PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 27 — आख़िरी क़हर

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
28 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
521
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

पर वो चीज़ इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी।
जैसे-जैसे मेरा अमल आगे बढ़ा, और वो गाँठ खुलने लगी, उस चीज़ का क़हर बढ़ता गया। पूरा घर हिलने लगा। दीवारों में दरारें और गहरी होने लगीं, छत से मलबा गिरने लगा, और उस टूटी छत के पार का काला आसमान, जैसे नीचे उतरने लगा — कमरे में, हर तरफ़, वो आग के पार की दुनिया रिसने लगी। वही धुएँ और बे-धुएँ की आग, पर इस बार वो सुंदर नहीं थी। वो भूखी थी, गुस्से में थी, और हमें निगल जाना चाहती थी।
उस चीज़ ने समझ लिया कि मेरा हमज़ाद अब उसके क़ब्ज़े में नहीं रहा। तो उसने अपने हमज़ाद वाले हथियार को छोड़ दिया, और खुद, सीधे, मेरी तरफ़ बढ़ा।
वो विशाल, अँधेरी आकृति, अपने उन दो जलते सुराख़ों के साथ, मेरी तरफ़ झुकी — एक ऐसी ठंड, एक ऐसी विशालता के साथ, कि मेरा दम घुटने लगा, मेरे लफ़्ज़ फिर लड़खड़ाने लगे। उसने वो सब्र, वो चालाकी छोड़ दी थी। अब वो बस मुझे कुचल देना चाहता था, मेरे अमल के पूरा होने से पहले।
और उसी पल, मेरा हमज़ाद, आख़िरी बार, मेरे और उस चीज़ के बीच आ खड़ा हुआ।
पर अब वो कमज़ोर था। उस चीज़ की ज़ंजीर से लड़ते-लड़ते, वो लगभग टूट चुका था। उसकी वो आकृति, जो कभी गहरी और मज़बूत थी, अब धुँधली थी, काँपती हुई, जैसे कोई बुझती हुई लौ जो आख़िरी बार भड़क रही हो। उसने अपनी बची-खुची सारी ताक़त उस चीज़ को रोकने में लगा दी — मुझे कुछ पल और देने के लिए। मुझे अमल पूरा करने के लिए।
उसने हाँफते हुए, दर्द में, चीखकर कहा — ज़ोया... रुकना मत... चाहे मेरा कुछ भी हो जाए... तू रुकना मत...
मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर मैं पढ़ती रही। एक-एक लफ़्ज़। गाँठ, धीरे-धीरे, खुलती जा रही थी।
और उसी अफ़रा-तफ़री में, उस कोहराम के बीच, मुनीर बाबा ने अपनी सबसे बड़ी ग़लती की।
वो आदिल की पकड़ से छूट गया था। और उसने देखा कि वो चीज़ अपनी पूरी ताक़त से मुझ पर, और मेरे कमज़ोर पड़ते हमज़ाद पर टूटी हुई है। मुनीर बाबा की आँखों में वो लालच फिर चमक उठा — उसे लगा, यही वो पल है। यही वो अफ़रा-तफ़री है जिसका उसे इंतज़ार था। मेरा हमज़ाद कमज़ोर था, लगभग टूट चुका था — और मुनीर बाबा को लगा कि अगर वो अभी अपना अमल करे, तो वो उस कमज़ोर हमज़ाद की ताक़त अपने क़ब्ज़े में कर सकता है।
उसने वहीं, फ़र्श पर, अपने बिखरे सामान के बीच, जल्दी-जल्दी अपना वो काला अमल शुरू कर दिया — उस चीज़ से, उसके 'मालिक' से, बिना पूछे। उसने मेरे हमज़ाद की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया, उसकी उस बुझती ताक़त को समेटने के लिए।
पर मुनीर बाबा ये भूल गया था कि वो किसके सामने ये कर रहा था। वो भूल गया था कि 'आग के पार रहने वाला' सौदा नहीं करता। वो सिर्फ़ छीनता है।
और उस पल, उस चीज़ ने — जो पहले ही गुस्से में था, जिसकी क़ीमत उसके हाथ से फिसल रही थी — अपनी उन दो जलती आँखों को, पहली बार, मुझसे हटाकर, मुनीर बाबा की तरफ़ घुमाया।

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