Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 29 — क़ीमत
Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 30 of 31
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 3 min
- Words
- 595
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
वो सफ़ेद रौशनी धीरे-धीरे छँटी, और उस टूटे हुए, अब शांत पड़े कमरे में, मैं घुटनों के बल बैठी थी, हाँफती हुई, लहूलुहान, पर ज़िंदा।
आदिल मेरी तरफ़ भागा। मेरी माँ, जो अब तक दरवाज़े पर, इस सब को देखती, जमी खड़ी थीं, वो भी मेरी तरफ़ लपकीं। हम बच गए थे। वो चीज़ चली गई थी। मुनीर बाबा ख़त्म हो गया था। कर्ज़ टूट गया था। पर मुझे उस जीत की ख़ुशी महसूस नहीं हो रही थी। क्योंकि मैं जानती थी कि उस गाँठ के टूटने का मतलब क्या था।
मैंने कमरे में उसे ढूँढ़ा। कोने में, जहाँ वो आख़िरी बार खड़ा था — मुझे बचाते हुए, उस चीज़ की ज़ंजीर से लड़ते हुए — अब वो धुँधली आकृति, बहुत धीरे-धीरे, बिखर रही थी। मिट रही थी। ठीक वैसे ही जैसे उसने कहा था। क्योंकि जो धागा उसे इस सौदे से बाँधता था, वो अब टूट चुका था। और उस धागे के साथ, वो भी जा रहा था।
मैं लड़खड़ाते हुए उसकी तरफ़ बढ़ी। मैंने कहा — नहीं... रुको... कोई और रास्ता होगा...
उसकी आवाज़ आई, पर अब वो बहुत कमज़ोर थी, बहुत दूर की, जैसे किसी बहुत गहरे कुएँ से आ रही हो। पर उसमें दर्द नहीं था। उसमें एक अजीब सी शांति थी। उसने कहा — कोई और रास्ता नहीं है, ज़ोया। और मुझे किसी और रास्ते की ज़रूरत भी नहीं। तू बच गई। बस यही मैं चाहता था।
मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे। मैंने कहा — पर तुम... तुम्हारे बिना...
उसने कहा — सुन। मेरी बात सुन। डेढ़ सौ साल, मैं एक ज़ंजीर में बँधा रहा। एक ऐसी चीज़ का ग़ुलाम, जिससे मुझे नफ़रत थी। मेरी पूरी हस्ती, बस एक कर्ज़ थी, एक क़ैद थी। पर फिर तू आई। और तेरे साथ, पहली बार, मुझे कुछ ऐसा मिला जो मेरा अपना था। तेरी हर हँसी, तेरा हर आँसू, तेरी वो हर रात जब मैं तेरे पास था — वो मेरी क़ैद के बीच की, मेरी अपनी आज़ादी थी। तूने मुझे, एक ग़ुलाम को, ये एहसास दिलाया कि किसी से मोहब्बत करना कैसा होता है। और अब मैं जा रहा हूँ, एक ग़ुलाम की तरह नहीं — बल्कि एक ऐसे की तरह, जिसने, अपनी पूरी हस्ती में, एक बार, किसी से सच्ची मोहब्बत की।
उसकी वो आकृति, अब लगभग ग़ायब हो चुकी थी। बस उसकी वो खुशबू, कमरे में, धीरे-धीरे हल्की पड़ रही थी।
मैंने रोते हुए, अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया — उस खुशबू की तरफ़, उस धुँधलाते साये की तरफ़। और आख़िरी बार, बहुत हल्के से, मैंने उसे महसूस किया — जैसे किसी ने, बहुत प्यार से, मेरे माथे पर से एक लट हटाई हो। वैसे ही, जैसे उस पहली रात हटाई थी।
और उसकी आवाज़, आख़िरी बार, मेरे बहुत पास, मेरे कान में, फुसफुसाई — मुझे एक 'साया' की तरह याद मत रखना, ज़ोया। मुझे उस तरह याद रखना, जैसे मैं तेरे लिए था। अब जी। दिन के उजाले में। मेरे लिए भी।
और फिर, वो खुशबू ग़ायब हो गई।
कमरा बिलकुल ख़ामोश हो गया। मेरे बगल की वो जगह, जो पिछले कई महीनों से हमेशा गरम रहती थी, अब ठंडी हो गई। वो चला गया था। जन्म से मेरे साथ। और अब, पहली बार, मैं सच में, पूरी तरह, अकेली थी।
मेरी माँ ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। आदिल मेरे बगल में बैठ गया। हम बच गए थे। सब ख़त्म हो गया था। पर मैं वहीं, उस टूटे हुए घर के ठंडे फ़र्श पर बैठी, फूट-फूटकर रोती रही — उस एक के लिए, जिसे बचाने के लिए मैं अपनी जान देने को तैयार थी, और जिसे बचाने का, आख़िर में, कोई रास्ता नहीं था।
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