PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 3 — उसकी खुशबू

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
4 of 11
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
546
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आईने वाली बात के बाद, चीज़ें बदल गईं। जैसे किसी ने कोई अनदेखी line पार कर ली हो। जैसे अब उसे मुझसे छुपने की ज़रूरत ही नहीं रह गई थी।
सबसे पहले खुशबू आई।
एक रात, नींद में, मुझे एक खुशबू महसूस हुई। कोई perfume नहीं, कोई agarbatti नहीं — ये कुछ और था। जली हुई लकड़ी जैसी, ऊद जैसी — यानी वो गहरी, गरम, धुएँ भरी खुशबू जो पुराने ज़माने में शाही महलों में जलाई जाती थी — और उसमें कहीं दूर बारिश के बाद की मिट्टी की महक घुली हुई। ऐसी खुशबू जो तुम्हारे सीने में उतर जाए और वहीं ठहर जाए। मैंने ऐसी खुशबू ज़िंदगी में कभी नहीं सूँघी थी, फिर भी... वो जानी-पहचानी लगी। जैसे बहुत पुरानी हो। जैसे मैं उसे बचपन से जानती हूँ, पर कहीं भूल गई थी।
और उसी खुशबू के बीच, मैंने पहली बार उसकी आवाज़ सुनी।
उसने कुछ ज़्यादा नहीं कहा। बस मेरा नाम।
ज़ोया।
बस इतना। पर जिस तरह उसने कहा — बहुत धीरे, बहुत करीब से, जैसे उसके होंठ मेरे कान से ज़रा भी दूर न हों — उस आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, कोई गुस्सा नहीं था। उसमें कुछ ऐसा था जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल है... जैसे कोई बहुत लंबे इंतज़ार के बाद, आख़िरकार उस चीज़ को पुकार रहा हो जो हमेशा से उसकी थी। मेरी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई — और सबसे बेचैन कर देने वाली बात ये थी कि वो सिहरन पूरी तरह डर की नहीं थी।
मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगी। मुझे उस आवाज़ को दोबारा सुनने का मन हुआ।
सपने में, मैं एक जगह थी जो मेरे कमरे जैसी थी, पर बिलकुल मेरा कमरा नहीं थी। हवा भारी थी, धुएँ जैसी। और कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा था। मैं उसे देख नहीं पा रही थी, पर मैं उसकी मौजूदगी को अपनी पीठ पर, अपनी गर्दन पर महसूस कर सकती थी — जैसे कोई गरम साया मुझ पर झुका हो। उसने मेरा नाम फिर लिया, और मुझे ऐसा लगा जैसे उसकी उँगलियाँ मेरे बालों को छूकर हटीं, बहुत हल्के से — जैसे मुझे तसल्ली दे रहा हो, जैसे कह रहा हो, डरो मत, मैं तो हमेशा से यहीं था।
मैं झटके से जागी।
और तब मुझे वो निशान दिखा।
मेरी बाईं कलाई के अंदर की तरफ़, त्वचा पर, एक हल्का-सा लाल निशान था। गोल — जैसे किसी ने बहुत धीरे से वहाँ अपना अँगूठा रखा हो, और देर तक रखा हो। वो जल नहीं रहा था, दर्द नहीं कर रहा था। बस गरम था, मेरी बाकी त्वचा से थोड़ा ज़्यादा गरम। मैंने उसे छुआ, और अजीब बात — उसे छूते ही मुझे फिर वही खुशबू महसूस हुई, बहुत हल्की-सी, जैसे वो निशान उसी खुशबू से बना हो।
अब मैं जानती थी कि सना ग़लत थी। ये sleep paralysis नहीं था। ये मेरा वहम नहीं था। कोई सच में था। कोई जो मुझे जानता था, मुझे मेरे नाम से पुकारता था, और जिसके छूने का निशान मेरी त्वचा पर रह जाता था।
पर वो कौन था, इसका पहला सिरा मुझे तब मिला जब उसी सुबह मेरी माँ का फ़ोन आया — और उन्होंने मुझसे वो सवाल पूछा जो उन्होंने पंद्रह साल से नहीं पूछा था। उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा — ज़ोया... वो ताबीज़ जो मैंने तुझे पहनाया था, वो अभी भी तेरे पास है न?
और उस पल मुझे याद आया कि वो ताबीज़ मैंने दो महीने पहले खो दिया था।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

हमज़ाद · सभी भाग →