PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 2 — आईने की देर

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
3 of 11
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
535
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस रात के बाद, सच कहूँ तो, मैंने सोने से डरना शुरू कर दिया। पर डर की एक अजीब बात होती है — वो जितना तुम्हें भगाता है, उतना ही अपनी तरफ़ खींचता भी है। मैं हर रात कसम खाती कि आज तीन बजकर बयालीस पर नहीं जागूँगी, आज ध्यान नहीं दूँगी। और हर रात, ठीक उसी मिनट पर, मेरी आँख खुल जाती और मैं अँधेरे में उस दूसरी साँस को ढूँढ़ने लगती।
मैंने अपनी दोस्त सना को बताया। सना बहुत practical लड़की है, इन सब बातों पर हँसती है। उसने कहा — ज़ोया, तुझे नींद पूरी नहीं हो रही, बस इतनी-सी बात है। ये sleep paralysis होता है, यानी नींद और जागने के बीच की एक ऐसी हालत जिसमें दिमाग़ जाग जाता है पर बदन कुछ पल के लिए सुन्न रहता है — बहुत common है। किसी अच्छे doctor को दिखा ले। मुझे उसकी बात सही लगी। शायद यही था। शायद मेरा दिमाग़ थकान में मुझे चीज़ें दिखा रहा था, सुना रहा था। मैंने एक neurologist का appointment ले लिया।
पर problem ये थी कि doctor को दिखाने से पहले ही, मेरे साथ वो हुआ जिसने रही-सही तसल्ली भी छीन ली।
मेरे कमरे में, दरवाज़े के पास, एक पुराना, पूरे कद वाला आईना लगा है — मेरी माँ का दिया हुआ, लकड़ी के भारी frame वाला। एक सुबह, office के लिए तैयार होते हुए, मैं उस आईने के सामने खड़ी थी और अपने बाल बाँध रही थी। हाथ ऊपर उठे हुए, बाल पीछे। और तभी मेरी नज़र आईने में अपने ही हाथों पर पड़ी।
मेरे हाथ रुक चुके थे। पर आईने में, मेरे हाथ... एक पल की देर से रुके।
बहुत हल्की-सी देर। इतनी हल्की कि कोई और होता तो शायद ध्यान भी न देता। जैसे किसी video call में network थोड़ा slow हो और सामने वाले की movement ज़रा-सी पीछे चले। मैं वहीं जम गई। मैंने बहुत धीरे से अपना दाहिना हाथ उठाया। आईने वाली ज़ोया ने भी हाथ उठाया — पर मेरे बाद। मैंने हाथ नीचे किया। उसने भी किया — मेरे बाद।
मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ मुझे अपने कानों में सुनाई दे रही थी। मैंने खुद से कहा — ज़ोया, ये तेरा वहम है, तेरी आँखें थकी हुई हैं। और फिर, न जाने क्यों, मैंने आईने वाली ज़ोया की आँखों में सीधे देखा।
और आईने वाली ज़ोया... मुस्कुरा दी।
मैं नहीं मुस्कुराई थी।
मैं पीछे हटी, मेरी पीठ दीवार से टकराई, और जब मैंने दोबारा आईने में देखा, तो सब normal था। आईने में सिर्फ़ मैं थी — डरी हुई, काँपती हुई, अपनी ही परछाईं। उसने ठीक वही किया जो मैंने किया। पर मुझे पता था कि मैंने क्या देखा। मैंने कोई सपना नहीं देखा था। दिन के उजाले में, पूरे होश में, मैंने अपनी परछाईं को अपनी मर्ज़ी से मुस्कुराते देखा था।
उस दिन मैं office नहीं गई। मैंने वो आईना एक पुरानी चादर से ढक दिया।
पर उस रात, जब मैं तीन बजकर बयालीस पर जागी, तो चादर... फ़र्श पर पड़ी थी। और आईना खुला हुआ था, खिड़की से आती चाँद की रोशनी में चमकता हुआ। और उस आईने के अँधेरे में, बहुत गहराई में, मुझे ऐसा लगा जैसे कोई खड़ा है — मेरे कद का, मेरे जैसा, पर मैं नहीं। और वो मुझे देख रहा है। बहुत सालों से देख रहा है।

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