PretikaJinn & Spiritsकोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें

भाग 1: अर्ज़ी, इक़रारनामा और परछाइयों का तिलिस्म

Piyashi Atma · Jinn & Spirits · 24 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें
Chapter
1 of 20
Category
Jinn & Spirits
Reading time
24 min
Words
4674
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

1. पुरानी फ़ाइलों की ज़र्द महक और एक तर्कवादी का वहम
दिसंबर की वह तेरह तारीख़ थी। दिल्ली के आसमान पर प्रदूषण और कोहरे की ऐसी मटमैली, ज़हरीली चादर तनी थी कि दोपहर के तीन बजे भी सूरज किसी बुझते हुए कोयले जैसा बेजान लग रहा था।

कबीर मेहरा जनपथ स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) के ठंडे, वातानुकूलित कमरे की मेज़ पर झुका हुआ था। उसकी आँखों के नीचे कई रातों के जागे होने के काले घेरे साफ़ नुमायाँ थे। कबीर कोई तांत्रिक या ओझा नहीं था; वह दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से डॉक्टरेट कर रहा एक ऐसा शोधार्थी था जिसका ईमान केवल दस्तावेज़ों, तिथियों और कार्बन डेटिंग पर था। उसके लिए पराभौतिक घटनाएँ (paranormal phenomena) सामूहिक सम्मोहन (mass hysteria) या मध्यकालीन अनपढ़ ज़ेहनियत की उपज के अलावा कुछ न थीं।

उसका शोध विषय था—‘मध्यकालीन दिल्ली के स्थापत्य में पराभौतिक लोक-आस्था: फ़िरोज़ शाह कोटला का समाजशास्त्रीय अध्ययन’।

उस दोपहर, उसके सामने 1954 की दिल्ली पुलिस की एक धूल-धूसरित, अप्रकाशित केस डायरी खुली थी। डायरी का कागज़ इतना जीर्ण-शीर्ण हो चुका था कि पन्ने पलटने पर सूखी पत्तियों की तरह चरमरा रहा था। फ़ाइल संख्या 42/बी, दरियागंज थाना। उसमें एक अजीबोगरीब दर्ज रपट थी:

"तारीख़ 14 दिसंबर 1954। मुक़द्दमा दर्ज बा-इत्तिला: दीवान हरदयाल मेहरा, मुक़ीम कूचा पाती राम, पुरानी दिल्ली। मुतवफ़्फ़ी (मृतक) हरदयाल की लाश आज सुबह फ़िरोज़ शाह कोटला की गोल बाओली के निचले तहख़ाने से बरामद हुई। बदन पर किसी चोट, ज़ख़्म या ज़हर का कोई निशान नहीं। आँखें खुली हुई और पुतलियाँ डर के मारे पूरी तरह फैल चुकी थीं। उनके कोट की अंदरूनी जेब से एक कोरा कागज़ और मुट्ठी भर राख मिली। उनके इकलौते बेटे (उम्र 12 वर्ष) के बयान के मुताबिक़, दीवान साहब पिछले चालीस दिनों से हर गुरुवार की रात कोटला के 'लाट वाले बाबा' को ख़त लिखने जाया करते थे। उन्होंने कहा था कि ख़ानदान की तरक़्क़ी के लिए उन्होंने एक 'सौदा' किया है, जिसकी क़ीमत तीसरी नस्ल को चुकानी होगी..."

कबीर की उंगलियाँ उस पन्ने पर जम गईं।

दीवान हरदयाल मेहरा—यह नाम उसके लिए नया नहीं था। वह कबीर के परदादा थे। घर में बचपन से उसने सुना था कि परदादा की मौत 1954 की सर्दियों में दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। ख़ानदान में यह बात हमेशा एक दबी-छिपी कानाफूसी की तरह रही कि दीवान साहब के अचानक इंतक़ाल के बाद ही उनके परिवार की क़िस्मत रातों-रात पलटी थी; पुरानी दिल्ली के मामूली सर्राफ़ से वे लोग सिविल लाइंस के रईस बन गए थे। मगर इस पुलिस फ़ाइल में दर्ज ब्योरा घर की सुनाई गई कहानियों से बिल्कुल जुदा था।

"तीसरी नस्ल..." कबीर ने अपने होंठों में दोहराया।

दीवान हरदयाल के बेटे थे कबीर के दादाजी—ओमकार मेहरा। ओमकार के बेटे थे कबीर के पिता—राजीव मेहरा। और राजीव का इकलौता बेटा था कबीर।

यानी तीसरी नस्ल कबीर ख़ुद था।

कबीर ने एक फीकी, व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए डायरी बंद कर दी। उसने अपनी कॉफ़ी का ठंडा घूँट भरा। "अंधविश्वास की भी हद है," उसने मन ही मन सोचा। "परदादा किसी तांत्रिक के चक्कर में फँसे होंगे, दिल की धड़कन रुकी होगी और पुलिस ने उस ज़माने की अफ़वाहों को डायरी में दर्ज कर लिया।"

मगर इतिहासकार का कीड़ा उसके दिमाग़ में कुलबुला रहा था। आज गुरुवार था। कोटला में लगने वाली 'जिन्नात की कचहरी' का दिन। उसने अपना कैनन का डीएसएलआर कैमरा उठाया, वॉयस रिकॉर्डर चेक किया और तय किया कि वह आज शाम कोटला के उन तहख़ानों का मुआयना ख़ुद अपनी आँखों से करेगा, जहाँ सत्तर साल पहले उसके परदादा की लाश मिली थी।

2. बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग से खंडहरों की सरहद तक
शाम पाँच बजते-बजते पुरानी दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफ़िक रेंगने लगा था। बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर गाड़ियों के धुएँ, पीली हेडलाइटों और हॉर्न के शोर के बीच कबीर की टैक्सी फ़िरोज़ शाह कोटला के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने रुकी।

यह क़िला 1354 ईस्वी में सुलतान फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने फ़िरोज़ाबाद शहर के तौर पर तामीर करवाया था। सदियों की मार, तैमूर लंग के हमलों और वक़्त की बेरहमी ने इसके महलों को खंडहर बना दिया था। अब यहाँ सिर्फ़ धूसर, काले पड़ चुके बलुआ पत्थरों के ऊँचे बुर्ज, मेहराबें, ऐतिहासिक जामी मस्जिद और सम्राट अशोक का वह विशाल लाट (स्तंभ) बचा था, जिसे तुग़लक टोपरा से मँगवाकर यहाँ बड़ी शान से नसब करवाया था।

कबीर ने टिकट कटवाया और क़िले के विशाल, लोहे के मेहराबदार दरवाज़े से भीतर दाखिल हुआ।

क़िले की दहलीज़ लांघते ही बाहर की दिल्ली का शोर अचानक यूँ धीमा पड़ गया जैसे किसी ने आवाज़ पर भारी पर्दा गिरा दिया हो। हवा में एक अजीब, दमघोंटू ठंडक थी। यह दिल्ली की सामान्य शीत लहर जैसी नहीं थी; इसमें एक ऐसी सीलन थी जो हड्डियों के भीतर तक उतर जाती थी।

सर्द धुंध घास के मैदानों पर सफ़ेद कफ़न की तरह बिछी हुई थी। शाम की हल्की बूँदाबाँदी के कारण पत्थरों की फ़र्श गीली और फिसलन भरी हो चुकी थी।

यहाँ का माहौल बाकी ऐतिहासिक स्मारकों जैसा बिल्कुल नहीं था। यहाँ सैलानी नहीं, बल्कि 'हाजिरी' देने वाले लोग थे।

कबीर जब जामी मस्जिद के वीराने की तरफ़ बढ़ा, तो उसने देखा कि दर्जनों लोग—जिनमें अमीर-ग़रीब, औरतें, मर्द और बूढ़े शामिल थे—दीवारों के काले पड़ चुके पत्थरों पर अपना सिर टिकाए खड़े थे। कोई सिसक रहा था, कोई पागलों की तरह पत्थरों से बातें कर रहा था, तो कोई अपने हाथों में कच्चा गोश्त, दूध के कुल्हड़ और चमेली के फूलों की मालाएँ लिए ज़मीन पर बैठा था।

हवा में सैकड़ों जलती हुई अगरबत्तियों का तीखा, कसैला धुआँ तैर रहा था। उस धुएँ में सरसों के तेल के दीयों की गंध और बकरे के कच्चे कलेजे की उबकाई ला देने वाली महक घुली हुई थी।

कोटला का यह नियम था—यहाँ रहने वाले जिन्नात के अलग-अलग ओहदे थे। लाट वाले बाबा सबसे बड़े हाकिम माने जाते थे, जो अशोक स्तंभ पर मुक़ीम थे। उनके नीचे वज़ीर, सेनापति और हज़ारों आम जिन्नात थे, जो नीचे के अंधेरे तहख़ानों, बाओली की सीढ़ियों और वीरान ताक़ों में रहते थे। लोग अपनी तकलीफ़ों की 'अर्जी' (आवेदन पत्र) लिखते थे, उन पर अपनी पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो चिपकाते थे, और पत्थरों की दरारों में इस यक़ीन के साथ ठूँस देते थे कि रात ढलने के बाद जिन्नात की कचहरी लगेगी और उनकी फ़रियाद सुनी जाएगी।

कबीर ने अपने कैमरे का ज़ूम लेंस ऑन किया और एक दीवार की तस्वीर ली।

दीवार के एक बड़े छेद में सैकड़ों मुड़े-तुड़े काग़ज़ दबे थे। उसने देखा कि एक ताज़ा काग़ज़ पर किसी औरत ने लाल स्याही से लिखा था: ‘ऐ जिन्नातों के सरदार, मेरी सौतन का खून पी लो, उसके पेट का बच्चा गिरा दो...’

दूसरे काग़ज़ पर किसी बेरोज़गार लड़के ने अपनी मार्कशीट की फ़ोटोकॉपी के साथ अपनी अर्ज़ी लगाई थी।

कबीर के चेहरे पर घिन और तरस का मिला-जुला भाव उभर आया। उसने अपने वॉयस रिकॉर्डर का बटन दबाया और धीरे से बोला:
"समय शाम 5:45। कोटला का माहौल मध्यकालीन अंधविश्वास का भयावह प्रदर्शन है। लोग अपनी मानसिक कुंठाओं, लालच और नफ़रत को 'जिन्नात' नाम के अदृश्य साए के हवाले कर रहे हैं। यहाँ का वातावरण इतना विषाक्त और धुएँ से भरा है कि कमज़ोर दिल का इंसान महज़ वहम में आकर बीमार पड़ जाए।"

उसने रिकॉर्डर बंद किया और जामी मस्जिद के पिछले हिस्से की तरफ़ चल पड़ा, जहाँ वह ऐतिहासिक गोल बाओली स्थित थी।

3. सीढ़ियों का पहरेदार और जिन्नात की हक़ीक़त
बाओली की तरफ़ जाने वाला रास्ता आम पर्यटकों के लिए लोहे की बड़ी ज़ंजीरों और तालों से बंद कर दिया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वर्षों पहले हादसों और कथित 'रहस्यमयी मौतों' के चलते इस बाओली में आम लोगों का दाख़िला प्रतिबंधित कर दिया था।

मगर कबीर के पास एक शोधकर्ता का आधिकारिक पास था, और उससे भी बड़ी बात यह थी कि बाओली की बाउंड्री वॉल के पश्चिमी कोने पर पत्थरों की एक ऐसी ढलान थी जहाँ से कोई भी आसानी से नीचे उतर सकता था।

कबीर जब बाओली के बाहरी दालान के पास पहुँचा, तो धुंध इतनी घनी हो चुकी थी कि दस कदम आगे का रास्ता भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था। यहाँ अगरबत्तियों का धुआँ नहीं था, बल्कि पत्थरों की सड़ांध, सैकड़ों साल पुराने काई लगे पानी की बदबू और एक बहुत हल्की, लेकिन दिमाग़ की नसों को झनझना देने वाली चमेली के असली इत्र की ख़ुशबू आ रही थी।

"अकेले जाने की ज़िद मौत से गले मिलने जैसी होती है, बाबू साहब।"

कबीर चौंककर पीछे हटा।

बाओली के मेहराबदार खंभे की ओट में, ज़मीन पर उकड़ूँ बैठा एक बूढ़ा इंसान सिगरेट का कश खींच रहा था। धुंध और धुएँ के बीच उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, लेकिन उसकी आँखें... वे किसी मोतियाबिंद के मरीज़ की तरह मटमैली, बेनूर और सफ़ेद थीं। उसके जिस्म पर एक पुराना, बदरंग ऊनी ओवरकोट था, जो शायद पचास के दशक का रहा होगा।

"आप कौन हैं? यहाँ अंदर आना मना है," कबीर ने आधिकारिक लहज़े में कहा।

बूढ़ा धीरे से हँसा। उसकी हँसी ऐसी थी जैसे दो सूखे पत्थरों को आपस में रगड़ा जा रहा हो।

"मना तो यहाँ साँस लेना भी है उनके लिए, जो जिस्म का गुमान लेकर आते हैं। मैं यहाँ पचास बरसों से हूँ, बेटा। लोग मुझे क़ासिम कहते हैं... कुछ लोग सिर्फ़ 'डाकिया' कहते हैं। जो ख़त ऊपर दीवारों में नहीं समाते, उन्हें नीचे सही पते पर पहुँचाना मेरा काम है।"

कबीर की वैज्ञानिक बुद्धि ने तुरंत भाँप लिया कि यह कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त भिखारी है जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं से पैसे ऐंठता होगा।

"तो डाकिया साहब, क्या आपके जिन्नात सच में ये ख़त पढ़ते हैं?" कबीर ने तंज़िया अंदाज़ में पूछा।

क़ासिम ने अपनी सिगरेट का सुलगता हुआ सिरा ज़मीन पर मसला। उसने अपनी सफ़ेद आँखें कबीर के चेहरे पर गड़ा दीं। कबीर को अचानक लगा कि वे अंधी आँखें उसके चेहरे को नहीं, बल्कि उसके सीने के आर-पार उसके दिल की धड़कनों को गिन रही हैं।

"इंसान मिट्टी से बना है, बाबू," बूढ़े की आवाज़ अचानक गंभीर और भारी हो गई। "और रूहें उस मिट्टी के पिंजरे से छूटने के बाद हवा में भटकती हैं। लेकिन जिन्नात... जिन्नात आग की उस लपट से बने हैं जिसमें धुआँ नहीं होता। वे तुमसे पहले इस ज़मीन पर थे, और तुम्हारे बाद भी रहेंगे। रूहें तकलीफ़ देती हैं क्योंकि वे तड़पती हैं, लेकिन जिन्न... जिन्न क़र्ज़ वसूलते हैं।"

बूढ़े ने अपनी कंपकपाती, मैली उंगली उठाई और कबीर के सीने की तरफ़ इशारा किया:
"तुम्हारी आँखों में तुम्हारे बाप-दादा का वही गुरूर है, जो सत्तर बरस पहले हरदयाल मेहरा की आँखों में था।"

कबीर का पूरा बदन काठ हो गया।

उसके दिमाग़ में जैसे बिजली का झटका लगा। इस अनजान, अर्ध-विक्षिप्त बूढ़े को कैसे पता चला कि वह हरदयाल मेहरा के ख़ानदान से है? उसने तो अपना नाम तक नहीं बताया था!

"तुम... तुम मेरे परदादा का नाम कैसे जानते हो?" कबीर ने आगे बढ़कर बूढ़े का कॉलर पकड़ना चाहा।

मगर बूढ़ा अपनी जगह से हिला तक नहीं। उसने केवल एक सर्द मुस्कान बिखेरी। "क्योंकि जिस मुक़द्दमे की फ़ाइल तुम आज दोपहर अभिलेखागार में पढ़ रहे थे, उस पर गवाह के तौर पर मेरा भी अँगूठा लगा था। हरदयाल ने जब नीचे के तहख़ाने में 'मारिद' (ताक़तवर जिन्न) के सामने घुटने टेके थे, तब उन्होंने अपनी दौलत की बुनियाद में अपने ख़ून की तीसरी पीढ़ी का सौदा लिखा था। आज सत्तर साल पूरे हो रहे हैं, कबीर बाबू।"

कबीर का दिमाग़ सुन्न पड़ने लगा। अभिलेखागार की फ़ाइल... उसका नाम... उसका ख़ानदान... यह सब कोई साधारण इत्तेफ़ाक़ या वहम नहीं हो सकता था।

"यह बकवास है! किसने भेजा है तुम्हें? मेरे किस दोस्त ने तुम्हें ये सब बताया है?" कबीर चिल्लाया, मगर उसकी आवाज़ में छिपा डर साफ़ झलक रहा था।

"जाओ, नीचे जाकर ख़ुद देख लो," बूढ़े ने बाओली के अंधेरे तहख़ाने की तरफ़ इशारा किया, जहाँ नीचे की ओर उतरती सीढ़ियाँ किसी विशाल अजगर के खुले मुँह की तरह पाताल में उतरती दिख रही थीं। "ताक़ नंबर सात। तुम्हारी अमानत वहीं रखी है। लेकिन याद रखना... जब सात बजकर चौदह मिनट होंगे, तो ऊपर की दुनिया का सूरज और नीचे की दुनिया की आग एक हो जाएगी।"

कबीर ने बूढ़े की बात का जवाब नहीं दिया। उसका अहंकार और उसका डर आपस में टकरा रहे थे। वह साबित करना चाहता था कि यह महज़ एक साज़िश है, किसी का रचा हुआ घटिया मज़ाक।

उसने अपनी जेब से हाई-पावर एलईडी टॉर्च निकाली, उसका स्विच ऑन किया और बाओली के नीचे उतरती सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया।

पीछे से बूढ़े क़ासिम की आखिरी आवाज़ गूँजी:
"दरवाज़े से कभी शिकायत मत करना कि उसने तुम्हें रोका नहीं, जब क़दम तुम्हारे अपने थे!"

4. पाताल का दालान और काल कोठरी
सीढ़ियाँ गीली थीं और उन पर काई की फिसलन भरी परत जमी हुई थी। जैसे-जैसे कबीर नीचे उतर रहा था, दिन की बची-खुची रोशनी ग़ायब होती जा रही थी। ऊपर का खुला आसमान एक छोटे से चौकोर टुकड़े में तब्दील हो गया था, जिस पर कोहरा मंडरा रहा था।

टॉर्च की तेज़ सफ़ेद रोशनी में प्राचीन तुग़लक कालीन चिनाई साफ़ नज़र आ रही थी।

पत्थरों की विशाल दीवारें लगभग पाँच फीट मोटी थीं। हवा में नमी का अनुपात इतना बढ़ गया था कि कबीर को साँस लेने में दिक़्क़त होने लगी। हर साँस के साथ फेफड़ों में एक अजीब, धातु जैसी कड़वाहट भर जाती थी—जैसे हवा में बारूद या गंधक (sulfur) घुली हो।

वह बाओली के सबसे निचले तल पर पहुँच गया।

यहाँ पानी का वह प्राचीन कुंड था, जो अब सूखकर गाढ़े, काले कीचड़ और मलबे में बदल चुका था। कुंड के चारों तरफ़ कई अंधेरे दालान और मेहराबदार कमरे थे, जिन्हें सल्तनत के दौर में कैदियों को रखने या तपती गर्मियों में ठंडक के लिए इस्तेमाल किया जाता था। स्थानीय भाषा में इन्हें 'काल कोठरी' कहा जाता था।

कबीर ने टॉर्च का दायरा घुमाया।

यहाँ सन्नाटा इतना गहरा था कि कबीर को अपनी छाती के भीतर धड़कते दिल की 'धक-धक' साफ़ सुनाई दे रही थी। हर तीन-चार सेकंड बाद, बाओली की किसी अनजान गहराई से पानी की एक बूँद टपकती थी—टप... टप... टप... और उसकी गूँज पत्थरों से टकराकर दस गुना बड़ी होकर लौटती थी।

दीवारों पर जगह-जगह मिट्टी के बुझे हुए सिकोरे, काले धागों में लिपटी नींबू-मिर्च की सड़ी हुई मालाएँ और सूअर के दाँत जैसी तांत्रिक वस्तुएँ बिखरी पड़ी थीं।

मगर सबसे भयानक चीज़ थीं—दीवारों की ताक़ें (niches)।

दीवार में छोटी-छोटी खिड़कियों जैसे सात आले बने हुए थे। कबीर आगे बढ़ा।

ताक़ नंबर एक: उसमें ज़र्द पड़ चुके काग़ज़ों का ढेर था।

ताक़ नंबर दो: उसमें किसी औरत के कटे हुए बाल और सिंदूर से पुता हुआ एक कपड़ा था।

ताक़ नंबर तीन, चार, पाँच, छह...

और फिर वह ताक़ नंबर सात के सामने आकर रुक गया।

यहाँ की हवा इतनी ठंडी थी कि कबीर के मुँह से भाप निकल रही थी। उसने अपनी जैकेट की ज़िप गले तक चढ़ा ली, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे।

ताक़ नंबर सात के भीतर कोई गंदगी या पुराने काग़ज़ नहीं थे।

वहाँ एक चौकोर, काले पत्थर की सिल्ली रखी थी। और उस सिल्ली के ठीक ऊपर, एक भारी, पीतल का दीया रखा हुआ था, जिसमें तेल नहीं था, मगर उसकी बत्ती से हल्का-हल्का नीला धुआँ निकल रहा था—जैसे वह अभी-अभी बुझाया गया हो!

और उस दीये के नीचे दबा था—एक बड़ा, भारी, ख़ाकी लिफ़ाफ़ा।

कबीर की आँखें फटी की फटी रह गईं।

लिफ़ाफ़ा बिल्कुल नया था। उस पर न कोई धूल थी, न सीलन का एक भी धब्बा। लिफ़ाफ़े के ऊपरी हिस्से पर लाल लाख (sealing wax) की एक बड़ी मुहर लगी थी। उस मुहर पर एक ख़ानदानी अंगूठी का निशान छपा हुआ था—दो तलवारों के बीच तराज़ू का चिह्न।

कबीर का हाथ अपने आप उसकी बायीं अनामिका उंगली (ring finger) पर चला गया।

वही अंगूठी! ठीक वही निशान, जो उसके हाथ में पहनी हुई उस पुस्तैनी अंगूठी पर खुदा था, जो उसके दादाजी ने मरने से पहले उसके पिता को दी थी, और पिता ने कबीर के पच्चीसवें जन्मदिन पर उसे पहनाई थी!

"नहीं... यह मुमकिन नहीं है," कबीर के मुँह से एक बेबस चीख़ निकली।

उसने कंपकपाते हाथों से वह लिफ़ाफ़ा उठाया। लिफ़ाफ़े पर स्याही से जो लिखा था, उसे देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए। लिखावट किसी पुराने फ़ाउंटेन पेन की थी, जिसकी लिखावट कबीर ने बचपन में अपने घर की पुरानी वसीयतों में देखी थी—उसके परदादा दीवान हरदयाल मेहरा की हस्तलिपि!

उस पर लिखा था:

बनाम: कबीर मेहरा (नूर-ए-नज़र, तीसरी पीढ़ी)

वक़्त-ए-मुलाक़ात: 13 दिसंबर, रात 7 बजकर 14 मिनट

मक़ाम: क़फ़स-ए-जिन्नात, फ़िरोज़ शाह कोटला

कबीर ने झटके से अपने कोट की आस्तीन पीछे खींचकर अपनी टाइटन की ऑटोमैटिक घड़ी देखी।

घड़ी की सुइयाँ बता रही थीं: 7 बजकर 11 मिनट।

उसके पास सिर्फ़ तीन मिनट थे।

5. इक़रारनामा: सत्तर साल पुराना सौदा
कबीर का वैज्ञानिक तर्क, उसका नास्तिक मिज़ाज, उसकी आधुनिक शिक्षा—सब कुछ उस अंधेरे तहख़ाने की सीलन में भाप बनकर उड़ चुका था। सामने खड़ा सच इतना भयानक था कि दिमाग़ सोचने-समझने की हद से बाहर जा रहा था।

उसने कांपती उंगलियों से उस लाल लाख की मुहर को तोड़ा। काग़ज़ को बाहर निकाला।

काग़ज़ किसी आम पेड़ की छाल या आधुनिक पन्ने जैसा नहीं था; वह किसी जानवर की पतली, सुखाई गई खाल (parchment) जैसा भारी और चिकना था। उस पर उर्दू और मुड़िया-हिंदी (पुरानी बनिया लिखावट) में एक इक़रारनामा दर्ज था।

स्याही का रंग भूरा-लाल था—जैसे स्याही में ताज़ा या सूखा हुआ ख़ून मिलाया गया हो।

कबीर ने टॉर्च की रोशनी उस इक़रारनामे पर केंद्रित की और पढ़ना शुरू किया:

"ब-हुज़ूर आली जनाब 'मीर-ए-आतिश' (अग्नि का स्वामी / कोटला के मारिद जिन्न),

मैं, हरदयाल मेहरा, वल्द दीवान काशीनाथ मेहरा, साकिन पुरानी दिल्ली, होश-ओ-हवास में यह तहरीर लिख रहा हूँ। मेरे कारोबार का दिवाला निकल चुका है, मेरी सात पीढ़ियों की इज़्ज़त ख़ाक में मिलने वाली है। आपने मेरी पुकार सुनी और मुझे इस जहाँ की तमाम दौलत, हुकूमत और शोहरत बख़्शी।

*इसके एवज़ में, मैंने अपना यह जिस्म आपकी ख़िदमत में सुपुर्द किया, जो 1954 की इस आख़िरी रात आपकी खुराक बनेगा।

मगर जो रूहानी ताक़त आपने मेरे ख़ानदान को दी है, उसकी मुकम्मल क़ीमत मेरा जिस्म नहीं चुका सकता। चुनांचे, यह मुआहिदा (समझौता) तय पाता है कि मेरी नस्ल की तीसरी कड़ी—जो ठीक सत्तर बरस बाद इस ज़मीन पर क़दम रखेगी—वह इस चौखट पर हाज़िर होगी।*

यदि वह 13 दिसंबर की शब 7 बजकर 14 मिनट पर यहाँ नहीं पहुँची, तो मेरे ख़ानदान का नामो-निशान मिटा दिया जाएगा। और अगर वह आ गई... तो वह आज़ाद नहीं जाएगी। उसकी रूह कोटला के जिन्नात की सल्तनत का नया चिराग़ बनेगी, और उसका जिस्म... हमारा हमज़ाद ओढ़ेगा।"

काग़ज़ के नीचे दीवान हरदयाल मेहरा के दस्तख़त थे। और उनके दस्तख़त के ठीक नीचे, एक छह उंगलियों वाले विशाल पंजे का काला, झुलसा हुआ निशान बना था, जिसने काग़ज़ को उस जगह से हल्का-सा जला दिया था।

कबीर के हाथों से वह काग़ज़ छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

"सौदा... परदादा ने मुझे बेच दिया था? सत्तर साल पहले?" कबीर की आँखें फटी हुई थीं। उसका पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था।

उसे याद आया कि वह यहाँ किसी इत्तेफ़ाक़ से नहीं आया था। पिछले चालीस दिनों से उसे लगातार अजीबोगरीब सपने आ रहे थे। सपने में उसे एक अंधेरी बाओली दिखती थी, पत्थरों से रिसता पानी दिखता था, और एक भारी, फुसफुसाती हुई आवाज़ उसका नाम पुकारती थी—‘कबीर... वक़्त आ गया है... कोटला चलो...’

उसी सम्मोहन में आकर उसने अपने प्रोफ़ेसर से लड़कर यह रिसर्च प्रोजेक्ट लिया था। उसी खिंचाव में वह आज शाम यहाँ खिंचा चला आया था।

वह यहाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं आया था। उसे बुलाया गया था!

उसने अपनी घड़ी की ओर देखा।

सेकंड का काँटा तेज़ी से घूम रहा था।

7 बजकर 13 मिनट और 50 सेकंड... 55 सेकंड...

और फिर, ठीक 7 बजकर 14 मिनट पर घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ अचानक रुक गई।

6. परछाइयों की बग़ावत और हमज़ाद का ज़हूर
घड़ी बंद नहीं हुई थी; घड़ी का सेकंड का काँटा 12 के अंक पर आकर थरथरा रहा था, जैसे समय की धारा किसी अदृश्य दीवार से टकराकर ठहर गई हो।

उसी पल, तहख़ाने का तापमान शून्य से भी नीचे चला गया।

कबीर ने साँस ली तो उसके फेफड़ों में बर्फ़ की सुइयाँ जैसी चुभीं। उसने जो टॉर्च हाथ में पकड़ रखी थी, उसकी तेज़ सफ़ेद रोशनी अचानक मद्धम पड़ने लगी। रोशनी का रंग सफ़ेद से बदलकर हल्का पीला, फिर नारंगी और आख़िर में एक मनहूस, ख़ूनी लाल रंग में तब्दील हो गया।

दीवारों से रिसता हुआ पानी जमने लगा था।

और फिर, एक ऐसी आवाज़ शुरू हुई जिसने कबीर की आत्मा को निचोड़ कर रख दिया।

यह आवाज़ किसी एक दिशा से नहीं आ रही थी। यह बाओली के पत्थरों के भीतर से आ रही थी। जैसे हज़ारों लोग एक साथ पत्थरों के पीछे अपनी उंगलियों के नाख़ूनों से दीवारों को खुरच रहे हों।

चर्र्र... खुर्र्र... चर्र्र...

"कौन है वहाँ?" कबीर पागलों की तरह चिल्लाया। उसकी आवाज़ में अब मर्दानी ताक़त नहीं थी, वह किसी असहाय बच्चे की तरह चीख़ रहा था।

उसने टॉर्च की लाल रोशनी को सामने की विशाल, सपाट दीवार पर डाला।

दीवार पर उसकी अपनी लंबी परछाईं पड़ रही थी।

कबीर दहशत के मारे दो कदम पीछे हटा।

लेकिन दीवार पर मौजूद उसकी परछाईं... पीछे नहीं हटी!

कबीर का बदन पसीने से भीग गया, जबकि बाहर कड़ाके की ठंड थी। उसने अपना दायाँ हाथ उठाया। परछाईं का हाथ नहीं उठा। परछाईं दीवार पर बिल्कुल सीधी, शांत खड़ी रही।

कबीर ने अविश्वास में अपनी आँखें मलीं। उसने सोचा कि शायद ऑक्सीजन की कमी की वजह से उसे मतिभ्रम (hallucination) हो रहा है। वह मुड़कर भागने ही वाला था कि दीवार की उस परछाईं में हरकत हुई।

परछाईं ने धीरे-धीरे, बहुत ही अस्वाभाविक और अमानवीय तरीक़े से अपनी गर्दन को पूरा 180 डिग्री घुमाया।

काली, सपाट परछाईं के चेहरे की जगह पर दो छेद उभरे, जिनके भीतर से धधकती हुई आग की दो लपटें जलने लगीं। वे आँखें थीं—बिना पलकों वाली, क्रूर, प्राचीन और भूखी आँखें।

और फिर, उस परछाईं के होंठ हिले।

दीवार के भीतर से एक ऐसी आवाज़ निकली जो कबीर की अपनी आवाज़ जैसी थी, लेकिन उसमें हज़ारों गूँजें मिली हुई थीं, जैसे किसी गहरे कुएँ के भीतर से कोई चीख़ रहा हो:

"कबीर... सत्तर बरस तक हमने तेरे ख़ून का इंतज़ार किया है। तेरे पुरखे ने जो आग जलाई थी, आज तू उस आग का ईंधन बनेगा।"

यह 'हमज़ाद' था।

इस्लामी और अरबी रूहानी मान्यताओं के अनुसार, हर इंसान के पैदा होते ही आग से बना एक हमज़ाद (शैतानी प्रतिरूप/Shadow Self) उसके साथ वजूद में आता है। आम तौर पर वह इंसान की ताबेदारी में परछाईं बनकर रहता है। मगर जब किसी रूह या जिन्न का क़हर टूटता है, तो वही हमज़ाद इंसान के ख़िलाफ़ बगावत कर देता है और उसे निगल जाता है।

कबीर के पैर ज़मीन में जम चुके थे। वह चीखना चाहता था, मगर उसके गले से सिर्फ़ एक घुरघुराहट निकल रही थी।

परछाईं धीरे-धीरे दीवार की सतह से बाहर उभरने लगी!

काले, गाढ़े धुएँ के रूप में वह दीवार से अलग हुई और कबीर के सामने एक विशाल, आठ फीट ऊँचे साए की शक्ल अख़्तियार करने लगी। उस साए के सीने में कोई दिल नहीं था, बल्कि आग का एक भँवर घूम रहा था जिसमें इंसानी चेहरों जैसी आकृतियाँ तड़पती नज़र आ रही थीं।

7. खूनी मोहर और दहलीज का भरम
जिंदगी बचाने की आदिम मानवीय वृत्ति (survival instinct) ने कबीर के सुन्न पड़े दिमाग़ को एक अंतिम झटका दिया।

उसने अपनी पूरी ताक़त समेटकर अपना भारी कैमरा बैग उस उठते हुए साए के मुँह पर दे मारा। बैग उस धुएँ के आर-पार निकल गया, मगर उस अप्रत्याशित हरकत से साए का ध्यान एक पल के लिए भटका।

कबीर मुड़ा और पागलों की तरह सीढ़ियों की तरफ़ भागा।

अंधेरे में उसका पैर ज़मीन पर पड़े उस प्राचीन इक़रारनामे पर पड़ा। कागज़ के नीचे नुकीला पत्थर था। कबीर बुरी तरह लड़खड़ाया और मुँह के बल गीले पत्थरों पर गिरा। उसकी बाईं कोहनी और हथेली पत्थर की तेज़ धार से कट गई।

गर्म, लाल ख़ून का एक फ़व्वारा फूटा और सीधा उस ज़मीन पर पड़े इक़रारनामे के उस हिस्से पर गिरा जहाँ छह उंगलियों वाले पंजे का निशान था।

जैसे ही कबीर का ख़ून उस जले हुए निशान से मिला, पूरे कोटला की ज़मीन में एक भयानक भूकम्प आया।

धड़ाम! गड़गड़ाहट!

पत्थरों की विशाल दीवारें आपस में टकराने लगीं। ज़मीन के नीचे से ऐसी आवाज़ें आने लगीं जैसे हज़ारों ज़ंजीरें टूट रही हों। तहख़ाने के आले में रखा वह पीतल का दीया अचानक नीली, विकराल लपटों के साथ जल उठा। हवा में इतनी भयानक दुर्गंध फैली जैसे सैकड़ों लाशों को एक साथ जलाया जा रहा हो।

"भागो! अगर यह चौखट पार कर गया, तो यह तुम्हारा जिस्म छीन लेगा!"

सीढ़ियों के ऊपर से एक चीख़ गूँजी।

कबीर ने दर्द से कराहते हुए सिर उठाया। सीढ़ियों के मुहाने पर वही बूढ़ा डाकिया—क़ासिम—खड़ा था। मगर अब वह बूढ़ा और लाचार नहीं दिख रहा था। उसके हाथों में लोहे का एक बड़ा त्रिशूलनुमा संबल था, और वह ज़ोर-ज़ोर से कुछ कलमे और प्राचीन मंत्र बुदबुदा रहा था।

कबीर अपने कटे हुए हाथ को सीने से चिपकाए, घिसटते हुए सीढ़ियों की तरफ़ लपका।

पीछे से वह धुएँ का दैत्य—मारिद जिन्न—हवा में तैरता हुआ उसकी तरफ़ बढ़ रहा था। उसके लंबे, काले पंजों के नाख़ून कबीर की जैकेट की पीठ को छू चुके थे। जैकेट का कपड़ा जलने लगा और कबीर की चमड़ी पर आग जैसी जलन महसूस हुई।

"क़ासिम! बचाओ मुझे!" कबीर बदहवास होकर चिल्लाया।

क़ासिम ने नीचे झुककर अपना हाथ बढ़ाया और कबीर के कॉलर को पकड़कर पूरी ताक़त से ऊपर खींच लिया।

जैसे ही कबीर सीढ़ियों के आख़िरी पायदान पर पहुँचा, क़ासिम ने लोहे की वह भारी ज़ंजीर सीढ़ियों के मुहाने पर पटक दी और ज़मीन पर मुट्ठी भर पीली सरसों और कोई राख फेंक दी।

एक ज़ोरदार धमाका हुआ—बूम!

नीली आग की एक दीवार सीढ़ियों के मुहाने पर खिंच गई। नीचे से उस जिन्न की ऐसी रूह-कँपा देने वाली चीख़ उभरी कि कबीर के कानों के पर्दे फटने लगे।

"तू बच नहीं सकता कबीर! तेरा ख़ून इस ज़मीन ने पी लिया है! तू जहाँ जाएगा, कोटला तेरे साथ जाएगा!" वह भयानक आवाज़ धीरे-धीरे तहख़ाने की गहराइयों में विलीन हो गई।

8. वह भयानक मोड़: आसमान की गुमशुदगी (The Twist)
कबीर औंधे मुँह घास के गीले मैदान पर गिरा पड़ा था। बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। वह ज़ोर-ज़ोर से हांफ रहा था। उसका पूरा बदन कांप रहा था, और उसकी कटी हुई हथेली से ख़ून अब भी रिस रहा था।

"मैं... मैं बच गया..." उसने ज़मीन की मिट्टी को मुट्ठियों में भींचते हुए ख़ुद से कहा। "मैं बाहर आ गया..."

उसने करवट ली और उठकर बैठने की कोशिश की।

सामने बूढ़ा क़ासिम खड़ा था। लेकिन उसके चेहरे पर कोई राहत नहीं थी। उसकी सफ़ेद, अंधी आँखें कबीर की तरफ़ देख रही थीं, और उसके चेहरे पर एक गहरा, सर्द मातम छाया हुआ था।

"क़ासिम चाचा... शुक्रिया... आपने मेरी जान बचा ली," कबीर ने हांफते हुए कहा। "चलिए यहाँ से बाहर चलते हैं। पुलिस को बुलाते हैं... किसी को बुलाते हैं..."

क़ासिम ने धीरे से अपना सिर नफ़ी (ना) में हिलाया।

"मैंने तुम्हारी जान नहीं बचाई, कबीर बाबू। मैंने सिर्फ़ तुम्हें उस मारिद के जबड़े से छीना है।"

"मतलब?" कबीर ने भौंहें सिकोड़ीं। "हम बाहर आ चुके हैं। देखिए, बारिश हो रही है। क़िले का मैदान है यह..."

"ज़रा ग़ौर से देखो, बाबू," क़ासिम की आवाज़ में एक अजीब, खोखला सन्नाटा था। "क्या बारिश का पानी ठंडा लग रहा है? क्या यह मिट्टी की ख़ुशबू है?"

कबीर ने चौंककर अपनी हथेली पर गिरती बारिश की बूँदों को देखा।

वे पानी की बूँदें नहीं थीं!

वे काले, चिपचिपे तेल जैसी बूँदें थीं, जो उसकी चमड़ी पर गिरते ही जलने का अहसास करा रही थीं। और हवा में... हवा में बारिश की ताज़गी नहीं, बल्कि सड़े हुए चमेली के तेल और कफ़न की वही घिनौनी बदबू थी!

कबीर का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। उसने घबराकर चारों तरफ़ देखा।

मैदान के पार, जहाँ बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग की ऊँची इमारतें और स्ट्रीट लाइटें दिखनी चाहिए थीं... वहाँ कुछ नहीं था। कोई सड़क नहीं थी। कोई शहर नहीं था। कोई गाड़ियाँ नहीं थीं।

सिर्फ़ पत्थरों की अंतहीन, विशाल दीवारें थीं जो सैकड़ों फीट ऊँची उठकर ऊपर की तरफ़ मिल रही थीं।

कबीर ने कांपते हुए अपनी गर्दन उठाई और आसमान की तरफ़ देखा।

उसकी चीख़ उसके गले में ही घुट गई।

ऊपर कोई आसमान नहीं था। न कोई बादल थे, न तारे, न दिल्ली का कोहरा।

ऊपर सैकड़ों मीटर ऊँची, पत्थरों की एक प्राचीन, विशालकाय गुंबदनुमा छत थी—वही छत जो कोटला की बाओली के सातवें पाताल के तहख़ाने में थी! और उस छत से हज़ारों की तादाद में, चमगादड़ों की तरह उलटे लटके हुए, काले साए और सफ़ेद कफ़न ओढ़े रूहें चुपचाप नीचे कबीर की तरफ़ देख रही थीं।

उन सब की आँखें अंधी और सफ़ेद थीं। और उन सब के चेहरों पर वही ख़ौफ़नाक, विकृत मुस्कान थी।

तभी, कबीर की जेब में रखे फोन ने अचानक वाइब्रेट किया।

सैकड़ों फीट ज़मीन के नीचे नेटवर्क होना नामुमकिन था, मगर फोन की स्क्रीन पूरी चमक के साथ जल रही थी। स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। सिर्फ़ एक अनरीड मैसेज फ़्लैश हो रहा था:

"कबीर, सीढ़ियाँ ऊपर नहीं चढ़तीं... सीढ़ियाँ हमेशा नीचे उतरती हैं। तुम बाहर नहीं भागे, तुम कोटला के 'आलम-ए-बरज़ख़' (जिन्नात के समानांतर पाताल) के पहले घेरे में दाखिल हो चुके हो।

अब मुड़कर क़ासिम को देखो।"

कबीर की साँसें अटक गईं। उसने बेहद धीरे से, कांपते हुए अपनी गर्दन घुमाई और अपने सामने खड़े उस बूढ़े डाकिया—क़ासिम—की तरफ़ देखा।

क़ासिम का जिस्म धीरे-धीरे पिघल रहा था। उसकी चमड़ी किसी मोमबत्ती की तरह गलकर नीचे गिर रही थी, और उस पुरानी देह के भीतर से वही छह उंगलियों वाला, काला, भयानक हाथ बाहर निकल रहा था।

क़ासिम के गिरते हुए चेहरे के भीतर से वही आवाज़ गूँजी:

"ख़त डाकिए तक पहुँच चुका है, कबीर... अब कचहरी शुरू होगी!"

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कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · सभी भाग →