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भाग चौथा — तोरण और चाबी
Piyashi Atma · Village Horror · 4 मिनट
चौथे दिन विहान ने पटेल हवेली का सर्वे शुरू किया — वही हवेली जो गाँव की सबसे बड़ी इमारत थी, जिसके दरवाज़े पर आज भी एक पुराना सा तोरण लटका हुआ था, धातु का बना हुआ, जिस पर पीतल की छोटी-छोटी घुंघरुएँ लगी थीं, और जो दो सौ साल की धूप और रेत के बावजूद इतना सलामत था जितना शायद कल ही लटकाया गया हो। विहान ने नियम याद किया — तोरण को हाथ न लगाना — पर उसकी नज़र तोरण के बीच में लटकी एक चाबी पर टिक गई, जो बिल्कुल वैसी ही थी जैसी जेठा भील के पास थी, और जिसके नीचे पीतल की तख्ती पर खुदा था — "जो अपना होगा, वही खोलेगा।"
विहान ने हवेली के अंदर कदम रखा — और अंदर का नज़ारा उसकी साँस रोक गया। क्योंकि हवेली के अंदर सब कुछ ऐसे रखा था जैसे मालिक अभी बाज़ार गया हो और लौटने वाला हो — आंगन में पानी भरा घड़ा रखा था, चूल्हे पर देगची चढ़ी थी, पीढ़ी पर एक अधबुनी पोशाक रखी थी, और दीवार के खूँटे पर एक पुरानी सी ढलाई तलवार लटकी थी, जिसके नीचे धूल की परत नहीं, बल्कि ताज़ा तेल की चमक थी, जैसे कोई रोज़ इसे साफ़ करता हो। विहान ने कैमरा उठाया — और उसी पल हवेली के अंदर कहीं, किसी और कमरे में, एक चूड़ी की खनक सुनाई दी।
विहान का दिल धड़क उठा — दोपहर का वक़्त था, गाँव में जेठा भील के अलावा कोई नहीं था, और खनक ऐसी साफ़ थी जैसे कोई आंगन में घूम रहा हो। उसने हिम्मत करके आवाज़ दी — "कौन है?" — और उसकी आवाज़ हवेली की दीवारों से टकराकर उसे लौट आई, पर साथ में एक और चीज़ भी लौट आई — एक बहुत हल्की-सी हँसी, किसी औरत की, जो दूसरे कमरे से आई थी और जिसमें न डरावनापन था, न बदला — बल्कि वो बात थी जो किसी के घर लौटने पर माँ की हँसी में होती है। विहान वहीं खड़ा-खड़ा कुछ देर सुनता रहा — फिर हँसी बंद हो गई, खनक बंद हो गई, और हवेली फिर से खामोश हो गई, इतनी खामोश कि अपनी साँसों की आवाज़ भी शोर लगने लगे। विहान ने धीरे से हवेली से बाहर कदम रखा, और बाहर आते ही उसकी नज़र दरवाज़े पर पड़ी — तोरण की घुंघरुएँ हिल रही थीं, बिना हवा के, और चाबी पर खुदी तख्ती की धूल पर किसी ने उंगली से लिखा था — "जल्दी आना।"
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उस शाम विहान जेठा भील की झोंपड़ी गया और सब कुछ बता दिया — तस्वीरों वाले आकार, हवेली की खनक, तख्ती पर लिखा "जल्दी आना"। जेठा भील ने सब सुना, अपनी चिलम भरी, एक कश लिया, और बोला — "बाबू, अब समझ आया कि तुम्हारी दादी ने तुम्हें लोकेट क्यों दी थी — तुम सिर्फ़ इतिहासकार नहीं हो, तुम पालीवालों के खून हो, और गाँव ने तुम्हें पहचान लिया है। मैं पच्चीस साल से इस गाँव की देखरेख में हूँ, और मैं तुम्हें सच बताऊँ — इस गाँव ने मुझसे कभी एक शब्द नहीं कहा, कभी एक घुंघरू नहीं हिलाया, क्योंकि मैं रखवाले का बच्चा हूँ, मालिक का नहीं — और तुमसे पहले हफ़्ते में ही इतना कुछ कह दिया, क्योंकि तुम जुझार सिंह की पोती का बेटा हो, और इस गाँव को अपने लोगों की खुशबू दो सौ साल से याद है।"
विहान चुपचाप सुनता रहा — फिर उसने लोकेट निकाली और जेठा भील के सामने रख दी। बूढ़े ने लोकेट को दोनों हाथों से उठाया, उसे अपने माथे से लगाया, और उसकी आँखों से आँसू बह निकले — "यह वही लोकेट है जो पटेलाइन पद्मा बाई ने अपनी बहू को दी थी, उस रात, जब गाँव उठा था — कहा जाता है कि पद्मा बाई ने कहा था, 'जिस पीढ़ी में यह लोकेट वापस गाँव आएगी, उस पीढ़ी में गाँव का दरवाज़ा खुलेगा — बस उस पीढ़ी को इतना समझ आ जाए कि घर छोड़ने वाले कायर नहीं होते, कभी-कभी वो घर को बचाने के लिए ही छोड़ते हैं।'" जेठा भील ने लोकेट वापस दी और बोला — "अब तुम्हें तय करना है बाबू — तुम अपनी रिपोर्ट लिखकर चले जाओगे, जैसे सौ अफसर गए हैं, या तुम वो करोगे जो दो सौ साल से कोई नहीं कर पाया — तुम इस गाँव की आखिरी रात की असलियत जानोगे, वो भी तब, जब मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि रात में यहाँ रुकना मना है।"
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात
- Chapter
- 4 of 5
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 722
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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