PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 17 — जाल

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
18 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
677
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगली शाम, आदिल और मैं उस पुराने घर तक पहुँचने का रास्ता, सामान, और अमल की हर चीज़ की तैयारी में लगे थे। हमने तय किया था कि हम अमावस से एक रात पहले वहाँ के लिए निकलेंगे। पर मुनीर बाबा — और उसके पीछे खड़ी वो चीज़ — हमें इतना वक़्त देने के मूड में नहीं थे।
रात होते-होते, आदिल किसी ज़रूरी सामान के लिए बाहर गया था, और मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में अकेली थी। और तभी, वही हुआ जिसका मेरे हमज़ाद को डर था।
पहले बत्ती गई। पूरी दुकान अँधेरे में डूब गई। फिर वही ठंड लौट आई — वो हड्डियों तक उतरने वाली ठंड, वो गीली राख की बू। और इस बार, वो पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। मुझे लगा जैसे कमरे की हर दीवार से अँधेरा रिस रहा हो, फ़र्श पर फैल रहा हो, मेरी तरफ़ बढ़ रहा हो। मैं दरवाज़े की तरफ़ भागी, पर दरवाज़ा जैसे जम गया था, हिल ही नहीं रहा था।
और फिर, हमेशा की तरह, वो आया। वो खुशबू, वो गर्मी, मेरे और उस ठंडे अँधेरे के बीच। उसने मुझे पीछे धकेला, अपने पीछे, और उस अँधेरे के सामने खड़ा हो गया। हवा उसकी उस गहरी, पुरानी आवाज़ से गूँज उठी। वो लड़ रहा था, मुझे बचा रहा था, जैसे उसने पहले बचाया था।
पर इस बार, कुछ और भी था।
जैसे ही मेरा हमज़ाद पूरी तरह प्रकट हुआ, अपनी पूरी ताक़त के साथ उस अँधेरे से लड़ने के लिए — कमरे की चारों दीवारों पर, अचानक, आग की लकीरों जैसे कुछ निशान जल उठे। नक़्श। आड़े-तिरछे, अजीब से निशान, ठीक वैसे ही जैसे मैंने मुनीर बाबा को अपने कमरे में बनाते देखा था। और मैं समझ गई — ये जाल था। मुनीर बाबा ने ये जाल पहले से यहाँ बिछा रखा था। वो जानता था कि जब भी मुझ पर हमला होगा, मेरा हमज़ाद मुझे बचाने ज़रूर आएगा — और जिस पल वो पूरी तरह प्रकट होगा, वही नक़्श उसे जकड़ लेंगे।
वो अँधेरा मेरा शिकार करने नहीं आया था। वो मेरे हमज़ाद को फँसाने के लिए एक चारा था।
मैंने देखा — वो आग की लकीरें उसके चारों तरफ़ सिकुड़ने लगीं, उसे बाँधने लगीं। पहली बार, मैंने उसे तकलीफ़ में देखा। उसकी वो खुशबू, जो हमेशा गहरी और स्थिर रहती थी, अब लड़खड़ाने लगी, कमज़ोर पड़ने लगी। कमरे में उसकी आवाज़ गूँजी — पर इस बार उसमें दर्द था। उसने चीखकर कहा — ज़ोया, भाग! अभी! जब तक मैं इसे रोक सकता हूँ!
पर मैं जम गई थी। मैं उसे यूँ तड़पते नहीं छोड़ सकती थी।
तभी दरवाज़ा खुला — आदिल लौट आया था। उसने एक नज़र में सब समझ लिया। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी चीज़ निकाली — उसके दादा की बनाई कोई निशानी — और उन जलते नक़्श में से एक पर फेंक दी। एक पल के लिए, वो लकीरें टिमटिमाईं, टूटीं। और उस एक पल में, मेरा हमज़ाद उस जाल से खुद को खींचकर बाहर निकाल पाया — और वो ठंडा अँधेरा, अपना चारा नाकाम होते देख, धीरे-धीरे सिमटकर गायब हो गया।
बत्ती लौट आई। पर कमरे में जो सन्नाटा था, वो पहले जैसा नहीं था। क्योंकि इस बार, वो जीत नहीं थी।
मेरे हमज़ाद की खुशबू, जो हमेशा पूरे कमरे में भर जाती थी, अब बहुत हल्की थी, बहुत दूर की, जैसे कोई बुझती हुई लौ। उसकी आवाज़, जब आई, तो इतनी धीमी थी कि मुझे उसे सुनने के लिए साँस रोकनी पड़ी। उसने कहा — उसने... उसने मेरा एक हिस्सा बाँध लिया। मैं अभी भी हूँ। पर मैं वो नहीं रहा जो कल था। मेरी ताक़त... कम हो गई है।
आदिल ने धीरे से कहा — मुनीर बाबा जानता था। वो अमावस से पहले तुम्हारे हमज़ाद को कमज़ोर करना चाहता था, ताकि उस रात, जब वो चीज़ ज़ंजीर खींचे, तो तुम्हारा हमज़ाद तुम्हें बचाने लायक ही न बचे।
मैंने अपने उस बुझते हुए हमज़ाद की तरफ़, अँधेरे में, बेबसी से देखा। और मुझे पहली बार एहसास हुआ कि इस लड़ाई में, हम हार भी सकते हैं। क्योंकि जो एक ताक़त हमेशा मेरे साथ खड़ी थी, वो अब, धीरे-धीरे, मेरी आँखों के सामने, बुझ रही थी।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

हमज़ाद · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories