PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 26 — यक़ीन

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
27 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
597
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उसका वो जलता हुआ हाथ, मेरे कंधे से बस चंद इंच दूर था। और मैं जानती थी, अगर मैं अब डरी, अगर मैं पीछे हटी, अगर मेरा यक़ीन एक पल और डगमगाया, तो सब ख़त्म हो जाएगा। मेरा अमल अधूरा रह जाएगा, और वो चीज़ मुझे, अपने ही हमज़ाद के हाथों, हमेशा के लिए ले जाएगी।
पर मुझे डर लग रहा था। क्योंकि जो मेरी तरफ़ आ रहा था, उसकी शक्ल उसी की थी जिससे मैं मोहब्बत करती थी।
और तभी, उस डर के बीच, मुझे उसकी एक बात याद आई। उसने कहा था — 'चिल्ले में, जिस पल तेरा यक़ीन डगमगाया, उसी पल तू हारी।' और उसने ये भी कहा था — 'हम दोनों एक ही धागे के दो सिरे हैं।'
और उस एक पल में, मुझे समझ आया कि मेरा यक़ीन किस पर होना चाहिए। उस अमल पर नहीं। उन लफ़्ज़ों पर नहीं। बल्कि उस पर — उस पर, जो इस राक्षसी शक्ल के अंदर, अब भी कहीं, मेरे लिए लड़ रहा था।
तो मैंने वो किया जो शायद सबसे बड़ी बेवक़ूफ़ी थी। या शायद, सबसे बड़ी हिम्मत।
मैं पीछे नहीं हटी। मैंने उससे डरना छोड़ दिया। और जब उसका वो जलता हुआ हाथ मेरे कंधे तक पहुँचा, तो मैं सिकुड़ी नहीं। मैंने अपना अपना, लहूलुहान हाथ उठाया, और उसके उस जलते हाथ को थाम लिया।
आग ने मुझे जलाया नहीं।
मैंने उसकी उन खाली, बेजान आँखों में सीधे देखा, और मैंने बहुत धीरे से, पर पूरे यक़ीन के साथ कहा — मैं जानती हूँ तुम अभी भी वहाँ हो। मैं तुमसे नहीं डरती। तुमने मुझे जन्म से देखा है। और मैं तुम्हें पहचानती हूँ — इस चीज़ की खींची ज़ंजीर के पीछे भी। लौट आओ। मेरी तरफ़ लौट आओ।
एक पल के लिए, कुछ नहीं हुआ। उसका वो हाथ, मेरे हाथ में, आग की तरह जलता रहा। उसकी आँखें खाली रहीं। फिर, उन खाली आँखों में, कहीं बहुत गहराई में, एक चिंगारी काँपी।
उसका हाथ, जो मुझे पकड़ने के लिए बढ़ा था, अचानक काँपने लगा — जैसे उसके अंदर दो ताक़तें लड़ रही हों। वो ठंडी, यंत्र जैसी आवाज़ फिर गूँजी, पर इस बार वो लड़खड़ा रही थी — छोड़... उसे... वो मेरी है... — और फिर, उसी आवाज़ के नीचे से, एक और आवाज़ उभरी। उसकी अपनी आवाज़। टूटी हुई, दर्द में डूबी, पर उसकी अपनी। उसने हाँफते हुए कहा — ज़ोया... तूने... तूने मुझे थाम लिया... और अब मैं... मैं इसे रोक सकता हूँ... पर ज़्यादा देर नहीं...
मेरी आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार डर के नहीं। उसने उस चीज़ की ज़ंजीर के ख़िलाफ़, अपने ही अंदर, लड़ना शुरू कर दिया था। और वो लड़ाई सिर्फ़ मेरे लिए थी।
उसने चीखकर कहा — अब! ज़ोया, अब अमल पूरा कर! जब तक मैं इसे रोके हुए हूँ! मेरे बारे में मत सोच! बस अमल पूरा कर!
और उस पल, उसका हाथ थामे हुए, उसकी आँखों में उसकी अपनी वो चिंगारी लौटती देख, मेरा यक़ीन वापस आ गया — पहले से भी मज़बूत होकर। मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। मैंने अपने दूसरे हाथ में वो लहू लिया, और अमल के वो लफ़्ज़, जो मेरे गले में अटक गए थे, फिर से, इस बार बिना काँपे, बिना रुके, पढ़ने लगे।
और कमरे के बीच, वो अँधेरी आकृति — 'आग के पार रहने वाला' — पहली बार, गुर्राया। इंसानी नहीं, किसी बहुत पुरानी, बहुत गहरी तकलीफ़ में। क्योंकि अब उसकी दोनों चालें नाकाम हो रही थीं। न वो मुझे सीधे रोक पा रहा था, और न मेरा हमज़ाद उसके हुक्म में रह गया था। और मेरा अमल, एक-एक लफ़्ज़ के साथ, उस डेढ़ सौ साल पुरानी गाँठ को, धीरे-धीरे, खोलता जा रहा था।

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