PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 24 — अमल की शुरुआत

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
25 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
556
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

जैसे ही घेरा खुला, सब कुछ एक साथ हो गया।
आदिल एक झटके में मुनीर बाबा की तरफ़ लपका। मुनीर बाबा ने ये उम्मीद नहीं की थी — उसे लगा था हम डरे हुए, बेबस, चुपचाप उसकी बात मानेंगे। आदिल उससे टकराया, और वो उसके अमल का सामान बिखेरता हुआ, ज़मीन पर गिर पड़ा। दोनों उलझ गए।
और मैंने वो पल पकड़ लिया।
मैं फ़र्श पर घुटनों के बल बैठ गई, वहीं, कमरे के बीच में, उस बनती हुई अँधेरी आकृति के ठीक सामने। मैंने वो जंग लगा बक्सा खोला, मीर साहब के लहू वाली शीशी निकाली, और आदिल की बही में लिखे उन लफ़्ज़ों को, जो मैंने पूरे दिन रटे थे, पढ़ना शुरू किया — मीर साहब के अमल को उलटा करने का अमल।
मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर मैं रुकी नहीं।
मैंने वो चाकू उठाया, जो मुनीर बाबा के बिखरे सामान में से गिरा था, और अपनी हथेली पर एक हल्का सा चीरा लगाया। मेरा अपना लहू। फिर मैंने वो शीशी खोली, और मीर साहब का वो डेढ़ सौ साल पुराना, सूखा लहू, अपने ताज़े लहू में मिलाया — ठीक वैसे ही जैसे उस काग़ज़ पर लिखा था।
और उसी पल, वो चीज़ पहली बार रुकी।
वो विशाल, अँधेरी आकृति, जो अब तक बेपरवाह होकर अपनी शक्ल ले रही थी, अचानक ठिठक गई। उन दो जलते सुराख़ों की आग एक पल के लिए भड़क उठी। और उसकी वो भारी आवाज़, पूरे कमरे में, मेरी हड्डियों में गूँजी — ये तूने क्या किया, नन्ही?
मैं समझ गई — इसका असर हो रहा था। मीर साहब का लहू, मेरा लहू, और वो उलटा अमल — ये उस गाँठ को खोलने लगा था। पर उस चीज़ ने हार नहीं मानी।
उसने अपनी पूरी ताक़त से, उस ज़ंजीर को खींचा — वो ज़ंजीर जो मेरे हमज़ाद को उससे बाँधती थी। और मैंने महसूस किया, अपने अंदर, कि मेरा हमज़ाद तड़प उठा। उसकी वो कमज़ोर खुशबू अचानक बेचैन होकर उमड़ी, फिर जैसे किसी अनदेखी ताक़त से जकड़ी जाने लगी। उसने चीखकर कहा — ज़ोया! वो मुझे... वो मुझे खींच रहा है! मैं खुद को रोक नहीं पा रहा! भाग! मुझसे दूर हट!
पर मैं अमल के बीच में थी। मैं रुक नहीं सकती थी। अगर मैं यहाँ रुकती, तो सब बेकार जाता।
और तभी, उस पूरे कोहराम के बीच, कमरे के दरवाज़े पर एक आवाज़ गूँजी — एक जानी-पहचानी, टूटी हुई, हाँफती हुई आवाज़। ज़ोया!
मैंने पलटकर देखा। दरवाज़े पर, अँधेरे में खड़ी, मेरी माँ थीं।
वो मेरे पीछे-पीछे यहाँ तक आ गई थीं — मुझे 'बचाने' के लिए, मुझे घर वापस ले जाने के लिए, मुनीर बाबा पर भरोसा करते हुए। पर अब, दरवाज़े पर खड़ी, वो जो देख रही थीं, उसने उनके पैर वहीं जमा दिए। उन्होंने देखा — कमरे के बीच वो अँधेरी, राक्षसी आकृति। उन्होंने देखा — मुनीर बाबा, आदिल से गुत्थम-गुत्था, उस चीज़ के सामने झुका हुआ 'मालिक, मालिक' पुकारता हुआ। और उन्होंने देखा — मुझे, फ़र्श पर, लहूलुहान हाथ से, अपनी बच्ची को, उस राक्षस से लड़ते हुए।
और उस एक पल में, मेरी माँ को सारा सच दिख गया। मुनीर बाबा, जिस पर उन्होंने भरोसा किया था, वो मुझे बचा नहीं रहा था — वो मुझे उस चीज़ के हवाले कर रहा था। माँ की आँखों में एक ऐसा डर, और एक ऐसा गुस्सा उभरा, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने चीखकर कहा — मेरी बेटी से दूर हटो!

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