PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 14 — जो चेतावनी भेज रहा था

Pretika · Jinn & Spirits · 5 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
15 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
5 min
Words
812
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

वो पता शहर के एक पुराने हिस्से में था — तंग गलियाँ, पुराने मकान, और एक छोटी सी किताबों की दुकान, जिसके बोर्ड पर धुँधले अक्षरों में कुछ लिखा था। जब मैं अंदर गई, तो वहाँ पुरानी किताबों की वो ख़ास महक थी, और counter के पीछे एक नौजवान खड़ा था — मेरी ही उम्र का, शायद थोड़ा बड़ा, शांत आँखें, और चेहरे पर एक ऐसी थकान जो उम्र से नहीं, फ़िक्र से आती है।
उसने मुझे देखते ही पहचान लिया। उसने कहा — ज़ोया? मैं आदिल हूँ। मैं ही वो messages भेज रहा था।
मैं सावधान थी। मैंने कहा — तुम मुझे जानते कैसे हो? और तुम्हें इस सब के बारे में पता कैसे है — मेरे हमज़ाद के बारे में, उस कर्ज़ के बारे में?
आदिल ने दुकान का दरवाज़ा अंदर से बंद किया, और मुझे पीछे एक छोटे से कमरे में ले गया, जहाँ चारों तरफ़ पुरानी किताबें, काग़ज़ात, और कुछ हाथ से लिखी बहियाँ रखी थीं। उसने कहा — क्योंकि मेरे दादा वही अमिल थे, जिन्होंने तुम्हें बचपन में वो चाँदी का ताबीज़ पहनाया था।
मैं चौंक गई। आदिल ने आगे बताया — मेरे दादा एक अमिल थे, पर मुनीर बाबा जैसे नहीं। उनका पूरा जीवन इसी काम में गुज़रा। तुम्हारे खानदान जैसे कई खानदान हैं, ज़ोया, जिन्होंने कभी न कभी इन जिन्नात की ताक़तों से सौदे किए, और उन सौदों की क़ीमत उनकी आने वाली नस्लें चुकाती रहीं। मेरे दादा उन्हीं 'क़ीमत' बने बच्चों को बचाने की कोशिश करते थे। जब तुम एक जागे हुए हमज़ाद के साथ पैदा हुईं, तो तुम्हारी नानी मेरे दादा के पास आई थीं। और मेरे दादा ने वो ताबीज़ बनाया, जो तुम्हें और तुम्हारे हमज़ाद को अलग रखे, ताकि वो कर्ज़ वसूलने का रास्ता कभी खुल न पाए।
मैंने पूछा — तो अब तुम मेरी मदद क्यों कर रहे हो?
मेरे दादा कुछ साल पहले गुज़र गए, आदिल ने धीरे से कहा। पर मरने से पहले, उन्होंने मुझे एक ज़िम्मेदारी दी। उन्होंने कहा था कि जिन बच्चों के ताबीज़ उन्होंने बनाए हैं, उन पर नज़र रखना, क्योंकि जिस दिन वो ताबीज़ किसी से छूटेगा, उस दिन ख़तरा फिर लौट आएगा। पिछले साल, जब तुमने अपना ताबीज़ खोया, तो मेरे दादा की बनाई हुई एक निशानी ने मुझे ख़बर दे दी। तब से मैं तुम पर नज़र रखे हुए था। और जब मैंने देखा कि तुम्हारी माँ मुनीर बाबा को बुला रही हैं, तो मुझे तुम्हें चेताना पड़ा।
मैंने पूछा — तुम मुनीर बाबा के बारे में कैसे जानते हो?
आदिल का चेहरा सख़्त हो गया। उसने कहा — क्योंकि मेरे दादा उन्हें जानते थे। मुनीर बाबा भी 'क़ीमत' बने बच्चों को 'बचाने' के नाम पर उन खानदानों में जाते हैं। पर वो बचाते नहीं। जिन-जिन बच्चों के पास वो गए, वो सब अमावस की रात के बाद ग़ायब हो गए। और हर बार, उसके बाद, मुनीर बाबा की ताक़त और बढ़ जाती। मेरे दादा उन्हें बरसों से रोकने की कोशिश कर रहे थे, पर कभी सबूत नहीं जुटा पाए।
मैंने उसे वो सब बताया जो मैंने उस दोपहर सुना था — मुनीर बाबा का वो काला अमल, वो सौदा, एक हमज़ाद के बदले एक ज़िंदगी। आदिल ने आँखें बंद कर लीं, जैसे उसे अपने दादा की हर बात सच होती दिख रही हो।
फिर उसने वो निकाला जिसके लिए मैं आई थी। एक पुरानी बही, जिसमें उसके दादा ने बहुत साल पहले, मीर साहब की डायरी के उन फटे हुए पन्नों की नक़ल उतारी थी — कर्ज़ तोड़ने का तरीक़ा।
पर जैसे-जैसे आदिल ने वो पढ़ा, उसका चेहरा उतरता गया। आख़िर में उसने बही नीचे रखी और मेरी आँखों में देखा। उसने कहा — ज़ोया, रास्ता तो है। तुम्हारा हमज़ाद सच कह रहा था। अमावस की रात, उसी वक़्त, उस चीज़ के सामने, तुम्हें मीर साहब का अमल उलटा करना होगा। ये कर्ज़ टूट जाएगा। वो चीज़ तुम पर से अपना हक़ खो देगी। तुम आज़ाद हो जाओगी।
उसने एक पल रुककर, बहुत नरमी से कहा — पर इस अमल में, जो हमज़ाद उस कर्ज़ से बँधा है, यानी तुम्हारा हमज़ाद, वो भी उसी के साथ मिट जाएगा। कर्ज़ तोड़ने का मतलब है, उसे खोना। हमेशा के लिए।
मैं ख़ामोश बैठी रही। ये बात मैं पहले से जानती थी। पर किसी और के मुँह से, इतने साफ़ लफ़्ज़ों में सुनकर, वो और भी भारी लगी। मेरे सामने दो ही रास्ते थे। या तो मैं मर जाऊँ — या वो मिट जाए।
और आदिल, जो अब तक एक अजनबी था, उसने बहुत धीरे से मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा और कहा — मैं तुम्हारे साथ हूँ, ज़ोया। इस पूरी लड़ाई में। तुम अकेली नहीं हो। उसका हाथ गरम था। इंसानी गरम। और उस पल, न जाने कितने दिनों बाद, मुझे थोड़ी-सी हिम्मत महसूस हुई।
पर मुझे तब नहीं पता था कि उस कमरे में, उस पल, कोई और भी था। कोई जो सब देख रहा था। कोई जिसकी खुशबू, अचानक, बहुत हल्की-सी, उस पुरानी किताबों की महक में घुल गई थी।

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