PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 23 — अमावस की रात

Pretika · Jinn & Spirits · 3 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
24 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
3 min
Words
533
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अमावस की उस रात, जैसे ही आख़िरी रौशनी बुझी, वो पूरा घर बदल गया।
हवा भारी हो गई, जैसे साँस लेना भी मुश्किल हो। दीवारों से वो गीली राख की बू उठने लगी, और वो ठंड, जो अब तक बस झोंकों में आती थी, अब पूरे कमरे में जम गई — इतनी कि आदिल और मेरी साँसें भाप बनकर दिखने लगीं। और सबसे अजीब — उस टूटी छत के पार, बाहर का आसमान अब बिलकुल काला था, बिना चाँद, बिना एक भी तारे के, जैसे किसी ने ऊपर से रौशनी की हर बूँद पोंछ दी हो।
मुनीर बाबा उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अब वो ठंडक नहीं, एक बेचैन उम्मीद थी। उसने कहा — वो आ रहा है। वक़्त हो गया।
उसने अपने सामने ज़मीन पर वो सब सामान फैलाया — वही सूखे फूल, वो आईना, वो चाकू, वो नक़्श वाला काग़ज़। और फिर उसने कुछ पढ़ना शुरू किया — गहरी, तेज़ आवाज़ में, कोई ऐसे लफ़्ज़ जो कमरे की हवा को हिला रहे थे।
और कमरे के बीचोंबीच, वो शुरू हुआ।
पहले फ़र्श पर एक काला धब्बा उभरा, जैसे अँधेरा ही ज़मीन से रिसकर बाहर आ रहा हो। फिर वो धब्बा फैलने लगा, ऊपर उठने लगा, धुएँ की तरह घूमता हुआ — पर वो धुआँ ठंडा था, और उसमें से वही दो जलते सुराख़ झाँक रहे थे, जो मैंने पहले देखे थे। पर इस बार, वो अकेले नहीं थे। इस बार, उन सुराख़ों के पीछे, एक पूरी आकृति बन रही थी — विशाल, अँधेरी, आग के पार की किसी दुनिया से खिंची हुई। 'आग के पार रहने वाला' अपनी क़ीमत लेने आ रहा था।
मेरे अंदर, मेरे हमज़ाद की वो कमज़ोर खुशबू अचानक तड़प उठी। मैंने उसे महसूस किया — वो बेचैन था, डरा हुआ था, पर मेरे लिए। उसने बहुत धीरे से, दर्द में, फुसफुसाया — ज़ोया, वो आ गया। और मैं उसकी ज़ंजीर को खिंचता महसूस कर सकता हूँ। जल्दी कर। जो करना है, अभी कर, इससे पहले कि वो मुझ पर पूरी तरह काबू पा ले।
मैंने आदिल की तरफ़ देखा। हमारे पास वो शीशी थी — मीर साहब का लहू। हमारे पास वो अमल था। पर हम अभी भी उस घेरे के अंदर क़ैद थे। और मुनीर बाबा, हमारे और उस अमल के बीच, अपनी पूरी ताक़त से खड़ा था।
तभी, मुनीर बाबा ने पढ़ना रोका, और उस बनती हुई आकृति की तरफ़ मुड़कर, झुककर कहा — मालिक, मैं हाज़िर हूँ। आपकी क़ीमत तैयार है। मैं अभी घेरा खोलता हूँ।
उसने अपना हाथ उठाया, हमारे उस घेरे की तरफ़, उसे खोलने के लिए — ताकि मैं उस चीज़ के सामने, बेबस, खड़ी हो जाऊँ। और उसी पल, मैंने वो किया जो मुनीर बाबा ने सोचा भी नहीं था।
मैंने आदिल का हाथ पकड़ा और फुसफुसाकर कहा — जैसे ही घेरा खुले, तुम मुनीर बाबा को रोकना। बस कुछ पल के लिए। बाकी मुझ पर छोड़ दो।
आदिल ने मेरी आँखों में देखा, और सिर हिला दिया। उसकी आँखों में डर था, पर उससे ज़्यादा, एक भरोसा।
मुनीर बाबा का हाथ नीचे गिरा। घेरे की वो जलती लकीरें बुझ गईं। हम आज़ाद थे। और उस कमरे में, हमारे सामने, वो चीज़ अपनी पूरी शक्ल ले चुकी थी। अमल का, और उस आख़िरी लड़ाई का, वक़्त आ गया था।

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