PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 20 — पुराने घर की तरफ़

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
21 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
633
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

बहुत देर बाद, उस बुझती हुई खुशबू में, उसकी आवाज़ आई। और उसमें कोई डर नहीं था, कोई खुदगर्ज़ी नहीं थी। बस एक अजीब सी शांति।
उसने कहा — नहीं, ज़ोया। मैं जीना नहीं चाहता, अगर उसकी कीमत तू हो। मैं डेढ़ सौ साल की उस ज़ंजीर में जकड़ा रहा हूँ, एक ऐसी चीज़ का ग़ुलाम बनकर जिससे मुझे नफ़रत है। और मेरी पूरी ज़िंदगी में, इस पूरी क़ैद में, सिर्फ़ एक चीज़ ऐसी थी जो मेरी अपनी थी, जो उस चीज़ ने मुझे नहीं दी थी — तेरे लिए मेरा ये एहसास। अगर मुझे मिटना है ताकि तू आज़ाद हो, तो मैं ख़ुशी से मिट जाऊँगा। पर अगर तू खुद को मिटाकर मुझे बचाएगी, तो मैं वो आज़ादी लेकर क्या करूँगा? एक ऐसी दुनिया में जहाँ तू नहीं है? वो आज़ादी नहीं, एक नई क़ैद होगी। इसलिए मैं तुझसे भीख माँगता हूँ — उस चीज़ का सौदा मत मानना। तू वो अमल करना। तू बच जाना। और मुझे जाने देना।
मेरी आँखों से आँसू बह निकले। क्योंकि दोनों में से जो भी बचता, वो एक-दूसरे को खोकर बचता। और हम दोनों, एक-दूसरे के लिए, खुद को मिटाने को तैयार थे।
उसी रात, आदिल और मैं शहर से निकल पड़े। अमावस कल रात थी। और हमें उस पुराने घर पहुँचना था, ताकि अगली रात के अमल के लिए सब तैयार हो सके।
रास्ता लंबा था। शहर पीछे छूटता गया, रौशनी कम होती गई, और आदिल की पुरानी गाड़ी हमें एक ऐसे इलाक़े में ले गई जहाँ सड़कें टूटी हुई थीं, और दोनों तरफ़ बस वीरानी थी। वो क़स्बा, जब आया, तो लगभग मरा हुआ था — आधे गिरे हुए मकान, खाली गलियाँ, और एक अजीब सा सन्नाटा जो कानों में चुभता था। लोग यहाँ से जा चुके थे। या शायद, किसी वजह से, यहाँ रुके ही नहीं।
और उस क़स्बे के आख़िरी छोर पर, एक ऊँचे, टूटते हुए ढाँचे के रूप में, वो खड़ा था। मीर साहब का घर। डेढ़ सौ साल पुराना। वही जगह जहाँ ये सब शुरू हुआ था।
जैसे ही मेरी नज़र उस घर पर पड़ी, मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसकी हर खिड़की एक खाली, काली आँख की तरह लग रही थी। और मेरे अंदर, वो कमज़ोर सी खुशबू अचानक थोड़ी तेज़ हो गई — जैसे मेरा हमज़ाद भी, इस जगह को देखकर, बेचैन हो गया हो। उसने बहुत धीरे से फुसफुसाया — ये वही जगह है। यहीं मैं बना था। यहीं वो सौदा हुआ था। ज़ोया... सावधान रहना। इस घर की मिट्टी में वो चीज़ बसी हुई है।
आदिल ने गाड़ी रोकी। हम दोनों उतरे। रात गहरी थी, और उस घर के ऊपर, आसमान में, चाँद अब बस एक पतली सी लकीर रह गया था — कल रात, वो भी नहीं होगा। कल अमावस थी।
हम धीरे-धीरे उस घर के टूटे हुए दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। आदिल ने अपनी torch जलाई, और उसकी रौशनी में हमने अंदर क़दम रखा। धूल, मकड़ी के जाले, गिरी हुई छत के टुकड़े, और एक भारी, दम घोंटने वाली ख़ामोशी।
पर जैसे ही हम उस बड़े से कमरे में पहुँचे — वो कमरा जिसके बारे में बही में लिखा था, वो कमरा जहाँ अमल होना था — आदिल की torch की रौशनी सामने की दीवार पर पड़ी। और मैं वहीं जम गई।
क्योंकि उस खाली, वीरान, डेढ़ सौ साल से बंद पड़े घर के उस कमरे में, फ़र्श पर, एक दीया जल रहा था। ताज़ा जला हुआ।
किसी ने हमें यहाँ पहले से आते देख लिया था।
और कमरे के उस अँधेरे कोने से, एक जानी-पहचानी, ठंडी आवाज़ उभरी — आ गई, बेटा? मुझे पता था तू यहीं आएगी।
मुनीर बाबा। वो हमसे पहले वहाँ पहुँच चुका था।

Comment Question
अब बताओ — ज़ोया की जगह तुम होते, तो क्या चुनते? खुद बचते और हमज़ाद को खोते, या खुद मिटकर उसे बचाते? एक शब्द में comment करो — “बचना” या “क़ुर्बानी”।

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