PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 3: हड्डियों का सौदा और आवाज़ों का फ़रेब

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 15 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
3 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
15 min
Words
2894
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. गोश्त में धँसती ताँबे की कील
कबीर की उंगली में आग का गोला दहक रहा था।

वह अंगूठी, जिसे वह पिछले पाँच सालों से अपने हाथ में एक साधारण ख़ानदानी अमानत समझकर पहने हुए था, अब कोई धातु का छल्ला नहीं रह गई थी। तराज़ू और दो तलवारों वाले उस लांछन की धारदार नक्काशी कबीर की अनामिका उंगली (ring finger) की त्वचा को चीरकर भीतर, सीधी नस और हड्डी में उतर चुकी थी। जहाँ-जहाँ ताँबे का सिरा छू रहा था, वहाँ से ख़ून नहीं, बल्कि काला, गाढ़ा, सड़ा हुआ पानी रिस रहा था, जिसकी गंध बाओली के सड़े हुए मलबे जैसी थी।

"उतार... इसे उतार दे, कबीर!" उसके पिता की आवाज़ उस छोटे से वॉयस रिकॉर्डर के स्पीकर से फटी-फटी, घुरघुराती हुई गूँज रही थी।

रिकॉर्डर की छोटी लाल बत्ती ख़ून की तरह फड़क रही थी। कबीर के हाथ-पैर पत्थरों से लिपटे हुए सायों की पकड़ में जकड़े थे, मगर उसका दायाँ हाथ, जिसे उसने पूरी ताक़त से झटककर छुड़ाया था, कांपता हुआ बाएँ हाथ की उंगली तक पहुँचा। उसने अपनी तर्जनी और अँगूठे से उस जलती हुई अंगूठी को पकड़ा।

"छूना मत उसे!"

सिंहासन से उतरकर आ रहे दीवान हरदयाल की रूह चीख़ी। उसकी आवाज़ में वही ख़ानदानी अहंकार था जो पुरानी हवेलियों के सड़े हुए दीवानख़ानों में गूँजता था। "वह कोई ज़ेवर नहीं है, नादान! वह तेरे बदन का बयाना (down payment) है! सत्तर बरस पहले मैंने अपनी उंगली का पोर काटकर उस धातु को पकाया था। अगर तूने उसे खींचा, तो तेरी उंगली ही नहीं, तेरे दिल की नस तक खिंच जाएगी!"

कबीर ने परदादा की धमकी नहीं सुनी। मौत और जिस्म छिन जाने का ख़ौफ़ हर दर्द से बड़ा था। उसने दाँत भींच लिए, इतने ज़ोर से कि उसके मसूड़ों से ख़ून फूट पड़ा, और उसने उस अंगूठी को बाहर की तरफ़ खींचा।

चर्र्र्र...

मांस के फटने की आवाज़ आई। कबीर के मुँह से ऐसी चीख़ निकली जिसने उस पाताल की छत से लटकी हज़ारों रूहों को एक पल के लिए थर्रा दिया। अंगूठी के भीतरी हिस्से पर बारीक, ज़हरीले काँटे बने हुए थे, जो हड्डी की सतह को खुरचते हुए बाहर आ रहे थे। उंगली की चमड़ी उधड़ गई थी, सफ़ेद हड्डी की चमक साफ़ दिखने लगी थी।

जैसे ही अंगूठी का पहला सिरा बाहर निकला, हरदयाल की रूह के चेहरे पर भयानक खलबली मच गई।

वह पारदर्शी, बूढ़ा साया जो हवा में तैर रहा था, अचानक विकृत होने लगा। उसके चेहरे का गोश्त उधड़ने लगा और उसकी आँखों के गड्ढों से सफ़ेद धुआँ फूट पड़ा। "मुंसिफ़! रोक इसे! इसका हाथ काट दे!" हरदयाल ने पागलों की तरह छह उंगलियों वाले जिन्न को हुक्म दिया।

2. दिमाग़ के भीतर दो रूहों का कुरुक्षेत्र
मुंसिफ़ जिन्न ने आगे बढ़कर अपना छह उंगलियों वाला भारी पंजा हवा में लहराया।

मगर इससे पहले कि वह पंजा कबीर की गर्दन तक पहुँचता, हवा में ज़ोहरा का साया बिजली की तरह कौंधा। ज़ोहरा की पारदर्शी, सफ़ेद रूह ने उस जिन्न की जलती हुई कलाई को दोनों हाथों से थाम लिया।

"सुलतान की इस मस्जिद में कोई मुआहिदा पूरा होने से पहले किसी पर हाथ नहीं उठ सकता!" ज़ोहरा की आवाज़ में किसी मल्लिका जैसी ताक़त थी। "कबीर, पूरी ताक़त लगा! इस अंगूठी की जड़ तेरे दिमाग़ में है, हाथ में नहीं!"

कबीर ने अपनी बची-खुची जान लगाकर एक आख़िरी झटका दिया।

कड़क!

हड्डी के चटकने की भयानक आवाज़ के साथ वह अंगूठी उंगली से अलग होकर जलते हुए लकड़ी के पुल पर गिर पड़ी।

जिस पल वह धातु की कील ज़मीन पर गिरी, पूरे आलम-ए-बरज़ख़ में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने वक़्त का गला घोंट दिया हो। कबीर की उंगली से काला पानी बहना बंद हो गया और लाल, शुद्ध ख़ून की बूँदें टपकने लगीं।

लेकिन राहत की सांस लेने का मौक़ा नहीं मिला।

अंगूठी के छूटते ही, दीवान हरदयाल का साया किसी फटे हुए ग़ुब्बारे की तरह हवा में फैला और एक झटके में कबीर के खुले मुँह और नाक के नथुनों के रास्ते उसके जिस्म के भीतर समा गया!

"आहहह!"

कबीर की रीढ़ की हड्डी में ऐसा भयानक करंट दौड़ा कि उसकी पीठ कमान की तरह पीछे मुड़ गई। उसके दोनों पैर ज़मीन से छह इंच ऊपर उठ गए। उसकी आँखों की पुतलियाँ पलट गईं—सिर्फ़ सफ़ेद हिस्सा बाहर रह गया।

अब कबीर का जिस्म एक ऐसा अखाड़ा बन चुका था जहाँ दो अलग-अलग सदियों के ख़ून आपस में लड़ रहे थे।

उसके दिमाग़ के भीतर एक भयानक विस्फोट हुआ। कबीर अपने ही ज़ेहन की गहराइयों में धकेल दिया गया था, जहाँ केवल अंधकार था। और उस अंधकार में, उसके सामने उसके परदादा हरदयाल खड़े थे।

"यह बदन मेरा है, कबीर!" हरदयाल की आवाज़ उसके दिमाग़ की नसों में हथौड़े की तरह बज रही थी। "तेरी सोच, तेरी यादें, तेरी मोहब्बत, तेरी तालीम... सब ख़ाक है! मैं इस जिस्म को 1954 के उस वैभव में ले जाऊँगा जहाँ मेरा नाम सुनकर दिल्ली का कमिश्नर भी सलाम ठोकता था!"

कबीर को महसूस हुआ कि उसके दाएँ हाथ पर से उसका नियंत्रण ख़त्म हो रहा था।

उसका दायाँ हाथ अपने आप उठने लगा। उसकी उंगलियाँ मुड़कर ठीक वैसी ही मुद्रा बनाने लगीं जैसी दीवान हरदयाल अपनी पुरानी तस्वीरों में कुर्सी पर बैठकर बनाया करते थे। कबीर के होंठ उसकी मर्ज़ी के बिना हिले, और उसके गले से एक भारी, खुरदुरी, बूढ़ी आवाज़ निकली:
"ज़ोहरा... तूने सोचा था कि तू मुझे रोक लेगी? मैं वापस आ गया हूँ... मैं ज़िंदा हूँ!"

"नहीं!" कबीर ने अपनी आत्मा की पूरी ताक़त से अपने ही दिमाग़ के भीतर चीख़ मारी। "यह मेरा जिस्म है! यह मेरा वक़्त है! तुम सत्तर साल पहले मर चुके एक लालची, कायर बुज़ुर्ग हो जिसने अपनी दौलत के लिए एक बेकसूर औरत को काट डाला था! तुम मेरे कुछ नहीं लगते!"

कबीर ने अपने बाएँ हाथ से—जिस पर अभी उसका नियंत्रण था—अपने ही दाएँ हाथ की कलाई को पकड़ लिया।

वह अपने आप से लड़ रहा था। उसका बायाँ हाथ दाएँ हाथ को मरोड़ रहा था। उसका अपना दाँत उसके अपने निचले होंठ को इतनी ज़ोर से काट रहा था कि ख़ून की धार उसकी ठुड्डी से बहकर छाती पर गिर रही थी।

यह लड़ाई केवल मांसपेशियों की नहीं थी; यह संकल्प की लड़ाई थी। कबीर ने अपनी ज़िंदगी की उन यादों को याद करना शुरू किया जो उसे ज़िंदा इंसान बनाती थीं—उसकी माँ का चेहरा, उसकी पढ़ाई, दिल्ली की ठंडी सुबहों में दोस्तों के साथ पी गई चाय, उसका वजूद। उसने अपनी हर एक सच्ची याद को एक हथियार की तरह हरदयाल की उस सड़ी हुई रूह के चेहरे पर दे मारा।

हरदयाल की रूह दर्द से बिलबिला उठी। "तू मुझे बाहर नहीं निकाल सकता! तेरा ख़ून मेरा है!"

"मेरा ख़ून ज़रूर तेरा है, लेकिन मेरी रूह पर सिर्फ़ मेरा हक़ है!" कबीर ने मानसिक धरातल पर हरदयाल के साए का गला पकड़ लिया।

3. अशोक स्तंभ की गुप्त सीढ़ियाँ
ज़मीन पर, बाओली के इस पाताल में, कबीर का शरीर भयानक झटकों के साथ तड़प रहा था।

मुंसिफ़ जिन्न ने ज़ोहरा के साए को झटककर दूर फेंक दिया था। ज़ोहरा की रूह पत्थरों से टकराकर कमज़ोर पड़ चुकी थी, उसकी सफ़ेद रोशनी बुझने के क़रीब थी।

"बेवक़ूफ़ लड़के!" ज़ोहरा ने ज़मीन पर घिसटते हुए अपनी आवाज़ कबीर के कानों तक पहुँचाई। "अपने ज़ेहन की लड़ाई में मत उलझ! अशोक की लाट के नीचे उतर! उस स्तंभ की नींव में वह पानी है जो इस पाताल की आग को बुझा सकता है! अगर तूने वह पानी छू लिया, तो तेरे परदादा की रूह जलकर राख हो जाएगी!"

कबीर ने अपने आधे लकवाग्रस्त जिस्म को घसीटना शुरू किया।

उसका दायाँ पैर आगे बढ़ने से इनकार कर रहा था; हरदयाल की रूह उसे पीछे खींच रही थी। मगर कबीर अपने बाएँ पैर और बाएँ हाथ के सहारे पत्थरों पर रेंगने लगा। हर इंच की दूरी तय करने में उसे ऐसा लग रहा था मानो वह पिघले हुए शीशे पर चल रहा हो।

सामने वह विशाल अशोक स्तंभ खड़ा था।

जैसे-जैसे कबीर उस स्तंभ के चबूतरे के क़रीब पहुँच रहा था, उस पाषाण लाट की ब्राह्मी लिपि से निकलती नीली रोशनी और तेज़ होने लगी। उस रोशनी के छूते ही कबीर के दाएँ हाथ में मची हरदयाल की छटपटाहट कमज़ोर पड़ने लगी। परदादा की रूह चीख़ने लगी—यह रोशनी उसके लिए तेज़ाब जैसी थी।

कबीर चबूतरे की पहली सीढ़ी पर चढ़ गया।

यहाँ ज़मीन ठंडी थी, लेकिन यह बर्फ़ की चुभन वाली ठंड नहीं थी; यह गंगाजल जैसी पवित्र और शांत शीतलता थी। कबीर ने देखा कि स्तंभ के ठीक नीचे, पत्थरों के बीच एक संकरा, गोल छेद था, जहाँ से नीचे की ओर जाती हुई बहुत पुरानी, घुमावदार सीढ़ियाँ दिखाई दे रही थीं। उन सीढ़ियों के भीतर से पानी के बहने की हल्की, संगीतमय आवाज़ आ रही थी—जैसे कोई भूमिगत झरना सदियों से पत्थरों के सीने में बह रहा हो।

"कबीर! रुक जा!"

पीछे से मुंसिफ़ जिन्न की गरजती हुई आवाज़ आई।

जिन्न अब हवा में नहीं तैर रहा था; वह अपने विशाल, दैत्याकार पंजों से ज़मीन को रौंदता हुआ सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ रहा था। लेकिन जैसे ही उसका पैर अशोक स्तंभ के चबूतरे के नीले घेरे पर पड़ा, एक भयानक विस्फोट हुआ—तड़ाक!

जिन्न का पंजा झुलस गया। काले धुएँ के गुबार उठे। जिन्न दर्द और बेबसी से दहाड़ उठा। वह उस पवित्र घेरे के भीतर दाख़िल नहीं हो सकता था! सम्राट अशोक के उस स्तंभ पर खुदे हुए तथागत बुद्ध के अहिंसा और सत्य के वचनों की रूहानी ताक़त किसी भी जिन्न या शैतान की सीमा से परे थी।

"तू वहाँ हमेशा नहीं छिप सकता, कबीर!" जिन्न ने घेरे के बाहर खड़े होकर अपनी छह उंगलियों वाला मुक्का पत्थरों पर मारा। "नीचे जो पानी है, वह तुझे आज़ाद नहीं करेगा... वह तुझे उस सच से मिलाएगा जिसे जानने के बाद तू ख़ुद अपनी जान की भीख माँगेगा!"

कबीर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उसके भीतर बैठा हरदयाल अब पागलों की तरह गिड़गिड़ा रहा था: "मत जा नीचे, कबीर! मेरी बात मान... मैं तेरा परदादा हूँ! मैं तुझे छोड़ दूँगा, मैं वापस चला जाऊँगा... लेकिन नीचे मत उतरना! वहाँ वह क़ैद है जिसे हमने सत्तर साल पहले दफ़्न किया था!"

परदादा की गिड़गिड़ाहट ने कबीर के शक को यक़ीन में बदल दिया। अगर हरदयाल नीचे जाने से डर रहा था, तो उसकी मुक्ति का रास्ता उसी अंधेरे कुएँ में था।

कबीर ने अपने आधे सुन्न जिस्म को उस संकरे छेद में धकेल दिया और सीढ़ियों से नीचे लुढ़क गया।

4. सातवाँ कुआँ और पानी का पहरेदार
सीढ़ियाँ इतनी संकरी थीं कि कबीर के कंधे दोनों तरफ़ की दीवारों से छिल रहे थे। वह दस-पंद्रह सीढ़ियाँ फिसलते हुए नीचे गिरा और सीधा ठंडे, निर्मल पानी के एक बड़े कुंड में जा समाया।

छपाक!

पानी में गिरते ही कबीर के सिर के भीतर एक ज़ोरदार धमाका हुआ।

वह पानी कोई साधारण कुएँ का पानी नहीं था। वह बाओली का वह मूल सोता (underground spring) था, जो सीधे यमुना की उस प्राचीन, लुप्त हो चुकी धारा से जुड़ा था जो हज़ारों साल पहले यहाँ बहती थी।

पानी की छुअन मिलते ही, कबीर के मुँह से काले धुएँ का एक विशाल बवंडर बाहर निकला।

दीवान हरदयाल की रूह उस पवित्र पानी की ताक़त को बर्दाश्त नहीं कर सकी। वह साया कबीर के जिस्म से बाहर खिंच आया और पानी की सतह पर तड़पने लगा।

"कबीर! तूने अपने ही ख़ानदान की क़ब्र खोद दी!" हरदयाल की रूह चीख़ी, और देखते ही देखते वह साया उस पानी में उठती नीली भाप में घुलकर हमेशा के लिए भाप बनकर उड़ गया।

कबीर ने राहत की एक लंबी, गहरी साँस ली।

उसका बदन हल्का हो चुका था। उसका दायाँ हाथ, उसकी आँखें, उसका दिमाग़—सब कुछ अब पूरी तरह उसका अपना था। उसने अपनी कटी हुई उंगली को पानी में डुबोया। हैरानी की बात यह थी कि उस पानी में हाथ डालते ही उसका दर्द पूरी तरह ग़ायब हो गया, और कटी हुई त्वचा पर नई चमड़ी उभरने लगी।

कबीर पानी से निकलकर एक सूखे, पत्थरीले चबूतरे पर बैठ गया।

यहाँ की हवा बिल्कुल साफ़ थी। कोई गंधक नहीं, कोई सड़ा हुआ चमेली का तेल नहीं। गुफ़ा की छत पर हज़ारों जुगनुओं जैसी नीली रोशनी चमक रही थी, जिससे पूरा भूमिगत कक्ष जगमगा रहा था।

कक्ष के बीचों-बीच, पानी की धारा के पास, एक बहुत पुरानी लकड़ी की मेज़ रखी थी। और उस मेज़ पर... वही टेप रिकॉर्डर रखा हुआ था, जिसकी आवाज़ कबीर ने ऊपर सुनी थी!

कबीर भौंचक्का रह गया।

उसका अपना वॉयस रिकॉर्डर तो उसकी जेब में था! उसने झट से अपनी जैकेट की जेब टटोली।

उसकी जेब ख़ाली थी।

उसका डिजिटल रिकॉर्डर जेब में नहीं था। मेज़ पर जो रिकॉर्डर रखा था, वह कोई आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं था; वह 1970 के दशक का एक भारी, पुराना कैसेट प्लेयर (spool tape recorder) था, जिसके दोनों पहिये धीरे-धीरे घूम रहे थे।

और उस रिकॉर्डर के सामने, पानी में पाँव लटकाए, एक इंसान बैठा था।

उसने खाकी रंग की पुरानी पैंट और सफ़ेद कमीज़ पहनी हुई थी। उसके बाल खिचड़ी थे, कंधे झुके हुए थे, और वह एक पीतल के लोटे से लगातार पानी भरकर बाओली के कुंड में वापस उढ़ेल रहा था।

कबीर के दिल की धड़कन एक बार फिर थम गई।

उस इंसान की पीठ कबीर की तरफ़ थी। मगर वह कद-काठी, बैठने का वह अंदाज़, वह झुके हुए कंधे... कबीर उस शख़्स को दुनिया की किसी भी भीड़ में पहचान सकता था।

"पा... पापा?" कबीर के होंठों से एक अविश्वास भरी फुसफुसाहट निकली।

5. वह रूह-कँपा देने वाला सच: बाप का साया (The Twist)
वह इंसान धीरे-धीरे मुड़ा।

कबीर की चीख़ उसके सीने में ही घुट गई।

सामने जो चेहरा था, वह किसी रूह या साए का नहीं था। वह हाड़-मांस का ज़िंदा इंसान था—कबीर के पिता, राजीव मेहरा!

वही चेहरा, वही चश्मा, वही आवाज़। लेकिन उनकी आँखों में ज़िंदा इंसानों जैसी चमक नहीं थी; उनकी आँखें उन अंधी गुफ़ाओं जैसी थीं जो सदियों से सूरज की रोशनी को तरस रही हों।

कबीर के दिमाग़ में एक भयानक भूचाल आ गया।

"नहीं... यह मुमकिन नहीं है," कबीर लड़खड़ाते हुए पीछे हटा। "पापा... आप तो तीन साल पहले अपोलो अस्पताल में... कार्डियक अरेस्ट से... मैंने ख़ुद आपका दाह-संस्कार किया था! निगमबोध घाट पर... मैंने ख़ुद मुखाग्नि दी थी!"

राजीव मेहरा ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ पीतल का लोटा नीचे रख दिया। उनकी सूखी, पपड़ीदार उंगलियों ने उस पुराने टेप रिकॉर्डर का 'स्टॉप' बटन दबाया।

टेप की वह आवाज़—जो कबीर को सीढ़ियों पर सुनाई दे रही थी—अचानक बंद हो गई।

"जिस शरीर को तुमने जलाया था, कबीर," राजीव मेहरा की आवाज़ बिल्कुल वही थी, शांत, गंभीर और अपार दुखों से भरी हुई, "वह मेरा शरीर नहीं था। वह मिट्टी का एक पुतला था जिसे कोटला के जिन्नात ने मेरे कपड़ों में लपेटकर तुम्हारे हवाले कर दिया था।"

कबीर के पैरों के नीचे की ज़मीन सचमुच धँसने लगी। "क्या कह रहे हैं आप? आप... आप ज़िंदा हैं? यहाँ... इस पाताल में?"

राजीव ने अपनी कमीज़ की आस्तीन ऊपर उठाई।

उनकी दाहिनी कलाई पर लोहे की एक भारी, जंग लगी हथकड़ी पड़ी थी, जिसकी ज़ंजीर बाओली के उस गहरे, अथाह कुएँ के भीतर डूबी हुई थी।

"सत्तर साल पुराना सौदा सिर्फ़ दीवान हरदयाल का नहीं था, कबीर," राजीव ने भर्राए हुए गले से कहा। "जब मेरे पिता ओमकार मेहरा को पता चला कि हरदयाल ने ख़ानदान की तीसरी पीढ़ी को गिरवी रख दिया है, तो उन्होंने अपनी जान दे दी। और जब मुझे पता चला कि तुम—मेरा इकलौता बेटा—पच्चीस साल की उम्र में इस जिन्न की खुराक बनने वाले हो... तो मैं तीन साल पहले चुपचाप यहाँ आया था।"

राजीव की आँखों से आँसू बहकर उनके गालों पर जमने लगे:
"मैंने उस छह उंगलियों वाले जिन्न से भीख माँगी थी। मैंने कहा था कि मेरे मासूम बच्चे को छोड़ दो। जिन्न ने एक सौदा मंजूर किया। उसने कहा कि अगर कोई तुम्हारे ख़ून का इंसान अपनी मर्ज़ी से इस पाताल की बाओली का 'आबदार' (जल-वाहक) बनना स्वीकार कर ले, तो वह तुम्हारी रूह को सीधा नहीं छुएगा।"

कबीर की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

"तो... तो आपने अपनी ज़िंदगी..."

"मैंने अपने आपको इस ज़ंजीर से बाँध दिया, कबीर," राजीव ने सिसकते हुए कहा। "पिछले तीन सालों से मैं दिन-रात इस कुंड से पानी भरकर उस आग को बुझाने की कोशिश कर रहा हूँ जो कोटला के जिन्नात को ज़िंदा रखती है। लेकिन..."

राजीव की आवाज़ अचानक रुक गई। उनके चेहरे पर एक ऐसा भयानक, डरावना खौफ़ उभरा जिसे देखकर कबीर की रूह कांप गई।

"लेकिन क्या, पापा?" कबीर ने आगे बढ़कर अपने पिता का हाथ पकड़ना चाहा।

राजीव ने एक झटके में अपना हाथ पीछे खींच लिया।

"लेकिन तुमने सब बर्बाद कर दिया, कबीर!" राजीव की आवाज़ में अब प्यार नहीं, एक खौफ़नाक चीख़ थी। "वह रिकॉर्डर... वह आवाज़ जो तुमने ऊपर सुनी... वह तुम्हें बचाने के लिए नहीं थी! वह टेप जिन्न ने मुझसे ज़बरदस्ती रिकॉर्ड करवाई थी ताकि तुम वह अंगूठी उतार सको!"

कबीर का दिमाग़ सुन्न पड़ गया। "अंगूठी? मगर अंगूठी तो हरदयाल की रूह को बाँधे हुए थी..."

"नहीं, कबीर!" राजीव दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर रोने लगे।

"वह अंगूठी हरदयाल की नहीं थी! वह सुलेमानी ताँबे की मुहर थी, जिसे तुम्हारे दादा ओमकार ने तुम्हारी पैदाइश के वक़्त तुम्हारे जिस्म पर बाँधा था ताकि कोटला की कोई भी रूह या जिन्न तुम्हारी असली पहचान न जान सके! वह अंगूठी एक सुरक्षा कवच थी!

और जब तक वह अंगूठी तुम्हारी उंगली में थी, तुम इस पाताल में महज़ एक 'मुसाफ़िर' थे... लेकिन जैसे ही तुमने वह अंगूठी उतारी और तुम्हारा ख़ून उस लाट पर गिरा..."

राजीव ने कांपते हुए अपनी उंगली कबीर के सीने की तरफ़ उठाई:

"तुमने अपने इंसान होने का आख़िरी ताल्लुक़ तोड़ दिया, कबीर! मुड़कर पानी में अपना चेहरा देखो!"

कबीर का दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा उसकी पसलियाँ टूट जाएँगी।

वह घुटनों के बल झुका और उस नीले, शांत कुंड के पानी में झाँका।

पानी की सतह पर जो अक्स (प्रतिबिंब) दिखाई दिया, वह कबीर मेहरा का नहीं था।

पानी के भीतर से जो चेहरा उसे देख रहा था, उसकी चमड़ी राख की तरह काली थी। उसकी आँखों की जगह दो धधकते हुए नीले अंगारे जल रहे थे। और उसके दोनों हाथों में... सामान्य पाँच नहीं, बल्कि छह-छह उंगलियाँ थीं!

और सबसे भयानक बात यह थी कि पानी में दिख रहे उस चेहरे के होंठ कबीर की मर्ज़ी के बिना मुस्कुराए, और पानी के भीतर से वही आवाज़ गूँजी जो अब तक मुंसिफ़ जिन्न की थी:

"स्वागत है, कोटला के नए सुल्तान... सत्तर साल की क़ैद ख़त्म हुई!"

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