PretikaHaunted Placesवो फ्लैट खाली नहीं था।

एपिसोड 18 — रिकॉर्डिंग

firoj saifi · Haunted Places · 3 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
वो फ्लैट खाली नहीं था।
Chapter
18 of 20
Category
Haunted Places
Reading time
3 min
Words
434
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

नैना ने कैमरे को फिर से चालू किया।

स्क्रीन पर वही भविष्य वाली नैना दिखाई दी।

इस बार वह सीधे कैमरे में देख रही थी।

“अगर तुम यहाँ तक पहुँच गई हो, तो तुम्हें समझ आ गया होगा कि वो भविष्य नहीं दिखाती।”

नैना ध्यान से सुनने लगी।

“वो तुम्हें वही दिखाती है जिस पर तुम विश्वास करना चाहती हो।”

नैना ने धीरे से कहा—

“मतलब सारे दृश्य झूठे थे?”

कबीर ने कहा—

“पूरी तरह नहीं।”

वीडियो में नैना बोली—

“जो तुम देखती हो, वो संभव होता है। लेकिन जरूरी नहीं कि वही सच बने।”

नैना की आँखें खुल गईं।

वीडियो जारी रहा—

“वो डर पैदा करती है। फिर तुम्हारे डर को सच जैसा दिखाती है। और जब तुम उस पर विश्वास कर लेती हो… वो तुम्हारे अंदर जगह बना लेती है।”

वीडियो बंद हो गया।

नैना ने कैमरा नीचे रखा।

“तो ये सब मेरे विश्वास पर चलता है।”

कबीर ने कहा—

“हाँ।”

“अगर मैं उस पर विश्वास न करूँ?”

“तो उसका रास्ता कमजोर हो जाएगा।”

अचानक कमरे में शालिनी दिखाई दी।

उसका चेहरा थका हुआ था।

“लेकिन सिर्फ विश्वास न करना काफी नहीं।”

नैना ने पूछा—

“फिर क्या करना होगा?”

“तुम्हें अपने डर का नाम लेना होगा।”

“कौन सा डर?”

शालिनी ने कहा—

“अकेले होने का।”

नैना चुप हो गई।

शालिनी ने आगे कहा—

“तुम बचपन से अकेले होने से डरती रही हो।”

नैना ने कबीर की तरफ देखा।

“इसलिए कबीर मेरे साथ था?”

शालिनी ने कहा—

“तुम्हारे डर ने उसे वापस बुलाया।”

नैना की आँखों में आँसू आ गए।

“मतलब कबीर…”

कबीर मुस्कुराया।

“मैं पूरी तरह तुम्हारे डर से नहीं आया था।”

“तो?”

“मैं भी चाहता था कि तुझे बचाऊँ।”

शालिनी ने कहा—

“लेकिन अब उसे जाना होगा।”

नैना ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

कबीर बोला—

“नैना…”

“मैं उसे फिर नहीं खोऊँगी।”

कबीर उसके करीब आया।

“तू मुझे नहीं खो रही।”

उसने नैना के हाथ में घड़ी रखी।

“मैं तुझे खुद से जोड़कर जा रहा हूँ।”

घड़ी अचानक चमकी।

उसमें 3:13 बज रहे थे।

शालिनी ने कहा—

“अब।”

कमरा काँपने लगा।

दीवारों पर तेरह नाम उभर आए।

नैना ने लोहे की छड़ उठाई।

“मीरा।”

उसने नाम मिटा दिया।

एक चीख।

फिर रोशनी।

“अनु।”

नाम मिटा।

फिर दूसरी आत्मा मुक्त हुई।

एक-एक करके नाम मिटते गए।

तीन।

चार।

पाँच।

छह।

सात।

आठ।

नौ।

दस।

ग्यारह।

बारह।

अब सिर्फ दो नाम बचे थे।

शालिनी।

और—

नैना।

शालिनी ने कहा—

“पहले मेरा नाम मिटाओ।”

नैना ने पूछा—

“फिर?”

“फिर तुम्हारा।”

नैना ने शालिनी का नाम मिटाया।

शालिनी ने आँखें बंद कर लीं।

उसके शरीर से काली धुंध निकलने लगी।

वह चीखी।

लेकिन इस बार उसकी चीख में दर्द नहीं, राहत थी।

“अब तुम्हारी बारी।”

नैना ने अपना नाम देखा।

उसके हाथ काँप रहे थे।

कबीर ने कहा—

“डर मत।”

“अगर मैं मर गई?”

“तू नहीं मरेगी।”

“तुझे कैसे पता?”

कबीर मुस्कुराया।

“क्योंकि मैंने तेरा भविष्य देखा है।”

नैना ने छड़ दीवार पर रखी।

तभी काली परछाईं उसके पीछे खड़ी हो गई।

उसने नैना के कान में कहा—

“तुम अकेली हो।”

नैना ने आँखें बंद कीं।

“हाँ।”

परछाईं मुस्कुराई।

नैना ने कहा—

“लेकिन अकेली होने से मैं कमजोर नहीं हूँ।”

परछाईं पीछे हट गई।

नैना ने अपना नाम मिटाना शुरू किया।

दीवार फट गई।

कमरा काँपने लगा।

और काली परछाईं पहली बार चीखी—

“नहीं!”

नैना ने आखिरी अक्षर भी मिटा दिया।

अचानक पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

कबीर उसके सामने खड़ा था।

उसने कहा—

“अब घर जाओ।”

एपिसोड समाप्त।

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