PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 2: आलम-ए-बरज़ख़ और छह उंगलियों वाला मुंसिफ़

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 19 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
2 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
19 min
Words
3686
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. पिघलती देह और नार-ए-समोम का ज़हूर
वह मंज़र किसी भी इंसानी ज़ेहन के बर्दाश्त से बाहर था।

बूढ़े क़ासिम का चेहरा किसी तपते हुए तवे पर रखी मोम की तरह पिघलकर कबीर के बूटों के पास गिर रहा था। उसकी आँखों के सफ़ेद ढेले अपनी जगहों से खिसक कर गल चुके थे, और उन ख़ाली गड्ढों के भीतर से गहरा, लसलसाता काला धुआँ उबल रहा था। चमड़ी के नीचे न कोई गोश्त था, न हड्डियाँ; वहाँ सिर्फ़ एक धधकता हुआ लाल-नारंगी अलाव था, जो बिना किसी धुएँ के, ख़ामोशी से जल रहा था—वही आग जिसे पुरानी किताबों में ‘नार-ए-समोम’ (धुएँ रहित ज़हरीली आग) कहा गया है, जिससे जिन्नात की तख़लीक़ हुई थी।

क़ासिम के फटे हुए ऊनी कोट की आस्तीन को चीरता हुआ जो हाथ बाहर निकला, वह किसी इंसान का हो ही नहीं सकता था। वह राख के रंग का था, जिस पर सूखी छाल जैसी पपड़ियाँ जमी थीं। उसकी उंगलियाँ सामान्य से डेढ़ गुना लंबी थीं, जिनके सिरों पर काले, मुड़े हुए गिद्ध जैसे नाख़ून थे। और सबसे भयानक थी उसकी छठी उंगली—अँगूठे के ठीक बग़ल से निकली हुई एक अतिरिक्त, पतली और हरकत करती हुई उंगली, जिसके पोरों पर ताज़ा, गाढ़ा ख़ून चमक रहा था।

कबीर ज़मीन पर पड़ा पीछे की ओर घिसटने लगा। उसके हाथ-पाँव कांप रहे थे, और ज़मीन पर बिछी वह काली, चिपचिपी 'बारिश' उसके कपड़ों को जलाकर त्वचा में चुभन पैदा कर रही थी।

"क़ासिम... तुम... तुम क्या हो?" कबीर के मुँह से निकली आवाज़ किसी मरते हुए परिंदे की फड़फड़ाहट जैसी थी।

उस जलती हुई देह के भीतर से जो आवाज़ निकली, वह अब किसी बूढ़े डाकिया की नहीं थी। वह ऐसी आवाज़ थी जैसे भारी लोहे के दो विशाल दरवाज़े आपस में टकराए हों, जिसमें सैकड़ों मरे हुए लोगों की अंतिम चीखें एक सुर में गूँज उठी हों:

"डाकिया तो ख़त पहुँचाने का जरिया था, कबीर। ख़त जब अदालत में पेश हो गया, तो डाकिए की क्या ज़रूरत? मैं वह हूँ जिसकी चौखट पर तेरे पुरखों ने अपनी पगड़ियाँ उतारी थीं। मैं 'मीर-ए-आतिश' का मुंसिफ़ हूँ... इस क़िले का क़ाज़ी!"

एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ वह पिघलती हुई देह फट गई।

हवा में इतनी तेज़ तपिश की लहर दौड़ी कि कबीर के सिर के बाल और भौंहें झुलसने लगीं। सामने जो वजूद खड़ा था, वह लगभग दस फीट ऊँचा था। उसका जिस्म किसी ठोस साए जैसा था जो किनारों से लगातार जल रहा था। उसके सीने में पसलियों की जगह लोहे के गर्म सरिए जैसे ढाँचे थे, जिनके भीतर इंसानी खोपड़ियों के आकार के अंगारे दहक रहे थे। उसका चेहरा लगातार बदल रहा था—कभी वह बूढ़ा क़ासिम दिखता, कभी 1954 के दीवान हरदयाल का चेहरा बनता, तो कभी कबीर का अपना चेहरा बनकर एक क्रूर हँसी हँसने लगता।

कबीर ने अपनी आँखें ज़ोर से मींच लीं। "यह झूठ है... यह सिर्फ़ एक न्यूरोलॉजिकल शॉक है... ऑक्सीजन की कमी है..." वह पागलों की तरह बुदबुदाया।

"आँखें बंद करने से हक़ीक़त नहीं बदलती, मेहरा के ख़ून!"

उस जिन्न ने अपना छह उंगलियों वाला भारी हाथ हवा में लहराया। एक तेज़, बवंडर जैसी आँधी चली। कबीर हवा में उछला और कई मीटर दूर जाकर पत्थरों के एक खंभे से टकराया। उसकी पीठ में ऐसी टीस उठी जैसे रीढ़ की कोई हड्डी चटक गई हो। उसके मुँह से ख़ून का एक नमकीन घूँट निकलकर होंठों पर बह आया।

जब उसने दर्द से कराहते हुए आँखें खोलीं, तो कोटला का नक़्शा पूरी तरह बदल चुका था।

2. पत्थरों का पुनर्निर्माण और कागज़ी अज़ाब
कबीर जहाँ पड़ा था, वह अब कोई बीसवीं सदी का वीरान खंडहर नहीं था।

समय ने जैसे अपनी चाल उल्टी चल दी थी। उसके सामने 1354 ईस्वी की फ़िरोज़ शाह तुग़लक की वह विशाल जामी मस्जिद अपने पूरे वैभव और भयानक रूप में दोबारा खड़ी हो रही थी। जो पत्थर ज़मीन पर टूटे पड़े थे, वे किसी अदृश्य चुंबक के खिंचाव से हवा में उड़कर अपनी-अपनी जगहों पर जुड़ रहे थे। मेहराबें तन गईं, बुर्ज आसमान की ओर उठ गए, और उन पत्थरों की दरारों से खून जैसी लाल रौशनी फूटने लगी।

लेकिन यह कोई इंसानी शहर नहीं था।

यह 'आलम-ए-बरज़ख़' था—ज़िंदों की दुनिया और मुर्दों की दुनिया के बीच फंसा वह पाताल, जहाँ कोटला के जिन्नात इंसानों की दी हुई अर्जियों, उनकी नफ़रतों और उनके लालच को अपनी हुकूमत की ईंटें बनाकर राज करते थे।

मस्जिद के विशाल सहन (आँगन) में हज़ारों की तादाद में परछाइयाँ खड़ी थीं।

वे सब इंसान थे—या कभी इंसान रहे होंगे। उनके बदन कंकाल जैसे सूखे हुए थे, उनके चेहरों पर चमड़ी नहीं थी, और उनकी आँखें ख़ाली गढ्ढों की तरह थीं जिनमें से पीला, मवाद जैसा पानी बह रहा था।

और सबसे भयानक बात यह थी कि उन सभी रूहों के गलों, हाथों और पैरों में लोहे की नहीं, बल्कि काग़ज़ की ज़ंजीरें बँधी हुई थीं!

कबीर ने सिहर कर देखा। वे काग़ज़ वही अर्जियाँ थीं जो सदियों से लोग गुरुवार को कोटला की दीवारों में ठूँसते आए थे।

एक रूह के गले में सैकड़ों फ़ोटो और अर्ज़ियाँ लिपटी हुई थीं, जिन पर लिखा था: ‘हे बाबा, इसे बर्बाद कर दो...’ वह रूह ज़मीन पर घिसट रही थी और उन काग़ज़ों का वज़न किसी टन भर वजनी लोहे जैसा था। काग़ज़ के किनारे छुरियों की तरह तेज़ थे, जो उस रूह के पारदर्शी जिस्म को हर पल काट रहे थे, और हर कट से धुएँ की बूँदें टपक रही थीं।

"देखा तुमने?" उस छह उंगलियों वाले मुंसिफ़ की आवाज़ आसमान की पत्थरीली छत से टकराकर गूँजी।

वह विशाल जिन्न हवा में तैरता हुआ मस्जिद के ऊँचे मिंबर (मंच) पर जाकर बैठ गया।

"तुम्हारे शहर के ज़िंदा इंसान समझते हैं कि वे यहाँ आकर अपनी नफ़रत का सौदा मुफ़्त में कर जाते हैं। कोई अपनी भाभी के लिए मौत माँगता है, कोई अपने भाई की जायदाद छीनने की दुआ करता है। वे नहीं जानते कि जब वे किसी दूसरे के लिए अज़ाब माँगते हैं, तो उनकी उस अर्ज़ी पर उनका अपना अंगूठा लग जाता है। मरने के बाद उनकी रूहें यहाँ खिंच आती हैं, और वे अपने ही लिखे हुए लफ़्ज़ों की ज़ंजीरों में तब तक जकड़े रहते हैं, जब तक यह दुनिया ख़ाक नहीं हो जाती!"

कबीर ने देखा कि एक रूह तड़पती हुई उसके क़रीब आई।

उस रूह का चेहरा किसी 30-35 साल के नौजवान जैसा था, जिसके बदन पर 1980 के दशक के फटे हुए कपड़े थे। उसने अपने दोनों हाथों से कबीर के बूट पकड़ लिए। उसकी उंगलियाँ बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडी थीं।

"बचा लो... बाबूजी, बचा लो..." वह रूह सिसकी। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी सूखे कुएँ में हवा सीटी बजा रही हो। "मैंने 1988 में अपनी चाची के नाम अर्ज़ी दी थी कि उसका घर उजड़ जाए। मेरा काम तो हो गया, लेकिन जिस दिन मेरी सड़क हादसे में मौत हुई, जिन्नात के काले साए मुझे सीधे यहाँ खींच लाए। पिछले छत्तीस बरसों से मैं अपनी ही उस अर्ज़ी के काग़ज़ चबा रहा हूँ... यहाँ से कोई वापस नहीं जाता! कोई नहीं!"

कबीर ने घिन और दहशत से अपना पैर पीछे खींचना चाहा, मगर उस रूह की पकड़ लोहे की ज़ंजीर जैसी मज़बूत थी।

तभी मिंबर पर बैठे जिन्न ने अपनी उंगली का इशारा किया। एक अदृश्य कोड़े की आवाज़ आई—तड़ाक!

वह रूह चीखती हुई हवा में उछली और पीछे खड़े हज़ारों सायों के झुंड में जा गिरी।

3. ख़ानदानी गुनाह और दीवान हरदयाल का सच
"अब तुम्हारी बारी है, कबीर मेहरा," मुंसिफ़ ने कहा। उसकी लाल, अंगारे जैसी आँखें कबीर के चेहरे पर गड़ गईं।

कबीर ने दीवार का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की। उसके हाथ-पाँव कांप रहे थे, लेकिन उसके भीतर का वह तर्कवादी इंसान, जो अपनी जान बचाने के लिए किसी भी तिनके को पकड़ना चाहता था, अचानक जाग उठा।

"अगर तुम कोई अदालत हो... अगर तुम कोई मुंसिफ़ हो, तो इंसाफ़ करो!" कबीर अपनी पूरी ताक़त समेटकर चीख़ा। उसकी आवाज़ उस विशाल, अभिशप्त मस्जिद के पत्थरों में गूँजी। "मैंने कोई अर्ज़ी नहीं दी! मैंने किसी के लिए बर्बादी नहीं माँगी! मैंने किसी जिन्न से कोई सौदा नहीं किया! तुम मुझे यहाँ किस हक़ से रोक सकते हो?"

मिंबर पर बैठा जिन्न ज़ोर से हँसा। उसकी हँसी से ऊपर लटके हुए साए थर-थर कांपने लगे।

"हक़? जिन्नात की सल्तनत में हक़ ख़ून से तय होता है, कबीर! क्या तूने वह इक़रारनामा नहीं पढ़ा जो तेरे परदादा ने अपने ख़ून से लिखा था?"

"वह मेरे परदादा थे! मैं नहीं!" कबीर ने तर्क दिया। "आधुनिक क़ानून हो या कुदरत का निज़ाम, कोई भी औलाद अपने बाप-दादा के गुनाहों की सज़ा नहीं भुगत सकती!"

"यह इंसानों की कमज़ोर अदालत नहीं है, कबीर मेहरा," जिन्न की आवाज़ में एक सर्द, ज़हरीली मिठास घुल गई। "जब हरदयाल मेहरा ने 1954 में अपनी तिजोरियों को सोने से भरने के लिए हमसे मदद माँगी थी, तब हमने उससे कहा था कि जिन्नात का दिया हुआ रिज़्क़ (दौलत) मुफ़्त नहीं आता। उसके एवज़ में आग की खुराक देनी होती है। हरदयाल ने अपनी मर्ज़ी से कहा था कि वह अपनी तीसरी नस्ल की रूह हमें नज़र करेगा।"

जिन्न ने अपनी छह उंगलियों वाला पंजा आगे बढ़ाया।

हवा में एक दृश्य तैरने लगा—जैसे पानी की सतह पर कोई फ़िल्म चल रही हो।

कबीर ने देखा:

1954 की वही सर्द रात थी। कोटला की बाओली का वही निचला तहख़ाना था।

एक पचास-पचपन साल का रोबदार आदमी, जिसने भारी कश्मीरी बंदगले का कोट पहना था और उंगली में वही तराज़ू वाली ख़ानदानी अंगूठी थी—दीवान हरदयाल मेहरा! वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठा था।

लेकिन वह अकेला नहीं था।

उसके बग़ल में एक अठारह-उन्नीस साल की बेहद ख़ूबसूरत लड़की ज़मीन पर बेहोश पड़ी थी। उसने पुरानी दिल्ली की तवायफ़ों जैसी ज़रीदार पोशाक पहनी हुई थी। उसके माथे से ख़ून की एक पतली लकीर बह रही थी।

हरदयाल के सामने वही छह उंगलियों वाला जिन्न खड़ा था।

हरदयाल की आवाज़ उस दृश्य में साफ़ सुनाई दे रही थी:

"हुज़ूर, यह ज़ोहरा है... चावड़ी बाज़ार की सबसे मशहूर गुलूकारा (गायिका)। यह मुझ पर जान देती थी। मैं इसे अपनी मोहब्बत के झांसे में यहाँ तक ले आया हूँ। इसका ख़ून इस चौखट पर बहाइए... मेरी दौलत का रास्ता खोलिए! और सत्तर साल बाद, मेरी तीसरी पीढ़ी का जो वारिस होगा, वह आपकी इस सल्तनत की हमेशा की ख़िदमत के लिए हाज़िर होगा!"

उस जिन्न ने एक पल में उस बेबस लड़की की गर्दन पर अपना खूनी पंजा रख दिया था। लड़की की रूह उसके मुँह से नीले धुएँ की शक्ल में बाहर निकली और उस पीतल के दीये में समा गई...

दृश्य ग़ायब हो गया।

कबीर का सिर चकरा गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

जिस परदादा की तस्वीर उसके ड्राइंग रूम में सोने के फ्रेम में लटकी थी, जिसे पूरा परिवार 'दानी और पुण्यात्मा' कहकर पूजता था... वह दरिंदा अपनी दौलत के लिए एक बेकसूर लड़की की बलि देकर गया था! और उस पाप की क़ीमत उसने अपने परपोते—कबीर—के सिर मढ़ दी थी!

"नहीं..." कबीर के घुटने ज़मीन पर टिक गए। "यह... यह वहशियाना है..."

"हरदयाल ने अपना वादा निभाया," जिन्न ने कहा। "उसने तुम्हें पैदा होने से पहले ही इस आग में झोंक दिया था। और आज, जब तुम्हारा ख़ून उस इक़रारनामे पर गिरा, तो अदालत की मुहर मुकम्मल हो गई। अब तुम हमारे हो।"

जिन्न ने अपना हाथ उठाया। कबीर के सीने में ऐसा भयानक खिंचाव महसूस हुआ जैसे कोई अदृश्य हाथ उसकी पसलियों को चीरकर उसके दिल को बाहर खींच रहा हो। उसकी साँसें उखड़ने लगीं। उसकी आँखें बाहर को उबलने लगीं।

4. बाओली की गहराई और ज़ोहरा की सदा
"रुको! अदालत का एक क़ानून अभी बाक़ी है!"

सन्नाटे को चीरती हुई एक पतली, दर्दभरी मगर तीखी आवाज़ गूँजी।

कबीर ने अपनी आधी बंद हो चुकी आँखों से देखा।

मस्जिद के सहन के पिछले कोने में, जहाँ बाओली का मुहाना था, वहाँ से एक सफ़ेद, धुंधली आकृति आगे बढ़ रही थी। वह कोई बदसूरत कंकाल या भयानक साया नहीं था। वह वही लड़की थी जिसे कबीर ने अभी उस तिलिस्मी दृश्य में देखा था—ज़ोहरा!

उसकी आँखों में आँसू थे, मगर उसके चेहरे पर गज़ब का जलाल था। उसके गले में भी एक काग़ज़ की ज़ंजीर थी, मगर उस ज़ंजीर पर ख़ून के ताज़ा निशान थे।

मुंसिफ़ जिन्न के चेहरे पर पहली बार एक हल्की-सी बेचैनी की शिकन उभरी। उसकी आँखों के अंगारे और तेज़ भड़क उठे।

"ज़ोहरा! तू अपनी क़ैद की हद से बाहर कैसे आई? क्या तुझे इस आग का खौफ़ नहीं?" जिन्न की आवाज़ में गुर्राहट थी।

ज़ोहरा ने अपने पारदर्शी, कांपते हुए हाथ कबीर के आगे फैला दिए। उसने कबीर के सामने एक ढाल की तरह खड़े होकर उस दैत्य की आँखों में देखा।

"मैं सत्तर बरसों से इस बाओली के सातवें कुएँ में जल रही हूँ, मीर-ए-आतिश!" ज़ोहरा की आवाज़ में सदियों का दर्द था। "मगर सुलेमानी क़ानून कहता है कि जिस सौदे में कोई गवाह ज़िंदा हो, उस सौदे की फ़रियाद दोबारा सुनी जा सकती है! हरदयाल ने मुझे क़त्ल करके मेरा ख़ून इस ज़मीन को दिया था, लेकिन उसने इक़रारनामे की दूसरी शर्त पूरी नहीं की थी!"

कबीर ने ज़मीन पर पड़े-पड़े ज़ोहरा की तरफ़ देखा। "दूसरी... शर्त?"

ज़ोहरा कबीर की तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखों में ऐसा गहरा अपनापन और अफ़सोस था जिसने कबीर के सुन्न पड़ते दिल को एक बार फिर धड़कने पर मजबूर कर दिया।

"कबीर," ज़ोहरा ने फुसफुसा कर कहा, "तुम्हारे परदादा ने इस शैतान को सिर्फ़ तुम्हारा जिस्म देने का वादा नहीं किया था। उसने एक शर्त रखी थी कि अगर तीसरी नस्ल का वारिस इस अदालत के सामने अपनी बेगुनाही का सबूत दे दे, या उस प्राचीन लाट (अशोक स्तंभ) के उस हिस्से को छू ले जहाँ 'अहिंसा' का फ़रमान खुदा है... तो यह आग का दायरा टूट जाएगा!"

"ख़ामोश, तवायफ़!" जिन्न दहाड़ा।

उसने अपनी छह उंगलियों वाला पंजा ज़मीन पर दे मारा। ज़मीन फटी और आग की लपटें ज़ोहरा के साए की तरफ़ लपकीं। ज़ोहरा दर्द से चीख़ उठी, उसका साया धुएँ में बदलने लगा।

"भागो कबीर!" ज़ोहरा ने अपनी पूरी रूहानी ताक़त से चीख़ कर कहा। "अशोक की लाट की तरफ़ भागो! वह इस आलम का हिस्सा नहीं है... वह उस दौर की है जब यहाँ कोई नफ़रत नहीं थी! अगर तुमने उसके चबूतरे को छू लिया, तो यह जिन्न तुम्हें हाथ नहीं लगा सकता!"

5. पत्थरों की भूलभुलैया और परछाइयों का हमला
कबीर को सोचने का वक़्त नहीं था।

ज़ोहरा के साए ने उस जिन्न की आग को चंद पलों के लिए अपने ऊपर रोक लिया था। कबीर ने अपने फटे हुए कोट को समेटा और मस्जिद के पिछले दरवाज़े की तरफ़ पूरी ताक़त से दौड़ लगा दी।

मगर यह कोई आम दौड़ नहीं थी।

जैसे ही वह मस्जिद के दालान से बाहर निकला, उसके सामने का रास्ता सीधा नहीं था। आलम-ए-बरज़ख़ में भूगोल इंसान की सोच के हिसाब से बदलता था। जहाँ ज़मीन होनी चाहिए थी, वहाँ गहरी, अथाह खाइयाँ थीं जिनमें आग की नदियाँ बह रही थीं। जो सीढ़ियाँ ऊपर जाती दिख रही थीं, वे असल में नीचे पाताल की तरफ़ मुड़ जाती थीं।

और सबसे भयानक बात—दीवारों से लटके हुए वे हज़ारों साए अब हरकत में आ चुके थे!

जैसे ही मुंसिफ़ जिन्न ने एक तेज़ सीटी जैसी आवाज़ निकाली, वे सब रूहें पत्थरों से अलग होकर कबीर के पीछे उड़ने लगीं।

हवा में चीखों, रोने की आवाज़ों और दाँत पीसने की भयानक ध्वनियों का तूफ़ान आ गया।

"हमें अपना जिस्म दे दो!"

"हमें ज़िंदा दुनिया में लौटना है!"

"एक साँस... सिर्फ़ एक साँस उधार दे दो!"

काले, चिपचिपे हाथ कबीर के कपड़ों, उसके बालों और उसके चेहरे को नोचने लगे। एक साए ने कबीर के पैर को इतनी ज़ोर से जकड़ा कि वह मुँह के बल एक चौकोर चबूतरे पर गिरा। उसके हाथ से टॉर्च छूटकर उस खंदक में गिर गई और अंधेरे में विलीन हो गई।

कबीर ने अपने हाथ से उस साए के चेहरे पर वार किया। उसका हाथ उस साए के आर-पार निकल गया, लेकिन उस छुअन से कबीर की पूरी बाँह सुन्न पड़ गई—जैसे उसने अपना हाथ किसी लिक्विड नाइट्रोजन के ड्रम में डाल दिया हो।

तभी उसकी नज़र कुछ दूरी पर उठी।

धुंध और लाल लपटों के पार, बहुत ऊँचाई पर... सम्राट अशोक का वह विशाल, एकाश्मक (monolithic) पाषाण स्तंभ खड़ा था!

हैरानी की बात यह थी कि जहाँ पूरे कोटला में लाल, खूनी आग जल रही थी, उस स्तंभ के चारों तरफ़ एक हल्की, दूधिया नीली और शांत रोशनी का दायरा था। उस स्तंभ की सतह पर ब्राह्मी लिपि में खुदे हुए सम्राट अशोक के अभिलेख किसी सोने की तरह चमक रहे थे।

वे अभिलेख धम्म, करुणा और प्राणी-मात्र की रक्षा के संदेश थे—एक ऐसा सत्य जिसे आग का कोई भी जिन्न छू तक नहीं सकता था!

स्तंभ सिर्फ़ पचास मीटर दूर था।

लेकिन उस स्तंभ और कबीर के बीच एक विशाल खाई थी, जिस पर सिर्फ़ एक पुराना, लकड़ी का जर्जर पुल बना था। और उस पुल के दूसरे छोर पर... मुंसिफ़ जिन्न पहले से खड़ा था।

6. जलते हुए पुल पर अंतिम फ़ैसला
कबीर हाँफता हुआ पुल के इस पार रुक गया। उसके पीछे हज़ारों भूखी रूहें रेंगती हुई आ रही थीं। आगे वह छह उंगलियों वाला जिन्न खड़ा था, जिसकी आँखों में अब कोई क्रोध नहीं, बल्कि एक घिनौनी, विजयी मुस्कान थी।

"रास्ता ख़त्म हो गया, कबीर मेहरा," जिन्न ने कहा।

उसने अपनी छह उंगलियों में से एक उंगली हवा में उठाई। पुल की लकड़ियों पर नीली आग जल उठी।

"तूने सोचा कि वह नाचने वाली ज़ोहरा तुझे बचा लेगी? वह यह भूल गई कि यह पूरा आलम मेरी मर्ज़ी से चलता है। वह लाट... वह पत्थर का खंभा सिर्फ़ एक छलावा है जो हमने तेरे जैसे शिकार को यहाँ तक खींचने के लिए सजाया था।"

कबीर ने अपनी कटी हुई हथेली को देखा। ख़ून बहना बंद हो चुका था, लेकिन वहाँ की चमड़ी अब काली पड़ रही थी। जहर उसके बदन में फैल रहा था।

"अगर मुझे मरना ही है," कबीर ने कांपती आवाज़ में मगर सीधा उस जिन्न की आँखों में देखते हुए कहा, "तो मुझे एक बात बताओ। मेरे परदादा ने जब यह सब किया... तो उन्हें क्या मिला? क्या वे चैन से मरे?"

जिन्न का चेहरा विकृत होकर फैला। वह ठहाका मारकर हँसा।

"चैन? जिन्नात से सौदा करने वाले को कभी चैन मिलता है? हरदयाल मेहरा 1954 की उस रात जब यहाँ मरा था, तो उसकी लाश तो बाहर फेंक दी गई थी... लेकिन उसकी रूह?"

जिन्न ने अपने पीछे, अशोक स्तंभ के चबूतरे के पास रखे एक विशाल, काले सिंहासन की तरफ़ इशारा किया।

"तूने सोचा कि इस अदालत का सबसे बड़ा हाकिम मैं हूँ? नहीं, कबीर... मैं तो सिर्फ़ मुंसिफ़ हूँ, फ़ैसले सुनाने वाला। लेकिन जिस हाकिम ने तेरी इस पेशी का हुक्म जारी किया था... जो सत्तर बरसों से इस तख़्त पर बैठकर इंसानों की रूहों का ख़ून पी रहा है... वह कोई जिन्न नहीं है।"

कबीर का दिल एक पल के लिए जैसे सीने के भीतर जम गया।

सिंहासन पर बैठा वह साया, जो अब तक धुंध और सायों की ओट में छिपा हुआ था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

उसने राजसी, सल्तनत-कालीन पोशाक पहनी हुई थी, लेकिन उसके कोट का कट 1950 के दशक का था। उसके सिर पर कोई ताज नहीं था, बल्कि वही बनिया शैली की पगड़ी थी। उसका चेहरा पूरी तरह साफ़ दिखाई दिया।

वह चेहरा बूढ़ा था, आँखें धूर्त और लाल थीं, और उसके चेहरे पर ठीक वही मस्सा था जो कबीर के ड्राइंग रूम में लटकी परदादा की तस्वीर में था।

दीवान हरदयाल मेहरा!

7. वह भयानक मोड़: परदादा का असली जाल (The Twist)
कबीर के पैरों तले की ज़मीन सचमुच खिसक गई।

वह कोई जिन्न नहीं था। वह उसका अपना परदादा था!

"पर... परदादा जी?" कबीर की आवाज़ हलक़ में फँस गई। "आप... आप यहाँ हैं? आप तो मर चुके थे..."

सिंहासन पर बैठे दीवान हरदयाल के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान उभरी जिसने कबीर की आत्मा को चीर दिया। वह मुस्कान किसी बुज़ुर्ग की नहीं, बल्कि एक ऐसे शिकारी की थी जिसने सत्तर साल बाद अपने सबसे बड़े शिकार को जाल में फँसा लिया हो।

"लाश मरी थी, मेरे बच्चे... मैं नहीं," हरदयाल की आवाज़ वही थी जो कबीर ने बचपन में अपने दादा के टेप रिकॉर्डर में एक पुरानी पारिवारिक रिकॉर्डिंग में सुनी थी।

हरदयाल ने अपने हाथ आगे बढ़ाए। उसके दोनों हाथों में सामान्य इंसानों की तरह पाँच-पाँच उंगलियाँ थीं, लेकिन उसकी उंगलियों के नाख़ून काले और सड़े हुए थे।

"1954 में जब मुझे पता चला कि मेरी उम्र ख़त्म होने वाली है, तो मैं मौत से डर गया था। मैं अपनी दौलत, अपनी रईसी छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने इस कोटला के मारिद जिन्न से एक ऐसा गुप्त मुआहिदा किया जो आज तक किसी इंसान ने नहीं किया था।"

हरदयाल अपने तख़्त से उठकर धीरे-धीरे उस जलते हुए पुल की तरफ़ बढ़ा। उसकी आँखों में एक पागलपन भरी चमक थी:

"मैंने जिन्न से कहा कि मैं इस आलम-ए-बरज़ख़ का इंसान-हाकिम बनने को तैयार हूँ, बशर्ते मुझे अमरता मिले। जिन्न राज़ी हो गया, लेकिन एक शर्त पर—अमरता सिर्फ़ रूह को मिल सकती थी, जिस्म को नहीं। मेरा पुराना जिस्म 1954 में सड़ गया। और जिन्नात के इस पाताल में मेरी रूह सत्तर साल से भटक रही है, एक नए जिस्म की तलाश में!"

कबीर की रीढ़ की हड्डी में बर्फ़ जम गई।

उसे सब समझ आ गया। एक झटके में पूरा सच उसके दिमाग़ में बिजली की तरह कौंधा!

"तुम... तुमने अपनी रूह को बचाने के लिए मुझे नहीं बेचा था..." कबीर ने कांपते हुए कहा, "तुमने मुझे इसलिए बुलाया... ताकि तुम मेरा..."

"हाँ, कबीर!" हरदयाल की आवाज़ में एक वहशी उल्लास भर गया।

"जिन्नात किसी इंसान के जिस्म में हमेशा के लिए नहीं रह सकते, लेकिन एक इंसान की रूह दूसरे इंसान के जिस्म पर क़ब्ज़ा कर सकती है—बशर्ते दोनों का ख़ून एक हो! सत्तर साल पहले मैंने यह हिसाब लगाया था कि मेरी तीसरी पीढ़ी का वारिस जब ठीक पच्चीस साल का होगा, तो उसका बदन मेरी रूह को संभालने के लिए सबसे मुकम्मल होगा!"

हरदयाल ने अपने छह उंगलियों वाले मुंसिफ़ जिन्न की तरफ़ देखा और हुक्म दिया:

"वक़्त पूरा हुआ! इसका ज़ेहन तोड़ दो! मुझे मेरा नया जिस्म चाहिए... मुझे वापस 2026 की दिल्ली की सड़कों पर ज़िंदा लौटकर राज करना है!"

मुंसिफ़ जिन्न ने अपने दोनों हाथ उठाए। पूरे पाताल की आग एक विशाल बवंडर बनकर कबीर की तरफ़ घूमने लगी।

कबीर के पीछे की रूहों ने उसके दोनों हाथों और पैरों को पत्थरों से बाँध दिया। वह हिल भी नहीं पा रहा था। सामने से उसके अपने परदादा की काली, सड़ी हुई रूह हवा में तैरती हुई, कबीर के मुँह के रास्ते उसके शरीर में दाख़िल होने के लिए आगे बढ़ रही थी!

कबीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसकी अपनी आत्मा उसके जिस्म से बाहर धकेली जा रही थी।

तभी, उसकी जेब में रखे उस पुराने वॉयस रिकॉर्डर ने—जो अब तक बंद पड़ा था—अचानक अपने आप ऑन होकर एक बीप की आवाज़ निकाली।

और उस रिकॉर्डर के छोटे से स्पीकर से कबीर के मरहूम पिता (राजीव मेहरा) की कांपती हुई आवाज़ गूँज उठी, जो उन्होंने मरने से ठीक पहले उस परदादा की वसीयत पढ़ते हुए रिकॉर्ड की थी:

"कबीर... अगर कभी कोटला की बाओली तुम्हें बुलाए, तो अपनी उंगली की उस अंगूठी को कभी मत देखना... क्योंकि वह अंगूठी कोई ज़ेवर नहीं, वह हरदयाल की रूह को बाँधने वाली ताँबे की कील है! उसे उतार कर..."

कबीर की उंगलियाँ हरकत में आईं। उसने अपनी बायीं हाथ की अनामिका उंगली में फँसी उस ख़ानदानी अंगूठी को देखा, जो अब उसके गोश्त में धँसकर ख़ून बहा रही थी...

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कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · सभी भाग →