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एपिसोड 19 — दरवाज़ा
firoj saifi · Haunted Places · 4 मिनट
नैना ने कबीर की तरफ देखा।
“तुम मेरे साथ नहीं चलोगे?”
कबीर मुस्कुराया।
“मैं तो पहले ही घर जा चुका हूँ।”
नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मुझे तुम्हारी जरूरत है।”
“अब नहीं।”
“मुझे डर लगेगा।”
“डर लगने देना।”
“क्यों?”
“क्योंकि डर का मतलब ये नहीं कि तुम कमजोर हो।”
कबीर धीरे-धीरे पीछे जाने लगा।
नैना ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन उसकी उंगलियाँ उसके हाथ से गुजर गईं।
“कबीर…”
“नैना।”
“हाँ?”
“उस रात तूने मीरा का हाथ छोड़ा था।”
नैना ने रोते हुए कहा—
“मुझे पता है।”
“इस बार किसी का हाथ मत पकड़ना।”
नैना ने पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि अब किसी को बचाने के लिए खुद को खोना जरूरी नहीं।”
कबीर धीरे-धीरे धुंधला होने लगा।
नैना चीखी—
“कबीर!”
उसकी आवाज़ दूर से आई—
“मैंने वादा किया था कि तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
नैना ने आँसू पोंछे।
“और?”
“वादा निभाया।”
कबीर गायब हो गया।
कमरे में अब कोई नहीं था।
नैना अकेली खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसे अकेलापन डरावना नहीं लगा।
सामने कमरा नंबर 13 का दरवाज़ा था।
वह धीरे-धीरे उसके पास गई।
दरवाज़े पर हाथ रखा।
अंदर से आवाज़ आई—
“नैना…”
वह शालिनी की आवाज़ थी।
“तुमने मुझे हरा दिया।”
नैना ने कहा—
“नहीं।”
“तो?”
“मैंने तुम्हें नहीं हराया।”
अंदर से काली हँसी सुनाई दी।
“फिर?”
नैना ने कहा—
“मैंने तुम्हें विश्वास देना बंद कर दिया।”
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर सिर्फ खाली कमरा था।
न कोई परछाईं।
न कोई आत्मा।
न कोई तस्वीर।
सिर्फ बीच में एक पुरानी कुर्सी।
नैना ने कमरे में कदम रखा।
फर्श पर लाल रिबन पड़ा था।
वह उसे उठाने झुकी।
लेकिन जैसे ही उसने रिबन उठाया, उसे पीछे से बच्ची की आवाज़ सुनाई दी—
“दीदी।”
नैना पलटी।
छोटी मीरा खड़ी थी।
इस बार वह रो नहीं रही थी।
वह मुस्कुरा रही थी।
“अब मैं जा सकती हूँ?”
नैना ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
मीरा धीरे-धीरे गायब हो गई।
फिर अनु दिखाई दी।
उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।
“मेरी दीदी को कहना…”
नैना ने पूछा—
“क्या?”
“उसे माफ कर देना।”
अनु भी गायब हो गई।
आखिर में शालिनी दिखाई दी।
नैना ने कहा—
“तुम भी जा सकती हो।”
शालिनी ने मुस्कुराकर कहा—
“तुमने मेरा बोझ उठा लिया।”
“नहीं। मैंने सिर्फ दरवाज़ा बंद किया है।”
शालिनी ने सिर हिलाया।
“कभी-कभी यही सबसे बड़ा काम होता है।”
वह भी गायब हो गई।
कमरे की दीवारें टूटने लगीं।
नैना दौड़कर बाहर निकली।
पूरी बिल्डिंग काँप रही थी।
सीढ़ियाँ टूट रही थीं।
दरवाज़े अपने आप बंद हो रहे थे।
नैना भागती हुई बाहर पहुँची।
सुबह होने लगी थी।
बारिश रुक चुकी थी।
शिव रेजिडेंसी बिल्कुल शांत थी।
पुलिस कुछ देर बाद पहुँची।
शर्मा जी भी आए।
लेकिन उनके चेहरे पर अजीब-सा डर था।
नैना ने पूछा—
“आपको सब पता था?”
शर्मा जी ने सिर झुका लिया।
“मेरे पिता इस जगह के मालिक थे।”
“और कमरा 13?”
“उसे बीस साल पहले बंद कर दिया गया था।”
“फिर आपने मुझे फ्लैट 407 क्यों दिया?”
शर्मा जी चुप रहे।
नैना ने दोबारा पूछा—
“क्यों?”
शर्मा जी ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उस कमरे ने आपका नाम फिर से लिख दिया था।”
नैना का दिल बैठ गया।
“लेकिन मैंने नाम मिटा दिया।”
शर्मा जी ने कहा—
“दीवार से।”
“तो?”
उन्होंने धीमे से कहा—
“हर दीवार से नहीं।”
नैना कुछ समझ पाती, उससे पहले पुलिस ने शर्मा जी को अपने साथ ले लिया।
नैना ने पीछे मुड़कर शिव रेजिडेंसी को देखा।
उसकी चौथी मंजिल पर फ्लैट 407 की खिड़की खुली थी।
अंदर कोई खड़ा था।
एक आदमी।
कबीर।
नैना की आँखों से आँसू निकल आए।
उसने हाथ उठाया।
खिड़की में खड़ा कबीर मुस्कुराया।
फिर खिड़की बंद हो गई।
नैना ने आखिरी बार बिल्डिंग की तरफ देखा।
और वहाँ से चली गई।
लेकिन उसे नहीं पता था—
कमरा नंबर 13 खत्म नहीं हुआ था।
वह सिर्फ जगह बदल चुका था।
एपिसोड समाप्त।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- वो फ्लैट खाली नहीं था।
- Chapter
- 19 of 20
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 4 min
- Words
- 624
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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