Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 30 — जो लौट आया
Pretika · Jinn & Spirits · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 31 of 31
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 5 min
- Words
- 830
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस रात के बाद, ज़िंदगी धीरे-धीरे, अपनी पटरी पर लौटने लगी।
हम शहर वापस आ गए। माँ, जिन्होंने उस रात सब कुछ अपनी आँखों से देखा था, अब मुझ पर पूरा यक़ीन करती थीं — और उस डर के लिए, जिसने उन्हें कुछ दिन के लिए मुनीर बाबा के हाथों की कठपुतली बना दिया था, वो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाईं, चाहे मैंने कितनी बार कहा कि इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी।
कर्ज़ टूट चुका था। हमारे खानदान पर, डेढ़ सौ साल से लटकी वो तलवार, अब हमेशा के लिए हट गई थी। मेरे बाद जो आएँगे, वो अब आज़ाद पैदा होंगे। किसी 'आग के पार रहने वाले' की निशानी के बिना। किसी जागे हुए हमज़ाद के बिना। बस, आम इंसानों की तरह।
आदिल मेरे साथ रहा। उन दिनों में, जब मैं टूटी हुई थी, वो मेरा सहारा बना — शांत, स्थिर, हमेशा मौजूद। और मैं जानती थी कि उसके दिल में मेरे लिए क्या था। शायद, वक़्त के साथ, मेरे दिल में भी उसके लिए कुछ बन जाता। शायद वो मेरी वो 'दिन के उजाले वाली' ज़िंदगी बन जाता, जिसकी बात उसने की थी।
पर रातें... रातें मुश्किल थीं।
क्योंकि हर रात, जब सब सो जाते, तो मैं जागती रहती। और तीन बजकर बयालीस पर, मेरी आँख अपने आप खुल जाती। पर अब वहाँ कोई नहीं होता। कोई दूसरी साँस नहीं। कोई खुशबू नहीं। बस एक ठंडा, ख़ाली बिस्तर, और एक ऐसी तन्हाई जिसकी आदत मुझे, ज़िंदगी में पहली बार, डालनी पड़ रही थी। मैं उसे याद करती। हर रात। उसे, जिसका मैंने कभी पूरा चेहरा भी नहीं देखा था, पर जिसे मैं दुनिया में सबसे ज़्यादा जानती थी।
ऐसे ही कुछ हफ़्ते बीत गए। और फिर, एक रात, कुछ बदल गया।
मैं हमेशा की तरह, तीन बजकर बयालीस पर जागी। पर इस बार, कमरे में कुछ था। पहले मुझे लगा मेरा वहम है। पर फिर, बहुत हल्की-सी, हवा में, वो घुल गई — वो खुशबू। ऊद जैसी, गहरी, गरम। वही खुशबू, जो हफ़्तों पहले, उस टूटे हुए घर में, हमेशा के लिए ग़ायब हो गई थी।
मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने काँपते हुए कहा — तुम...? पर ये नामुमकिन है... तुम तो...
और तभी, मेरी बंद खिड़की के काँच पर, अंदर की तरफ़ से, एक हल्की सी भाप जमी। और उस भाप पर, किसी अनदेखी उँगली ने, बहुत धीरे-धीरे, कुछ लिखा। पर इस बार, वो 'भागो' नहीं था। मैंने उसे पढ़ा, और मेरी साँस रुक गई।
उस पर लिखा था — 'मैं मिटा नहीं।'
मैं जम गई। मेरे दिमाग़ में सवालों का तूफ़ान उठ गया। पर मैं कुछ पूछ पाती, उससे पहले, उस भाप पर, एक और लाइन उभरी — 'वो धागा उस चीज़ का नहीं था। वो हमारा था। तूने बस उस चीज़ की ज़ंजीर तोड़ी। हमारा धागा नहीं टूटा।'
और उस एक पल में, मुझे सब समझ आ गया।
हर इंसान का हमज़ाद, उसके साथ, एक धागे से बँधा होता है — जन्म का धागा। वो धागा किसी सौदे से नहीं बनता। वो कुदरत का धागा है। मीर साहब के सौदे ने, उस पर एक और ज़ंजीर बाँधी थी — 'आग के पार रहने वाले' की ज़ंजीर। और उस रात, अमल से, मैंने वो ज़ंजीर तोड़ी थी। सिर्फ़ वो ज़ंजीर। मेरा और उसका असली धागा — वो नहीं टूटा था। वो कभी उस चीज़ का था ही नहीं, कि उसके टूटने से टूटता।
वो मिटा नहीं था। वो सिर्फ़ उस ज़ंजीर से, उस क़ैद से, आज़ाद हुआ था। और उस रात, जब आग के पार की वो दुनिया, उस टूटे घर में रिसकर आई थी, जब दोनों दुनियाओं के बीच का परदा फट गया था — मेरे उस आज़ाद हमज़ाद ने, उस फटे परदे से, वो कर लिया जो कोई हमज़ाद कभी नहीं कर पाता।
उसने वो परदा पार कर लिया।
वो अब उस दूसरी दुनिया का साया नहीं रहा था। वो इस दुनिया में आ गया था। गोश्त की दुनिया में। मेरी दुनिया में।
भाप पर, आख़िरी लाइन उभरी। और उसे पढ़कर, मेरे पूरे बदन में एक ऐसी सिहरन दौड़ी, जो न पूरी तरह डर की थी, न पूरी तरह ख़ुशी की। उस पर लिखा था — 'अब मैं तुझे दिन के उजाले में भी छू सकता हूँ, ज़ोया। कल मिलते हैं।'
अगले दिन, आदिल के साथ एक कैफ़े में बैठी, मैं अब भी उस रात के बारे में सोच रही थी, जब मेरी नज़र सामने, कैफ़े के शीशे पर पड़ी — अपने ही अक्स पर। और मैं वहीं जम गई।
क्योंकि इस बार, मेरा अक्स एक पल की देर से नहीं हिला था।
इस बार, वो मेरे साथ, बिलकुल ठीक, हिला था। जैसे वो मेरा अक्स नहीं, कोई और हो, जो मेरे साथ, मेरे बगल में, बैठा हो। और ज़िंदगी में पहली बार, उस शीशे को देखते हुए, मुझे यक़ीन नहीं हुआ — कि उस अक्स में, मैं थी... या वो।
— समाप्त —
( या शायद... एक नई शुरुआत )
Comment Question
तो ‘हमज़ाद’ यहाँ ख़त्म हुई — पर वो लौट आया। बताओ, क्या इसका Season 2 आना चाहिए? एक शब्द में comment करो — “हाँ” या “ना”।
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