PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 25 — बंधन

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
26 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
533
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

पर मेरी माँ के उन लफ़्ज़ों का, उस राक्षस पर कोई असर नहीं हुआ।
उस चीज़ ने, जो अब तक मुझ पर, मेरे अमल पर काबू पाने की कोशिश कर रहा था, अचानक अपना तरीक़ा बदल दिया। उसने समझ लिया कि मुझे सीधे रोकना मुश्किल है — मीर साहब का लहू उसे कमज़ोर कर रहा था। तो उसने वो किया जो सबसे क्रूर था। उसने अपना पूरा ज़ोर उस ज़ंजीर पर लगा दिया, जो मेरे हमज़ाद को बाँधती थी।
और मेरे अंदर, कुछ टूट गया।
वो कमज़ोर खुशबू, जो अब तक मेरे साथ, मेरे लिए तड़प रही थी, अचानक बदलने लगी। वो गरम, अपनी सी खुशबू, धीरे-धीरे ठंडी होने लगी। और कमरे के एक कोने में, उस धुएँ में, मेरे हमज़ाद की आकृति उभरने लगी — पर इस बार, वो मेरी तरफ़ प्यार से नहीं देख रहा था। उसकी वो जलती आँखें, जिनमें हमेशा एक नरमी होती थी, अब खाली थीं, बेजान, किसी और के हुक्म से चलती हुई।
उसकी आवाज़ आई — पर वो उसकी अपनी आवाज़ नहीं लग रही थी। वो टूटी हुई, दो हिस्सों में बँटी हुई थी — जैसे वो अपने ही अंदर किसी से लड़ रहा हो। उसने कहा — ज़ोया... भाग... मैं... मैं खुद को रोक नहीं पा रहा... वो मुझसे तुझे... — और फिर उसकी आवाज़ कट गई, और उसकी जगह एक ठंडी, यंत्र जैसी आवाज़ ने ले ली — तेरा हमज़ाद अब मेरे हुक्म में है, नन्ही। और अब यही तुझे मेरे पास लाएगा।
वो आकृति, मेरा अपना हमज़ाद, धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ने लगी।
मैं जम गई। ये वो नहीं हो सकता था। ये वो नहीं था जिसने मुझे जन्म से देखा था, जिसने मुझे बचाया था, जिसने मुझसे मोहब्बत की थी। पर वो मेरी तरफ़ आ रहा था — उसका वो हाथ, जो कभी मेरे बालों को छूकर हटता था, अब आग की तरह जलता हुआ, मेरी तरफ़ बढ़ रहा था। मुझे पकड़ने के लिए। मुझे उस चीज़ के हवाले करने के लिए।
आदिल ने चीखकर कहा — ज़ोया, अमल पूरा करो! रुको मत! ये उसकी असली मर्ज़ी नहीं है!
मैं जानती थी वो सच कह रहा था। मैं जानती थी कि जो मेरी तरफ़ आ रहा है, वो मेरा हमज़ाद नहीं, उस चीज़ की खींची हुई ज़ंजीर है। पर उसे यूँ देखना — उसे, जिसे मैं बचाना नहीं चाहती थी, जिसके लिए मैं टूट रही थी — उसे अपनी तरफ़ आते देखना, मुझे नुक़सान पहुँचाने के लिए... मेरे हाथ काँपने लगे। मेरी आवाज़ लड़खड़ा गई। और अमल के वो लफ़्ज़, जो मुझे बिना रुके पढ़ने थे, मेरे गले में अटक गए।
और उसी पल, वो ठंडी, यंत्र जैसी आवाज़, मेरे हमज़ाद के मुँह से, फिर गूँजी — बस, नन्ही। तेरा यक़ीन डगमगा गया। और जिस पल तेरा यक़ीन डगमगाया... उसी पल तू मेरी हुई।
उसका वो जलता हुआ हाथ, मेरे कंधे से बस चंद इंच दूर था।
और मुझे उस पल, ये समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपने ही हमज़ाद से खुद को कैसे बचाऊँ — उससे, जिसे बचाने के लिए मैं अपनी जान देने को तैयार थी।

Comment Question
ज़ोया का यक़ीन टूटने वाला है, और उसका अपना हमज़ाद उसकी तरफ़ बढ़ रहा है — क्या वो अमल पूरा कर पाएगी? एक शब्द में comment करो — “हाँ” या “नहीं”।

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