PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 22 — इंतज़ार

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
23 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
677
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

वो दिन, मेरी ज़िंदगी का सबसे लंबा दिन था।
सुबह की हल्की रौशनी उस टूटी हुई छत की दरारों से अंदर आई, पर उसने उस घर की घुटन को कम नहीं किया। मुनीर बाबा बीच-बीच में बाहर जाता, फिर लौट आता, अमावस की रात की तैयारी करता। और हम उस घेरे के अंदर, फँसे हुए, इंतज़ार करते रहे।
पर मैंने वो वक़्त बर्बाद नहीं किया। जब भी मुनीर बाबा कमरे से बाहर जाता, मैं उस घेरे के अंदर से, जहाँ तक मेरी नज़र और मेरे हाथ पहुँच सकते थे, उस कमरे को टटोलती — मीर साहब के उस 'कुछ' को ढूँढ़ती, जिसकी बात मेरे हमज़ाद ने की थी।
आदिल ने पूछा — तुम क्या ढूँढ़ रही हो? मैंने उसे धीरे से बताया कि मेरे हमज़ाद ने क्या कहा था। आदिल की आँखों में एक चमक आई। उसने कहा — अगर मीर साहब ने अपनी मौत से पहले कर्ज़ तोड़ने का रास्ता ढूँढ़ा था, तो हो सकता है उन्होंने उस अमल की कोई असली चीज़, कोई असली निशानी, यहीं इसी कमरे में छुपाई हो — कुछ ऐसा जो उस बही में लिखा नहीं जा सकता था।
और उस पूरे दिन की टटोल के बाद, आख़िरकार, शाम ढलते-ढलते, मुझे वो मिल गया।
उस कमरे की एक दीवार, जो आधी गिर चुकी थी, उसके नीचे की ईंटें ढीली थीं। और जब मैंने घेरे की हद तक झुककर, अपने हाथ से उन ईंटों को खिसकाया, तो उनके पीछे, एक खोखली जगह में, एक छोटा सा, जंग लगा लोहे का बक्सा रखा था। मैंने बड़ी मुश्किल से उसे अपनी तरफ़ खींचा।
बक्से में दो चीज़ें थीं। एक — एक छोटी सी काँच की शीशी, जिसमें कोई सूखा हुआ, गहरे रंग का पदार्थ था। और दूसरी — काग़ज़ का एक मुड़ा हुआ टुकड़ा। मैंने वो काग़ज़ खोला। ये मीर साहब की उसी काँपती लिखावट में था, उनकी मौत से ठीक पहले की। और जो उस पर लिखा था, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।
उन्होंने लिखा था — जो मेरे बाद आएगा, और इस कर्ज़ को तोड़ना चाहेगा, उसके लिए मैं ये छोड़े जा रहा हूँ। इस शीशी में मेरा अपना लहू है, उस रात का, जब मैंने वो सौदा किया था। गाँठ मेरे लहू से बँधी थी, तो वो मेरे लहू से ही खुलेगी। अमल के वक़्त, जिस बच्चे को ये कर्ज़ तोड़ना हो, उसे मेरा ये लहू, और अपना लहू, दोनों को मिलाना होगा। तभी वो चीज़ अपना हक़ खोएगी।
मेरे हाथ काँप रहे थे। तो अमल के लिए सिर्फ़ मेरा लहू काफ़ी नहीं था। मुझे मीर साहब का लहू भी चाहिए था — और वो, इस शीशी में, मेरे हाथ में था। बही में ये बात नहीं थी, क्योंकि आदिल के दादा तक ये शीशी कभी पहुँची ही नहीं थी। ये आख़िरी टुकड़ा, ये असली चाबी, सिर्फ़ यहीं, इसी घर में थी।
पर काग़ज़ पर एक आख़िरी लाइन और थी। और वो लाइन पढ़कर, मुझे उस चीज़ के सौदे की असलियत समझ आ गई। मीर साहब ने लिखा था — और जो कोई उस चीज़ के किसी सौदे पर यक़ीन करे, वो मूर्ख है। वो कभी अपना वादा नहीं निभाता। उसने मुझसे भी झूठ बोला था। जिस दिन तुम उसके सामने खड़े हो, याद रखना — वो सौदा नहीं करता। वो सिर्फ़ छीनता है।
मैंने वो काग़ज़ आदिल को दिखाया, और उस पल, मेरे अंदर का वो सबसे बड़ा उलझन का काँटा टूट गया।
क्योंकि उस चीज़ ने मुझसे कहा था — 'अपनी मर्ज़ी से आ जा, और मैं तेरे हमज़ाद को छोड़ दूँगा।' मैं इस सौदे को लेकर टूट रही थी, सोच रही थी कि शायद खुद को क़ुर्बान करके मैं उसे बचा लूँ। पर अब मुझे पता था — वो झूठ था। अगर मैं खुद को उसके हवाले कर देती, तो वो मुझे भी ले जाता, और मेरे हमज़ाद को भी नहीं छोड़ता। मेरी क़ुर्बानी बेकार जाती। हम दोनों खो जाते।
तो अब सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था। वो अमल। जिसमें मैं बचती, पर वो मिट जाता।
और जैसे ही मैंने ये फ़ैसला किया, कमरे की वो आख़िरी रौशनी बुझ गई। बाहर, आसमान में, आख़िरी पतली सी चाँद की लकीर भी डूब गई। अमावस उतर आई थी।

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