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भाग तीसरा — गाँव का दस्तावेज़
Piyashi Atma · Village Horror · 3 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- चौरासी खंडहर — उस गाँव की आखिरी रात
- Chapter
- 3 of 5
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 3 min
- Words
- 489
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
विहान ने तीन दिन तक दिन की रोशनी में सर्वे किया — घर गिने, कुएँ नापे, मंदिर के खंडहर को फोटो खींचा, और हर शाम को सूरज ढलने से पहले वापस जैसलमेर लौट आया। तीन दिन में उसके पास सैकड़ों तस्वीरें थीं, पर चौथी तस्वीर के बाद उसने एक अजीब बात गौर की — उसकी ली हुई हर तस्वीर में, किसी न किसी खिड़की में, किसी न किसी दरवाज़े की ओट में, एक धुंधला-सा आकार खड़ा था, जो लेंस की खराबी कहलाने के लिए बहुत ज़्यादा इंसानी था और इंसान कहलाने के लिए बहुत ज़्यादा पारदर्शी। विहान ने तस्वीरें ज़ूम कीं — एक तस्वीर में, पुराने पटेल हवेली की खिड़की में, एक औरत खड़ी थी, जिसके सिर पर ओढ़नी थी और हाथों में चूड़ियाँ, और उसकी आँखें सीधी कैमरे में देख रही थीं — ऐसे देख रही थीं जैसे कोई बहुत देर से इंतज़ार कर रहा हो और आखिरकार इंतज़ार करने वाला आ गया हो।
पर असली खुलासा तब हुआ जब विहान ने जिला अभिलेखागार में गाँव के पुराने कागज़ खंगाले। वहाँ उसे एक फाइल मिली — ब्रिटिश काल की, साल 1825 की — जिसमें जैसलमेर रियासत के दीवान के बारे में लिखा था। दीवान का नाम था ज़ाहिर सिंह — एक ऐसा अधिकारी जो अपनी लालच और अपने ज़ुल्म के लिए पूरी रियासत में मशहूर था, जिसकी नज़र पालीवालों की अमीरी पर थी, और फिर एक दिन उसकी नज़र पटेल जुझार सिंह की बेटी पद्मा पर पड़ गई। कागज़ों में लिखा था कि दीवान ने इश्तिहार भिजवाया था — "या तो पटेल अपनी बेटी मेरे हवेली के दरवाज़े पर भेजे, या चौरासी गाँवों पर इतना लगान लगेगा कि पालीवालों की पीढ़ियाँ चुकाती रहेंगी।" और अगले ही पन्ने पर, एक और रिपोर्ट थी — "उसी सप्ताह, चौरासी गाँव एक रात में उजाड़ पाए गए; दीवान की फौज पहुँची तो घर गरम थे पर घर वाले गायब थे; दीवान ने गुस्से में गाँवों को जलाने का हुक्म दिया, पर फौज के घोड़े गाँव की सीमा पर रुक गए और आगे न बढ़े; कहा जाता है कि उस रात गाँव की सीमा पर सैकड़ों दीये अपने आप जल उठे थे।"
विहान ने फाइल बंद की और उसकी नज़र फाइल के आखिरी पन्ने पर पड़ी — वहाँ एक अंग्रेज़ अफसर के हाथ से लिखा था — "यह मामला हमारी समझ के बाहर है; पूरे गाँव का पलायन एक रात में संभव नहीं, पर हुआ है; और सबसे विचित्र बात यह है कि उजाड़ने वालों ने अपने साथ कुछ नहीं लिया — न सोना, न जेवर, न अनाज — बस अपने दरवाज़ों पर तोरण टाँगे गए हैं, जैसे वो कहीं जा नहीं रहे हों, बल्कि किसी के आने का इंतज़ार कर रहे हों।" विहान के हाथ काँप गए — क्योंकि उसकी दादी माँ भी यही कहा करती थीं, वही शब्द, वही लहजा — "हमारे पुरखे कहीं गए नहीं थे बेटा, वो बस इंतज़ार करने लगे थे — इंतज़ार उस दिन का, जब कोई अपना लौटकर आएगा और गाँव को कहेगा कि अब सब ठीक है।"