PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 18 — आग के पार से आवाज़

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
19 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
658
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस रात के बाद, मेरा हमज़ाद बदल गया। वो अब भी मेरे साथ था, पर पहले जैसा नहीं। उसकी खुशबू कमज़ोर थी, उसकी आवाज़ दूर की, और कभी-कभी तो घंटों तक कोई आहट ही नहीं होती थी, जैसे वो अपनी बची-खुची ताक़त बचाने के लिए कहीं गहरे छुप गया हो। और मुझे पहली बार समझ आया कि मैं उसकी आदी हो चुकी थी — उसकी उस मौजूदगी की, जो मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती थी। अब जब वो चुप था, तो मैं सच में, ज़िंदगी में पहली बार, अकेली महसूस कर रही थी।
अमावस में अब सिर्फ़ दो रातें बची थीं।
और उसी रात, जब आदिल सो चुका था और मैं ऊपर वाले कमरे में जागी हुई थी, वो आया। पर वो मेरा हमज़ाद नहीं था।
पहले वही ठंड आई। पर इस बार उसके साथ कोई हमला नहीं था, कोई रेंगता अँधेरा नहीं था। बस एक मौजूदगी — इतनी विशाल, इतनी पुरानी, कि कमरा उसके सामने छोटा पड़ गया। दीवारें जैसे पीछे हट गईं, और मेरे सामने, अँधेरे में, दो आँखें खुलीं — पर वो आँखें नहीं थीं। वो दो गहरे, जलते हुए सुराख़ थे, जिनमें कोई पुरानी, ठंडी आग सुलग रही थी। और मैं जान गई — ये वही था। 'आग के पार रहने वाला'। वो चीज़ जिसने डेढ़ सौ साल पहले मेरे पुरखे से सौदा किया था।
उसकी आवाज़, जब आई, तो वो हवा से नहीं आई। वो सीधे मेरे सिर के अंदर गूँजी — इतनी गहरी, इतनी भारी, कि मेरे कान से नहीं, मेरी हड्डियों से उसे महसूस हुआ। उसने कहा — तो तू भागने की सोच रही है, नन्ही।
मैं बोल नहीं पाई। मेरा गला सूख गया था।
उसने कहा — डेढ़ सौ साल से, तेरे खानदान का हर बच्चा जो मेरी निशानी लेकर पैदा हुआ, चुपचाप मेरे पास आया। किसी ने भागने की हिम्मत नहीं की। और तू... एक कमज़ोर हमज़ाद के इश्क़ के सहारे, और एक किताबों वाले लड़के की मदद से, मुझे मात देने चली है? — उसकी आवाज़ में एक ठंडी, गहरी हँसी घुली। तेरी हिम्मत की दाद देता हूँ।
मैंने काँपते हुए, न जाने कहाँ से हिम्मत बटोरकर कहा — मैं तुम्हारी क़ीमत नहीं हूँ। वो सौदा मैंने नहीं किया था।
एक पल के लिए, वो ठंडी आग और गहरी हो गई। फिर उसने जो कहा, उसने मुझे अंदर तक हिला दिया। उसने कहा — शायद तू सही कहती है। तो चल, मैं तुझे एक नया सौदा देता हूँ। तेरे पुरखे से भी बेहतर।
मैं ख़ामोश रही। और वो चीज़, जैसे मेरे दिल की सबसे कमज़ोर रग को जानती हो, बोली — तू उस हमज़ाद से मोहब्बत करती है। मैं जानता हूँ। और तू ये भी जानती है कि जिस अमल से तू बचेगी, वो अमल उसे मिटा देगा। है न? तू आज़ाद होगी, पर वो ख़त्म हो जाएगा। तेरे हाथों। हमेशा के लिए।
मेरी आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि वो सच कह रहा था। और वही मेरा सबसे बड़ा डर था।
उसने कहा — पर एक और रास्ता है, नन्ही। तू वो अमल मत कर। अमावस की रात, तू चुपचाप, अपनी मर्ज़ी से मेरे पास आ जा। बिना किसी लड़ाई के। और बदले में — मैं तेरे उस हमज़ाद को छोड़ दूँगा। उसकी ज़ंजीर तोड़ दूँगा। वो आज़ाद हो जाएगा। वो जिएगा। हमेशा। बस उसे तू खोनी होगी, तेरी जगह। एक जान के बदले एक जान। तू, उसके लिए।
और फिर, वो मौजूदगी धीरे-धीरे सिमटने लगी, वो जलते सुराख़ बुझने लगे, और जाते-जाते उसकी वो आवाज़ मेरे अंदर आख़िरी बार गूँजी — सोच ले, नन्ही। दो रातें हैं तेरे पास। या तो तू बच, और उसे खो। या वो बचे, और तू खो जा। दोनों में से एक तो जाएगा ही। फ़ैसला तेरा है।
कमरा फिर से normal हो गया। ठंड चली गई। पर मैं वहीं, अपने बिस्तर पर, जमी बैठी रह गई। क्योंकि उस चीज़ ने मुझ पर हमला नहीं किया था। उसने उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक कुछ किया था। उसने मेरे सामने वो चुनाव रख दिया था, जो मैं खुद से भी छुपा रही थी।

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