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भाग 4: सात दरवाज़ों का तिलिस्म और लहू का फरेब
Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
- Chapter
- 4 of 20
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2797
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
1. आईने का ज़हर और छह उंगलियों की छटपटाहट
कबीर ने एक भयानक चीख़ के साथ अपना चेहरा पानी से पीछे खींच लिया।
उसका पूरा जिस्म इस तरह कांप रहा था जैसे किसी ने उसकी रीढ़ में सीधे बिजली का नंगा तार जोड़ दिया हो। उसने अपनी दोनों हथेलियों को अपनी आँखों के सामने फैलाया।
पानी के प्रतिबिंब में जो दिखा था, वह कोई वहम नहीं था।
उसकी दोनों हथेलियों के बाहरी किनारों पर—जहाँ छोटी उंगली के ठीक बग़ल की त्वचा चिकनी होनी चाहिए थी—वहाँ की नसें नीली पड़कर केंचुए की तरह रेंग रही थीं। त्वचा के भीतर कुछ ज़िंदा था, कुछ ऐसा जो हड्डियों को तोड़कर, माँस को फाड़कर बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था। देखते ही देखते, दोनों हाथों में एक-एक अतिरिक्त, पतली और नुकीली उंगली की हड्डी त्वचा को तानती हुई उभर आई। पोरों पर काले, गिद्ध जैसे नाख़ून फूटने लगे थे।
"यह... यह मेरे साथ क्या हो रहा है?" कबीर ने अपने फटे हुए कोट को छाती से भींचते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब एक अजीब, दोहरी गूँज थी। जब वह बोलता था, तो उसकी मानवीय आवाज़ के ठीक पीछे एक प्राचीन, धातु जैसी ठंडी और भारी आवाज़ अपने आप निकलती थी।
सामने बैठा उसका पिता—राजीव मेहरा—ज़मीन पर अपने घुटनों के बल गिरा हुआ था। उसकी हथकड़ी की ज़ंजीरें बाओली के उस काले कुंड में खिंची हुई थीं।
"मैंने कहा था न, कबीर..." राजीव की आँखों से आँसू बहकर उनकी सूखी दाढ़ी पर जम रहे थे, "वह ताँबे की अंगूठी कोई आभूषण नहीं थी। वह 'सील-ए-सुलेमानी' की एक शाख थी, जिसे तेरे दादा ओमकार ने तिब्बत के एक लामा और निज़ामुद्दीन के एक सूफ़ी बुज़ुर्ग से चालीस दिन तक लोहे और ताँबे पर दम करवा कर तैयार करवाया था। वह अंगूठी तेरे जिस्म के भीतर सोई हुई उस 'नार' (आग) को दबाकर रखे हुए थी।"
"आग? कैसी आग, पापा?" कबीर पागलों की तरह चीख़ा। उसने आगे बढ़कर राजीव के दोनों कंधे पकड़ लिए। "मैं आपका बेटा हूँ! कबीर मेहरा! दिल्ली में पैदा हुआ, मॉडर्न स्कूल में पढ़ा, डीयू का रिसर्चर! मेरे दादा सर्राफ़ थे, परदादा दीवान थे! आप मुझे जिन्न कैसे कह सकते हैं?"
राजीव ने सिर उठाकर कबीर की आँखों में देखा। उन आँखों में जो दर्द था, उसने कबीर के सुन्न पड़ते दिल को भीतर तक छलनी कर दिया।
"तू इंसान ही है, मेरे बच्चे... लेकिन पूरा नहीं," राजीव की आवाज़ एक धीमी, रुआंसी फुसफुसाहट में बदल गई। "सत्तर साल पहले, 1954 में... जब तेरे परदादा हरदयाल ने उस ज़ोहरा नाम की गायिका की बलि इस बाओली में चढ़ाई थी, तब उस मारिद जिन्न ने सिर्फ़ दौलत नहीं दी थी। जिन्नात इंसानों की दुनिया में हमेशा के लिए दाख़िल होने के रास्ते तलाशते हैं। मारिद ने हरदयाल की औलाद के ख़ून में अपना एक क़तरा मिला दिया था। तेरे दादा उस ज़हर से बच गए क्योंकि वे पहले ही पैदा हो चुके थे... मैं बच गया क्योंकि मेरी माँ ने मुझे बचपन से तावीज़ों में बाँध रखा था।"
राजीव ने कांपते हाथों से कबीर के गाल को छुआ। उनका हाथ बर्फ़ की तरह ठंडा था, लेकिन कबीर की चमड़ी अब अंगारे की तरह तप रही थी।
"लेकिन तेरी पैदाइश के वक़्त, कबीर... उस रात पुरानी दिल्ली में ऐसा तूफ़ान आया था कि जामा मस्जिद के मीनारों से पत्थर गिर पड़े थे। तू गुरुवार की रात ठीक 12 बजे पैदा हुआ था, जिस पल पूर्ण चंद्रग्रहण लगा था। तेरी पीठ पर पैदाइशी तौर पर छह पसलियाँ थीं और सीने पर आग से जले हुए जैसा एक गहरा लाल निशान था। तेरे दादा समझ गए थे कि सत्तर साल पुरानी वह नज़र अब जिस्म ले चुकी है। तू 'जिन्न-ज़ादा' नहीं है, कबीर... तू वह 'दरवाज़ा' है जिसके ज़रिये कोटला के हज़ारों क़ैद जिन्नात इंसानों की दिल्ली पर टूट पड़ने का इंतज़ार कर रहे हैं!"
2. सात फाटकों का खुलना और शहरपनाह की रूहें
इससे पहले कि कबीर इस भयानक सच को पचा पाता, बाओली के इस सातवें पाताल की पत्थरीली दीवारों में भयानक दरारें पड़ने लगीं।
गड़गड़ाहट... चर्र्र... धड़ाम!
वह भूमिगत कक्ष, जिसे कबीर अब तक एक सुरक्षित गुफ़ा समझ रहा था, हिलने लगा। छत पर चमकती हुई नीली रोशनी बुझने लगी और उसकी जगह एक खूनी, मैला पीला धुआँ गुफ़ा के कोनों से रिसने लगा।
पानी के उस शांत कुंड में बड़े-बड़े भँवर उठने लगे।
और फिर, उस गोल कक्ष की चारों दिशाओं में बने सात विशाल, लोहे के मेहराबदार दरवाज़े—जो सदियों से भारी ताले और ज़ंजीरों से बंद थे—एक के बाद एक अपने आप खुलने लगे।
पहला दरवाज़ा खुला: उसमें से बर्फीली हवा का ऐसा बवंडर आया जिसमें बारूद और सड़ी हुई लाशों की बदबू थी। यह कश्मीरी गेट की तरफ़ से आने वाली रूहें थीं—1857 के ग़दर में अंग्रेज़ों की तोपों से उड़ाई गई उन हज़ारों बेकसूर शहरियों की चीखती हुई रूहें, जिनके कंकाल आज भी पुरानी दिल्ली की ज़मीन के नीचे दफ़्न हैं।
दूसरा दरवाज़ा खुला: उसमें से ताज़े बकरे के ख़ून और कफ़न के इत्र की गंध आई। यह तुर्कमान गेट के खूनी दरगाहों के जिन्नात थे, जो सदियों से सूफ़ियों के हुक्म पर ज़मीन के नीचे क़ैद थे।
तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, छठा...
दिल्ली के सातों दरवाज़ों के पाताल एक-दूसरे से जुड़ गए।
अजमेरी गेट, दिल्ली गेट, मोरी गेट, लाहौरी गेट—हर दरवाज़े के नीचे दबी हुई उस पुरानी, खूनी दिल्ली का अंधेरा सिमटकर इस सातवें कुएँ में उतर आया था।
हवा में हज़ारों फुसफुसाहटें गूँजने लगीं।
कबीर के कानों में सिर्फ़ आवाज़ें नहीं आ रही थीं; उसके दिमाग़ के भीतर दिल्ली शहर की हर एक सड़क, हर एक गली का दर्द किसी लाइव रेडियो स्टेशन की तरह बजने लगा। वह सुन सकता था कि ऊपर, बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर गाड़ियों में बैठे लोग क्या सोच रहे थे। वह सुन सकता था कि दरियागंज के किसी पुराने मकान में बैठी एक बूढ़ी औरत अपने बेटे की बीमारी के लिए किस पीर को पुकार रही थी। वह सुन सकता था कि कोटला की जामी मस्जिद की दीवारों में आज शाम जिन हज़ारों लोगों ने अपनी अर्जियाँ ठूँसी थीं, उन अर्जियों के हर एक शब्द में कितना ज़हर और कितना लालच भरा था!
"आहहह!" कबीर ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसका दिमाग़ फटने को था।
ज्ञान और अनुभूतियों का यह बोझ किसी सामान्य इंसान के लिए असंभव था। यह वही सर्वज्ञता (omniscience) थी जो केवल उच्च श्रेणी के जिन्नात के पास होती है—वे हवा के ज़रिये हज़ारों मील दूर की कानाफूसियाँ सुन सकते हैं।
"तुम्हारी आँखें अब सिर्फ़ सामने का मंज़र नहीं देख रहीं, कबीर..."
एक आवाज़ आई।
कबीर ने कांपते हुए आँखें उठाईं।
सातवें दरवाज़े के मुहाने पर वही छह उंगलियों वाला मुंसिफ़ जिन्न खड़ा था। मगर अब वह अकेला नहीं था। उसके पीछे छह और दैत्याकार वजूद खड़े थे। किसी का सिर भेड़िए जैसा था, किसी के जिस्म से नीली लपटें निकल रही थीं, तो कोई पूरी तरह काले, गाढ़े तरल जैसा था जो ज़मीन पर रेंगता हुआ आकार बदल रहा था।
यह कोटला की 'मजलिस-ए-सबआ' (सात जिन्नात की सर्वोच्च परिषद) थी!
मुंसिफ़ जिन्न ने अपने छह उंगलियों वाले हाथ को अपने सीने पर रखा और कबीर के सामने अपनी गर्दन झुका दी।
"सलाम, ऐ वारिस-ए-आतिश!" मुंसिफ़ की आवाज़ में अब नफ़रत नहीं, एक गहरी, डरावनी श्रद्धा थी। "सत्तर साल तक इस कमज़ोर इंसान (राजीव) ने हमें इस कुएँ में बाँध कर रखा था। लेकिन जैसे ही तूने इस पानी को छुआ, तेरे पुरखों के ख़ून ने उस पुराने सुलेमानी तिलिस्म की चूलें हिला दीं। अब यह अदालत तेरी है। हुक्म दे, और हम आज रात इस पूरी दिल्ली को उसी आग में झोंक दें जिसमें हम सदियों से जल रहे हैं!"
3. बाप की अंतिम वसीयत और लोहे की छुरी
"नहीं! कबीर, इनकी बात मत सुनना!"
राजीव मेहरा अपनी हथकड़ियों को खींचते हुए पागलों की तरह चीख़े। लोहे की ज़ंजीरों ने उनकी कलाई का गोश्त काट दिया था, ख़ून की धार ज़मीन पर बह रही थी।
"यह सब फ़रेब है! जिन्नात कभी किसी के ग़ुलाम नहीं होते!" राजीव ने कबीर के पैर पकड़ लिए। "ये तुम्हें सुल्तान नहीं बना रहे हैं, कबीर... ये तुम्हारे जिस्म को एक मशाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जिस पल तुमने इनके हुक्मनामे पर अपनी छह उंगलियों की मुहर लगा दी, तुम्हारा मानवीय दिमाग़ जलकर ख़ाक हो जाएगा, और उस खाली खोपड़ी में यह पूरा आलम-ए-बरज़ख़ आकर बैठ जाएगा!"
कबीर ने अपने पिता की तरफ़ देखा। उसकी आँखों के नीले अंगारे एक पल के लिए मद्धम पड़े। उसके भीतर का वह इंसान—वह लड़का जिसे उसके पिता ने उंगली पकड़कर इंडिया गेट पर आइसक्रीम खिलाई थी—अचानक उस आग के समंदर से बाहर झाँका।
"पापा... मुझे क्या करना होगा? मैं यह सब नहीं चाहता... मुझे वापस जाना है! मुझे अपनी पुरानी, मामूली ज़िंदगी चाहिए!" कबीर रो पड़ा। उसकी आँखों से जो आँसू गिरे, वे पानी की बूँदें थीं, आग नहीं।
राजीव ने अपने कुर्ते की अंदरूनी जेब में हाथ डाला।
उनकी उंगलियों में एक पुरानी, ज़ंग लगी, सात इंच लंबी लोहे की छुरी थी। उस छुरी के मूठ पर पीतल के तारों से कुछ अरबी और संस्कृत के श्लोक आपस में गूँथे हुए थे।
"यह वह छुरी है जिससे 1354 में कोटला की जामी मस्जिद की पहली बुनियाद का पत्थर तराशा गया था," राजीव ने हांफते हुए वह छुरी कबीर के हाथ में थमा दी।
लोहे की छुरी की छुअन मिलते ही कबीर के हाथ की नसों में दौड़ती वह नीली आग एक पल के लिए थम गई। लोहा—जिन्नात की सबसे बड़ी कमज़ोरी।
"तुझे अपनी उस छठी उंगली को... दोनों हाथों की उन अतिरिक्त हड्डियों को इस छुरी से काटकर इस पवित्र पानी में बहाना होगा, कबीर!" राजीव ने सिसकते हुए कहा। "यह दर्द ऐसा होगा जैसे तेरी आत्मा को ज़िंदा छील दिया जाए। लेकिन अगर तूने उन दोनों हड्डियों को इनके मुकम्मल होने से पहले काट दिया, तो तेरे जिस्म का जिन्नात से ताल्लुक़ हमेशा के लिए कट जाएगा! तू बच जाएगा, मेरे बच्चे!"
"और आपका क्या होगा, पापा?" कबीर ने थरथराते हाथों से उस ठंडी छुरी को पकड़ा।
राजीव के चेहरे पर एक ऐसी शांत, निर्मल मुस्कान उभरी जो केवल उन लोगों के चेहरे पर होती है जिन्होंने अपनी मौत को बहुत पहले स्वीकार कर लिया हो।
"मेरी क़ैद तो उसी दिन पूरी हो गई थी जिस दिन मैंने इस ज़ंजीर को थामा था। तू जब अपनी उंगली काटेगा, तो उस ख़ून से इस कुएँ का तिलिस्म टूटेगा। मैं आज़ाद हो जाऊँगा... अपनी असली दुनिया के लिए।"
4. हड्डियों का कटना और चीख़ों का सैलाब
मुंसिफ़ जिन्न ने जब कबीर के हाथ में वह प्राचीन लोहे की छुरी देखी, तो उसके चेहरे की श्रद्धा एक झटके में विकराल, हिंसक क्रोध में बदल गई।
"नादान कीड़े! तू उस आग को ठुकरा रहा है जिसके आगे सुलतानों ने अपने ताज उतार दिए?"
जिन्न दहाड़ा और आगे झपटा।
मगर सातवें कुएँ के चबूतरे पर सम्राट अशोक के स्तंभ की अदृश्य दीवार अब भी मौजूद थी। जिन्न जैसे ही आगे बढ़ा, नीली बिजलियों के सैकड़ों झटके उसके जिस्म पर पड़े। जिन्न का साया छटपटाकर पीछे हटा।
"वक़्त नहीं है, कबीर! काट इसे!" राजीव चीख़े।
कबीर ने एक लंबी, कांपती साँस ली। उसने अपने बाएँ हाथ को उस चौकोर पत्थरीली सिल्ली पर रखा।
उसकी छठी उंगली अब पूरी तरह उभर चुकी थी—काली, पपड़ीदार और नाख़ूनों से लैस। वह उंगली अपने आप हिल रही थी, जैसे उसका अपना एक अलग दिमाग़ हो।
कबीर ने अपनी आँखें बंद कीं। उसने अपने दाँतों के बीच अपने फटे हुए कोट का एक टुकड़ा दबा लिया।
और फिर, पूरी ताक़त से उसने वह ज़ंग लगी लोहे की छुरी अपनी उस छठी उंगली की जड़ पर दे मारी!
खचाक!
एक ऐसा दर्द उठा जिसकी कबीर ने अपने बुरे से बुरे सपने में भी कल्पना नहीं की थी।
यह कोई साधारण माँस कटने का दर्द नहीं था। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी रीढ़ की हड्डी के भीतर उबलता हुआ सीसा उड़ेल दिया हो। उसके दिमाग़ की एक-एक नस फटने लगी। कबीर के मुँह से निकली चीख़ कोट के कपड़े को चीरती हुई उस पाताल के पत्थरों से टकराई।
काली, सड़ी हुई हड्डी कटकर अलग हो गई।
उस कटे हुए जोड़ से लाल ख़ून नहीं, बल्कि गहरा, नीला, धधकता हुआ लावा जैसा तरल बहा और सीधा उस पवित्र कुंड के पानी में जा गिरा।
जैसे ही वह जिन्न-अंश उस पानी में गिरा, बाओली की गहराइयों से एक ऐसा धमाका हुआ जिसने पूरी ज़मीन को हिला दिया।
कबीर दर्द के मारे दोहरा हो गया। उसकी आँखों के आगे सफ़ेद सितारे नाचने लगे। मगर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने लहूलुहान, कांपते दाएँ हाथ से उस छुरी को उठाया और अपने दाहिने हाथ की छठी उंगली पर वार करने के लिए हाथ उठाया।
"शाबाश, कबीर... बस एक वार और!" राजीव की आवाज़ आई।
कबीर ने दूसरा वार किया।
तड़ाक!
दूसरी उंगली भी कटकर कुंड में गिर पड़ी।
कबीर का पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। वह मुँह के बल गीले पत्थरों पर गिर पड़ा। उसकी दोनों हथेलियों से अब नीला लावा नहीं, बल्कि इंसानों जैसा लाल, ताज़ा, गर्म ख़ून बह रहा था। उसके चेहरे की काली राख जैसी चमड़ी छूटकर गिरने लगी। उसकी आँखें वापस अपनी सामान्य, इंसानी शक्ल में लौटने लगीं।
उसने कराहते हुए सिर उठाया।
सामने खड़े मुंसिफ़ जिन्न और उसकी मजलिस के तमाम साए हवा में तिनकों की तरह बिखर रहे थे। वे चीख़ रहे थे, उनकी ताकत छिन चुकी थी। वे सातों दरवाज़े एक-एक करके भारी धमाकों के साथ बंद हो रहे थे।
"मैं... मैंने कर दिया, पापा..." कबीर ने ख़ून से सनी उंगलियों से ज़मीन को टटोलते हुए कहा। "दरवाज़े बंद हो रहे हैं... हम... हम आज़ाद हैं..."
5. वह रूह-कँपा देने वाला मोड़: पानी का बहरूपिया (The Twist)
कबीर ने राहत की सांस लेते हुए अपने पिता की तरफ़ देखा।
वह उनके गले लगना चाहता था, उनके पाँव छूना चाहता था।
लेकिन जब कबीर की नज़र राजीव मेहरा पर पड़ी... तो उसकी साँसें एक बार फिर उसके हलक़ में अटक गईं।
राजीव मेहरा अपनी जगह पर खड़े थे।
उनकी कलाई पर बंधी वह लोहे की भारी हथकड़ी... पिघल चुकी थी!
मगर उनके चेहरे पर किसी पिता की राहत या प्यार का भाव नहीं था।
राजीव का वह रोता हुआ, असहाय और बूढ़ा चेहरा धीरे-धीरे एक ऐसी मुस्कान में बदल रहा था जो इतनी ठंडी, इतनी क्रूर और इतनी प्राचीन थी कि उसे देखकर कबीर के रोंगटे खड़े हो गए।
राजीव ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए।
उनकी हथेलियों पर कोई ज़ख़्म नहीं था। उनकी कलाई का गोश्त, जो अभी कुछ पल पहले ज़ंजीरों से कटा हुआ दिख रहा था, बिल्कुल साफ़ और बेदाग़ था।
"पा... पापा?" कबीर ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।
राजीव धीरे से हँसे।
उनकी हँसी ऐसी थी जैसे किसी सूखे मक़बरे में हज़ारों हड्डियाँ एक साथ खड़खड़ा रही हों। और फिर, उनके मुँह से जो आवाज़ निकली... वह राजीव मेहरा की आवाज़ नहीं थी।
वह 1354 ईस्वी की उस पुरानी, दरबारी फ़ारसी की लय में बोली जाने वाली एक ऐसी आवाज़ थी जिसमें सदियों की हुकूमत की गूँज थी:
"तेरा बाप? सचमुच, कबीर... तुम इंसान अपने जज़्बातों के कितने बड़े ग़ुलाम होते हो!"
कबीर की आँखें दहशत से फैल गईं।
राजीव का शरीर अचानक लंबा होने लगा। उसकी सफ़ेद कमीज़ और खाकी पैंट किसी राख की तरह झड़कर गिर गई। उस शरीर के ऊपर 14वीं सदी का एक भारी, ज़रीदार शाही चोला और गले में काले मोतियों की मालाएँ उभर आईं।
उसका चेहरा राजीव का नहीं था। वह एक सत्तर साल का, लंबी सफ़ेद दाढ़ी वाला, तीखी चील जैसी आँखों वाला एक प्राचीन बुज़ुर्ग था, जिसके माथे पर एक गहरा, जला हुआ तांत्रिक तिलिस्म खुदा हुआ था!
कबीर पीछे की ओर घिसटने लगा। "तुम... तुम कौन हो? मेरे पापा कहाँ हैं?"
उस प्राचीन साए ने अपने हाथ में वही लोहे की छुरी उठा ली, जिसे कबीर ने अभी ज़मीन पर छोड़ा था:
"तेरा बाप तीन साल पहले अपोलो अस्पताल में ही मर चुका था, कबीर! उसकी रूह उसी दिन इस दुनिया के बंधनों से छूटकर अपने रब के पास चली गई थी। जो यहाँ बैठा था... वह मैं था!"
उस साए ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा और एक ख़ौफ़नाक ठहाका लगाया:
"मेरा नाम मसूद अल-फ़ारूक़ी है... सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक का शाही आलिम और जिन्न-गीर (जिन्नों को क़ैद करने वाला तांत्रिक)!
1354 में जब सुलतान ने इस बाओली को तामीर करवाया था, तब कोटला के जिन्नात ने बग़ावत करके मुझे इस सातवें कुएँ में सम्राट अशोक की लाट की सुलेमानी ज़ंजीरों से बाँध दिया था! वे ज़ंजीरें केवल एक ही चीज़ से पिघल सकती थीं—किसी ऐसे जिन्न-ज़ादा के शुद्ध ख़ून से, जिसने अपनी मर्ज़ी से अपनी जिन्न-हड्डियों की बलि इस पानी में दी हो!"
कबीर का दिमाग़ सुन्न पड़ गया। उसकी रीढ़ की हड्डी में जैसे किसी ने बर्फ़ का खंजर घोंप दिया हो।
"तुमने... तुमने मुझे धोखा दिया?" कबीर की आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"धोखा?" मसूद अल-फ़ारूक़ी ने अपनी तीखी, पीली आँखें कबीर पर गड़ा दीं।
"मैंने तेरे ही ज़ेहन की सबसे कमज़ोर रग को पकड़ा! वह टेप रिकॉर्डर... वह हथकड़ियाँ... वह बाप का रूप... सब कुछ एक जाल था ताकि तू अपनी मर्ज़ी से अपनी उन दोनों जिन्न-उंगलियों को काट दे!
अगर वे उंगलियाँ तेरे हाथ में रहतीं, तो तू इस सल्तनत का नया हाकिम बन जाता, और मैं हमेशा के लिए तेरी ज़ंजीरों में जकड़ा रहता। लेकिन तूने ख़ुद... अपने ही हाथों से अपनी वह रूहानी ताक़त काटकर इस पानी में फेंक दी! तूने मुझे आज़ाद कर दिया, कबीर!"
मसूद ने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए।
पूरे सातवें पाताल की ज़मीन फटने लगी। अशोक स्तंभ की वह नीली, सुरक्षात्मक रोशनी एक भयानक धमाके के साथ बुझ गई!
"और अब..." मसूद की आवाज़ किसी कयामत के बिगुल की तरह गूँजी, "चूँकि तू अब न पूरा जिन्न रहा और न पूरा इंसान... तू इस खाली, बंजर बाओली का नया पहरेदार बनेगा! हमेशा के लिए!"
मसूद ने वह लोहे की हथकड़ी—जो अब ठंडी हो चुकी थी—ज़मीन से उठाई और कबीर की तरफ़ बढ़ गया...