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Episode 1 — तीसरा पहर

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

मेरा नाम ज़ोया है। और अगर तुम ये कहानी सुन रहे हो, तो मुमकिन है कि कभी न कभी तुम्हें भी वो एहसास हुआ हो, जो पिछले कुछ महीनों से मेरी हर रात का हिस्सा बन चुका था — वो एहसास कि अँधेरे में तुम्हारी साँसों के साथ कोई और भी साँस ले रहा है।
बात शुरू होती है उस रात से जब मैं पहली बार ठीक तीन बजकर बयालीस मिनट पर नींद से जागी। कोई बुरा सपना नहीं था, कोई आवाज़ नहीं थी, कुछ भी नहीं — बस अचानक आँख खुल गई, जैसे किसी ने बहुत धीरे से, बहुत प्यार से मेरा नाम पुकारा हो और मेरे कान के पास से हट गया हो। मैंने घड़ी देखी, करवट बदली और सोचा — थकान होगी, office का stress होगा, सो जाओ ज़ोया। पर अगली रात, फिर वही हुआ। तीन बजकर बयालीस। और उसके अगले दिन भी, और उसके अगले दिन भी। एक ही मिनट पर, हर रात, जैसे मेरे अंदर कहीं कोई alarm लगा हो जो मैंने कभी अपने हाथों से set नहीं किया था।
पहले-पहल मैंने इसे नज़रअंदाज़ किया। हम सब यही करते हैं न — जो चीज़ समझ में न आए, उसे coincidence कहकर आगे बढ़ जाते हैं। पर फिर छोटी-छोटी चीज़ें होने लगीं। मैं हमेशा से अपने बिस्तर के बाईं तरफ़ सोती थी, बचपन से। पर जब मैं तीन बजकर बयालीस पर जागती, तो हर बार मेरे बिस्तर का दाहिना हिस्सा — जो हमेशा खाली और ठंडा रहता था — हल्का-सा गरम मिलता। जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से उठा हो। जैसे कोई पूरी रात मेरे बगल में लेटा रहा हो, और मेरे जागने से ठीक पहले उठ गया हो।
मैं अकेली रहती हूँ। एक छोटे-से flat में, शहर के एक शांत-से हिस्से में। दरवाज़े पर दो lock हैं, खिड़कियों पर grill है। कोई अंदर नहीं आ सकता। मैंने खुद को यही समझाया — कोई अंदर नहीं आ सकता।
फिर एक रात मैंने वो किया जो शायद मुझे नहीं करना चाहिए था। मैं तीन बजकर बयालीस पर जागी, और इस बार मैंने आँखें नहीं खोलीं। मैं वैसे ही, बंद आँखों के साथ, पूरी तरह शांत पड़ी रही, जैसे अभी भी सो रही हूँ। और मैंने सिर्फ़ एक काम किया — मैंने सुना। कमरे में एक ही आवाज़ होनी चाहिए थी, मेरी अपनी साँसों की। अंदर... बाहर। अंदर... बाहर।
पर जो मैंने सुना, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।
एक और साँस थी। मेरी साँस के ठीक बीच में। जब मैं साँस अंदर खींचती, वो बाहर छोड़ता। धीमी, गहरी, इत्मीनान वाली साँस — किसी ऐसे की, जो जल्दी में नहीं था, जो जानता था कि उसके पास सारी रात है, सारी उम्र है। और वो साँस मेरे तकिये से चंद इंच दूर, मेरे कान के ठीक पास से आ रही थी।
मैंने अपनी पूरी हिम्मत बटोरी और आँखें खोल दीं।
कमरे में कोई नहीं था।
पर उस दूसरी साँस की गरमाहट, अभी भी मेरी गर्दन पर थी।

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
2 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
478
Language
Hindi (हिंदी)
Price
3 parts free · 28 unlock with coins

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