़ते थे, तो ज़मीन पर जलने के काले निशान छूट जाते थे। "इस बाओली की बुनियाद में जो आग क़ैद है, उसे ठंडा रखने के लिए हर सदी में एक नया पहरेदार चाहिए होता है। सत्तर साल पहले तेरे परदादा ने अपने जिस्म का सौदा किया था, लेकिन वह डरपोक निकला। उसने अपनी तीसरी पीढ़ी को बलि का बकरा बना दिया। और आज... तूने अपनी ही उंगलियाँ काटकर उस क़ैद के दरवाज़े पर अपने दस्तख़त कर दिए हैं!"

मसूद ने लोहे की वह भारी, बर्फ़ से भी ठंडी हथकड़ी कबीर की लहूलुहान दाईं कलाई पर रख दी।

छन्नन्र...

कबीर की त्वचा पर लोहे का स्पर्श होते ही एक भयानक जलन उठी। लोहे की ज़ंजीर अपने आप किसी काले नाग की तरह हरकत में आई और कबीर की कलाई के चारों तरफ़ लिपट गई। कबीर ने चीखने की कोशिश की, मगर उसकी छाती पर मसूद का भारी, पुराना जूता आ टिका।

"चीख़ मत," मसूद ने अपनी पीली, मुर्दा आँखें कबीर के चेहरे के बिल्कुल क़रीब लाते हुए फुसफुसाया। उसके मुँह से सैकड़ों साल पुरानी क़ब्रों की सड़ी हुई मिट्टी और कपूर की दुर्गंध आ रही थी। "अब तू यहाँ बैठेगा। जब-जब दिल्ली के लोग ऊपर क़िले की दीवारों में अपनी नफ़रत की अर्जियाँ ठूँसेंगे, तब-तब इस कुएँ का पानी खौलेगा। और तू... अपने इन कटे हुए हाथों से उस खौलते पानी को अपने जिस्म पर उड़ेलेगा ताकि ऊपर का शहर जलने से बचा रहे!"

2. 1354 ईस्वी का काला पन्ना: सम्राट अशोक की लाट का सच
कबीर मसूद के पैर के नीचे दबा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें उस विशाल पाषाण स्तंभ की तरफ़ उठीं जो इस सातवें पाताल की छत को चीरता हुआ ऊपर जा रहा था—सम्राट अशोक की लाट।

कबीर एक इतिहासकार था। उसके दिमाग़ में अचानक वह सवाल कौंधा जिसने उसे वर्षों से परेशान कर रखा था: सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने हरियाणा के टोपरा गाँव से उस विशाल, सैकड़ों टन वजनी पत्थर के खंभे को इतनी मशक़्क़त करके दिल्ली क्यों मँगवाया था? इतिहास की किताबों में लिखा था कि सुलतान को प्राचीन इमारतों का शौक़ था।

लेकिन इस भयानक पाताल में खड़े होकर, कबीर को समझ आया कि इतिहास की किताबें कितनी झूठी थीं!

"तुमने उस स्तंभ को यहाँ क्यों गाड़ा था, मसूद?" कबीर ने दर्द के बीच अपनी आवाज़ में पूरी नफ़रत समेटते हुए पूछा। "वह कोई विजय स्तंभ नहीं था... वह कुछ और था!"

मसूद अल-फ़ारूक़ी का पाँव एक पल के लिए थमा। उसके चेहरे पर एक अजीब, विकृत गर्व की मुस्कान उभरी।

"तू वाक़ई इतिहास का कीड़ा है, कबीर," मसूद ने आकाश की ओर फैले उस नीले पत्थर के खंभे को देखा। "हाँ! वह कोई नुमाइश का पत्थर नहीं था। 1354 में जब तुग़लक ने फ़िरोज़ाबाद शहर बसाना शुरू किया, तो इस ज़मीन के नीचे से ऐसे भयानक जिन्नात और इफ़्रीत निकले जिन्होंने हज़ारों मज़दूरों को ज़िंदा चबा डाला। वे आग के वो प्राचीन दैत्य थे जो हज़रत सुलेमान के दौर से भी पहले इस यमुना की पुरानी धारा के नीचे सो रहे थे।"

मसूद की आँखें उस स्तंभ की ब्राह्मी लिपि पर टिक गईं:
"सुलतान का सारा लश्कर, सारे मौलवी और सारे फ़क़ीर उन जिन्नात के आगे बेबस हो गए थे। तब मैंने... मसूद अल-फ़ारूक़ी ने पुरानी यूनानी और बाबिली (Babylonian) किताबों के पन्ने खंगाले। मुझे पता चला कि टोपरा में मौर्य सम्राट अशोक का एक ऐसा लाट गड़ा है, जिस पर तथागत बुद्ध के अहिंसा और सत्य के वो पवित्र मंत्र खुदे हैं जिनकी रूहानी ताक़त किसी भी आग के जिन्न की कमर तोड़ सकती है!"

मसूद का ठहाका गुफ़ा में गूँजा:
"हमने उस लाट को उखाड़ा। रेशम की गद्दियों पर रखकर, हज़ारों कश्तियों के सहारे उसे यहाँ दिल्ली लाया गया। और फिर, मैंने उस विशाल स्तंभ को एक 'मेख़' (कील) की तरह इस ज़मीन के सीने में ठोंक दिया! वह खंभा नीचे पाताल में सोए हुए सबसे भयानक अफ़रीत की छाती पर गड़ा हुआ है! लेकिन उस स्तंभ को बाँधे रखने के लिए जो पहरेदार चुना गया... उन जिन्नों ने सुलतान को धोखा देकर मुझे ही उस स्तंभ की ज़ंजीरों में बाँध दिया!"

मसूद ने अपनी दूसरी हथकड़ी को कबीर के बाएँ हाथ पर कसना चाहा:
"साढ़े छह सौ साल तक मैं इस अंधेरे में सड़ता रहा। लेकिन आज... आज इस स्तंभ की पकड़ कमज़ोर हो चुकी है। तेरा ख़ून गिरते ही इसकी जड़ें हिल गई हैं। अब मैं ऊपर जाऊँगा... और तू यहाँ मेरी जगह सड़ेगा!"

3. ज़ोहरा की रूह का आत्मबलिदान
जैसे ही मसूद ने कबीर के बाएँ हाथ पर वह हथकड़ी चढ़ानी चाही, हवा में एक भयानक सीटी जैसी आवाज़ गूँजी।

सननन्र!

अंधेरे कोने से सफ़ेद रोशनी का एक तीर छूटा और सीधा मसूद की दाढ़ी वाले चेहरे से टकराया।

यह ज़ोहरा थी!

चावड़ी बाज़ार की वह अभागी गायिका, जिसे 1954 में कबीर के परदादा ने क़त्ल किया था, अब पूरी तरह एक शुद्ध, धधकती हुई रूहानी लपट बन चुकी थी। उसके चेहरे पर अब कोई दर्द या बेबसी नहीं थी; उसकी आँखों में सत्तर साल के इंतक़ाम की ऐसी ज्वाला थी जो किसी भी जिन्न की आग को फीका कर दे।

"मसूद! तूने इंसान होकर शैतान से भी बदतर सौदे किए!" ज़ोहरा की आवाज़ उस पूरे पाताल में गूँज उठी।

ज़ोहरा का पारदर्शी, सफ़ेद साया मसूद के दोनों कन्धों पर लिपट गया। उसकी रूहानी उंगलियों ने मसूद की आँखों को नोचना शुरू कर दिया।

"आहहह! हरामज़ादी रूह!" मसूद दर्द और क्रोध से बिलबिला उठा।

उसने कबीर की छाती से अपना पैर हटाया और ज़ोहरा के साए को अपने दोनों हाथों से पकड़कर ज़मीन पर पटकने की कोशिश की। मगर रूहें हड्डियों से नहीं बनी होतीं; ज़ोहरा का साया मसूद के जिस्म के भीतर समाने लगा, उसकी नसों में दौड़ते काले जादू को चीरने लगा।

"कबीर! उठो!" ज़ोहरा की चीख़ कबीर के दिमाग़ के भीतर किसी घंटी की तरह बजी। "अपनी उंगलियों का ख़ून देखो! वह कोई हार नहीं है... वह तुम्हारी मुक्ति की चाबी है!"

कबीर ने अपने लहूलुहान हाथों को देखा।

उसकी कटी हुई उंगलियों से बहता हुआ ख़ून उस चबूतरे की ढलान से बहकर सीधा उस गहरे कुंड में गिर रहा था जहाँ सम्राट अशोक का स्तंभ ज़मीन के भीतर धँसा हुआ था।

"ज़ोहरा... मुझे क्या करना होगा?" कबीर ने लड़खड़ाते हुए अपने घुटनों के बल खड़े होने की कोशिश की।

"वह खंभा बुद्ध का है, कबीर!" ज़ोहरा मसूद के चेहरे को अपनी रूहानी आग से जलाते हुए चीख़ी। "अशोक का धर्म त्याग और अहिंसा पर टिका था! तुमने अपने भीतर के जिन्न का त्याग अपनी मर्ज़ी से किया है! तुमने अपनी ताक़त का अहंकार छोड़ दिया! तुम्हारा यह ख़ून किसी पापी का ख़ून नहीं है... यह एक ऐसे इंसान का ख़ून है जिसने राक्षस बनने से इनकार कर दिया! उस लाट की नींव को छू लो! उस पर अपना माथा टेक दो!"

"रुक जा, कमीने!"

मसूद ने अपनी पूरी ताक़त लगाकर ज़ोहरा के साए को अपने सीने से खींचकर बाहर निकाला और अपने हाथ में पकड़ी उसी लोहे की प्राचीन छुरी को ज़ोहरा के साए के आर-पार घोंप दिया।

चीख़ख़ख़!

ज़ोहरा की रूह से नीले धुएँ का एक भयानक फव्वारा छूटा। उसका साया तिनके-तिनके होकर बिखरने लगा। उसकी आँखें कबीर की तरफ़ देख रही थीं—उन आँखों में एक अंतिम, मूक प्रार्थना थी।

"ज़ोहरा!" कबीर के सीने से एक दहाड़ निकली।

4. पाताल की आदिम धारा और महा-अफ़रीत का कंपन
कबीर के भीतर का सारा डर, सारा संकोच और सारी शारीरिक पीड़ा एक पल में भस्म हो गई।

वह दौड़ा।

अपनी कलाई में लटकी आधी बंधी लोहे की ज़ंजीर को घसीटते हुए, वह उस पवित्र कुंड के किनारे पहुँचा जहाँ सम्राट अशोक का स्तंभ पाताल की गहराई में समाया हुआ था।

मसूद अल-फ़ारूक़ी ज़ोहरा की रूह को कुचलकर पीछे से झपटा। उसके हाथों के नाख़ून कबीर की पीठ के गोश्त को चीरने ही वाले थे कि कबीर ने छलांग लगा दी।

कबीर का पूरा शरीर उस प्राचीन पाषाण लाट की विशाल, गोल सतह से जा टकराया।

उसने अपनी दोनों ख़ून से लथपथ हथेलियाँ उस स्तंभ पर खुदे हुए ब्राह्मी अभिलेखों पर चिपका दीं। उसने अपना लहूलुहान माथा उस ठंडे, पवित्र पत्थर की छाती पर टेक दिया।

"हे तथागत... हे इस ज़मीन के प्राचीन रखवाले..." कबीर के मुँह से अनजाने ही वे शब्द निकले जो उसने कभी किसी किताब में नहीं पढ़े थे, "मैंने इस आग को ठुकरा दिया है! मुझे मेरी मिट्टी वापस दे दो!"

जैसे ही कबीर का शुद्ध मानवीय ख़ून और उसका पश्चाताप उस ब्राह्मी लिपि के अक्षरों में समाया, पूरा ब्रह्मांड जैसे एक सेकंड के लिए ठहर गया।

स्तंभ पर खुदा हुआ एक-एक अक्षर किसी तपते हुए सोने की तरह चमकने लगा।

ॐ... धम्म... सत्य... शांति...

स्तंभ के भीतर से एक ऐसी ध्वनि निकली जैसे हज़ारों तिब्बती घंटियाँ और शंख एक साथ बज उठे हों। उस ध्वनि की तरंग इतनी प्रचंड थी कि मसूद अल-फ़ारूक़ी दस फीट पीछे हवा में उड़कर पत्थरों की दीवार से जा टकराया।

और फिर, बाओली के उस सातवें कुंड का पानी... सूखने लगा।

कुंड का पानी किसी विशाल भँवर की तरह नीचे की ओर खिंच गया। कुंड के तल में, जहाँ सदियों से कीचड़ और मलबा जमा था, पत्थरों की एक विशाल, चौकोर चट्टान खिसक गई।

उस चट्टान के नीचे यमुना की वह आदिम, लुप्त हो चुकी पाताल-धारा बह रही थी—चांदी जैसी चमकती हुई, बर्फीली और पवित्र नदी!

और उस धारा के बीचों-बीच, सम्राट अशोक के स्तंभ का निचला सिरा एक विशाल, सहस्र-शीर्ष (हज़ार सिरों वाले) पाताल-नाग और आग के उस महा-अफ़रीत की छाती में धँसा हुआ था, जो सदियों से गहरी समाधि में सोए हुए थे।

स्तंभ से फूटी उस दूधिया, पवित्र रोशनी ने कबीर को अपने आगोश में ले लिया।

कबीर को लगा कि उसका वज़न ख़त्म हो गया है। वह हवा में तैर रहा था। उसके घावों से ख़ून बहना बंद हो गया। उसकी कलाई में बंधी वह लोहे की हथकड़ी किसी सूखे पत्ते की तरह टूटकर उस पाताल-धारा में बह गई।

"नहीं! यह नहीं हो सकता!" मसूद पत्थरों पर पड़ा हुआ चीख़ रहा था।

उसका 650 साल पुराना जादू उस पवित्र रोशनी के आगे जल रहा था। उसका ज़रीदार चोला राख बन रहा था। उसकी दाढ़ी, उसकी चमड़ी, उसकी हड्डियाँ... सब कुछ उसी आग में गलने लगा था जिसे उसने दूसरों के लिए जलाया था।

"कबीर! तू मुझे यहाँ नहीं छोड़ सकता!" मसूद ने अपने गलते हुए हाथ कबीर की तरफ़ फैलाए। "अगर यह स्तंभ जाग गया, तो यह वक़्त की चादर को फाड़ देगा! तू कहाँ जाएगा? तू अपनी दुनिया में कभी वापस नहीं पहुँच पाएगा!"

कबीर ने नीचे गिरते हुए मसूद की तरफ़ देखा। कबीर की आँखों में अब कोई नफ़रत नहीं थी, सिर्फ़ एक शांत, गहरा विरक्ति का भाव था।

"जहाँ भी जाऊँगा, तुम्हारी इस नरक की आग से दूर जाऊँगा, मसूद।"

कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

नीचे से उस पाताल-यमुना की प्रचंड जलधारा एक विशाल बवंडर बनकर ऊपर उठी और उसने कबीर को अपने भीतर खींच लिया। कबीर का शरीर वक़्त और दिशा के किसी अनजान भँवर में घूमता हुआ, गहराइयों से निकलकर ऊपर की ओर खिंचता चला गया...

5. पत्थरों की दरार और सुबह की पहली किरण
छपाक!

कबीर की आँखें खुलीं।

वह ज़मीन पर पड़ा था। उसके फेफड़ों में ताज़ा, ठंडी हवा भर रही थी। उसने मुँह से पानी की एक बड़ी उलटी की और हांफते हुए अपनी हथेलियों को देखा।

उसकी हथेलियों पर पट्टियाँ नहीं थीं, लेकिन कटे हुए निशानों पर हल्के गुलाबी रंग के सूखे घाव थे—जैसे वे घाव आज के नहीं, बल्कि हफ़्तों पुराने हों!

उसने अपना सिर उठाया।

चारों तरफ़ घना, सफ़ेद कोहरा छाया हुआ था।

वह फ़िरोज़ शाह कोटला के खुले मैदान में था!

सामने सम्राट अशोक का वही विशाल लाट अपनी पुरानी, सामान्य मुद्रा में खड़ा था। कोई लाल आग नहीं थी। कोई छह उंगलियों वाला जिन्न नहीं था। कोई मसूद अल-फ़ारूक़ी नहीं था।

आसमान में भोर का धुंधलका था। पूरब की दिशा में यमुना के पार से सूरज की पहली, मटमैली किरणें कोहरे को चीरती हुई आ रही थीं। क़िले के पुराने नीम और पीपल के पेड़ों पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं।

दूर, बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग की तरफ़ से सुबह की पहली बसों के हॉर्न और गाड़ियों की आवाज़ें आ रही थीं।

कबीर के होंठों पर एक अविश्वास भरी, पागलपन जैसी मुस्कान खिल गई। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

"मैं बच गया..." वह घुटनों के बल बैठकर रो पड़ा। "मैं बाहर आ गया... मैं अपनी दुनिया में वापस आ गया!"

उसने अपने कपड़ों को देखा। उसकी जैकेट फटी हुई थी, उस पर मिट्टी और पत्थरों की धूल जमी थी, लेकिन वह ज़िंदा था। हाड़-मांस का इंसान!

वह लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ। उसके पैर कांप रहे थे, लेकिन वह चल सकता था।

वह कोटला के मुख्य दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। वह बस यहाँ से बाहर निकलना चाहता था—आईटीओ के किसी ढाबे पर बैठकर गर्म चाय पीना चाहता था, अपने घर जाकर अपनी माँ की तस्वीर को चूमना चाहता था, और इस पूरे रिसर्च प्रोजेक्ट को आग लगा देना चाहता था।

क़िले का बड़ा मेहराबदार दरवाज़ा सामने दिखाई दिया।

दरवाज़े के पास दो गार्ड खड़े थे। उन्होंने खाकी रंग की पुरानी वर्दी पहन रखी थी, पैरों में भारी चमड़े के जूते थे और सिर पर पुरानी शैली की खाकी टोपी थी। वे हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए आपस में बात कर रहे थे।

"भैया! ऐ गार्ड साहब!" कबीर खुशी से चिल्लाता हुआ उनकी तरफ़ भागा।

6. वह भयानक, दिल दहला देने वाला मोड़: वक़्त की सलाख़ें (The Twist)
कबीर भागता हुआ उस गार्ड की चौकी के पास पहुँचा।

"गार्ड साहब! शुक्र है आप यहाँ हैं! अंदर... अंदर कुछ बहुत भयानक हुआ था... मुझे तुरंत पुलिस को फ़ोन करना है!" कबीर हाँफते हुए चौकी की लकड़ी की मेज़ का सहारा लेकर खड़ा हो गया।

लेकिन दोनों गार्ड्स ने कबीर की तरफ़ देखा तक नहीं।

वे दोनों अपनी चाय पीते रहे और अपनी बातचीत में मशगूल रहे।

कबीर को अजीब लगा। उसने आगे बढ़कर एक गार्ड के कंधे पर हाथ रखना चाहा।

उसका हाथ गार्ड के कंधे के आर-पार निकल गया! जैसे गार्ड कोई हवा का पुतला हो!

कबीर का दिल एक बार फिर पाताल में जा गिरा। उसके गले में चीख़ फँस गई। "नहीं... नहीं, यह क्या है? क्या मैं... क्या मैं अब भी भूत हूँ?"

"अरे बलदेव सिंह," पहले गार्ड ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए दूसरे गार्ड से कहा, "अंदर बाओली की तरफ़ बड़ा सन्नाटा है आज। रात को बारिश बहुत ज़ोर की हुई थी। जामी मस्जिद के पिछले दालान में कोई लावारिस लाश पड़ी होने की इत्तिला मिली है।"

"हाँ यार," दूसरा गार्ड बोला। उसने मेज़ पर रखा आज का अख़बार उठाया। "दरियागंज थाने से दीवान साहब के ख़ानदान वाले आ रहे हैं। बेचारे बड़े रईस आदमी थे... पता नहीं यहाँ खंडहरों में क्या करने आए थे।"

कबीर की नज़र उस मेज़ पर रखे अख़बार पर पड़ी।

वह कोई आधुनिक, रंगीन अख़बार नहीं था। वह खुरदुरा, पीले पन्नों वाला दैनिक 'हिन्दुस्तान' था।

अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर बड़े-बड़े काले अक्षरों में जो तारीख़ छपी थी, उसे देखकर कबीर के पैरों तले से पूरी पृथ्वी खिसक गई।

उसकी आँखों के आगे पूरा ब्रह्मांड घूमने लगा।

अख़बार पर तारीख़ लिखी थी:

दैनिक हिन्दुस्तान — दिल्ली

मंगलवार, 14 दिसंबर 1954

कबीर के मुँह से आवाज़ नहीं निकली। उसकी साँसें पूरी तरह थम गईं।

1954?!

वह 2026 की अपनी दुनिया में वापस नहीं आया था! जब अशोक स्तंभ के नीचे पाताल-यमुना का भँवर उठा था, तो मसूद की वह आख़िरी चीख़ सच साबित हुई थी—वक़्त की चादर फट चुकी थी! वह सत्तर साल पीछे फेंक दिया गया था!

और तभी, क़िले के मुख्य दरवाज़े पर एक पुरानी, काले रंग की विंटेज ऑस्टिन कार आकर रुकी।

कार का दरवाज़ा खुला।

उसमें से दो लोग बाहर निकले।

पहला व्यक्ति दिल्ली पुलिस का एक नौजवान सब-इंस्पेक्टर था, जिसके हाथ में वही फ़ाइल संख्या 42/बी थी जिसे कबीर ने कल दोपहर राष्ट्रीय अभिलेखागार में पढ़ा था!

और उस इंस्पेक्टर के पीछे जो आदमी कार से उतरा...

उसने सफ़ेद धोती, काला कश्मीरी बंदगला कोट पहना हुआ था, चेहरे पर घनी मूंछें थीं और आँखों में वही धूर्त, लाल चमक थी...

वह कोई और नहीं... दीवान हरदयाल मेहरा था!

ज़िंदा! हाड़-मांस का इंसान!

हरदयाल अपनी जेब से घड़ी निकालते हुए इंस्पेक्टर से बोला: "चलिए दरोगा जी... बाओली के नीचे चलकर देखते हैं कि उस अभागी तवायफ़ ज़ोहरा की लाश ठिकाने लगी या नहीं..."

कबीर वहीं पत्थरों के बीच बुत बना खड़ा था।

उसे समझ आ गया था कि वह इतिहास का दर्शक नहीं था... वह उस भयानक इतिहास की उस तारीख़ में क़ैद हो चुका था, जहाँ उसके परदादा अभी-अभी अपना पहला ख़ूनी सौदा करके लौटे थे!

और सबसे भयानक बात यह थी कि जब कबीर ने कांपते हुए अपनी जेब में हाथ डाला... तो उसकी उंगलियों में वही मोम से सील किया हुआ पुराना लिफ़ाफ़ा आ टकराया, जिस पर अभी-अभी ताज़ा ख़ून से लिखा गया था:

"बनाम: कबीर मेहरा — तुम्हारी सज़ा अब शुरू होती है..."

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