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Episode 4 — माँ का डर
Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 5 of 11
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 3 min
- Words
- 543
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
वो ताबीज़ अभी भी तेरे पास है न? — माँ के इस एक सवाल ने मेरे अंदर कुछ हिला दिया। क्योंकि मेरी माँ डरती नहीं हैं। मैंने उन्हें ज़िंदगी में मुश्किल से कभी घबराते देखा है। पर उस फ़ोन पर, उनकी आवाज़ काँप रही थी। और जब मैंने सच बताया — कि वो ताबीज़ मैंने दो महीने पहले, किसी तरह खो दिया था, शायद bathroom में उतारते वक़्त, मुझे ठीक से याद भी नहीं — तो फ़ोन पर कुछ पल के लिए बिलकुल खामोशी छा गई। इतनी गहरी खामोशी कि मुझे लगा call ही कट गई।
फिर माँ ने सिर्फ़ इतना कहा — मैं कल सुबह की पहली बस से आ रही हूँ।
उस ताबीज़ की कहानी मुझे थोड़ी-थोड़ी याद है। मैं जब पैदा हुई थी, तो माँ बताती हैं कि मैं बहुत कमज़ोर थी, दिन-रात रोती रहती थी, और कोई doctor बता नहीं पाता था कि तकलीफ़ क्या है। तब मेरी नानी मुझे किसी बुज़ुर्ग के पास ले गई थीं — कोई अमिल था, यानी वो लोग जो जिन्नात और उस दूसरी दुनिया की चीज़ों का इल्म रखते हैं — और उसने एक काला धागा, जिसमें चाँदी का एक छोटा-सा ताबीज़ बँधा था, मेरे गले में डाल दिया था। और उसके बाद, माँ कहती हैं, मेरा रोना बंद हो गया। मैं ठीक हो गई।
बचपन में वो ताबीज़ मेरे लिए बस एक आदत था, गले में पड़ा एक धागा। जवान होते-होते मैंने कई बार सोचा कि इसे उतार दूँ, ये अजीब लगता है, पर हर बार माँ की एक ही बात याद आ जाती — इसे कभी मत उतारना, ज़ोया, चाहे कुछ भी हो जाए। और मैंने उतारा नहीं। पर पिछले साल भर में मैं इतनी लापरवाह हो गई थी कि मुझे पता ही नहीं चला वो कब मेरे गले से गायब हो गया।
अब मुझे समझ आ रहा था कि ये सब कब शुरू हुआ था। तीन बजकर बयालीस की वो पहली रात... वो ठीक उसी हफ़्ते की थी जब मैंने वो ताबीज़ खोया था।
अगले दिन माँ आईं। पंद्रह साल बाद मैंने उनके चेहरे पर वो डर देखा जो एक माँ अपनी औलाद से छुपाने की बहुत कोशिश करती है, पर छुपा नहीं पाती। घर में क़दम रखते ही उनकी नज़र सबसे पहले उस ढके हुए आईने पर पड़ी। और वहीं रुक गई। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पूछा — बस उस आईने को देखती रहीं, जैसे उसमें कुछ ढूँढ़ रही हों।
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, मुझे बिठाया, और बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोलीं — ज़ोया, अब वक़्त आ गया है कि मैं तुझे कुछ बताऊँ। कुछ जो मैंने तुझसे इसलिए छुपाया क्योंकि मुझे लगता था कि जब तक वो ताबीज़ तेरे पास है, तुझे कभी जानने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
मैंने पूछा — क्या बताना है, माँ? ये सब क्या हो रहा है मेरे साथ?
उन्होंने मेरी आँखों में देखा। और जो उन्होंने कहा, उसने मेरी दुनिया पलट कर रख दी।
तू अकेली पैदा नहीं हुई थी, बेटा। तेरे साथ कोई और भी था। और वो ताबीज़... उसे तुझसे दूर रखने के लिए था।
मैंने घबराकर कहा — कोई और? माँ, मेरा तो कोई भाई-बहन नहीं है। आप क्या कह रही हैं?
माँ ने एक लंबी साँस ली, जैसे वो शब्द बोलना उनके लिए किसी भारी पत्थर को उठाने जैसा हो।
हमारे खानदान में एक कर्ज़ है, ज़ोया। बहुत पुराना कर्ज़। और उस कर्ज़ का एक नाम है।