Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 19 — अपनों का धोखा
Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 20 of 31
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 4 min
- Words
- 647
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस रात के बाद, वो चुनाव मेरे सीने पर एक पत्थर की तरह बैठ गया। बच जाऊँ, और उसे खो दूँ। या वो बच जाए, और मैं ख़त्म हो जाऊँ। हर बार जब मैं आदिल के साथ अमल की तैयारी करती, मुझे उस चीज़ की आवाज़ याद आती — 'एक जान के बदले एक जान'। और मैं आदिल से नज़रें नहीं मिला पाती। क्योंकि मैं जानती थी, अगर मैंने उसे ये सब बताया, तो वो मुझे कभी वो दूसरा रास्ता चुनने नहीं देता।
अगली सुबह, मुझे माँ का फ़ोन आया। और उनकी आवाज़ सुनते ही मुझे पता चल गया कि कुछ गड़बड़ है।
उन्होंने रोते हुए कहा — ज़ोया, तू कहाँ है, बेटा? घर आ जा। मुनीर बाबा ने मुझे सब बता दिया है।
मेरा दिल बैठ गया। मैंने पूछा — क्या बताया है?
माँ ने कहा — उन्होंने बताया कि तू किसी लड़के के बहकावे में आ गई है। कि तू कोई ख़तरनाक अमल करने की सोच रही है, जो तुझे मार डालेगा। और कि वो हमज़ाद... वो तुझे उकसा रहा है, तुझे मौत की तरफ़ धकेल रहा है। मुनीर बाबा कहते हैं कि तुझे बचाने का बस एक ही सुरक्षित तरीक़ा है — कि अमावस की रात तू घर पर, उनकी निगरानी में रहे, और वो सब सँभाल लेंगे। बेटा, मैं तुझे खोना नहीं चाहती। तू वापस आ जा। मुनीर बाबा पर भरोसा कर।
और उस पल, मुझे समझ आया कि मुनीर बाबा कितना चालाक था। उसने मुझ पर हमला नहीं किया। उसने मेरी माँ के दिल पर हमला किया। उसने एक माँ के सबसे बड़े डर — अपनी औलाद को खोने के डर — को हथियार बना लिया। और अब मेरी अपनी माँ, मुझसे प्यार करते हुए, मुझे उसी जाल की तरफ़ धकेल रही थी, जिससे मैं बचने की कोशिश कर रही थी। वो नहीं जानती थी कि मुनीर बाबा की 'निगरानी' का मतलब था — मुझे चुपचाप उस चीज़ के हवाले कर देना।
मैंने माँ को समझाने की कोशिश की — माँ, मुनीर बाबा जो हैं वो नहीं जो दिखते हैं। मैंने उन्हें खुद सुना है, वो उस चीज़ के साथ मिले हुए हैं, वो मुझे...
पर माँ ने मेरी बात काट दी। और उनकी आवाज़ में अब वो डर नहीं, एक ठंडी सख़्ती थी — बस कर, ज़ोया। वो हमज़ाद तेरे दिमाग़ में ज़हर भर रहा है। मुनीर बाबा ने कहा था तू यही कहेगी। तू शाम तक घर आ जा, वरना मैं खुद तुझे लेने आऊँगी, और इस बार मैं तुझे अपनी नज़रों से दूर नहीं जाने दूँगी।
फ़ोन कट गया। मैं वहीं बैठी रह गई, हाथ में बेजान phone लिए। मुनीर बाबा ने मेरा आख़िरी सहारा भी छीन लिया था। अब मेरे अपने घर में, मेरी अपनी माँ, मेरी दुश्मन बन चुकी थीं — बिना जाने, बिना समझे, सिर्फ़ मुझसे प्यार करते हुए।
आदिल ने मेरा चेहरा देखा और सब समझ गया। उसने धीरे से कहा — अब हम रुक नहीं सकते, ज़ोया। अगर तुम्हारी माँ या मुनीर बाबा तुम्हें घर ले गए, तो अमल करने का मौक़ा हाथ से निकल जाएगा। हमें आज रात ही उस पुराने घर के लिए निकलना होगा। कल अमावस है।
मैंने सिर हिला दिया। पर मेरे अंदर, वो चुनाव अभी भी अनसुलझा था। मैं उस पुराने घर तो जा रही थी — पर मुझे खुद नहीं पता था कि जब वो पल आएगा, जब मैं उस चीज़ के सामने खड़ी होऊँगी, तो मैं क्या करूँगी। अमल करके खुद को बचाऊँगी, और उसे मिटा दूँगी? या उस चीज़ का सौदा मान लूँगी, और खुद मिट जाऊँगी, ताकि वो जी सके?
उस रात, जब हम सामान बाँध रहे थे, मैंने पहली बार अपने उस कमज़ोर, बुझते हुए हमज़ाद से वो सवाल पूछा जो मेरे दिल में अटका था। मैंने बहुत धीरे से कहा — तुम क्या चाहते हो? तुम... जीना चाहते हो?
बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया। फिर, उस कमज़ोर, दूर की आवाज़ में, उसने जो कहा, उसने मेरा फ़ैसला और मुश्किल कर दिया।
और कहानियाँ · More stories
- जिन्न का इश्क़ · Pretika
- रजिस्टर · Pretika
- ग्यारह मिनट · Pretika
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · Piyashi Atma