PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 16 — तैयारी

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
17 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
774
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगले दिन, मैंने माँ से कहा कि मुझे office के काम से दो दिन बाहर रहना पड़ेगा, और मैं अपनी एक सहेली के पास रुकूँगी। ये झूठ था। सच ये था कि मैं आदिल के पास जा रही थी — क्योंकि अब मेरे पास सिर्फ़ तीन रातें थीं, और उन तीन रातों में मुझे वो सब सीखना था जो मुझे अमावस की रात करना था।
आदिल की उस पुरानी किताबों की दुकान के पीछे वाले कमरे में, हमने वो बही खोलकर रख दी — उसके दादा की लिखी हुई, मीर साहब के फटे पन्नों की नक़ल। और जैसे-जैसे हमने उसे पढ़ा, मुझे समझ आने लगा कि ये जितना मैंने सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल था।
कर्ज़ तोड़ने का वो अमल — मीर साहब के अमल को उलटा करना — कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो मैं अपने कमरे में बैठकर कर लेती। बही में साफ़ लिखा था कि ये अमल वहीं किया जा सकता है जहाँ वो गाँठ बाँधी गई थी। यानी उसी जगह, जहाँ डेढ़ सौ साल पहले मीर साहब ने वो चिल्ला किया था, जहाँ 'आग के पार रहने वाले' के साथ वो सौदा हुआ था। उनका पुराना घर। वो कमरा।
आदिल ने बताया कि उसके दादा को उस घर के बारे में पता था — शहर से कुछ घंटे दूर, एक पुराने, अब लगभग उजड़ चुके क़स्बे में, वो हवेलीनुमा घर आज भी खड़ा है। खाली, वीरान, जहाँ बरसों से कोई नहीं रहता। लोग उससे दूर रहते हैं। और अमावस की रात, ठीक उसी वक़्त जब मीर साहब ने वो सौदा किया था, मुझे उसी कमरे में, उस चीज़ के सामने खड़े होकर, अपने ही लहू से वो अमल उलटा करना था।
मैंने आदिल से पूछा — और अगर मैं बीच में डर गई? अगर वो चीज़ मुझे उस अमल को पूरा करने से पहले ही खींच ले गई?
आदिल कुछ पल चुप रहा। फिर उसने कहा — इसीलिए मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, ज़ोया। तुम अकेली नहीं जाओगी। पर मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा — ये ख़तरनाक है। बहुत ख़तरनाक। उस रात, उस कमरे में, तुम आग और अँधेरे के बीच अकेली खड़ी होगी, और तुम्हें अपना यक़ीन, अपना हौसला, एक पल के लिए भी नहीं खोना होगा। बिलकुल वैसे ही जैसे चिल्ले में नहीं खोना होता।
मैं सुन रही थी, समझ रही थी। पर मेरा एक हिस्सा कहीं और था। क्योंकि इस पूरी बातचीत में, एक बात थी जो मैं आदिल को नहीं बता पा रही थी। ये अमल मुझे बचा तो लेगा — पर उसे मिटा देगा। और आदिल के लिए ये आसान था, क्योंकि उसके लिए वो हमज़ाद सिर्फ़ एक ख़तरा था, एक कर्ज़ का हिस्सा। पर मेरे लिए... मेरे लिए अब वो सिर्फ़ ख़तरा नहीं रह गया था।
और जैसे ही मेरे मन में ये ख़याल आया, मुझे महसूस हुआ — कमरे की हवा में, उन पुरानी किताबों की महक के नीचे, बहुत हल्की-सी, वो खुशबू घुल गई थी। वो यहाँ था। वो हमेशा की तरह मेरे साथ था, आदिल के इतने पास बैठा देख रहा था, सुन रहा था। और मैं जानती थी कि आदिल का 'मैं तुम्हारे साथ चलूँगा' उसे किस तरह चुभा होगा।
उस रात, जब मैं आदिल की दुकान के ऊपर वाले छोटे से कमरे में अकेली लेटी थी, तो वो आया। पर इस बार उसमें कल वाला गुस्सा नहीं था। बस एक थकान थी, और एक फ़िक्र। उसने कहा — तुम उस पुराने घर जाने की सोच रही हो।
मैंने कहा — मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है।
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, उसने जो कहा, उसने मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ा दी। उसने कहा — ज़ोया, एक बात सुन। जब से तूने ये अमल करने का फ़ैसला किया है, कुछ बदल गया है। मैं महसूस कर सकता हूँ। 'वो' — आग के पार रहने वाला — उसे तेरा इरादा पता चल गया है। तेरे मन का इरादा उस तक पहुँच रहा है, उस ज़ंजीर के ज़रिए जो मुझे उससे बाँधती है। और वो नाराज़ है।
मैंने घबराकर पूछा — तो वो क्या करेगा?
उसने कहा — वो अमावस का इंतज़ार नहीं करेगा। जब किसी शिकार को ये पता चल जाए कि वो भाग सकता है, तो शिकारी उसे पहले ही जकड़ लेता है। वो तुझ तक पहुँचने की कोशिश करेगा, उन तीन रातों में से किसी एक में। और सबसे बुरी बात — वो अकेला नहीं आएगा। उसके पास इस दुनिया में एक आदमी है, जो उसके लिए दरवाज़े खोलता है। वो आदमी, जो तेरी माँ के भरोसे को हथियार बनाकर, तेरे अपने घर में बैठा है।
मुनीर बाबा।
उस रात मुझे नींद नहीं आई। क्योंकि मैं समझ गई थी — अब लड़ाई अमावस की नहीं रही। लड़ाई अब, इसी पल से, शुरू हो चुकी थी।

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