PretikaVillage Horrorचौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात

भाग पाँचवाँ — वो रात जो रुकी हुई है

Piyashi Atma · Village Horror · 4 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
चौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात
Chapter
5 of 5
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
778
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

विहान ने फैसला किया — वो रात गाँव में रुकेगा। जेठा भील ने बहुत मना किया, बहुत समझाया, पर आखिर में हार गया और बोला — "ठीक है बाबू, पर मेरी तीन शर्तें हैं — एक, तुम मंदिर की तरफ़ कभी नहीं जाओगे, चाहे वहाँ से कुछ भी सुनाई दे; दो, तुम हवेली के आंगन में बैठोगे, जहाँ पटेल के घर वाले मेहमान बिठाते थे, क्योंकि मेहमान पर घर वाले कभी ज़ोर नहीं करते; और तीन — अगर रात में कोई तुम्हें कुछ दे, तो ले लेना, पर अगर कोई तुमसे कुछ माँगे, तो पहले मुझे पुकारना — मैं टीले के पीछे जागूँगा, और मेरी चिलम की आग बुझने नहीं दूँगा, क्योंकि कहा जाता है कि इस गाँव के लोग आग से नहीं डरते, पर आग के साथ खड़े आदमी की इज्ज़त करते हैं।"

रात उतरी — और मरुस्थल की रात वैसी उतरी जैसी सिर्फ़ रेत में उतरती है, जहाँ ठंडक अचानक गिरती है और आसमान के तारे इतने करीब आ जाते हैं कि लगे कोई झाड़ पर बैठे दीये हों। विहान हवेली के आंगन में बैठा था — आगे धूनी जली हुई थी, जेठा भील की चिलम की चमक टीले के पीछे दिख रही थी, और गाँव का खंडहर चाँदनी में ऐसे खड़ा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर ज़िंदा हो गई हो। घड़ी में बज रहे थे रात के ग्यारह — और तब, गाँव के बीचों-बीच खड़े मंदिर से, घंटी बजी।

घंटी की आवाज़ इतनी साफ़, इतनी मधुर, इतनी रोज़ाना-सी थी, कि एक पल के लिए विहान भूल गया कि वो किसी श्रापित खंडहर में बैठा है — उसे लगा जैसे वो किसी बसे हुए गाँव में है, जहाँ संध्या आरती का वक़्त हो रहा है। पर अगले ही पल उसे जेठा भील की तीसरी चेतावनी याद आई, और उसने अपने पैर समेट लिए, अपनी पीठ दीवार से सटा ली, और अपनी आँखें आंगन के दरवाज़े पर गड़ा लीं। घंटी बजती रही — और घंटी के साथ-साथ, गाँव की गलियों में, धीरे-धीरे, दीये जलने लगे।

पहले एक दीया जला — पटेल हवेली के दरवाज़े पर। फिर दूसरा — पड़ोस के घर के दरवाज़े पर। फिर तीसरा, चौथा, दसवाँ — और दस मिनट के अंदर पूरे गाँव में, जितने टूटे दरवाज़े थे, उन सब पर दीये जल रहे थे, ऐसे जल रहे थे जैसे दीवाली की रात किसी बसे हुए गाँव में जलती हैं, और उन दीयों की रोशनी में, गलियों में, साये चलने लगे — ऐसे साये जो झुककर चल रहे थे, जिनके सिर पर टोकरी थी, जिनके हाथों में बच्चे थे, जो आपस में बातें कर रहे थे, एक ऐसी आवाज़ में जो हवा की सरसराहट और इंसानी फुसफुसाहट के बीच की थी। विहान बैठा-बैठा पथरा गया — क्योंकि उसे अब समझ आ रहा था कि यह गाँव मरा नहीं है — यह गाँव उसी रात को दोहरा रहा है, हर रात, दो सौ साल से, उसी वक़्त से जब पटेल ने ऐलान किया था कि "उठो, हमें चलना है।"

✦ ✦ ✦

और तब आंगन के दरवाज़े पर, दीयों की लाइन के आखिर में, एक औरत खड़ी हुई — ओढ़नी ढके हुए, हाथों में चूड़ियाँ, पैरों में पायल, और उसकी आँखें, जो दीयों की रोशनी में भी धुंधली थीं, सीधी विहान पर टिकी थीं। औरत ने कदम बढ़ाया — आंगन में उतरी — और विहान के सामने, ठीक उसी दूरी पर रुकी जितनी दूरी पर मेहमान को बिठाया जाता है, और उसने अपना घूँघट थोड़ा उठाया। विहान ने उस चेहरे को देखा — और उसकी साँस अटक गई, क्योंकि वो चेहरा उसकी लोकेट में बंद तस्वीर का चेहरा था — पद्मा बाई, पटेल जुझार सिंह की धर्मपत्नी, जो दो सौ साल पहले इसी आंगन से उठी थी और आज, उसी आंगन में, अपने ही खून के सामने खड़ी थी।

पद्मा बाई ने कुछ नहीं कहा — उसने बस अपना हाथ बढ़ाया, हथेली खोली, और उसमें रखी हुई चीज़ विहान की तरफ़ दिखाई। हथेली में एक तोरण की घुंघरू थी — टूटी हुई, पुरानी, पर उसकी चमक बरकरार। और फिर उसने पहली और आखिरी बार बोला — एक ऐसी आवाज़ में जो कुएँ के पानी में गिरी ईंट जैसी थी, गहरी और गूँजती हुई — "तुम्हारी दादी ने लोकेट लौटा दी — अब तुम हमारी कहानी लौटा दो। दुनिया को बताओ कि हम भागे नहीं थे — हम लूटे गए थे, और लूटने वाला आज भी दुनिया में जीवित है, अपने ही खून के बदले हुए नाम से। जब तक सच नहीं आएगा, हम उठते रहेंगे — हर रात, हर पीढ़ी — क्योंकि श्राप हमने नहीं दिया था, श्राप हमें दिया गया है।" यह कहकर वो पीछे हटी, दीयों की लाइन में घुल गई, और घंटी एक आखिरी बार बजी — और फिर पूरा गाँव, एक साथ, ऐसे बुझा जैसे किसी ने पूरे गाँव की साँस एक साँस में खींच ली हो।

← पिछला भाग

चौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात · सभी भाग →