Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 21 — घेराबंदी
Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 22 of 31
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 4 min
- Words
- 704
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
मुनीर बाबा उस अँधेरे कोने से धीरे-धीरे बाहर आया, और उस जलते दीये की रौशनी में उसका चेहरा और भी ठंडा, और भी डरावना लग रहा था। उसके हाथ में एक पुरानी तसबीह थी, जिसके दाने वो बड़े इत्मीनान से घुमा रहा था — जैसे उसे कोई जल्दी न हो, जैसे यहाँ सब कुछ उसकी मर्ज़ी से हो रहा हो।
उसने कहा — मैं जानता था तू यहीं आएगी, बेटा। क्योंकि कर्ज़ तोड़ने का अमल सिर्फ़ यहीं हो सकता है, इसी कमरे में। और जहाँ वो अमल हो सकता है, वहीं मुझे तुझे रोकना था। तूने मुझे ढूँढ़ने की तकलीफ़ बचा दी।
आदिल मेरे आगे आ गया। उसने कहा — तुम इसे नहीं रोक सकते। हम इसे यहाँ लेकर आए हैं, और ये अमल पूरा करके रहेगी।
मुनीर बाबा हँसा — एक धीमी, ठंडी हँसी। उसने कहा — पूरा करके रहेगी? बेटा, तुम अपने दादा की तरह ही भोले हो। तुम्हें लगता है इतने साल से मैं ये खेल खेल रहा हूँ, और मैंने इस पल के लिए तैयारी नहीं की होगी?
और फिर उसने वो किया जिसके लिए हम तैयार नहीं थे। उसने ज़मीन पर एक लफ़्ज़ फूँका, और अचानक, उस पूरे कमरे के चारों तरफ़, फ़र्श पर, आग की लकीरों जैसे निशान जल उठे — एक घेरा, जो हमें बीच में क़ैद कर गया। मैंने आदिल का हाथ पकड़ा और दरवाज़े की तरफ़ भागने की कोशिश की, पर जैसे ही मैं उस घेरे की लकीर के पास पहुँची, एक अनदेखी दीवार से टकरा गई — गरम, ठोस, जिसे पार करना नामुमकिन था। हम फँस चुके थे।
मुनीर बाबा उस घेरे के बाहर, आराम से एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठ गया। उसने कहा — अब तुम दोनों यहीं रहोगे। कल रात, अमावस को, ठीक उस वक़्त, वो आएगा। और तब मैं ये घेरा खोल दूँगा — ताकि तू, ज़ोया, उसके सामने खड़ी हो। पर अमल के लिए नहीं। तुझे बस उसके हवाले होना है। और जब वो तुझे ले जाएगा, और तेरा हमज़ाद बेबस होकर उसके पीछे खिंचेगा, तब मैं उसकी वो लावारिस ताक़त समेट लूँगा। सौदा पूरा हो जाएगा।
मैंने गुस्से में कहा — तुम्हें लगता है वो तुम्हें वो ताक़त लेने देगा? तुम उसके ग़ुलाम हो, मुनीर बाबा। तुम मीर साहब से भी बड़े मूर्ख हो।
पहली बार, मुनीर बाबा की उस ठंडी मुस्कान में एक हल्की सी दरार आई। बस एक पल के लिए। फिर उसने खुद को सँभालते हुए कहा — मीर साहब को उसे क़ाबू करने का इल्म नहीं था। मुझे है। मैं डेढ़ सौ साल की तैयारी हूँ, बेटा। मैं कोई ग़लती नहीं करूँगा।
पर मैंने वो दरार देख ली थी। और मैं समझ गई — मुनीर बाबा भी उससे डरता था। वो भी बस एक जुआ खेल रहा था, इस उम्मीद में कि उस अफ़रा-तफ़री में वो ताक़त झपट लेगा। वो मालिक नहीं था। वो भी एक मोहरा था — बस एक ऐसा मोहरा जिसे अपने मोहरा होने का पता नहीं था।
रात गहराती गई। मुनीर बाबा वहीं बैठा, तसबीह घुमाता रहा, और बीच-बीच में कुछ पढ़ता रहा। आदिल और मैं उस घेरे के अंदर, ठंडे फ़र्श पर बैठे थे, फँसे हुए, बेबस। और उस पूरे वक़्त, मुझे उस घर की मिट्टी से एक अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी — जैसे इन दीवारों में कुछ बसा हो, कुछ जो हमें देख रहा हो, हमारा इंतज़ार कर रहा हो।
देर रात, जब मुनीर बाबा की आँख झपकी, मैंने बहुत धीरे से, अपने अंदर, अपने उस कमज़ोर हमज़ाद को पुकारा। मैंने फुसफुसाकर कहा — तुम यहाँ हो? कुछ कर सकते हो?
बहुत देर बाद, वो कमज़ोर सी खुशबू आई। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे बहुत दूर से आ रही हो। उसने कहा — इस घेरे के अंदर, मैं और भी कमज़ोर हूँ, ज़ोया। मुनीर बाबा के नक़्श मुझे बाँधते हैं। पर एक बात सुन — इस घर में कुछ है। मीर साहब का कुछ। मैं उसे महसूस कर सकता हूँ, यहीं, इसी कमरे में, बहुत पास। अगर तू उसे ढूँढ़ ले... तो शायद, शायद, कल रात के लिए हमारे पास एक मौक़ा हो।
मैंने अँधेरे में उस कमरे को देखा। धूल, मलबा, टूटी दीवारें। मीर साहब का कुछ, यहीं, इसी कमरे में। और मेरे पास उसे ढूँढ़ने के लिए बस एक दिन था — अमावस की उस आख़िरी रात के आने से पहले।
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