PretikaVillage Horrorचौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात

भाग पहला — जो गाँव एक रात में मर गया

Piyashi Atma · Village Horror · 4 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात
Chapter
1 of 5
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
706
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

राजस्थान के मरुस्थल में, जैसलमेर से कुछ कोस दूर, जहाँ रेत के टीलों के अलावा आसमान तक कुछ नहीं दिखता, वहाँ एक गाँव का खंडहर पड़ा है जिसका नाम पुराने कागज़ों में मिलता है — पालीवालों का गाँव। और यह अकेला गाँव नहीं था — इसके आसपास फैले हुए चौरासी गाँव थे, जिनमें पालीवाल ब्राह्मणों की बिरादरी बसी हुई थी, ऐसी बिरादरी जो अपनी मेहनत, अपनी सिंचाई की तकनीक और अपनी अमीरी के लिए पूरे मरुस्थल में मशहूर थी, क्योंकि जहाँ दूसरे लोग रेत देखते थे, पालीवाल वहाँ खेत देखते थे, और जहाँ दूसरों के कुएँ सूख जाते थे, पालीवालों के कुएँ गगनचुंबी कौशल से जल भरे रहते थे।

और फिर एक रात ऐसी आई, जिसके बारे में आज भी मरुस्थल के बूढ़े धीमी आवाज़ में बात करते हैं — क्योंकि उस रात चौरासी के चौरासी गाँव, हज़ारों की तादाद में इंसान, अपने घरों की मिट्टी का थोड़ा-सा हिस्सा लिए, अपने दरवाज़ों पर तोरण टाँगे, अपने कुओं को खुदा हाफिज़ कहे, एक साथ उठे और अँधेरे में गायब हो गए। न किसी ने उन्हें जाते देखा, न किसी ने उन्हें किसी और गाँव में बसते देखा — सुबह जब पड़ोस के लोग आए, तो चूल्हे में राख गरम थी, चक्की के बीच आटा फैला था, दीवारों पर लटकी कड़छियाँ ऐसे लटकी थीं जैसे अभी कोई दाल चढ़ाकर गया हो, पर इंसान — एक भी इंसान — कहीं नहीं था। बस हर घर के दरवाज़े पर एक तोरण लटक रहा था, और गाँव के मंदिर के सिंहद्वार पर किसी ने कोयले से लिखा था — "यहाँ अब कभी कोई नहीं बसेगा; जो बसाने आएगा, वो हमारी तरह बिताएगा।"

यह घटना लगभग दो सौ साल पुरानी है, और दो सौ साल में सैकड़ों लोगों ने इन गाँवों में दोबारा बसने की कोशिश की — कभी सरकार ने आवास दिए, कभी ज़मींदारों ने खेत जोते, कभी ढाणियाँ बसाई गईं — पर हर बार, हर कोशिश, कुछ ही महीनों में खत्म हो गई। लोग बसते थे और भागते थे; किसी की बहू बोलना बंद कर देती थी, किसी के घर रात में चक्की अपने आप चलने लगती थी, किसी के बच्चे सुबह उठकर कहते थे कि रात में बहुत सारे लोग आए थे और उन्हें हटाने को कह रहे थे — "यह हमारा घर है, तुम जाओ।" धीरे-धीरे लोगों ने बसना छोड़ दिया, और आज ये गाँव वैसे के वैसे खड़े हैं — सूखे, खाली, और भरे हुए उन आवाज़ों से जो सिर्फ़ रात को सुनाई देती हैं।

इसी खंडहर में एक दिन एक गाड़ी रुकी — सरकारी नंबर प्लेट वाली, धूल में लिपटी, और उसमें से उतरा डॉ. विहान चौबे — उम्र चौंतीस साल, इतिहासकार, और राजस्थान के पुरातत्व विभाग का सबसे जाँची शोधकर्ता, जिसे सरकार ने भेजा था इस गाँव का दस्तावेज़ी सर्वेक्षण करने, ताकि तय किया जा सके कि इन खंडहरों को संरक्षित स्मारक घोषित किया जाए या बुलडोज़र से मिटा दिया जाए। विहान के बैग में नक्शे थे, कैमरा था, मापने के औज़ार थे — और उसकी जेब में एक पुरानी सी लोकेट थी, जो उसकी दादी माँ ने मरते-मरते उसे दी थी, कहते हुए — "बेटा, तू इतिहास पढ़ता है ना, तो एक दिन हमारे गाँव का इतिहास भी पढ़ लेना — वो गाँव जिसे हमारे पुरखों ने एक रात में छोड़ा था, और जिसका नाम मैं मुँह से लेने से डरती हूँ, क्योंकि मेरी माँ कहा करती थीं कि उस गाँव का नाम लेने वालों को गाँव पुकारने लगता है।"

विहान ने उस दिन दादी की बात पर हँसी उड़ाई थी — पर आज, जब उसकी गाड़ी खंडहर के पुराने रास्ते पर उतरी और उसकी आँखों के सामने सैकड़ों बिना छतों वाले घर खड़े थे, जिनकी खाली खिड़कियाँ ऐसे उसे देख रही थीं जैसे किसी की आँखें देखती हैं, तो उसे दादी की आखिरी बात याद आई — और इस बार उसने हँसी नहीं उड़ाई। उसने लोकेट खोली — अंदर एक फीकी पड़ी तस्वीर थी, एक जोड़े की, जिसके नीचे देवनागरी में लिखा था — "जुझार सिंह पालीवाल और पद्मा बाई — गाँव के आखिरी पटेल।" विहान ने तस्वीर देखी, फिर खंडहर देखा, और अपने आप से बोला — "चलो दादी, आज आपके गाँव का इतिहास पढ़ा ही देता हूँ — बस इतनी देर की मेहमानी कर लेना, जितनी देर में सूरज ढले।" उसे नहीं पता था कि गाँव उसकी मेहमानी की अवधि खुद तय कर चुका था।

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