PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 15 — जलन

Pretika · Jinn & Spirits · 5 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
16 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
5 min
Words
814
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस रात, जब मैं घर लौटी, तो मेरे अंदर पहली बार एक अजीब सी हिम्मत थी। मेरे पास अब एक रास्ता था। एक साथी था। और सबसे बड़ी बात — मेरे पास वो जानकारी थी जो मुनीर बाबा नहीं चाहते थे कि मुझ तक पहुँचे। पर जिस पल मैं अपने कमरे में दाख़िल हुई, मुझे महसूस हुआ कि कुछ बदला हुआ है।
वो खुशबू, जो हमेशा गरम और गहरी होती थी, आज कमरे में भरी हुई थी — पर इस बार वो अलग थी। भारी। तीखी। जैसे धुआँ जब गुस्से में हो। और कमरे का तापमान गरम था, पर आरामदेह गर्मी नहीं। ये वो गर्मी थी जो किसी सुलगती हुई चीज़ के पास होती है। मैं समझ गई। वो नाराज़ था।
मैंने धीरे से कहा — तुम... तुम वहाँ थे? उस दुकान में?
उसकी आवाज़, जब आई, तो पहली बार उसमें वो नरमी नहीं थी। वो ठंडी थी, और उसके नीचे कुछ खौलता हुआ। उसने कहा — मैं हर जगह हूँ जहाँ तू है, ज़ोया। जन्म से। तो हाँ, मैं वहाँ था। मैंने सब देखा। मैंने देखा उसने तेरे हाथ पर अपना हाथ रखा। और मैंने देखा कि तूने अपना हाथ हटाया नहीं।
मेरे अंदर एक अजीब सी घबराहट दौड़ गई। मैंने कहा — आदिल सिर्फ़ मेरी मदद कर रहा है। उसके पास वो पन्ने हैं। वो जानता है कि इस कर्ज़ को कैसे तोड़ना है...
हाँ, उसने मेरी बात काटी, और उसकी आवाज़ में वो खौलता हुआ हिस्सा और तेज़ हो गया, वो जानता है कि इस कर्ज़ को कैसे तोड़ना है। और वो ये भी जानता है कि उस कर्ज़ को तोड़ने में, मैं मिट जाऊँगा। है न? उसने तुझे बताया होगा। और फिर, बड़ी नरमी से, अपना हाथ तेरे हाथ पर रख दिया होगा। कितना आसान है न उसके लिए — मुझे रास्ते से हटाना, और फिर तेरे पास आ जाना।
पहली बार, मुझे उससे डर लगा। क्योंकि उस आवाज़ में अब वो हमज़ाद नहीं था जो मुझे भाप पर 'भागो' लिखकर बचाता था। उसमें वो चीज़ थी जिसकी बात मुनीर बाबा ने की थी — वो सैकड़ों साल पुरानी, आग से बनी ताक़त, जिसे किसी को खोने का डर इंसानों से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बना देता है। कमरे का आईना अपने आप हिलने लगा। मेज़ पर रखी चीज़ें थरथराने लगीं। और वो खुशबू इतनी तेज़ हो गई कि मेरा दम घुटने लगा।
मैंने काँपते हुए कहा — तुम मुझे डरा रहे हो।
और जैसे ही मैंने ये कहा, सब कुछ रुक गया। आईना थम गया। चीज़ें शांत हो गईं। और वो तीखी खुशबू धीरे-धीरे फिर से नरम होने लगी। कुछ पल के लिए कमरे में सिर्फ़ मेरी साँसों की आवाज़ थी।
फिर उसकी आवाज़ आई — और अब उसमें गुस्सा नहीं था। उसमें कुछ और था, जो मुझे गुस्से से कहीं ज़्यादा चुभा। उसमें दर्द था। उसने कहा — माफ़ कर दे। मैं तुझे कभी नहीं डराना चाहता था। पर तू समझती नहीं, ज़ोया। मैं तुझे तेरी पहली साँस से देख रहा हूँ। और इन सब सालों में, मैं कभी तुझे छू नहीं पाया — सच में नहीं। मैं तेरे बालों में उलझ सकता हूँ, तेरी त्वचा पर एक निशान छोड़ सकता हूँ, तेरे कान के पास साँस ले सकता हूँ — पर मैं कभी वो नहीं कर पाया जो उस लड़के ने आज किया। मैं कभी दिन के उजाले में तेरे साथ नहीं चल पाया। मैं कभी तेरा हाथ थामकर तुझे ये नहीं कह पाया कि 'तू अकेली नहीं है'।
वो एक इंसान है, उसने आगे कहा। वो तुझे वो सब दे सकता है जो मैं कभी नहीं दे सकता। और सबसे बुरी बात — तुझे बचाने का जो एक रास्ता है, उस रास्ते के आख़िर में, वो तेरे साथ होगा... और मैं नहीं।
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। क्योंकि उसकी हर बात सच थी। और उस सच में इतना दर्द था कि मैं उससे नाराज़ भी नहीं रह पाई।
उसने आख़िर में, बहुत धीरे से, लगभग एक फुसफुसाहट में कहा — मैं चाहता हूँ तू बच जाए, ज़ोया। सच में। भले ही उसकी क़ीमत मेरा मिट जाना हो। पर एक बार, सिर्फ़ एक बार, अमावस से पहले, मैं चाहता हूँ कि तू ये जान ले कि मेरा होना कैसा था। मैं चाहता हूँ कि तू मुझे सिर्फ़ एक 'साया' या एक 'कर्ज़' की तरह याद न रखे।
और उस रात, कमरे की उस गरम, नरम खुशबू में, अपने उस जागे हुए हमज़ाद के साथ अकेली बैठी, मुझे पहली बार समझ आया कि मेरी असली लड़ाई उस 'आग के पार रहने वाले' से नहीं थी। मेरी असली लड़ाई अपने ही दिल से थी। क्योंकि अब मुझे सिर्फ़ अपनी जान नहीं बचानी थी — मुझे ये भी तय करना था कि जिसे बचाना है और जिसे खोना है, उन दोनों में से मेरा दिल किसे चुनता है। और अमावस में, अब सिर्फ़ तीन रातें बची थीं।

Comment Question
अब सबसे बड़ा सवाल — ज़ोया का दिल किसे चुनना चाहिए? सिर्फ़ एक शब्द में comment करो — “हमज़ाद” या “आदिल”।

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