Pretika › Haunted Places › वो फ्लैट खाली नहीं था।
एपिसोड 14 — भूली हुई रात
firoj saifi · Haunted Places · 3 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- वो फ्लैट खाली नहीं था।
- Chapter
- 14 of 15
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 3 min
- Words
- 434
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कमरे के अंदर घना अंधेरा था।
नैना ने टॉर्च जलाई।
दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।
एक चित्र में छोटी नैना थी।
दूसरे में मीरा।
तीसरे में शालिनी।
और आखिरी चित्र में एक काली आकृति।
उसके नीचे लिखा था—
वह जिसे नाम नहीं दिया जा सकता।
नैना ने पूछा—
“इसका नाम क्यों नहीं है?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि नाम लेने से वो मजबूत होती है।”
अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।
धड़ाम!
नैना ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“अब?”
कबीर ने कहा—
“अब हमें रास्ता ढूँढना होगा।”
कमरे के बीच एक पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।
वह अपने आप चलने लगा।
पहले शोर।
फिर एक महिला की आवाज़।
नैना की माँ।
“अगर कोई यह रिकॉर्डिंग सुन रहा है, तो मेरी बेटी वापस आ चुकी है।”
नैना की आँखें भर आईं।
रिकॉर्डिंग जारी रही।
“शालिनी ने जिस चीज़ को बुलाया था, वो इंसान नहीं है। उसे शरीर चाहिए। लेकिन उसे किसी भी शरीर में जाने के लिए एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसने उसे बचपन में देखा हो।”
नैना ने फुसफुसाया—
“मैं।”
रिकॉर्डिंग में उसकी माँ बोली—
“हाँ। नैना।”
फिर कुछ सेकंड की खामोशी।
“उस रात मैंने तुम्हें कमरे से बाहर निकाला। लेकिन उससे पहले उसने तुम्हारे माथे को छुआ।”
नैना ने अपना माथा पकड़ लिया।
उसे अचानक तेज़ दर्द हुआ।
उसकी आँखों के सामने पूरी रात खुलने लगी।
बारिश।
कमरा।
मीरा।
शालिनी।
और काली परछाईं।
छोटी नैना दरवाज़े के सामने खड़ी थी।
मीरा चिल्ला रही थी—
“नैना, मत खोलना!”
लेकिन दूसरी तरफ से एक बच्ची की आवाज़ आई—
“दीदी… मैं अनु हूँ।”
नैना ने दरवाज़ा खोल दिया।
अंधेरा बाहर आया।
शालिनी चीखी—
“दरवाज़ा बंद करो!”
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
काली परछाईं ने नैना के माथे को छुआ।
छोटी नैना बेहोश हो गई।
उसकी माँ दौड़कर आई।
उसने नैना को उठाया।
शालिनी रोते हुए बोली—
“उसे यहाँ से ले जाओ।”
नैना की माँ ने पूछा—
“तुमने ये क्या किया?”
शालिनी ने कहा—
“मैंने नहीं किया।”
उसने काली परछाईं की तरफ देखा।
“ये खुद आई थी।”
नैना की माँ ने नैना को लेकर भागने की कोशिश की।
लेकिन जाते-जाते शालिनी ने उसके कान में कहा—
“एक दिन वो वापस आएगी।”
वर्तमान में नैना ने आँखें खोल दीं।
वह फर्श पर बैठी थी।
कबीर उसके सामने था।
“अब याद आया?”
नैना रोते हुए बोली—
“हाँ।”
“क्या?”
“मेरी माँ मुझे बचाकर ले गई थी।”
कबीर ने पूछा—
“और शालिनी?”
“वो पीछे रह गई।”
अचानक कमरे में शालिनी की आवाज़ गूँजी—
“क्योंकि मैं उसे रोकना चाहती थी।”
शालिनी सामने दिखाई दी।
इस बार उसका चेहरा डरावना नहीं था।
वह थकी हुई लग रही थी।
नैना ने पूछा—
“तुमने बीस साल इसे रोके रखा?”
“हाँ।”
“कैसे?”
“अपने शरीर से।”
नैना चौंक गई।
शालिनी ने कहा—
“वो मेरे अंदर थी।”
कबीर ने कहा—
“फिर अब?”
शालिनी ने नैना की तरफ देखा।
“अब वो मुझे छोड़कर तुम्हारे पास जाना चाहती है।”
नैना ने कहा—
“मैं उसे अपने अंदर नहीं आने दूँगी।”
शालिनी ने दुखी मुस्कान दी।
“तुम्हें लगता है चुनाव तुम्हारा है?”
अचानक कमरे की दीवार फट गई।
एक विशाल काली परछाईं बाहर निकली।
उसने शालिनी को पकड़ लिया।
शालिनी चीखी—
“भागो!”
नैना ने कबीर का हाथ पकड़ा।
दोनों भागे।
पीछे से शालिनी की आखिरी आवाज़ आई—
“तेरह नाम मिटाना… तभी दरवाज़ा बंद होगा!”
नैना सीढ़ियों पर रुक गई।
“तेरह नाम?”
कबीर ने कहा—
“अब हमें वो दीवार ढूँढनी होगी।”
एपिसोड समाप्त।