PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 28 — जो छीनता है

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
29 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
611
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

मुनीर बाबा को अपनी ग़लती का एहसास तब हुआ, जब बहुत देर हो चुकी थी।
उस चीज़ की वो दो जलती आँखें, जब उस पर टिकीं, तो मुनीर बाबा का वो लालच, एक पल में, दहशत में बदल गया। उसने काँपते हुए कहा — नहीं, मालिक... मैं तो बस... मैंने तो आपकी सेवा की है... इतने साल... मैं तो बस अपना हिस्सा...
पर उस चीज़ ने कुछ नहीं सुना।
मैंने देखा — वो अँधेरी आकृति, अपनी पूरी विशालता के साथ, मुनीर बाबा की तरफ़ मुड़ी। और वो ठंडी, गहरी आवाज़, जो अब तक मुझे 'नन्ही' कहकर बुला रही थी, इस बार मुनीर बाबा से बोली — तूने डेढ़ सौ साल मेरी सेवा इसलिए नहीं की, क्योंकि तू वफ़ादार था। तूने इसलिए की, क्योंकि तू लालची था। और अब, जब मेरी क़ीमत मेरे हाथ से जा रही है, तू मेरी ही ताक़त चुराने चला? — उसकी आवाज़ में एक ठंडी, भयानक हँसी घुली। ठीक है। अगर तुझे ताक़त चाहिए... तो आ, मेरे पास आ।
और फिर, वो अँधेरा, मुनीर बाबा पर टूट पड़ा।
मैं जो देख रही थी, उसे बयान करना मुश्किल है। वो जलते सुराख़, वो धुआँ, वो आग के पार की भूखी दुनिया — सब कुछ, एक पल में, मुनीर बाबा को अपने अंदर खींचने लगी। मुनीर बाबा चीखा — एक ऐसी चीख़ जो मैं अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं भूल पाऊँगी — और उसका वो बूढ़ा शरीर, धीरे-धीरे, उस अँधेरे में घुलने लगा, बिखरने लगा, जैसे रेत किसी तूफ़ान में उड़ जाती है। उसने डेढ़ सौ साल जिस मालिक की सेवा की थी, आख़िर में, वही मालिक उसे निगल गया। एक जान के बदले एक जान — पर वो जान, जो उस चीज़ को मिली, वो मेरी नहीं थी। वो मुनीर बाबा की थी। उसके अपने लालच की।
पर उस चीज़ ने ये अपनी भूख के लिए नहीं किया था। उसने ये मुझसे एक और पल छीनने के लिए, मेरा ध्यान भटकाने के लिए किया था। पर उसने एक बात का हिसाब नहीं लगाया था — कि उस एक पल में, जब उसका पूरा ध्यान मुनीर बाबा पर था, मैं रुकी नहीं थी।
मैं पढ़ती रही थी। एक-एक लफ़्ज़। और अब, मैं उस अमल के आख़िरी हिस्से पर पहुँच चुकी थी।
मैंने वो आख़िरी लफ़्ज़ पढ़े, अपने और मीर साहब के मिले हुए लहू को, उस फ़र्श पर, उस पुराने नक़्श के बीचोंबीच रख दिया — ठीक वहीं, जहाँ डेढ़ सौ साल पहले वो गाँठ बाँधी गई थी।
और उस पल, पूरा घर, एक तेज़, सफ़ेद रौशनी से भर गया। वो डेढ़ सौ साल पुरानी गाँठ — वो ज़ंजीर, वो सौदा, वो कर्ज़ — टूट गई।
मैंने उस चीज़ को, पहली बार, दर्द में चीखते सुना। वो अँधेरी, विशाल आकृति, जो अब तक इतनी ताक़तवर, इतनी बेपरवाह थी, अचानक लड़खड़ाई। उसके वो दो जलते सुराख़, बुझने लगे। उसकी वो शक्ल, बिखरने लगी। मीर साहब का लहू, और मेरा लहू — उस खून की डोर ने, जिसने उसे हम पर हक़ दिया था, अब उसी हक़ को छीन लिया था। उसका इस दुनिया से, हमारे खानदान से, हमेशा के लिए नाता टूट रहा था।
वो आख़िरी बार गुर्राया, और उसकी वो आवाज़, जाते-जाते, पूरे कमरे में गूँजी — ये ख़त्म नहीं हुआ...
पर वो झूठ था। या शायद, एक हारे हुए का आख़िरी घमंड। क्योंकि अगले ही पल, वो सफ़ेद रौशनी और तेज़ हुई, और 'आग के पार रहने वाला' — वो चीज़ जिसने डेढ़ सौ साल मेरे खानदान का खून चूसा था — उस रौशनी में, चीख़ते हुए, बिखरकर, हमेशा के लिए ग़ायब हो गई।
अमल पूरा हो चुका था। मैं बच गई थी। पर जैसे ही वो रौशनी छँटने लगी, मुझे एहसास हुआ कि इस जीत की जो क़ीमत मुझे चुकानी थी, वो अब मेरे सामने खड़ी थी।

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